रंगमंच

‘बिहार में चुनाव लड़ने’ से ‘निमकी मुखिया’ बनने तक…

 

‘मंच’ (मुम्बई-पटना-छोटका कोपा) के विजय कुमार

 

वह 21वीं सदी के शुरुआती दिन थे…। उन दिनों मुझे विश्वविद्यालय जाना हो या कहीं और, स्थानीय रेलगाड़ी (लोकल ट्रेन) पकड़ने के लिए देह-व्यायाम के हित घर से 15-20 मिनट की दूरी पर स्थित विलेपार्ले स्टेशन (मुम्बई) तक प्राय: चलकर ही आता-जाता था।

उस दिन तक़रीबन 11 बजे के आसपास स्टेशन पहुँचने ही वाला था कि पीछे से एक हाथ आहिस्ता से मेरे बाएं कन्धे पर महसूस हुआ और मैंने पलट कर देखा, तो एक युवा सज्जन को मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बड़ी गद्गदायमान मुद्रा में अपने दोनों हाथ सीने की ऊँचाई पर ले जाके जोड़े हुए नमस्ते करते पाया…। मुस्कान में फैले होंठ बटुर रहे हैं या बटुरे होंठ फैल रहे हैं, कहना मुश्क़िल था। उन्हीं फैले-बटुरे होठों के बीच से उतनी भर दिखती सामने की सुडौल दंत पंक्तियां मोहक लग रही थीं। छोटे कॉलर वाले आधी बाँह के कसे हुए (टाइट फिट) शर्ट से मेल खाते (मैचिंग) पैण्ट में सुदर्शन न सही, आकर्षक व्यक्तित्त्व के मालिक उस शख़्स को पहचानने में आधा मिनट भी न लगा… कि अरे, इसे तो अभी दसेक दिनों पहले नेहरू सेंटर में नाटक करते देखा था…बल्कि नाटक ही इसी का था और मुख्य भूमिका में भी यही था…सहसा नाम याद नहीं आया। सो, उससे बचते हुए झटपट पूछ बैठा –‘आप वो ‘माइस ऐण्ड मैन’ नाटक वाले हैं न’? और तपाक से जवाब आया – ‘जी सर, विजयकुमार कहते हैं मुझे…’ और मैंन लोक लिया था – ‘हाँ, हाँ भाई याद है…इतना अच्छा तो नाटक था…’!

‘जी सर, आपका विद्यार्थी हूँ – अपना बच्चा ही समझिए’…मैं तो मीठीबाई कॉलेज (लगभग दस मिनट के रास्ते) से ही आपके पीछे-पीछे आ रहा हूँ…भक्ति-भावभरे शब्दों को बोलने के अन्दाज़ में विनोद भरा हुआ था, बल्कि लहज़े में किंचित मसखरापन भी था…।

विजयकुमार से यह मेरी पहली निजी मुलाक़ात थी। बाद में पता लगा कि ये मसखरी अदाएं उनका स्थायी भाव हैं। लेकिन उस वक़्त मुझसे मित्रता करने या गाढ़ा परिचय बनाने का इरादा छिप न रहा था…। छिपाने का प्रयत्न भी नहीं हो रहा था – जान बूझकर ही…। तभी तो उस दिन ही वे गाड़ी से चर्च गेट तक साथ चले आये और परिचय…आदि की तमाम औपचारिक बातें हुईं। यूँ विजय की सहज वृत्ति है कि जब नाटकों के प्रदर्शन या नाट्याभ्यास…आदि न हों – याने वह मुक्त हो, तो कहीं भी चल देता है। उसकी इस वृत्ति ने भी आगे के सम्बन्धों में बड़ी नज़दीकियाँ ला दीं व मज़े की यात्राएँ भी करायीं…। लेकिन उस दिन के लिए तो मुझे आज तक यही क़यास है कि वह पीछे-पीछे आना संयोगन नहीं, इरादतन था – अता-पता निकाल कर पीछा किया गया था। ऐसा करने का कारण एवं पृष्ठभूमि बनी थी – ‘नेहरू सेंटर’ के नाट्योत्सव पर ‘महानगर’ दैनिक में छपी मेरी समीक्षा, जिसमें इनके नाटक ‘माइस ऐंड मैन’ पर हुई बेहद बेबाक़ चर्चा में विजय द्वारा इरादतन की गयी कारस्तानी मुझसे आदतन उजागर हो गयी थी। असल में नाटक तो अच्छा बना था…।

स्टीनबेक के इस नाटक में मूलतः अपना गाँव-देश छोड़कर सुदूर आये मज़दूरों की व्यथा-कथा थी। इसे विजयकुमार ने इतिहास की उस पीड़ा से जोड़ दिया था, जिसमें पुरबिहा मज़दूर वर्ग अपना गाँव छोड़कर कभी मॉरीशस व सूरीनाम व क़ायम के तौर पर आज तक मुम्बई-कलकत्ता व लुधियाना-पटियाला…आदि शहरों में कमाने चला जाता है– गीत मशहूर हुआ था हमारे बचपन में – ‘छ-छ पैसा, चल कलकत्ता…’। वहाँ के ढेरों शोषणों-संघर्षो-संत्रासों में अपने गाँव को याद करता है, कभी उसी भाव में गाता-बजाता भी है…इस तरह उस पीड़ा से त्राण पाता है। और कुछ ताज़ा होकर सुबह उठते ही फिर दिन भर के जानलेवा संघर्ष में जुट जाता है। धीरे-धीरे पता चला कि विजयकुमार की नाट्य-चेतना के यही दो प्रमुख आयाम हैं – वर्गीय दंश पर आधृत सामाजिक चेतना व उसे सम्बल देकर डटाये रहने वाली लोकचेतना। लोकचेतना का कमाल यह कि ऐसे नाटक में भी ‘गोंदिया होतें एगो ललनवां तनी खेलउतिवं ननदी’ जैसा लोकगीत (सोहर) सटीक फ़िट कर देना विजय जैसे बिरले के ही वश का था…।

विजय कुमार और सत्यदेव त्रिपाठी

लेकिन इन सबके साथ ही उस प्रस्तुति में विजय की नीयत कुछ गड़बड़ा गयी थी…हिन्दी रूपांतर में उसने ढेर सारी अंग्रेज़ी डलवा दी थी– इतनी कि हिंग्लिश नाटक कहा जाये, तो ही सही पहचान हो, जबकि उत्सव में वह हिन्दी नाटक के रूप में चयनित व प्रचारित हुआ था। दर्शक व नाट्य-संहिता के साथ हुए इस छल से मुझे बड़ी चिढ़ है। सो, विजय के निहित मक़सद समेत पूरे विस्तार से मैंने बता दिया था कि विदेश (दुबई) से इस नाटक के शो के आमंत्रण की चर्चा है। एनएसडी के लोग हैं। फ़िल्म व टीवी में कमाने के काम में लगे हैं। लेकिन नाटक का लेबल छोड़ना चाहते नहीं और नाट्याभ्यास वग़ैरह का समय मिलता नहीं। सो, इस प्रदर्शन का उपयोग दुबई में शो के लिए बतौर अभ्यास (रिहर्सल) किया है। अंग्रेज़ी डालने का यही सबब है…। हालाँकि यह भी विजय का तब व्यामोह ही था, जो बाद में टूटा भी। क्योंकि ऐसा होता नहीं। ‘तुम्हारी अमृता’ जैसे नाटक में दो लोग बैठकर सिर्फ़ संवाद बोलते – ख़ालिस हिंदुस्तानी में। अंग्रेज़ी के लिए ऐसा कोई समझौता बिलकुल नहीं। और इतना लोकप्रिय हुआ –इतना खेला गया कि उन दिनों उसी ने हिन्दी नाटकों के विदेश-गमन का चलन शुरू कर दिया। फिर शायद विजय का कोई नाटक दुबई…वग़ैरह गया भी नहीं –दोहरा व्यामोह गुनाहे बेलज्जत ही हुआ!!

उस बेबाक़ समीक्षा से विजय समझ गये होंगे…। रहा-सहा ‘नेहरू नाट्योत्सव’ के तत्कालीन इंचार्ज क़ाज़ी साहब व आयोजक पवार साहब समेत…लोगों ने शायद बता भी दिया हो (क्योंकि उनसे विजय के अच्छे सम्बन्ध जहिराए बाद में) कि मैं निर्देशकादि से मिलूँ, न मिलूँ– उनसे हमारी पटे, न पटे, सही-सही कुंडली ज़रूर निकाल लेता हूँ और उसे बाँच के सुना भी देता हूँ…। फ़िर विजय तो अपने जन्म-स्थान ‘छोटका कोपा’ (नौबतपुर प्रखंड) व पास ही स्थित बिहार की राजधानी पटना से शुरू होकर दिल्ली व रानावि (राष्ट्रीय नाट्या विद्यालय) के बाद एकाध साल लंदन के अनुभव और थिएटर करने के दौरान पूरे देश में न जाने किस-किस घाट का पानी पीते-पिलाते हुए मुम्बई के रंग-जगत में जमने आये थे। सो, जानने के बाद वह मिलना अपने मसखरेपन में ही सही, मित्रता बनाने जैसा था, जो चर्चगेट तक की यात्रा में समझ में भी गया था…। फिर भी मुझे तो चार कदम आगे बढ़ के मिलना ही था, क्योंकि मेरे लिए उनका नाटक वाला होना ही पर्याप्त था…।

लेकिन धीरे-धीरे यह सम्बन्ध रंगकर्मी व रंग समीक्षक से आगे बढ़कर दोस्ताने में बदला व फिर घरेलू होता गया – आज तक चल रहा है…। और आज मै कह सकता हूँ कि बीस-पचीस सालों के अपने नियमित नाट्य समीक्षा-कर्म के समय से लेकर अब कभी-कभी फुटकर लिखने तक विजय के साथ मेरे सम्बन्ध प्रगाढ़ न सही, जितने नज़दीकी बने – काफ़ी घरेलू, उतने किसी और थिएटर-कर्मी के साथ नहीं बने। पहल उसी ने की, ऊपर स्पष्ट हुआ और आगे बढ़कर मिला-सटा, तो हम भी हमेशा सहारते हुए एकदम सहर्ष जुड़ गये…। विजय अकेला रंगकर्मी ही नहीं, पूरे साहित्य-कला जगत का भी ऐसा इकला साथी है, जो मुम्बई-बनारस व गाँव – सम्मौपुर के मेरे तीनों घरों में तो गया व रहा ही है, ससुराल वाले घर (लुनावड़ा, गोधरा) भी सप्ताह भर रहा है, जो उसकी बेधड़क मिलनसारिता व घुमंतू वृत्ति का परिणाम है। और हर जगह ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’ का मंचन भी हुआ है– बस, बनारस के ‘रंगशीर्ष’ में शो बाक़ायदा संकल्पित ही था, लेकिन कोरोना की भेंट चढ़ गया। मैं भी मुम्बई में विजय के मालाड व लोखंडवाला के घरों में आने-जाने के अलावा जब पटना में उसका ‘पावस नाट्योत्सव’ हुआ और गाँव की ‘मंच-टीम’ ने ‘गोदान’ का शो मगही में किया था, तो मौजूद रहा था। इस प्रकार घर से लेकर बाहर तक मिलने में नाटक ही निमित्त भी रहा व प्रयोजन भी। इसी तरह सुबह चार बजे उठना मेरी बचपन की और विजय की भी क़ायम की आदत है। उठक़र वह अपने अध्ययन से नाट्यज्ञान एवं व्यायाम…आदि से अभिनय-कौशल को बढ़ाने के उपक्रम करता है… तो कई बार 5 बजे फ़ोन पर हमारी लम्बी बातें होतीं…कई बार 6 बजे जहू पर मिलके घंटों टहलते हुए भी बातें ही बातें…अपने सुखों-दुखों की, दुनिया-जहान की, साहित्य-नाटक की…। फिर रंगकर्म से संचालित यात्राएँ भी हुईं। कुल मिलाकर यह कि इन सबके यथास्थान विवरण सहित तब से इन लगभग दो दशकों के गहन साथ के दौरान विजय कुमार का जो व्यक्तित्त्व व नाट्यकर्म मेरे पल्ले पड़ा, उसी की दास्तान होगा यह स्मरण-लेख – अपने सम्बन्धों की चासनी के साथ…।

