सत्यदेव त्रिपाठी
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रंगमंच
‘बिहार में चुनाव लड़ने’ से ‘निमकी मुखिया’ बनने तक…
‘मंच’ (मुम्बई-पटना-छोटका कोपा) के विजय कुमार वह 21वीं सदी के शुरुआती दिन थे…। उन दिनों मुझे विश्वविद्यालय जाना…
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रंगमंच
‘डिप्लोमा इन करप्शन’ के मंचन की जानिब से
पिछले शनिवार, 12 फ़रवरी की शाम सातबंगला, मुंबई में ‘वेदा फ़ैक्ट्री आर्ट स्टूडियो’ में सुरेंद्र चतुर्वेदी लिखित नाटक ‘डिप्लोमा…
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रंगमंच
जीवन और रचना : आमने-सामने
निदा फ़ाज़ली का शेर है – ‘कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे; हक़ीक़त भी कहानी-कार हो,…
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संस्मरण
जेरी के जल्वे
उस शाम घर में घुसते ही बेटे ने बड़ी हसरत भरे खिलन्दड़ेपन के साथ जेब में हाथ डालकर जैसे…
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संस्मरण
भोजपुरी कविता के सफरमैना हरिराम द्विवेदी को याद करते हुए…
सत्यदेव त्रिपाठी हनुमंत नायडू की कविता है – ‘रोना तक भूल गया, मन इतना रोया है’। वही हाल मेरे…
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कहानी
तीसरी कसम : पोर-पोर में प्रेम
कहना तो ये चाहता हूँ कि ‘तीसरी कसम’ न होती, तो फिल्मों में प्रेम की चर्चा न हो पाती……
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