रंगमंच

शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने

 

मुंबई के ‘केशव गोरे ट्रस्ट’ सभागार में शहर की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के दूसरे दौर का 27वां मासिक आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रमुख वक्तव्य देते हुए डॉ. दयानंद तिवारी ने मोहन राकेश को अपने समय का सशक्त रचनाकार कहा, जिन्होंने साठ के दशक में प्राध्यापक की सुरक्षित नौकरी को छोड़कर पूर्णकालिक लेखक बनने का फ़ैसला किया। डॉ तिवारी ने एक साक्षात्कार के हवाले से बताया कि अपनी तीसरी पत्नी अनिताजी के पूछने पर उन्हें बताया था कि उनके जीवन में पहला स्थान लेखन का था, दूसरा स्थान मित्रों का और पत्नी कहीं तीसरे स्थान पर आती थीं। यह बात एक सच्चे लेखक के विशिष्ट और स्वतंत्र व्यक्तित्व को उजागर करती है। राकेश जी द्वारा साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सशक्त लेखन का उल्लेख करते हुए तिवारी जी ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ‘मलबे का मालिक’ जैसी प्रासंगिक कहानी के बार-बार लिखे जाने की आवश्यकता बतायी। इसी तरह नाट्य परम्परा की चर्चा करते हुए डॉ. तिवारी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं जयशंकर प्रसाद के बाद मोहन राकेश को आधुनिक हिंदी नाटक का तीसरा सशक्त पड़ाव बताया। उन्होंने निष्कर्ष रूप में कहा कि मोहन राकेश का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने रचना-काल में था।

वक्तव्यों के सिलसिले में कवि एवं विचारक डॉ. अनिल गौड़ ने ‘मोहन राकेश की रचनात्मकता के उत्स’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राकेशजी थे तो सिंधी, लेकिन अमृतसर में जन्म होने से वे पंजाबी सांस्कृतिक परिवेश में पले-बढ़े…। उस वक्त के संक्रमण क़ालीन दौर में, जब विभाजन की त्रासदी झेलता समाज बड़ी तेजी से बदल रहा था,  मोहन राकेश एक सशक्त रचनाकार के रूप में उभरते हैं। अनिल जी ने रेखांकित किया कि मोहन राकेश की किसी भी कहानी को पढ़ते समय पाठक को एक ऐसा रचनाकार स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जो बाह्य यथार्थ का सशक्त और सूक्ष्म चित्रण करता है, तो आंतरिक यथार्थ को भी उतनी ही गहनता से व्यक्त करता है। उनकी रचनाओं में करुणा का एक अथाह सागर लहराता है। यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति की ध्वनियाँ और चिंताएँ अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु उसका प्रभाव सदैव गहरा और दीर्घकालिक रहता है। इसे उन्होंने ‘गिरगिट का सपना’ कहानी के ज़रिए सिद्ध भी किया, जो एक ऐसी व्यंग्यात्मक कथा है, जिसमें ऊपर से करुणा कम दिखाई देती है, परंतु आंतरिक स्तर पर इसका पूरा ताना-बाना बेहद कारुणिक है। ‘सीमाएँ’, ‘उसकी रोटी’ और ‘मलबे का मालिक’ जैसी कहानियों का हवाला देते हुए वक्ता ने कहा कि मोहन राकेश ने जीवन की जिस बेचैनी को सीधे-सीधे पकड़ा है, वह आसान नहीं थी। प्रश्न यह है कि यह बेचैनी उनके भीतर आई कैसे? इस संदर्भ में अनिलजी ने मोहन राकेश के जीवन की एक मार्मिक घटना बतायी, जिसमें पिता के देहांत पर अंत्येष्टि के लिए घर में पैसे न थे। उनकी माता ने अपनी सोने की चूड़ियाँ बेचकर यह संस्कार पूरा कराया। तब मोहन राकेश की आयु लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया और ऐसे अनुभव उनके साहित्य की मूल संवेदना बन गये।

रचनाओं के साथ मोहन राकेश द्वारा अनूदित ग्रंथों- ‘मृच्छकटिकम्’ और ‘शाकुन्तलम्’…आदि- के  उल्लेख से गौड़जी ने कहा कि उनके उपजीव्य के तीन स्तर थे। एक ओर आधुनिक हिंदी साहित्य, दूसरी ओर ऊँचाई पर खड़ा अंग्रेज़ी साहित्य, और तीसरी ओर क्लासिक संस्कृत साहित्य। किन्तु वास्तविकता यह थी कि उनके पीछे खड़े थे भारतेंदु हरिश्चंद्र और एक प्रकार से प्रयोग-दूभर नाटक वाले जयशंकर प्रसाद। इन सभी सीमाओं को तोड़ते हुए मोहन राकेश के भीतर की बेचैनी ने उन्हें एक अनूठा और नायक रचनाकार बना दिया। डॉ. गौड़ ने यह प्रश्न भी उठाया कि कहानी लिखते-लिखते मोहन राकेश नाटक विधा की ओर क्यों मुड़ गये? और इसका उत्तर देते हुए आगे कहा कि क्लासिक साहित्य में कथा की अपेक्षा नाटक अधिक समग्र विधा है। इसमें नाटक में कहानी, कविता, संवाद, कथन और उपकथन—सब कुछ समाहित होता है। इसके माध्यम से रचनाकार अपनी बात अधिक व्यापक और प्रभावशाली ढंग से कह सकता है। डॉ. गौड़ ने कहा कि कुल मिलाकर मोहन राकेश एक विशिष्ट और चिरस्थायी रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएँ चाँद की तरह प्रकाशमान होकर आज भी पाठकों को भीतर तक स्पर्श करती हैं।