यह सम्बन्ध उक्त पहली मुलाक़ात (2003) से जब शुरू हुआ, तो नाट्य क्षेत्र में विजय की पहचान उसके अब तक के सबसे लोकप्रिय नाटक ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’ की थी – हालाँकि वह ‘रेणु के रंग’…जैसे तमाम अच्छे काम और भी कर चुका था। उसी तरह आज (2020-21) के दौर में यदि विजय के कलाकर्म की जानिब से कहूँ, तो वह दूरदर्शन-धारावाहिक ‘निमकी मुखिया’ के तेतर सिंह के लिए प्रख्यात है, जबकि ‘रुक जाना नहीं’, ‘चाँद छुपा बादल में’ और ‘देश की बेटी’… आदि जैसे कुछेक बड़े सीरियल और भी कर चुका है – कई-कई छोटे-मोटों के अलावा…। फ़िल्में भी उसने ढेर सारी की हैं, लेकिन भूमिकाएँ इतनी छोटी-छोटी कि किसी फ़िल्म में उसकी पहचान न बनी और बड़ी भूमिकाएँ शायद उसे न मिलीं। शुरू-शुरू में पर्दे पर उसे देखकर मेरा क़यास बना था, जो मैंने उससे आज तक कभी कहा नहीं, कि पर्दे के लिए वह बना ही नहीं है। मंच पर जिस तरह वह अपनी भूमिका को थामकर (होल्ड करके) किरदार की बारीकियों को निबेरते हुए अपने अभिनय से चरित्र को स्थापित-प्रक्षेपित करता है, पर्दे पर नहीं कर पाता– शायद वे इतना समय ही नहीं देते। फिर भी बहुत से काम किये – वांच्छित न सही, सुविधा-सम्पन्न जिन्दगी जीने भर धन भी मिला…। इसी त्वरा में कोरोना-काल के ठीक पहले जब बनारस के पास चल रही शूटिंग से तीन दिनों की छुट्टी में घर आने के लिए फ़ोन किया और पता चला कि मैं गाँव में हूँ; तो वहीं आ जाने का मन बना लिया। उस वक्त सीरियल…आदि देखने वाला वर्ग -लगभग आधा गाँव- ‘तेतर सिंह आ रहे…तेतर सिंह आ रहे’… कह-कह के उसे देखने के लिए बेहद उत्सुक था – किसी को उसके असली नाम की पड़ी ही न थी– नाटक वाले काम की तो क्या बात!!

सो, ‘बिहार में चुनाव लड़ने’ की मंच-कला से ‘निमकी मुखिया’ की दूरदर्शनी लोकप्रियता के बीच का यह काल ही हमारे निजी व कलागत सम्बन्धों का सक्रिय दौर रहा…। लेकिन उसके पर्दा माध्यम वाला सिलसिला काफ़ी बाद में चला…। तब हम मिले, तो गहनता का मुख्य कारण बना था – विजय का पूर्णकालिक रंगकर्मी होना व उसके बने रहने की कट्टरता। विजय की इस वृत्ति के बरक्स उन दिनों की स्थितियों की मुख़्तसर-सी चर्चा ग़ैर मौजूँ न होगी…

…जी हाँ, यह वह समय था, जब थिएटर ख़ास तौर पर रानावि-वाले लोग फ़िल्म-टीवी में काम करने जायें या न जायें…याने ‘कला बनाम व्यवसाय’ का द्वंद्व दशक-डेढ़ दशक पहले समाप्त हो चुका था। रानावि के बनिया पुरोधाओं ने ‘रक्षक ही भक्षक’ होते हुए नाट्य-संहिता में एक नयी धारा (क्लॉज) जोड़ दी थी – ‘नाटक और फ़िल्म दोनों समान कला-माध्यम हैं’। याने जिस प्रवाह को रोककर नाटक और नाट्य-मूल्यों को बचाया जा सकता था, गोया उसे ख़त्म करने के लिए ही नाट्य से फ़िल्म में निर्गमन को हरी झंडी ही नहीं दिखा दी गयी, फ़िल्म को ही नाटक की -ख़ासकर रानावि के प्रशिक्षण की- मंज़िल बना दिया गया। नतीजा सामने है कि अभी हाल (2021) में पचहत्तर वसंत देखने के पार के रानावि वाले, जो सीरियल में काफ़ी लोकप्रिय व कुछ फ़िल्मों में भी सुपरिचित नाम हैं, से समकालीन रंगमंच के बारे पूछा गया, तो उन्होंने शान से कहा – इधर पाँच सालों से मैंने कोई नाटक देखा ही नहीं और करना तो दस-पंद्रह सालों से नहीं हुआ, मैं क्या बता सकता हूँ!! इसी के परिणाम स्वरूप बक़ौल सुरेंद्र वर्मा एनएसडी के छात्र अन्तिम वर्ष का आख़िरी पर्चा देकर उपाधि-पत्रक लिये बिना ही मोहमयी (मुम्बई) नगरी का टिकिट इसलिए कटा लेते कि शायद कल ही किसी फ़िल्म के लिए अभिनय-परीक्षण (ऑडिशन) होने वाला हो और वे देखते-देखते सितारे बन जायें…तो इस मौक़े को क्यों छोड़ दें? फलतः एक गड्डलिका-प्रवाह शुरू हो गया, जो तब तकप्रायः राजमार्ग बन चुका था…।

इन सबके नजीजतन मुम्बई आये रानावि वालों का हाल यह था कि सभी तथाकथित बड़े रंगकर्मी अहर्निश ‘थिएटर-थिएटर…’ का राग अलापते, लेकिन एक फ़ोन आते ही छोटी-मोटी भूमिका के लिए भी सब कुछ छोड़-छाड़ के कूच कर देते थे। इस पर्दा-आसीन होने की बेपर्दगी के बड़े-बड़े दृश्य देखे…ओमपुरी का नाटक आ रहा है, की दो महीने से हो रही घोषणा पर शो के लिए ‘पृथ्वी’ में दर्शक बैठे हैं और पता चलता है कि वे नाटक में नहीं हैं। पंकज कपूर, अन्नू कपूर…जैसों ने मुम्बई आके थिएटर का रुख़ ही नहीं किया। एक बार तो मेरे लिए ग़ज़ब ही हो गया…रानावि वालों ने अपना एक संगठन बनाया था– ‘सांग’, जिसके उद्घाटन में पंकज कपूर जैसों को आना था और फ़िल्मी लंतरानी के चलते वे घंटों लेट हो गये…। आने पर जो कार्यक्रम कटे, उनमें वेशभूषा डटाये व साज-बाज सहित बैठे रानावि के रंगकर्मियों के प्रदर्शन ही थे, जिनमे ढोल-मजीरा लिये साथियों के साथ धोती-कुर्ता-टोपी डटाके नेता बने अपने विजयकुमार भी थे। उन्हें भले कुछ न लगा हो, या लगा भी हो (आदमी जो हैं), तो दुनियादारी या रानावि की शान-शर्म बस ही सही, चुप रह गये। लेकिन ‘अति अघ गुरु अपमानता नहिं सहि सकेउ महेस’ की तरह फ़िल्मी छबि के समक्ष ‘नट अपमानता’ न सह सके – मराठी के महान नाटककार विजय तेंदुलकर। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में इस वृत्ति और सलूक पर कटाक्ष कर भी दिया। और उसी के हवाले से मैंने अपनी समीक्षा में भी सनाम खुला ज़िक्र करके सवाल उठा दिये, जिसके जवाब तो किसी के पास थे नहीं…, हाँ आयोजकों में रहे वामन केंद्रे, अतुल तिवारी…आदि मित्रों का कोप-भाजन भी बना। ऐसे में रानावि के जल में रहकर भी उससे निर्लिप्त कमल की तरह (पद्म पत्रमि वाम्भसा) लगे थे उन दिनों मुझे विजयकुमार…।

बाएं से दाएं : पुंज प्रकाश, संजीव झा, पंकज त्रिपाठी, राकेश त्रिपाठी, विजय कुमार, अमरेन्द्र शर्मा, अनंजय रघुराज, शशी भूषण, सुनील पहलवान और सुनील बिहारी

विजय की यह निर्लिप्तता यूँ ही नहीं, मेरी आँखन देखी थी…इसके सहपाठी व समकालीन यशपाल शर्मा, सत्यजीत शर्मा, आशुतोष राणा, मुकेश तिवारी, विनीत कुमार…आदि लोग प्राय: पर्दे पर चहरे की पहचान जैसे जानीता (known) व्यक्तित्त्व बन चुके थे। तमामों बार उनके फ़ोन आते –‘अभी आ जाइए। सेट तैयार है, बात हो चुकी है’। विजय का काम देखे हुए फ़िल्म-निर्देशक (छोटा ही सही) का इसरार करना भी मैंने देखा है और विजय को मिनट भर के लिए कसमसाते भी…, लेकिन फिर वही जवाब –‘अभी तो परसों शो है। अभ्यास ज़रूरी है…फिर उस नाटक का वहाँ शो लगा है…नहीं सर, नहीं हो पायेगा’। फिर गोया उनका मन रखने के लिए कभी यह भी –‘अच्छा, कोई छोटा-सा रोल दे दीजिए। दो-तीन दिनों में छायांकन (शूटिंग) पूरा करके नाटक में आ सकूँ’। कौन जानता था कि यह ‘छोटी भूमिका’ करके टालने की बात का टोटका जीवन में उतर जायेगा – उसके फ़िल्मी-जीवन (कैरियर) को ग्रस लेगा। मैं कई बार उकसाता –‘यार कर ले। सभी करके कमा रहे हैं। यह रोज़-रोज़ की मगजमारी बंद हो…’। विजय की वही मसखरी वाली मुस्कान – ‘कमा तो मैं भी रहा हूँ सर। कभी भूखों मरने की नौबत आ गयी, तो आ जाऊँगा आप लोगों के घर। यह करना होता, तो कब का कर लेता…’। और मैं निरुत्तर…। अंदर से हिल भी जाता, पर कहीं गहरे पुलकित भी होता…। और कभी जयप्रकाश नारायण जी को लक्ष्य कर दुष्यंत का कहा याद हो आता –‘इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है’। इस रोशनदान के बंद होने व फ़िल्म का दर ठीक से न खुलने की चर्चाएं आगे होती रहेंगी…।

इसे संयोग कहें या भवितव्य कि जिन दिनों विजय मुझसे टकराया व नज़दीक आने लगा, मैंने हर महीने के पहले शनिवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम करने वाली ‘बतरस’ नाम की अनौपचारिक संस्था चलाना शुरू किया था। सितम्बर में नेहरू-नाट्योत्सव के समय वह मिला और अक्तूबर के पहले शनिवार को ‘बतरस’ का पहला वार्षिकोत्सव होने वाला था। विजय के ‘बिहार में चुनाव…’ का शो रखने की सोची, लेकिन दुर्दैव से एक दिन पहले उसका शो दिल्ली में था। इधर हमारी ज़रूरत भी थी और इस प्रस्तुति की कर्ण-परम्परा में फैली शोहरत के चलते इसे देखने की दुर्दमनीय हसरत ने भी ज़ोर मारा…। संयोग से मित्र देवमणि पांडेय के कहने पर शहर के धनिक सर्राफ़ साहब से मिला थोड़ा-सा धन था हमारे पास, सो हमने विमान का टिकट देकर बुला लिया। टिकट का ज़िक्र इसलिए कर दे रहा हूँ कि इसकी अब तक हुई लगभग सात-आठ सौ प्रस्तुतियों में से 25-30 शो तो यहाँ-वहाँ मिलाकर स्वयं मैंने कराये ही होंगे, लेकिन दो-एक संस्थानों में कराने के सिवा कभी कुछ दिया नहीं। हँसी-हँसी में विजय कहता भी कि आप तो खाने पर हमसे नाटक करा लेते हैं…सर! किसी और से भी कहता – सर के लिए हम खाना खाके भी नाटक कर देते हैं। ख़ैर, यह सब तो हमारे सम्बन्धों व जिन्दगी की खुराक है, लेकिन ऐसा होने का बड़ा राज़ यह कि विजय की यह प्रस्तुति हमारे साहित्य में ‘रबर छंद’ की तरह है, जिसे 15-20 मिनट से लेकर डेढ़ घंटे तक के बीच जितना भी समय हो, विजय कर देता है। और किसी ख़ास मंच व प्रकाश-योजना के बिना कहीं भी हो जाती है। इन साधनों के साथ साज़िंदे मिल जायें, तब तो गीत-संवाद-अदाएं लहक जायें और लोग लहालोट हो जायें…। और कुछ न मिले, तो भी दर्शक के लिए काफ़ी मज़े देने जितनी दर्शनीय प्रस्तुति तो हो ही जाती है। इसीलिए हमने तो इसे अपने पुनश्चर्चा पाठ्यक्रम (रेफ़्रेशर कोर्स) में अध्यापक के सामने रखी मेज पर भी करा दिया – एक सत्र के व्याख्यान का मानधन देकर। वहाँ तो कुर्ता-धोती-टोपी थी भी, बिना इसके भी बीस मिनट से आधे घंटे के शोज होते मैंने देखा है, जिसके भी दर्शक खूब मज़े लेते…। यह लचीलापन (फ़्लेक्सिबिलिटी) इस प्रस्तुति की जान है। और कोई बहाने-नख़रे या कलाकार के अहम…आदि के चोंचले के बिना सहज भाव से कर देने की विजय की प्रकृति ही इसकी जीवनी-शक्ति है। क्योंकि विजय इसे करने का मज़ा लेता है। अभिनय ही नहीं करता, अभिनय के दौरान अपनी अदाओं-भंगिमाओं-शारीरिक क्रीड़ाओं से आस-पास के परिवेश व लोगों के साथ खेलता भी है। यह सम्भव होता है उसकी प्रत्युत्पन्न बुद्धि (प्रजेंस ओफ़ माइंड) से, जो प्रस्तुति के दौरान वाजिब स्थल खोज लेने की कलात्मक युक्ति है। और यह मात्र प्रशिक्षण से नहीं आती, अंतस् से फूटती है, कलाकर की प्रकृति से रवाँ होती है और उसके आत्मविश्वास व सतत चलते अभ्यास से फलते-फूलते हुए दर्शकों में बेलसती है…।

बाएँ से दाएं : शशी भूषण, हेमंत झा, अविनाश दास, पंकज त्रिपाठी, सुनील बिहारी, रणधीर बिहारी

‘बतरस’ के लिए उस प्रदर्शन में उस वक्त उनके साज़िंदों की असली मंडली भी थी, जिसका मुखिया शशी नामक वह खाँटी कलाकार था, जिसके सुर मुखरित भर हो जायें, साज को उसकी उँगलियों की धनक मिल जाये, मंच पर वह किसी भी रूप में प्रकट भर हो जाये…तो गीत-संगीत, नाट्य के किसी भी रूप में चार चाँद लग जाते थे। गले में ढोलक लटकाये भी वह भूमिका में उतरता…। यह कला-जगत का दुर्भाग्य ही था कि कई बार फेल होने के बाद आख़िर जब उसे एनएसडी में प्रवेश मिला, तो संस्थान की अक्षम्य बद-इंतज़ामी और लापरवाही से कला का वह भावी चाँद बिना ठीक से उगे ही अस्त हो गया। मुम्बई में शशी के चंद दिनों के निवास के बावजूद उसकी याद में हुई अश्रु-पूरित व भावभीनी शोक-सभा चिर-स्मरणीय रही। मेरे घर तो अक्सर आ जाता –मुम्बई के होटलों में में अप्राप्य आलू का चोखा खाने भात के साथ। जब वो भयंकर बाढ़ आयी थी, मेरे घर के आसपास ही कहीं फँसा था वह। सो, चल के घर आ गया और पानी उतरने तक चार-पाँच दिनों हमने साथ ही कष्ट झेले थे। विजय ने उसके लिए अपनी मातृ संस्था से खूब लड़ाई लड़ी। मृतक-परिवार को किंचित अर्थ-लाभ तो हुआ, लेकिन संस्थान-सत्ता के राहु-चेहरों पर सिकन तक न आयी। हाँ, रानावि से विजय के सम्बन्ध कुछ ख़राब हुए। वहाँ से मिलते कामों के लाभ काफ़ी दिनों के लिए बंद हुए। और उसी आमद के बंद होने ने भी पर्दे की ओर प्रयाण पर विवश किया। ग़ज़ब यह कि शशी-मामले से बने हालात तो दृश्य-रूप में विजय के पर्दोन्मुख होने की बड़ी वजह रहे, लेकिन थिएटर करने के लिए दिल्ली-पटना…आदि छोड़कर मुम्बई आने की नीयत पर सोचता हूँ, तो कहानी कुछ और भी लगने लगती है – कि फ़िल्मी कीड़ा तो पहले से था – अचेतन में ही सही, प्रकटा ज़रा बाद में…। ख़ैर,

‘बतरस’ का वह सालाना आयोजन अंधेरी स्पोर्ट्स-क्लब के सभागार में हुआ, जिसमें जानबूझकर विजय का शो सबसे अंत में रखा गया था। तब तक शो की कहानियाँ सुन-सुन कर उत्सुक तो सब लोग थे, लेकिन मेरी उतावली चरम पर थी। विजय जब शफ़्फ़ाक धोती-कुरता पे नेताओं वाली सफ़ेद टोपी लगाये और केसरिया रँग का दुपट्टा कंधे पर रखे नुमायाँ हुआ, तो देख के ही जी जुड़ा गया। कृष्ण राघव ने कार्यक्रम की घोषणा में जम के परिचय व प्रस्तावना दे ही दी थी, सो, शो की प्रकृति के मुताबिक़ आते ही टेर दिया –‘मोहन रसिया रे, मोहन रसिया रे, मोहन रसिया…कतहूँ बँसिया बजवले बा मोहन रसिया…। और साज-साज़िंदों की गमकती युति के साथ उसकी गायन-कला की लहक से वह समाँ बंधा कि विजय के शब्दों में कहूँ तो ‘चंद मिनटों में ही पब्लिक हाथ में आ गयी’। और फ़िर तो उसके चंग पे नाचने ही लगी…। बाद में कभी उसकी सहकलाकार अस्मिता शर्मा ने बताया था कि वनस्थली विवि में विजय के इस शो की सुबह छात्राओं के हर कमरे व स्नानागारों से ‘मोहन रसिया’ की ही धुन व आतुर पुकार आ रही थी, जिनका ‘मोहन रसिया’ वो ‘लॉर्ड कृष्णा’ नहीं, विजय था। ‘बतरस’ के उस शो का समय तो 45मिनट का था, लेकिन उस शाम ऐसी भीषण वर्षा हुई कि घर जाने के लिए बाहर निकलने की स्थिति ही न रही। थमने के बाद भी परिसर में लगे घुटने भर पानी में चल के लोग निकले…। इस स्थिति का पूरा लाभ लेते हुए विजय ने शो को खूब लम्बा दिया– डेढ़ घंटे चला नाटक। बंदा खूब खेला शाम के उस शो के साथ…अपने अभिनय में जम के जगलरी की। 2×2 फ़िट की चौकी पर मूलतः केंद्रित होकर आंगिक-वाचिक अभिनय का ऐसा समाँ बांधा व नेताओं वाले कुर्त्ते-धोती से बनती छबि के साथ टोपी के उतारने-पहनने और उस दुपट्टे को रथ की पताका से लेकर धनुष-वाण एवं ओढ़नी-सारी के घूँघट-आँचल से लेकर पगड़ी तक के विविध उपयोगों के बीच अभिनय का जो ‘धरा से असमान तक’ का वितान तना, वह दर्शकों के लिए अभिनव ही नहीं, अमूमन अकल्पनीय भी था। फिर स्वर्ग से उतरे भारती जी के ‘भूखा ईश्वर’ के बरक़्स चुनाव जीतकर राजनीति को सुधारने के संकल्प से अवतरित परसाईजी के कृष्ण की अनपेक्षित पराजय से उपजी आजिजी व अकल्पनीय दुर्दशा जिस तरह नुमायाँ हुई, उसमें भ्रष्ट व अवसरवादी राजनीति का जो कच्चा चिट्ठा खुला, वह यदि हास्य-व्यंग्य के साथ न आता, तो अपनी विद्रूपता में नाक़ाबिले बर्दाश्त ही होता…। कायिक-जगलरी व वाचिकता के अनन्त वैविध्य के बीच साज़िंदों व दर्शकों के साथ जुगलबंदी से भी बड़े मज़े किये। सर्वाधिक निशाना मैं बना था। उसी शाम समझ में आ गया कि जीवन का मसखरापन उसकी मंच-प्रकृति का ही प्रतिबिम्ब है। और यह हर लोक कलाकर की सहज वृत्ति रही है, जो विजय में उसकी मौलिकता बनकर समाहित है। फिर तो अब तक कुल पचास शो में ज़रूर मौजूद रहा हूँगा… वह हर बार मुझे निशाना बनाता और जीवन में मेरी यत्किंचित डपटों व लिखे की आलोचनाओं का कलात्मक ढंग से बदला लेता रहा – इतना कि एक बार शो के बाद मेरी एक भावुक छात्रा ने विजय से झगड़ा कर लिया था –‘मेरे सर को ऐसा क्यों कहा’? पर वह मुझे खूब भाता- मैं हमेशा उस फ़न के मज़े लेता रहा हूँ…। आज स्वीकार करना चाहूँगा कि ‘बतरस’ के पहले वार्षिकोत्सव की वह शाम हमारे सम्बन्धों की ऐसी बुनियाद बनी, जिस पर तैयार हुआ आपसी रिश्तों का बसेरा कभी कुछ व्यावहारिक तूफ़ानों के थपेड़ों से हहराया भले हो (ज़िक्र आगे आ भी सकते हैं), अपनी जगह से हिला-डुला बिलकुल नहीं– साबुत बचा-बना हुआ है।

संगीत नाट्य अकादमी में थिएटर फेस्टीवल में रेणु के रंग नाटक के प्रदर्शन के बाद

जब इस शो का योगदान हमारे जीवन में ऐसा सिद्ध हुआ है, तो अब यहीं इस नाटक के कुछ ख़ास शोज़ के ज़िक्र करके ही आगे बढ़ूँ, जो मेरे लिए ख़ास साबित हुए…। नम्बर एक पर रखूँगा मैं ससुराल के गाँव लुणावड़ा में हुए शो को – इसलिए कि कभी सपने में भी न आया होगा कि वहाँ कोई ऐसा शो होगा…। विजय तो तफ़रीहन गया था। शहर से दूर गुजरात का ठेंठ गाँव, जहां कोई हिन्दी भी ठीक से समझ नहीं सकता – बोलने का तो सवाल ही नहीं, वहाँ पुरबहिया हिन्दी के शो -वह भी एकल- की कल्पना भी कैसे सम्भव होती…!! लेकिन यहीं विजय का चुनौती-भरा असली रंग-स्वभाव समझ में आता है। वहाँ का बंद घर खोलकर जब कभी चार-छह दिन रहता हूँ, तो सुबह के भ्रमण के लिए गाँव के पश्चिमोत्तर स्थित मंदिर की टेकरी (दो सौ फ़ीट ऊँची पहाड़ी) पर जाता हूँ। दिव्य जगह है – मनोरम स्थल। वहीं की सुबह देखकर मुझे जोश मलीहाबादी की बात पर यक़ीन हुआ कि ‘हम जैसे अहलेवफ़ा के सुबूतेहक के लिए, रसूल न भी जो आते, तो सुबह काफ़ी थी। और विजय तो ठहरा गांधीजी वाला सतत वॉकर। वहाँ से लौटते हुए सुबह ही एक दिन मैंने उसे पत्नी-ख़ानदान के कुलदेवता का मंदिर दिखाया, जो उन नागर ब्राह्मणों के मुहल्ले के नाम को मिलाकर ‘नागरवाडा मंदिर’ कहा जाता है। मंदिर के सामने बड़ी गोल जगत का खूब चौड़ा कुआँ है। उसी के नीचे तीन रास्ते का मोड़ है – तिराहा, जहां से हर किसी का आना-जाना होता है…। उसी जगत पर घूमते-घूमते वहाँ से इधर-उधर तजबीजते (मुआयना करते) हुए सहसा विजय बोला –‘इसी तिराहे पर एक शो करते हैं सर…’।

‘देखेगा कौन? कोई समझेगा यहाँ? – मैं हतप्रभ!!