कवि रासबिहारी पांडेय जी ने मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक ‘लहरों के राजहंस’ के मर्म पर बात करते हुए कहा – महाकवि अश्वघोष के महाकाव्य ‘सौन्दरानंद’ पर आधारित इस नाटक में नाटककार ने मूल कथा के पात्रों और प्रसंगों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए उनमें अपेक्षित परिवर्तन किये हैं, जिससे यह रचना केवल ऐतिहासिक या पौराणिक न रहकर समकालीन जीवन की संवेदनाओं से जुड़ जाती है। नाटक का ताना-बाना लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति की खोज के बीच फँसे नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से निर्मित होता है। दोनों पात्र अनिर्णय की स्थिति में हैं- नंद का मन वैराग्य और अध्यात्म की ओर आकृष्ट है, जबकि सुंदरी लौकिक जीवन और सांसारिक सुखों के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करती है। किंतु यह द्वंद्व किसी स्पष्ट निर्णय तक नहीं पहुँच पाता, जिससे नाटक की वैचारिकी और गहराती है। मोहन राकेश अपनी रचनाओं के माध्यम से स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाते हैं। नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से सांसारिक सुखों के पक्ष और विपक्ष में दिये गये तर्क यह स्पष्ट करते हैं कि भोगों से तृप्ति संभव नहीं है। अंततः ‘लहरों के राजहंस’ लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के बीच चलने वाले अंतर्द्वंद्व की कथा है, जो मन की शांति के लिए अध्यात्म-मार्ग को अपरिहार्य बताती है।

कलाविद एवं नाट्य समीक्षक प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने ‘मोहन राकेश के नाटकों में स्त्री-पुरूष सम्बन्ध’ पर अपनी बात रखते हुए कहा – मोहन राकेश के तीनों नाटक मुख्यतः स्त्री केंद्रित हैं। सबके मूल में पुरुष के समक्ष उनमें द्वन्द्व व टकराहट है। पहले में दो स्त्री एक पुरुष, तो दूसरे में स्त्री-पुरुष के बीच दर्शन होता है, लेकिन दोनों में पुरुष चला जाता है घर छोड़कर…। बस, तीसरे में चार पुरुष हैं और सामने है सावित्री… जो नाम में सतीत्व का मिथक लिये हुए है, पर काम में उत्तर आधुनिक-सी है – चारो पुरुषों में अत्यधिक सुख की तलाश करती है। लेकिन अंत में इस तलाश की त्रासदी भी खूब स्पष्ट होती है, जो भोगवादी लिप्सा पर कड़ा तमाचा यूँ मारती है कि सबसे ठुकरायी जाकर सावित्री को लौटके उसी घर में आना पड़ता है, जिसे हरचंद छोड़ने को तत्पर है। त्रस्त होकर बाहर गये पति को भी बच्चा लेके आता है और इस तरह सिद्ध होता है कि ‘मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर ये दुनिया सारी है, तन का दुख मन पर भारी है’। याने सुख भौतिकता के पीछे भागने में नही है। क्या यही अंतिम हल है?

प्रकाशक एवं कवि रमन मिश्र जी ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर 1971 में मणि कौल द्वारा इसी नाम से बनायी फ़िल्म के प्रीमियर शो को देखने का हाल बताते हुए कहा कि यह आलोचकों द्वारा बेहद सराही गई और इसे ‘फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड’ भी मिला। यह अंग्रेज़ी में भी डब होकर ‘वन डे बिफ़ोर द  रेनी सीजन’ नाम से प्रदर्शित हुई। रमनजी के मुताबिक़ इस फ़िल्म की सब से बड़ी विशेषता रहा – भारतीय कला-सिनेमा के प्रतिष्ठित कैमरा-मैन के.के. महाजन का छायांकन। फिल्म में पेंटरली मिनिमलिस्ट़ फ्रेम्स का उपयोग किया गया। हर शॉट को बेहद सूक्ष्म, संतुलित और भाव-भरा निरूपित करने के लिए, जिसका  मकसद था – नाटकीय संघर्ष और पात्रों की भावनाओं की उथल-पुथल को दृश्य भाषा के ज़रिये स्पष्ट करना। अधिकांश दृश्यों को हिमालय के पर्वतीय इलाके में शूट किया गया, जिसमें पृष्ठभूमि को धवल  बनाकर दर्शाया गया। इसमें बाहरी वातावरण को धुंधला करने से पात्रों और उनके संवादों पर ध्यान केन्द्रित होता है। अधिकांश संवाद और भाव-भंगिमा एक झोपड़ी के भीतर होती है, जहाँ कैमरा स्थिर-संतुलित और धीरे चलने वाले शॉट्स का प्रयोग करता है। यह परम्परागत नाट्य रूप से हटकर सिनेमाई प्रयोगशीलता को दर्शाता है। इस फ़िल्म के निर्माण में संवादों को पहले रिकॉर्ड कर लेने का भी एक विरल प्रयोग हुआ। फिर उनसे बनते दृश्यों को शूट किया गया— जिससे पात्रों के चेहरे, भावों और वातावरण पर अधिक स्वतंत्र रूप से कैमरा केंद्रित हो सके। यह फिल्म श्वेत-श्याम रूप  में बनाई गई थी, जिससे दृश्य रूप में एक क्लासिकल मौन और दार्शनिक अनुभव मिल सके और जो नाटकीय भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करता रहे।