‘यही तो मज़ा है सर – रंगकर्म की परख का…। हमारे काम के लिए चुनौती है। …करते हैं सर…’ आग्रह व यकीन से लबरेज़ था विजय का स्वर…।

घर जाके पत्नी से कहा, तो ‘शी जम्पड टु द आइडिया…’! बस, पक्का हो गया। मैंने जाके ख़ानदान वालों और अग़ल-बग़ल के पहचाने चेहरों से कह दिया। 2×2 की डेढ़-दो फ़िट ऊँची चौकी घर पे ही मिल गयी। कुर्त्ता-धोती-गमछा-टोपी विजय के बैग में थे– सिपाही के कंधे पर बंदूक़ की तरह -कहीं भी मोर्चा लग जाये…।

शाम को सेविका उषा और वहाँ के घर की रखवाली-कर्त्ता रंजनबेन को मिलाके हम पाँच लोग घर के और दो पड़ोसी साथ चले, तो दो-तीन ख़ानदान वाले भी आ गये…। मैंने खड़े-खड़े दो-चार वाक्यों में विजय का परिचय व विशुद्ध मज़े के लिए किये जाने के रूप में शो की भूमिका बतायी और विजय को बुला दिया…। अपनी मुस्कुराती विनोदी अदा में हाथ जोड़ के, सर नवाके चारो दिशाओँ में प्रणाम भेजते हुए शुरू हुआ विजय ‘मोहन रसिया…’ की टेर के साथ…। गायन सुनके आसपास के घरों पर बैठे दो-चार पंछी फड़फड़ा के उड़ गए, लेकिन अंदर से चार-छह लोग कुतूहल बस बाहर निकल आये। तिराहे पर होने व शाम के समय का फ़ायदा यह हुआ कि हर मिनट एक-दो लोग इस या उस रास्ते से घर की ओर जाते हुए निकल आते…। अब घर ही जाना था, तो रुक लेते – गोया तमाशा ही देखने…। और रुकते ही दो-चार मिनट में शो में बँध जाते…। भाषा भले बेहद कम समझ में आती, लेकिन इसमें तो विजय का पूरा शरीर बोलता है। और इस भाषा को हर कोई समझता है। फिर गायन के स्वर-सुर के क्या कहने, वे तो विश्वजनीन होते ही हैं। मैंने उस दिन विजय को-याने शो- नहीं देखा, बल्कि देखते हुए लोगों को देखा –‘हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं…’। और साकार हो रहा था हबीब साहब के नाटक का नाम – ‘देख रहे हैं नैन’…। 50 मिनट तो शो चला होगा…और देखना छोड़कर जाने वालों का अनुपात ‘दस में एक’ याने दस प्रतिशत रहा होगा – उसमें भी कुछ के जाते हुए कसमसाने की भी याद है, जो किसी अ-निवार्य काम का संकेत थी। नाटक पूरा होने पर खूब बजी तालियों ने तुरत बता दिया कि शो कितना भाया लोगों को…। फिर तो अच्छे व लोकप्रिय शो होने की पुष्टि ही हो गयी, जब आगामी दो दिनों तक शो कराने के चार-पाँच आमंत्रण आये, जिनमें विद्यालय-महाविद्यालय के अलावा सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं भी शामिल थीं। लेकिन सभी लोग चार-पाँच दिनों बाद ही करा पाने की स्थिति में थे। और हमारा तो वहाँ से 80-85 किमी. पर स्थित आनंद जाने का दिन तय हो गया था। मुझे व विजय को इतने क़रीब पाकर मित्र कनु पटेल ने ने अपने कला महाविद्यालय में मेरा एक व्याख्यान व विजय का शो रख दिया था। लिहाज़ा दुबारा आने पर करेंगे, के वायदे के साथ सबसे मुआफ़ी माँग ली गयी। लेकिन आज मैं भगवान को हाज़िर-नाज़िर करके कहता हूँ, कि लुणावड़ा के अपने नागरवाडा मुहल्ले के इस शो में मुझे जो मज़ा आया, कहीं न आया। उस दिन के नितांत जन सामान्य दर्शक बिना किसी निहित मतलब के यूँ एकाकार हुए नाटक व कलाकर के साथ कि बक़ौल खुमार बाराबंकवी – ‘हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए, इश्क़ की मगरिफ़त (मोक्ष) की दुआ कीजिए’ के बरक्स परमात्मा में आत्मा के समा जाने के अध्यात्म दर्शन की भाषा में उसे ‘रंगकला का मोक्ष’ ही कहा जा सकता है।

दूसरे नम्बर पर मैं नागपुर का शो रखना चाहूँगा, क्योंकि लुणावड़ा में अलग परिवेश व विरल क़िस्म के लोगों के बीच शो करने के उत्साह व जोखम की तरह यहाँ सिर्फ़ एक शो के लिए विजय ने अलग भाषा भोजपुरी, जो उसे आती भी नहीं, में पूरा नाटक तैयार किया। इसमें विजय की रंग-वृत्ति का एक अलग ही आयाम खुलकर सामने आया। वह भोजपुरी का अंतरराष्ट्रीय समारोह था। मैं उसके प्रमुख आयोजकों में था। भोजपुरी का नाटक कराना मेरे ज़िम्मे था। मुझ पर ‘बिहार में चुनाव…’ को देखने और उससे ज्यादा यह कि अधिक से अधिक लोगों को दिखाने का भूत सवार ही रहता…। नाटक की भोजपुरी प्रांतर की पृष्ठभूमि इस सोने पर सुहागा का काम कर रही थी। विजय से पूछा। वह तैयार हो गया। उसी दौरान उसका ‘एलियांसफैंसिस’ में उत्सव (चर्चा आगे होगी) चल रहा था। मैंने अपनी संस्था के अध्यक्ष सतीश त्रिपाठी (वरिष्ठ आइएस) को बुलाकर ‘बिहार…’ का शो दिखा दिया –सहर्ष ‘हाँ’ होनी ही थी। आज भी सतीश जी व विजय अच्छे मित्र हैं। अनुवाद करके मैंने दिया। रट के और समझ के विजय ने तैयार किया। जाने की घटना भी यादगार है। तीन दिनी समारोह में नाटक दूसरे दिन था। मुझे कोई उद्घाटन पर पहुँचना था, लेकिन कोई अटाल्य काम आ जाने से मैं दूसरे दिन जाने पर विवश हुआ, तो विजय भी रुक गया। दोनों टिकिट कैंसिल हुए। अगले दिन के मिले नहीं। सतीशजी उन दिनों राज्यपाल के प्रमुख सचिव थे। लिहाज़ा प्रतीक्षा सूची के टिकिट के लिए मंत्री तक से कहलाया गया, पर हुआ नहीं। टीसी से कहलवा कर तृतीय श्रेणी वातानुकूलित डिब्बे में घुसाये गये…और इस सीट से उस सीट पर उठते-बैठते से थक कर व नींद के आक्रमण से हारकर ज़मीन पर बिछाके सोके गये। किसी स्टेशन पर ढेर सारे लोग उतर गये, तो हमें अन्तिम दो घंटे के लिए शायिका (बर्थ) मिल गयी… ऐसा सोये कि उतरते हुए विजय की बड़ी अच्छी-महँगी ऊनी चद्दर भूल के उतर गये, जो बहुत खला उन दिनों। लौटते हुए भी आरएसी में एक शायिका मिल पायी। विजय ने मुझे सीट पर सुला दिया और एक चद्दर बिछाके खुद पुन: नीचे सोके आया…।

सतीश कौशिक और विजय कुमार

लेकिन दोनों यात्राओं के ‘दुखों का एक सुख’ इतना बड़ा था – नाटक इतना अच्छा हुआ कि सब भूल गया। दर्शक अधिकतर पूर्वांचल के थे और उस पूरी संस्कृति व राजनीतिक पतन की ग़लीज़ स्थितियों से बखूबी अवगत (अवेयर) थे। इसलिए खूब मज़े लिये और विजय जो बीच-बीच में जीवंत व मौजूँ संवाद करता है दर्शकों से, उसके बड़े माकूल व लहकते जवाब मिले शिक्षित ग्रामीण लोगों से…, जिससे शो का मज़ा दोगुना हो गया और दर्शक अपनी भागीदारी से भी प्रफुल्लित होते रहे। नाटक की बातों व कार्य-कलापों को अभिनय से प्रक्षेपित करने का तो तबील अनुभव था ही, भाषिकता को लेकर उसकी मानसिक पकड़ उस दिन ख़ास तौर पर लक्ष्य हुई। उसमें भी भोजपुरी शब्दों के लहजे तो उसे रवाँ ही थे, बस उसकी मगही से थोड़ी-सी अलग बनावट से उच्चारण के जो फ़र्क़ थे, उन्हें बर्राक करके ऐसा माँज लिया था कि किसी को उसके भोजपुरी-भाषी न होने का पता ही न लगा। उस दिन नाटक ऐसा विस्तारित (एक्सटेंड) हुआ कि मंच के बाद खाने-सोने के दौरान भी चलता रहा। लोग छोड़ने को तैयार ही न थे। खबोर होने के नाते मुझे अच्छी तरह याद है कि किसी बड़े संस्थान या सेठिया द्वारा प्रायोजित उस रात्रि-भोज में सौ के क़रीब खाद्य-पदार्थ तो थे ही – और एक से एक स्वादिष्ट। मैंने तो एक-एक दाना-टुकड़ा-सिप में सबके स्वाद लेने के बाद प्रियतम सामग्रियों पर जम के हाथ फेरा, लेकिन बेचारे विजय को एक तो लोग घेरे रहे…, वह ऐसा कर न सकता था; दूसरे, वह खाने के मामले में ऐसा है भी नहीं। मुक्त रहता, तो भी आदतन जो कुछ आगे की तरफ़ होता, उसी में से लेके बैठ जाता और झटपट खाके किनारे हो जाता…। बहरहाल, इस शो की चर्चा आगे के आयोजनों में भी लोग मुझसे करते रहे। आज भी जब उस जमात का कोई मिलता है, कुछ तो कह ही देता है…। और यही प्राप्य है, जो सीधे उसका हिस्सा न होने पर भी इसे बार-बार कराता रहा है…।

अपने गाँव सम्मौपुर के शो को मैं इसलिए तीसरे नम्बर पर रखना चाहूँगा कि उसका होना व असर दोनों ही लुनावड़ा से एकदम विपरीत रहा। होने की बात यूँ कि उसकी तरह यह अचानक नहीं हुआ और अजनवियों के बीच भी न हुआ– आयोजित हुआ और कुछ तैयारी भी हुई। जब से विजय ने शूटिंग से तीन दिनों की अपनी छुट्टी गाँव में आके बिताने की बात कही थी, तभी से शो कराने की बात दिमाग में चल पड़ी थी – यूँ लुणावड़ा के शो के दिन से ही ‘अपने गाँव में कराने की हसरत’ जन्म ले चुकी थी, पर स्थितियाँ बननी दूभर थीं, तो किसी योजना का ख़्याल भी कैसे आता? अब तो जगह भी तजवीज़ ली – गाँव के शिवमंदिर की बग़ल की ख़ासी ख़ाली जगह है। विजय ने पहुँचकर सुना, तो वाद्य-संगीत की सम्भावना की बात पूछी। ख़ानदान के छोटे भाई महेंद्र त्रिपाठी अपने पिता-दादा के प्रभाव-स्वरूप थोड़ा-बहुत ढोलक…आदि बजा लेते हैं। उन्होंने बग़ल वाले गाँव से एक ठीक ठाक वादक भी बुलवा लिया। शाम-सुबह मिलके थोड़ा अभ्यास भी हो गया। धोती-कुर्ते की कमी गाँव में अब भी नहीं है। टोपी ख़ास तौर पर सिलवानी पड़ी। रेकॉर्डिंग स्टूडियो वाले प्रिय दयाराम ने पूरे नाटक का वीडियो बनाने की पहल कर दी।

शाम के शो के लिए दोपहर को शादी-व्याह के गँवई रवाज की तरह घर-घर बुलावा गया। लेकिन इतनी तरद्दुत के बाद भी ‘गाँव उमड़ पड़ेगा, कि मेरी उम्मीद के अनुसार उपस्थिति उतनी अच्छी न हुई। सक्रिय व मुख्य लोगों में से बहुत कम आये। यह इरादन नहीं, आदतन था। अब नाटक…आदि कलात्मक आयोजन के कोई संस्कार गाँवों में बचे ही नहीं हैं। शादियों में नौटंकियों के आने और ‘विजय दशमी’ के मेले के पहले दस दिनों तक रामलीला…आदि होने-हवाने को बंद हुए आधी सदी तो बीत ही गयी है। सो, मेरी उम्र के बचे हुए चंद लोग भी खेती-बारी व जोड़-जुगत में सब भूल चुके हैं और मेरे बाद की पीढ़ी तो इन सबसे बिल्कुल अनजान है। सो, औरतें-बच्चे मिलाके कुछ 50-60 लोग थे। संक्षिप्त भूमिका मुझे देनी ही थी। अपने प्रियतो में डोलू-बोलू राजाराम व प्राइमरी स्कूल के मुख्याध्यापक भतीजे घनश्याम त्रिपाठी के हाथों पुष्पगुछ व शाल-श्रीफल से स्वागत भी करा दिया और शो शुरू हुआ…

उस दिन भी मैं नाटक के बदले देखने वालों को ही देख रहा था। इस शो में दर्शक के साथ संवाद का जो रूप व प्रथा बन गयी है, उसमें कोई प्रतिक्रिया ही न आयी। विजय के संवादों की लाठी हवा में हुक जा रही थी– वह मुँह की खा रहा था…। औरतें तो जिज्ञासा-कुतूहल में चुप व विस्मित थीं। कुछ गवैया औरतें अवश्य गायन पर झूम रही थीं, लेकिन बच्चे अपनी शैतानी से मुक्त न हो रहे थे। उन्हें कुछ लोग खींच-खाँच के हटाने भी लगते थे, जिससे व्यवधान और बढ़ ही ज़ा रहा था। विजय की काफ़ी ऊर्जा आगे व बीच में बैठे बच्चों को संयमित (कंट्रोल) करने में जा रही थी। बस, ‘छेड़ गयो, छेड़ गयो, छेड़ गयो रे, मोहें पनघट में नंदलाल छेड़ गयो रे’…गुनगुनाते हुए कृष्ण-मिलन के सजती स्त्री वाले सदाबहार हिट दृश्य को मुक्त सराहना यहाँ भी मिली – स्त्रियों ने उसका खूब ‘सवाद’ लिया। वरना तो विजय को मंच पर ‘उतना बेचारा’ मैंने किसी शो में न देखा था। थका भी वह उस दिन। सैकड़ों शो का रियाज़ आदत न बन गया होता, तो शो रुक जाता। और इसी अनाड़ीपन व विरलता के लिए यह शो उल्लेखनीय हो रहा है। सबसे अधिक दुःख दिया जिन्दगी भर हाईस्कूल व अन्तिम दिनों में इंटर कॉलेज प्रभाग में प्राध्यापक रहे अपने भतीजे शिवाश्रय त्रिपाठी ने। वे आये और 5-7-मिनट में चले गये…। कला व संस्कृति से ऐसे संस्कार-विहीन हो गये हैं हमारे देहात के शिक्षित लोग भी!! लेकिन यह सब मैंने महसूस किया, क्योंकि पृथ्वी में जिन्दगी भर शो मैंने देखा है, जहां सुई भी गिरे, तो आवाज़ सुन ली जाती है और असर विस्फोट की तरह होता है। इससे नितांत वंचित वहाँ के जन-मन के लिए तो वह गलगंज ही शो है। लेकिन बीस प्रतिशत लोगों ने समझा भी और मज़े भी लिये। शो के बाद आपसी चर्चा भी सिर्फ़ गिने-चुने लोगों ने की –वह भी बस एक दो दिन। फिर तो आज तक कोई नामलेवा नहीं। और इसके लिए पुन: वे दोषी नहीं, बल्कि बात व्यवस्था की है। ऐसे शोज़ यदि ज़बरदस्ती ही सही, आयोजित होते रहते, तो दस-एक शोज़ के बाद एक समुदाय में संस्कार बनते। फिर भी मुझे व्यक्तिगत संतोष है कि एक बानगी तो दिखायी जा सकी, जिसका सारा श्रेय विजय व उसकी नाट्य-प्रवृत्ति को जाता है।

सबसे यादगार और लहकता शो ‘विवेचना’ (जबलपुर) के नाट्योत्सव में देखा। वहाँ के सालाना उत्सव की ख्याति ज़बरदस्त है। वही कि शहर में होते ढेरों नाटकों से नाट्य के प्रबल संस्कार बन गये हैं। हजार से ज़्यादा तो लोग रहे ही होंगे…और ऐसे सधे दर्शक कि सैकड़ों तो खड़े थे, फिर भी ऐसे तल्लीन कि टस से मस न हो रहे थे। उस शाम विजय को ‘विवेचना’ का पहला सम्मान भी मिला था। ऐसा माहौल व सम्मान पाके विजय भी उस रात अपने शबाब पर था – ऐसा फब रहा था कि मुझे अपनी नज़र लग जाने का ख़्याल बार-बार आता रहा था। ‘बतरस’ के अपने देखे पहले शो के बाद इतना लहकता हुआ ज़बर्दस्त शो फिर देखने न मिला।

विजय कुमार

अब ‘बिहार में चुनाव’ के शो की ही डोर पकड़ के आगे बढ़ूँ…तो मुझे ठीक-ठीक याद है कि ‘बिहार में चुनाव’ का कोई जबलपुर जैसा ही शो संजना कपूर ने कहीं देखा और हज़ार की संख्या में दर्शकों के साथ खेलते हुए विजय के अभिनय से इतनी प्रभावित हुईं कि ‘पृथ्वी’ में शो करने के लिए आमंत्रित किया। उन दिनों शशि कपूर जी हर नाटक का छह बजे वाला शो पूरा देखते थे। प्रवेश द्वार के पास उनके लिए एक अलग कुर्सी लगती थी। उन्होंने विजय से बिहार के शो की तारीफ़ तो खूब की, पर यह भी कहा कि यह नाटक नहीं है।

लेकिन विजय को इसी लस्तगे से कुछ तारीखें मिल गयीं, जो वहाँ के नियमितों के अलावा किसी को इतनी आसानी से नहीं मिलतीं। उसने उस कालावधि के अपने ज़हीन व सुंदर बने नाटक ‘रागदरबारी’ का शो रखा दिया। उन दिनों ‘पृथ्वी’ में चौबीसो घंटे अड्डा जमाये रहने वाला एक ‘कॉकस’ (गिरोह) हुआ करता था (शायद आज भी हो), जो था तो मीडियाकर, लेकिन अपनी गिटपिट अंग्रेज़ी के बल खुद को अति आधुनिक व बड़ा नाट्य-ज्ञानी दिखाता। बता दूँ कि जन्मजात अंग्रेज़ी-भाषी जेनिफ़र जी ने ‘पृथ्वी’ बनवाया और उनके समय-भर हिन्दी का ख़ास थिएटर रहा ‘पृथ्वी’। पर उनके बाद अंदर से अंग्रेज़ी-पसंद हो गये ‘पृथ्वी’ वालों के बीच हिन्दी थिएटर तो नहीं रह गया, यह कॉकस भी उनके ‘अंगरेजी परस्ती’ का ही नतीजा था। सो, वह कॉकस उन्हें काफ़ी भाता तथा इसीलिए ‘पृथ्वी’ पर अधिकार जमाये रहता। ज्यादा से जयादा तारीखें हथियाकर चाँदी काट रहा था। वह कॉकस विजय का काम देखकर चौकन्ना हो गया। नाटक और खेल ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बात से काम नहीं चलता – करके दिखाना होता है। और कला में तो एक लकीर के सामने उससे बड़ी लकीर खींचने की तरह किसी कलाकर्म को छोटा करने के लिए उससे बड़ा कलाकर्म लेकर आना होता है। विजय के सामने उस कॉकस में ऐसा दम तो था नहीं। लिहाज़ा कला का वह रचनात्मक तरीक़ा छोड़कर वे लोग विध्वंसात्मक तरीक़े पर उतर आये। उसे उखाड़ फेंकेने के षडयंत्र रचने लगे। और कुछ बन पड़ा नहीं, तो बड़ी गंदी हरकत कर दी। जब शो के पहले मंच पर अभ्यास करके समूचा समूह कुछ खाने-पीने चला गया, तो उस गिरोह ने सारे वाद्य-यंत्र ग़ायब कर दिये, जो ‘पृथ्वी’ में त्रिकाल में नहीं हुआ था। विजय के रंगकर्म से थोड़ा भी परिचित व्यक्ति जानता है कि गीत-संगीत उसके नाट्यकर्म की प्राणवायु होते हैं। और महान हबीब साहब की तरह मंच के एक किनारे खड़े होकर नहीं, दृश्य के दौरान संवाद-अदा की तरह किरदारों के साथ-साथ चलते हैं स्वर-सुर…। और उस बार तो विजय ने ख़ास तौर पर पटना से वादक बुलवाये थे। कुछ नये वाद्य ख़रीदे थे। थिएटर क्षेत्र में मक्का की तरह मानिंद ‘पृथ्वी’ से जुड़ जाने के लिए बहुत उत्साहित था। सो, लौट के देखने पर विजय को काटो, तो खून नहीं…!! तुरत कइयों के साथ मुझे भी फ़ोन किया। ऑटो से 15 मिनट की दूरी पर स्थित सात बंगले के अपने संगीतज्ञ मित्र से मैंने बात की, तो उन्होंने अपने सेवक के हाथों हारमोनियम-ढोलक तो भेज दिया, लेकिन झाल…आदि न मिले। और सब कुछ के बावजूद शो ऐसा सफल हुआ कि उसकी छाप पड़ी बड़ी ज़बर्दस्त। उसमें उपकरण के सहाय के बिना ही बड़े सारे नाट्यमय (थिएट्रीकल) प्रयोग हैं। तीन पात्रों के लहकते हुए ट्रक व चालक बन जाने से ही तो शुरुआत होती है और इतनी लहरेदार कि वही –‘दर्शक हाथ में आ जायें’…। इसी तरह के दृश्यों में बेला-रुप्पन के प्यार व चिट्ठी के आदान-प्रदान के चरम पर अचानक मोमबत्ती जलाकर हाथ में लिये सारे कलाकारों का ख़ास आकार में गति के साथ ‘कहीं दीप जले, कहीं दिल’ का गायन, प्रबंध समिति की मतदान-प्रक्रिया…आदि-आदि। और जब अंत में लाठी के बल खन्ना-मालवीय के इस्तीफ़े लिये जाने व वैद्य बने विजय के निर्णायक फ़ैसले वाला सशक्त प्रदर्शन…आदि के साथ बेहद कल्पनाशीलता से सिरजे जाकर अद्भुत बन पड़े व तह तक का मज़ा देने वाले सिद्ध होते तमाम दृश्यों को मिलाकर शो ज़बरदस्त हुआ…।