‘बतरस’ की नियमित प्रतिभागी प्रज्ञा मिश्र, जो एक कवयित्री होने के साथ-साथ पॉडकास्ट से भी जुड़ी हैं, ने मोहन राकेश की रचना ‘गिरगिट का सपना’ (बाल साहित्य) को ऐसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया कि इसकी संवेदनात्मक गहराई विशेष रूप से उभर कर असरकारक बन गयी। मोहन राकेश को कथाकार रवींद्र कालिया अपना कथा-गुरु मानते थे और दोनो के अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध भी रहे। इनसे प्रभावित होकर ही कालियाजी ने साहित्यिक संसार में प्रवेश किया। समय-समय पर राकेश जी ने उनका मार्गदर्शन भी किया। ऐसे रवींद्र कालिया द्वारा लिखी हुई भूमिका को रंगकर्मी दिनेश कुमार ने मंच पर अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की मित्रता को साहित्यिक जगत में ‘तिगड़ी’ के नाम से जाना जाता है। राजेंद्र यादव के दूसरे उपन्यास को पढ़कर मोहन राकेश ने जो पत्र लिखा था राजेंद्र यादव को, उसे रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने मंच पर अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया। रंगकर्मी एवं सिने अभिनेता सौरभ बंसल ने मोहन राकेश पर लिखी अपनी कविता का सशक्त पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने सराहा।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित निधि मिश्र एवं सुशील बौंठियाल ने वर्ष 2002 में रामगोपाल बजाज के निर्देशन में ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में क्रमशः मल्लिका और कालिदास की प्रमुख भूमिकाएँ निभाई थीं। दोनो ने भूमिकाओँ के लिए अपने चयन की मार्मिक प्रक्रिया के साथ ही उस दौरान हुए कठिन-सहज अनुभवों को भी साझा किया और नाटक के एक अंश का भी किया। पक्खड रंगकर्मी विजयकुमार ने थोड़े ही दिनों पहले तैयार करके ढेरों शोज़ किये नाटक ‘आधे अधूरे’ से काले शूट वाले आदमी को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। अनुभवी रंगकर्मी एवं लागी अभिनेता प्रमोद सचान जी ने अपने कलाकार साथियों (प्रतिमा सिन्हा, मधुबाला शुक्ला और सौरभ बंसल) के साथ मिलकर ‘आषाढ़ का एक दिन’ के विलोम को बड़े लहक़दार अंदाज में जीवंत कर दिया, जो खूब सराहा भी गया। 

कार्यक्रम के कुशल संचालन के दौरान विजयजी पंडित ने समय-समय पर मोहन राकेश से जुड़े महत्वपूर्ण संदर्भों का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम को समृद्ध भी किया और रोचक भी बनाये रखा। उनकी टिप्पणयों का सार यूँ रहा कि राकेशजी ने आधुनिकता को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझा था। उन्होंने उस कालखंड में इसके लिए चुस्त मोहरी की पतलूनें नहीं पहनीं, व्यवस्था को गालियाँ नहीं दीं, परम्परा को वक़्त-बेवक़्त कोसने का काम नहीं किया, बल्कि चली आती हुई परम्परा को कहीं मोड़कर, कहीं तोड़कर और कहीं बदलकर उसे अपने और समय के अनुरूप बना लिया। उनके आदर्श विदेशी लेखक नहीं रहे। उन्होंने फैशन के तौर पर भी विदेशी मान्यताएँ नहीं ओढीं। उनकी अपनी मान्यताएँ सहज जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप थीं और उनके मामले में यह किसी किस्म की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं करते थे…।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत के साथ हुआ।

मधुबाला शुक्ल

लेखिका प्राध्यापक व सुपरिचित समीक्षक एवं संस्कृति कर्मी हैं। सम्पर्क- vinitshukla82@gmail.com
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