लेकिन ‘खेलवै बिगारब’ के प्रति कटिबद्ध वह कॉकस अपना काम कर गया। मंच को लचर करने के बावजूद उखाड़ने में जब सफल न हुआ, तो दूसरी चाल चली, जिसके निर्माता-कर्त्ता सब वही लोग थे। सबने मिलकर उन दिनों शनि-रवि में से एक शाम को सप्ताह में हुए नये नाटकों पर निर्देशक के साथ बातचीत का ‘कॉफ़ी टेबल’ चलाया था, जिसका मूल मक़सद तो था – उसी गिटपिट अंग्रेज़ी के बोलबाले के बीच आपस में ‘अहो रूपम अहो ध्वनि:’ करना। लेकिन इस बार उसका उपयोग किया गया इस नाटक को ध्वस्त करने में। लिहाज़ा इस गँवईं गंध व सत्ता-व्यवस्था पर शातिर व्यंग्य वाले नाटककी गीत-संगीतमयता के साथ जो जानदार प्रस्तुति हुई थी, उसके जितने शुभ व कारगर पक्ष थे, सभी को निरस्त करते हुए जमकर छीछालेदर की गयी। और इसी बिना पर उसे आगे कभी तारीख़ें न दिये जाने के कुचक्र में वे कामयाब हो गये। वह दिन विजय व उसके ‘मंच’ के लिए ही नहीं, पूरे थिएटर के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ, जिसे काले अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। उसी दिन ‘बतरस’ का कार्यक्रम अपने घर पर ही होने से मैं वहाँ जा न सका, जिससे विजय दिलगीर भी हुआ मुझसे। शायद मेरे होते उस शाम नाटक की इतनी दुर्दशा न हो पाती, पर पूर्व निश्चित कार्रवाई तो न रुकती। उस समूह से अनकही तनातनी तो मेरी पहले से थी; शायद उस दिन जा पाता, तो लड़ाई खुल जाती। फिर भी खुली…। इस नाटक की समीक्षा मैं नभाटा में लिख चुका था – दुबारा छपनी न थी, लेकिन ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में इस ‘कॉफ़ी टेबल’ की रपट में आयी नाटक की विध्वंसक चर्चा पर अगली सुबह मेरी कड़वी प्रतिक्रिया छपी, जिसके बाद जब पृथ्वी पर मिले सुनील शानभाग, तो मुझे लताड़ने चले…। उनके काम-स्वभाव व कुछ दुबेजी के शिष्य होने के नातेउ नसे मेरे सम्बन्ध बड़े सौहार्दपूर्ण व आपसी सहयोग के थे, लेकिन उस तेवर पर जो फटकार लगायी मैंने सरेआम, तो आज तक बात बंद है…फिर तो कॉकस का और कोई बोला नहीं। हाँ, टाइम्स में पढ़ते ही सुबह नादिराजी बब्बर का आतुर फ़ोन आया, जो था तो अंग्रेज़ी में मेरे लिखने से स्तंभित होकर, लेकिन लगे हाथों मेरी बात का समर्थन भी निकल पड़ा; पर लिखित तो क्या, किसी भी स्वनामधन्य रंगकर्मी की तरफ़ से मौखिक भी कुछ सामने न आया। याने कॉकस का रुतबा इलाक़े के दबंगों वाला था, जिसके सामने सभी चुप रहते हैं। फिर यहाँ तो तारीख़ें पाने के निहित स्वार्थ का डर भी जुड़ा था– कोई नया भागीदार न जुड़ जाये…। हाल वही था कि –

‘इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात, अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ…’

विजय कुमार

किंतु इन सबके बीच विजय के साथ सम्बन्धों के बढ़ने का एक प्रबल व व्यावहारिक आधार बना – ‘पृथ्वी थिएटर’ के पास स्थित मेरा घर, जिसके बिना इतनी जल्दी और इतना अधिक जुड़ाव न हो पाता। मसलन – एक बार की ऐसी याद है कि ‘पृथ्वी’ से नाटक देखके व गप्पा-गोष्ठी करके जाते हुए विजय रात के बारह बजे घर की ओर लटक पड़े – उन्हें मेरे देर रात तक जागने (छात्रावास में निशाचर नाम से मशहूर) का पता चल ही गया था। अब आधी रात को चाय के लिए क्या पूछा जाये, तो बचा हुआ खाना निकाला गया। विजय ने देखते ही कहा – सर, ये तो दो लोग आराम से खा सकते हैं। मैं उस लड़के को भी बुला लेता हूँ, जो गेट से चला गया है। और फोन करके सच ही बुला लिया…। याने ऐसा अनौपचारिक व घरेलू सम्बन्ध बना…।

कहना होगा कि जितने दिनों मैं समीक्षा-कर्म के रूप में थिएटर के साथ नियमित व सक्रिय रूप से जुड़ा रहा, मेरा घर किसी भी रंगकर्मी के सहयोग के लिए खुला रहता। लेकिन इसका जितना रंगमय सदुपयोग विजय ने किया, वैसा कोई और न कर सका – हालाँकि नाट्याभ्यास नाट्य-पाठ, व बैठक…आदि के लिए तमाम नयों के अलावा ‘सुरनई’ नाट्य समूह (इला अरुण-केके रैना) से लेकर गाहे-ब-गाहे ‘अंक’ (दिनेश ठाकुर) और एक-दो शाम ही सही, ‘अस्मिता’ रंग समूह (दिल्ली) तक तमाम रंगकर्मी भी इस पंक्ति में शामिल हैं, लेकिन विजय ने तो इसे अपना घर समझकर नाट्य-स्थली जैसा मुक़ाम बनाया। घर के पीछे के लम्बे-खुले हिस्से के लिए मुड़ने-खुलने (फ़ोल्डिंग) वाला तालपतरी का ओसारा (शेड) भी बनवाया और नियमित अभ्यास करता था। ‘राग दरबारी’ की पूरी तैयारी वहीं हुई… ऐसा कहें, तो अत्युक्ति न होगी। घरेलू होने का यही राज़ था। उन यादों से आज भी हम पुलकित होते रहते हैं…। वैसे ‘राग दरबारी’ की शुरुआत (आलेख-पाठ (रीडिंग), पात्र-चयन वग़ैरह) सचिवालय के पास विधायक-निवास के एक कमरे में हुई थी, जो विजय के समूह के किसी बच्चे के ज़रिए मिला था। हमारे सम्बन्धों के वे शुरुआती दिन थे। विजय ने वहाँ मुझे बुलाया था। मै सहज भाव से इसलिए गया, क्योंकि यह मेरे लिए सामान्य बात थी। इप्टा के अलावा मुम्बई के प्रतिनिधि नाट्य-समूह अक्सर बुलाया करते थे…। लेकिन विजय के इरादे कुछ और थे, जो वहाँ पहुँच के जहिराए। असल में मुझे देख के उसे न जाने कैसे यह क़यास हो गया था कि मैं गाता हूँ। सो, नाटक में भूमिका करने के लिए बुलाया था। उस वक्त सारे समूह की आँखें मुझ पर लगी थीं और मैं इनकार करते हुए बड़ा असहज महसूस कर रहा था…। मैंने बचपन में अपने गाँव व मौंसी के गाँव में रामलीलाएँ अवश्य की थीं – सीता तक बना था। स्कूल के नाटकों में खूब भाग लिया था। दर्जा पाँच में पढ़ते हुए भामाशाह की मेरी भूमिका को पुरस्कार भी मिला था – डिप्टी साहब (एसडी आइ) ने पुरस्कार देते हुए ठोड़ी पकड़ के दुलराया था…आदि; लेकिन करने लायक़ होने पर जिन्दगी की मुसीबतों ने इस लायक़ रखा ही नहीं। उस दिन यह सब तो क्या कहता…!! मेरे बारे में विजय के क़यास उस दिन तो नहीं, पर समय के साथ बाद में टूटे, क्योंकि सम्बन्ध बना रहा था…।

और बना रहा, तो विजय का वह क़यास कई तरह से सार्थक भी हुआ, जो हमारे लिए सच ही यादगार है…। दो उदाहरण उल्लेख्य हैं -दोनों की कर्त्ता बनी वही वनस्थली वाली अस्मिता शर्मा, जो उन दिनों मुम्बई में ‘मंच’ समूह की वरिष्ठ अभिनेत्री व विजय की घनिष्ठ मित्र भी रही। पहला यूँ हुआ कि मुम्बई में विजय के शुरुआती दिनों में ही किसी संयोग वश ‘एलियास-फ़्रांसिस’ वालों से उसका साबका पड़ा और एक सप्ताह का नाट्योत्सव करने की तारीख़ें मिल गयीं। हॉल भी छोटा, मंच भी छोटा – छोटे-मोटे आयोजनों में भाषण…आदि के लिए बना। नेपथ्य नाम की कोई चीज़ नहीं…। वहाँ ‘बिहार में चुनाव…’ जैसी एकल प्रस्तुति तो हो सकती थी – रजित कपूर अभिनीत ‘मै बाथ रूम से बोला रहा हूँ’ का शो वहाँ देखा भी था मैंने…फिर भी ‘माइस ऐंड मैन’ करना तो दूभर था। लेकिन नाटक करने का विजय का हौसला देख के मेरे ब्राह्मण को याद आया –‘क़्रियासिद्धि: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे’ याने ‘महान लोगों की क़्रिया-सिद्धि उनके सत्त्व से होती है, साधनों से नहीं’। बस, लग गया उसके साथ, जिसमें सर्वाधिक सहायक बना भूगोल – हॉल की बग़ल में ही हमारे ‘एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय’ का होना। और इसी साथ के चलते उत्सव में अस्मिता ने मेरे हिन्दी विभाग की छात्राओं को लेकर ‘ब्रिज़िश क़दर का कुनबा’ प्रस्तुत करने की ठानी, जिससे लगाव और भी बढ़ गया तथा छात्राओं की सहभागिता को वैधानिक बनाने की प्रक्रिया में विश्वविद्यालय की स्थिति कुछ सह-आयोजक की-सी बन गयी, तो हमारे परिसर में शामों को नाट्याभ्यास की जगह भी मिल गयी। और हिन्दी विभाग की प्रमुख माधुरी छेड़ा के पास स्थित घर का भी पूरा उपयोग हुआ – मंचोपकारण की घरेलू वस्तुएँ वहाँ से उठा लायी गयीं – जिनमे एक भारी भरकम पलंग का लाया जाना ख़ास यादगार है…।

उत्सव की पूर्व संध्या पर देर तक अभ्यास के बाद निकलते समय मेरे मुँह से निकला – ‘कहाँ घर पे जाके तुम लोग चूल्हा-चौका फूंकोगे’ और अस्मिता-विजय को लेके अपने घर चला गया। यूँ वे पहले भी आया करते थे…। लेकिन उस शाम आना-खाना, रात को रुकना…ऐसा किलका कि नाट्योत्सव भर यहीं रहना हो गया। ग़ज़ब यह कि उन दिनों हमारी अन्नपूर्णा (रसोइयाँ) थी – एक दक्षिण भारतीय महिला – लक्ष्मी। उसे कुछ बनाने न आता था, लेकिन हम दोनों के नौकरीपेशा होने के चलते ज़रूरी था, तो गरज-माफ़िक रख लिया था। वह सिर्फ़ दाल-भात व आलू-टमाटर की भाजी ही बना पाती थी। घुमा-फिराकर वही रोज़ खाते – भाजी के विस्तार में मिर्ची-अँचार व रोटी के बदले ब्रेड जोड़ लेते। विजय तो अभ्यास व शो के बाद इतना थका होता कि अन्तिम कौर के साथ ही सो जाता। हाँ, अस्मिता को खाना व खाना बनाना दोनों बहुत पसंद है -पटना में उसके पिता का बड़ा होटल है, जहां भी मै रह-खा आया हूँ। फिर तो बाद में जब सम्बन्ध नियमित हो गये, तो दोनों कई बार कहके आते व अस्मिता कुछ अच्छे व्यंजन बनाती। गाजर का हलवा उसे ख़ास प्रिय है। खाते वक़्त तारीफ़ के लिए बच्चों की तरह चिहाते हुए उसका ख़ास वाक्य आज भी बड़ा याद आता है – ‘सर बड़ा स्वाद है’। यह बनाना-खाना हमारे घर से लेकर मालाड में उन दोनों के आसपास स्थित घर तक खूब चला, जो मेरे बनारस जाने पर ही रुका, तो फिर रुक ही गया। लेकिन वे सुहाने दिन व वह प्रियता तो अविस्मरणीय है।

बाएं से दाएं : विजय कुमार, सत्यजीत शर्मा, राजेश तैलांग, राम गोपाल बजाज, शेखर सेन, अविनाश दास और अजय ब्रह्मात्मज

लेकिन यह सब ज़िक्र रहना-खाना बताने के लिए नहीं, बल्कि उस परिणाम के लिए कर रहा हूँ कि यह न होता,तो ‘ब्रिज़िश कदर…’ का शो रुक जाता। उसके शो से ठीक दो दिन पहले टीम की एकमात्र पेशेवर थिएटर वाली कलाकार ने शो छोड़ दिया। वह छहो लड़कियों की दबंग माँ की बूढ़ी सास वाली भूमिका कर रही थी। तो घर रहने के चलते विजय-अस्मिता ने मिलकर रात भर तरह-तरह से मान-मनुहार कर-करके-ख़ासकर अस्मिता ने- श्रीमती कल्पना त्रिपाठी को वह भूमिका करने के लिए मना लिया। दिन बचे थे सिर्फ़ दो और इस किरदार के प्रवेश (एंट्रीज) भी दो ही थे, लेकिन दोनों में बड़े झकास दृश्य बनते थे। इधर कल्पना जी ने तब की उम्र के पचास वर्षों में कभी मंच पर कदम न रखा था। अन्तिम अभ्यास (रन थ्रू) में तो काँप रही थीं और पूरा होने पर भाग के आयीं व मुझसे लिपट के हाँफती रहीं…। लेकिन विजय-अस्मिता ने जोखम उठाया – दूसरा रास्ता भी न था और शो में कल्पना जी जम गयीं…सर्वाधिक तालियाँ मिलीं – वह ओल्ड-बोल्ड अर्ध विक्षिप्त लेडी की भूमिका ही ऐसी है कि ‘कोई भी कवि बन जाए सहज संभाव्य है’। लेकिन यह कहकर मै कल्पना जी की हिम्मत-मेहनत को कम नहीं करना चाहता…। उनके मंच-प्रवेश से पहले शहर में किसी को पता न था और दर्शक अधिकांश सब परिचित ही थे। डॉ माधुरी छेड़ा ने शो के बाद कहा था – आप पिता-पुत्र तो थे ही नाटक वाले, अब पूरा परिवार नाटक वाला हो गया। इस प्रकार हमारे सम्बन्धों का यह सुफल तो यादगार दस्तावेज है। लेकिन उस शो की जान-परान थी माँ की प्रमुख भूमिका में स्वयं अस्मिता। रंगमंच पर बिना किसी ख़ास (एनएसडी जैसे) प्रशिक्षण के उस उम्र की इतनी सशक्त अभिनेत्री मैंने दूसरी न देखी। स्वभाव में किंचित उग्रता न होती, तो बहुत आगे जाती…। यूँ है दिल की बड़ी अच्छी…। ‘मंच’ में उसे बनाए रखने में भी समूह की बड़ी ऊर्जा जाती थी…।

उसी नाट्योत्सव के लिए पुन: तैयार किये गये ‘रेणु के रंग’ की तीनों कहानियों के शोज़ भी देखने का अवसर बना। बिहार के हर कलाकार में मैंने वहाँ के साहित्यकारों के प्रति अपार श्रद्धा का भाव देखा है। सभी कुछ न कुछ करते रहते हैं। इस क्रम में विजय का रेणु को मंच पर प्रस्तुत करना भी ख़ास उल्लेख्य है। ‘पंचलाइट’ व ‘रसप्रिया’ तो प्रख्यात हैं। ‘रसप्रिया’ का डंका बजता है साहित्य में, तो ‘पंचलाइट’ मंच व मीडिया दोनों में इतनी मक़बूल हुई है कि उसके ढेरों प्रदर्शन व पाठ तैयार हुए हैं…। लेकिन ‘मंच’ के लिए विजय की प्रस्तुति में उसे देखना रेणु के साथ उनके अंचल की खाँटी माटी-पानी में लहकती संस्कृति से एकाकार होने का सुख बन जाता है। इन दोनों सामूहिक प्रस्तुतियों में पूरी टीम की संगति में नाच-गान व खेल-खिलवाड़ों के बीच खिले प्रदर्शन तो कमाल कर ही रहे थे, ‘न जाने केहि वेश में’ को देखना विजय के रंगकर्म व ख़ासकर उसके अभिनय के बिलकुल अलहदा रूप से साक्षात्कार करना था। क्योंकि शेष प्रदर्शनों में नाच-गान, हँसी-ठिठोली…आदि के मंसायन की गम्मद होती है, जो नाट्य में उसकी ख़ास छबि बन चुकी है। लेकिन इस प्रस्तुति में उसका शांत, अवसाद-द्वंद्व मय व गम्भीर अभिनय बिलकुल दूसरे ही विजय को सामने रखता है। पता नहीं क्यों, वह इस रूप को व्यक्त होने वाले प्रदर्शन कम करता है। इस तरह अपने को एक ख़ास छबि में बाँध देता है…!! तभी तो इसके सिवा कहीं यह रूप मैं न देख सका। इसके प्रदर्शन भी कम करता – इसी एक की याद आती है – बस। यह भी एकल है और प्राय: एक खाट में सीमित – जैसे ‘बिहार में चुनाव…’ एक छोटी चौकी पर केंद्रित। अभिनय की दृष्टि व अभिनेता की मानस-प्रक्रिया में ऐसा सम्भव होना ख़ासा मुश्किल है, वरना कभी इन दोनों के प्रदर्शन एक साथ आगे-पीछे होते, तो एक कलाकार की दो ध्रुवीय अभिनय-प्रतिभा के दायरे (रेंज) का अद्भुत आनंद आता…!!

कल्पना जी के बाद दूसरा हादसा मेरे साथ हुआ अगले साल…। उन दिनों ‘मंच’ की एक प्रस्तुति बड़ी सरनाम हो रही थी – ‘बूढ़ा चाँद’, जिसके शोज़ बाहर होते रहने से मैं देख न पाया था। शर्मीला वोहरा लिखित वह दस-बारह साल की तूलिका नामक एक बच्ची की कहानी है, जो दुनियादारी से बिलकुल अलग विकसित हो रही है – इतनी कि लोग उसे कुछ असामान्य याने मनोरोगी-सा समझने लगते हैं। फिर उसके सपनों में एक बूढ़ा आने लगता है, जो उसके साथ तरह-तरह से खेलता है, उसकी हर बात मानता है…। इससे बच्ची बहुत खुश रहती है…। नाटक तो तूलिका बनी अस्मिता शर्मा का ही था, बूढ़े की भूमिका सहयोगी भर थी। लेकिन यदि नाटक बच्ची का था, तो बूढ़ा उसकी जान था। प्राय: 25-30 साल की उम्र में अस्मिता उस बच्ची की भूमिका करती भी ग़ज़ब की थी। शुरुआत के बीस मिनट वह अकेले मंच पर होती – और वह होना अभिनय का आगार-श्रिंगार बन जाता…। कहानी की खोज, नाट्य-रूपांतर व कुशल-स्वच्छ निर्देशन विजय का था। लेकिन अस्मिता का वही स्वभाव कि बूढ़े की भूमिका में मंच के दो-दो नियमित कलाकार आये, पर दो-चार शोज़ में ही बात बिगड़ जाती। लिहाज़ा ‘मंच’ का कोई मिल न रहा था। और अस्मिता को करना था…। उसी रौ में न जाने कैसे उसने एक दिन मुझसे कह दिया। सीधा इनकार करना ही था मुझे। कैसे करता – सभी कारण विपरीत थे…। पूर्णकालिक नौकरी के ऊपर ढेर सारे काम – साहित्य व नाटक तथा घर…आदि के! फिर बचपन के बाद अब पचास की उम्र तक कभी मंच का मुँह न देखा। लाज यह भी कि शहर का सारा रंग़-जगत जानता है। कहेगा –बूढ़ा तोता राम-राम करने चला है…। लेकिन यही पक्ष अस्मिता के तर्क का सकारात्मक हिस्सा होता– ‘सर आप तो उम्र के कारण इस कहानी के बने-बनाये बूढ़े हो। भूमिका एकदम आपके योग्य है –आप पर फबेगी…’ आदि-आदि। गरज यह कि वह बार-बार मिलती तथा नाटक में भूमिका करने के लिए बच्चों की तरह आग्रह-मनुहार…करती ही रहती…।

संयोग से ‘बतरस’ का वार्षिकोत्सव आने वाला हो गया। घंटे भर के एक नाटक की परम्परा बन गयी थी, जिसके लिए यह बिलकुल फ़िट था। पैसे भी बचने थे। सो, बार-बार के उसके इसरार पर एक दिन पाठ (रीडिंग) शुरू हुआ। बालिका के साथ बूढ़े के कुच-कुच करके ढेरों संवाद थे। दो-तीन पाठ में मुझे लग गया कि बहुत मुश्किल है, न होगा। छोड़ने की बात कह भी दी। लेकिन तब तक अस्मिता ने मारे ख़ुशी में बात फैला दी थी। पत्नी के साथ मिलकर अस्मिता और फिर तमाम बच्चे… सब चिढ़ाने लगे कि भाग खड़े हुए। करने के लिए चिट्टा धराने लगे…और मैं ताव खा गया। तो लग गया तैयारी में जम के…। विजय का कराया सब अस्मिता को पता था। अत: उसकी बहुत ज़रूरत थी नहीं। अस्मिता ही वह सब बताती रही – जैसा विजय ने कराया था। लेकिन पाठ के बाद अभ्यास शुरू करने के पहले मैंने विजय को एक दिन बुलाया। उससे कहा – मुझे तुम सिखाओ। फिर अपने समय के अनुसार विजय कई दिन आया…। और कहना होगा कि मंच (स्टेज) की स्थिति, उसकी गुणवत्ता और अभिनेता द्वारा उसके प्रयोग-उपयोग के मूलभूत विचार उससे सुन-जान के मैं बहुत समृद्ध हुआ। मेरी भूमिका की भी मूल बात बतायी – आपको जो कुछ भी करना है, उसका मूल भाव बच्ची के साथ खेलना है। उसे खुश रखना है – चाहे जो कह-कर के…। बस, बूढ़े को निभाने की गोया कुंजी मिल गयी। सुई में धागा डालने का एक दृश्य था, जिसमें काफ़ी समय देना था। मैं परेशान था – इतने से काम को कैसे इतनी देर करूँगा। विजय ने सुई-धागे के साथ भी खेलना सिखाया – सोचिए सर, बचपन में आपने देखा होगा उमर-दराज लोगों को सुई में धागा डालते हुए…कैसे उनसे नहीं होता, फिर अंत में कैसे वे कर पाते है…वैसा कीजिए…और मुझे धागे को मुँह में डालके जीभ-होंठ से गीला-नुकीला करती अपनी माँ याद आ गयी। जब वैसा किया, तो विजय जैसा प्रमुदित हुआ कि उतनी ख़ुशी तो मुझे भी नहीं हुई थी। और मुझे अब इसी संगति में विजय की माँ याद आ रही हैं, जिनके हुक्का पीने की नक़ल विजय ऐसी उतारता है कि हंस-हंस के लोट-पोट हो जायें…। वे मुम्बई आयीं एकाधिक बार – दो-चार दिनों रहीं भी मेरे घर। उनकी अद्भुत सरलता ऐसी कि अपने गाँव जाके बताया–‘समुंदर के किनारे तिरपाठीजी के एक एकड़ में मकान हौ – नरियर के बड़ा बगइचा हौ…’। जबकि नारियल के दो पेड़ हैं और समुद्र दस मिनट की दूरी पर है। बहरहाल,

‘बूढ़ा चाँद’ में काम करने का एक बड़ा स्वास्थ्यकर लाभ हुआ। पूरे नाटक के दृश्य विधान यूँ बने थे कि मुझे लगातार बाएँ देखना था, जो मेरी हल्की स्पोंडिलाइसिस वाली गरदन के लिए उलटा था। इसे विजय ने कहने पर भी बदला नहीं। और एक सप्ताह के अभ्यास में ही गरदन ने मान लिया – दुखना बंद हो गया। मन में आया कि पंतजी के ‘रोग का है उपचार – प्यार’ की तरह कला भी रोग का उपचार है !! कुल मिलाकर उस दौरान विजय का ऐसा रूप दिखा, जो यह भूमिका न करता, तो मुझे न दिखता…और कहूँगा कि वही उसके रंगकर्मी का असली रूप है। मै तो निहाल हो उठा…। उतने दिनों के उसके व्यक्तित्त्व के उस अंश के लिए मेरे मन के गह्वर में कहीं एक अलग आदर भाव पनपा, जो आज भी मौजूद है…और इस लिखने वग़ैरह जैसे गहन एकांत क्षणों में काफ़ी मसर्रत महसूस कराता है…। लेकिन यह कभी उससे मैंने कहा तो क्या, ज़ाहिर तक नहीं होने दिया, जो शायद अध्यापक के मेरे बादशाही पेशे व वरिष्ठता का ग़ुरूर भी हो…!!

वार्षिकोत्सव हुआ गोरेगाँव के अजंता हाल में–‘बूढ़ा चाँद’ का मेरा अभिनीत पहला शो। अस्मिता तो स्कूल की पोशाक में ही रहती। मुझे पाजामे पर झोलझाल कुर्ता और कंधे से दोनों ओर लटकती चद्दर लेना था। नारंगी रंग की चद्दर विजय ने दी, जो आज तक सहेज कर रखी हुई  है मेरे पास, जिसे देखकर मुझे बालगंधर्व द्वारा ‘बेगम बर्वे’ को दी गयी चद्दर की याद आती है…। आयोजन में शहर के कई रंगकर्मी व साहित्यकार व प्राध्यापक उपस्थित थे, जिनका समोह मुझे होना था। शशी के नेतृत्व में नवचों की विनोदी धमकी की भनक भी मुझे लगी थी – सर अपनी समीक्षाओं में सबकी खिंचाई करते हैं – आज उन्हें हूट करके बदला लेंगे…। लेकिन विजय ने वो कहा था, जो कर्मकांड (रिचुअल्स) की तरह अपने हर छात्र को भाषण-प्रतियोगिता में भेजते हुए हम कहते थे –‘सामने सब अनाड़ी बैठे हैं, सोचकर मंच पर आइएगा…’। लेकिन सबने मित्रवत स्नेह से देखा, दिल खोलकर सराहा…। इप्टा के महामंत्री तक रहे मित्र रमेश राजहंस ने समीक्षा भी लिखी, जिसमें क़यास व्यक्त किया कि करने के बाद मैं नाटक को अंदर से और अधिक समझ पाऊँगा…। बड़ा द्वय-अर्थी बेधक वाक्य है। लेकिन मुझे मालूम है जन्नत की हक़ीक़त -वीडियो देखा है मैंने और जानता हूं कि मै समीक्षा लिखता, तो शो आगे न कर पाता…, लेकिन 15-20 शोज़ भी किये हमने घूम-घूमकर। जबलपुर में विवेचना उत्सव में हुए विजय के उस भव्य शो के पहले यह शो भी हुआ था। पर्दे के पीछे से हज़ार की संख्या में बैठे दर्शकों को देखकर मैं हिल गया था। लेकिन घोषणाएँ चल रही थीं – मंच पर जाने के सिवा दूसरा रास्ता न था। एक ख़ास उल्लेख…भोपाल में एक शो हुआ, जिसमें जाने कैसे मै एक मुद्रा भूल गया। एक संवाद था, जिसे बोलते हुए मुझे पीछे की तरफ़ गिर जाना था और मैंने खड़े-खड़े बोल दिया। अस्मिता की भाव-संगति उस पोज के साथ थी, लिहाज़ा वह सकपका गयी – अगला संवाद न बोल सकी। उस क्षण उसके पेशेवर रंगकर्म के बदले मेरी उम्र का अनुभव काम कर गया। उसके बाद हमें अपनी दिशा बदलनी थी। सो, मैं बदलके उधर गया और अपना एक संवाद छोड़के अगला संवाद बोला, जिसे उस क्षण भर के वक़्फे में अस्मिता ने भी पकड़ लिया। फिर तो शो पूर्ववत हुआ, लेकिन भोपाल के कला-मर्मज्ञ दर्शकों ने इस च्युति को खूब पकड़ लिया। शिकायत भी विजय तक पहुँची –‘तुम्हारे ऐक्टर्स अच्छा अभ्यास करके नहीं आये थे’। कहना यह कि विजय के साथ ने ऐसे-ऐसे अनुभवों से समृद्ध किया मुझे, जो यूँ कभी होने न थे…!!

विजय के साथ इस तरह की गहन साझेदारी भरा जीवन क़रीब सात-आठ सालों रहा। उसके नाट्यकर्म की बावत ढेरों बातें देखने-जानने-महसूसने को मिलीं…। नाटक उसकी रग-रग में, उसके जीवन के क्षण-क्षण में समाया था। एक दिन शाम को हम जहू चर्च के आसपास घूम रहे थे। सड़क पर रंगीन व छोटे आकार की मोमबत्तियाँ बिक रही थीं। उसने दो दर्जन ख़रीद लीं। मैंने पूछा – क्या करोगे? वह मुस्कुरा के रह गया। दो-चार दिनों बाद ही ‘रागदरबारी’ का शो था, जिसमें इन मोमबत्तियों का कलात्मक व चुलबुला प्रयोग देखके दंग रह गया…। पटना में प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ का शो था। शो के पंद्रह मिनट पहले पता चला कि मंचोपकरण (‘प्राप्स’ कहने का चलन हो गया है – जा रे जमाना!!) में लकड़ी चीरने की टांगी नहीं है। बस, विजय चल पड़ा झटके से। दस मिनट में एक अलबेली (स्टाइलिश) टांगी लेके प्रकट हुआ…। मालाड के खंडवाला कॉलेज में ‘बूढ़ा चाँद’ का शो था। किसी गलती से छुट्टी की घंटी बज गयी और सारे बच्चे भाग लिये। कुछ पकड़ के लाये गये, तो दिखा कि 500 की क्षमता के हॉल में 50 बच्चे भी नहीं! शो कैसा लगेगा। बस, दो मिनट में विजय उस बड़े से मंच पर चढ़ा और हमें बुलाकर कहा – मंच के इस भाग में दस फ़िट के अंदर आप लोग ऐक्ट कर लो और बाक़ी मंच पर बिना कुर्सी के बच्चे बैठ जाएँगे…। सचमुच शो एकदम कांम्पैक्ट हो गया। इन सारी तमाम तत्परताओं, सूझबूझों व जानकारियों के साथ उसमें कला व कलाकर की इयत्ता का जज़्बा भी खूब भरा हुआ रहा…। भोपाल के किसी सरकारी उत्सव में ‘रागदरबारी’ का शो लगा था। उसमें अष्टभुजा शुक्ल की कविता का प्रयोग था – ‘कहीं बलात्कार हो जाए, मत घबराना नारी जी, बूढ़ी होने पर मुआवज़ा देंगे अटल बिहारी जी। के बदले बूढ़ी होने पर मुआवज़ा के बाद पाँच सेकेंड ठहर कर और उँगली दिल्ली की ओर उठाकर) देंगे मनमोहन गिरधारी जी’ कर दिया गया था। शो के ठीक पहले एक अधिकारी भागे-भागे आये और कहा कि वह पंक्ति यहाँ मत गाइए। लेकिन विजय अड़ गया – ‘हम तो गाएँगे’। और इस इयत्ता के लिए शो रद्द कराने को तैयार हो गया। रद्द होने पर और बवाल हो जाने की सोचकर उन्हें मानना पड़ा – शायद रेकॉर्डिंग में न लेना तय हुआ था।

कुल मिलाकर यह कि इस दौरान हम दोनों का एक दूसरे से कम ही कुछ दबा-छिपा रह गया होगा…। उसने मुम्बई से गाँव तक का मेरा सारा संसार ही नहीं देखा, मेरे द्वंद्वों-सीमाओं को भी जाना…, तो मैंने भी उसके जीवन के कृष्ण-शुक्ल सारे पक्षों को देखा। नौबतपुर के छोटका कोपा जाके मगही नाटक और भाई से बँटवारे में पैतृक हवेली लेकर उसे थिएटर में तब्दील करने का उसका सपना ही नहीं देखा, परिवारों की सामंतशाही और एक दूसरे घरों से राजघराने जैसे युद्ध के वाकये और इसी सबके दुष्परिणाम स्वरूप हुई उसके पिता की निर्मम हत्या भी सुनी, जिसके लिए ‘ब्रिटिश कौंसिल ऑफ इंडिया’ के बेहद सम्मानजनक चार्ल्स वैलेस ट्रस्ट अवार्ड’ के तहत लंदन में की जाती ‘ऐडवाँस स्टडी’ को छोड़के विजय को आना पड़ा…। मुक़दमा मुझसे मिलने तक चलता रहा था। ऐसे ही दबंग परिवार में विजय की शादी हुई थी। दोनों प्राणियों व परिवारों के बीच अहम-शान की भयंकर टकराहट में साँसत झेलता दाम्पत्य देखा कि तलाक़ के लिए तैयार नहीं – मिलके साथ रहने की स्थिति नहीं…। लेकिन ऐसे भयावह भौतिक संघर्ष व मानसिक यंत्रणा के बीच दोनों बेटों को बाकायदे पढ़ाते, सेटिल करते देखा…। सबसे भला मुझे उस सुबह जहू की तरफ़ जाते हुए लगा, जब उसने मुझे उलाहना दिया कि सब कुछ जानते तथा अभिभावक की तरह होते हुए भी मेरी समस्या के लिए आप कुछ कर नहीं रहे…। लेकिन सचमुच चाहकर भी कुछ करने जैसा था नहीं…।

और इसी सबके चलते एक निछद्दम प्रेम को पनपते तथा दाम्पत्य के लिए तैयार, बल्कि दाम्पत्य-सी सहभागिता की समझ से बनी स्थितियों (साझे निवेशों व कार आदि के साथ आस-पास घर लेने) में लगभग साथ-साथ रहते-जीते देखा, लेकिन कानूनी पेंच से थक-ऊबकर उस प्रेम के टूटने के साथ विजय को भी टूटते देखा…। टूटे हुए विजय को जिन्दगी की गाड़ी खींचते व निरन्तर अपनी पारिवारिक जिन्दगी को ठीक से बनाने-बसाने की सोचते, प्रयत्न करते देखा। इसीलिए समझ सका उसका यह निष्कर्ष ‘सर, दुनिया की परवाह छोड़िए…और अपने सुख, अपनी इच्छा, अपने ढंग से अपने लिए जीने की जिन्दगी चुनिए…’। अपने सुख, अपनी ख़ुशी के लिए जीने की बात कह रहा था वह मुझसे, मेरे लिए…, पर शायद तैयार कर रहा था अपने को भी – अपने लिए…। और उसने कर लिया, जो मैंने नहीं देखा। करते हुए उसने बताया भी नहीं – बहुत बाद में बताया – शायद तब, जब जान गया कि मैं जान चुका हूँ…। मैं तो तब भी जानता, तो शाबाशी के साथ सहयोग ही देता – बाद में जाना, तो भी सदिच्छाएं-शुभेच्छाएं दीं…।

निजी जीवन की इस व्यक्ति-केंद्रित जहनियत के साथ थियेटर में घनघोर समाजवादी चिंता को व्यक्त करता वह सोच भी देखा, जो इतना ज़हीन व अंतस् तक इतना समाया रहा कि ‘रागदरबारी’ जैसे हास्यमय व्यंग्य का अंत निरालाजी की अतिशय गम्भीर कविता –‘गहन है यह अन्धकारा’ से करता…। कविता विजय ही कढ़ाता (शुरू करता) और फिर सारे पात्रों का कोरस उसे दुहराता। एक बार (शायद मेरे विवि के पाटकर हाल में) गाते-गाते विजय रुक गया –कदाचित कविता की राहों जीवन का वह अवसाद-भाव भूमिका में उतर आया और दोनों ऐसे गड्डम-गड्ड हुए कि विजय मूक हो गया, लेकिन न गीत रुका, न शो…उसी का सिखाया, उन दिनों का विजय के बाद ‘मंच’ का नम्बर दो सदस्य, सह-कलाकार अजय ने विजय की चुप्पी के चंद सेकेंड्स के अंदर उसी निरन्तरता में आगे बढ़कर कविता को उठा लिया…। ‘मंच’ की रंग-यात्रा का यह प्रतीक बन सकता था, लेकिन ऐसा हो न सका…।

हालाँकि बहुतेरे लोगों ने विजय के साथ काम किया, उससे सीखा। उनमें पंकज त्रिपाठी जैसे लोग फ़िल्मों में बड़ा नाम-दाम कमा रहे हैं, तो रणधीर जैसे लोग थिएटर में प्रतिष्ठित हैं और पुंज प्रकाश जैसे विचारक व ज़हीन रंगकर्मी भी अपने ढंग का साख भरा काम कर रहे हैं…। ऐसे सभी लोग विजय के काम व जीवट-जज़्बे की बहव: प्रशंसा करते हैं, सम्मान देते हैं। विजय स्वयं अपने देवेंद्रराज अंकुर…आदि गुरुओं का बड़ा सम्मान करता है। हबीब तनवीर की तो नाट्य-देव की तरह पूजा-सी करता है। लेकिन इन सबके बावजूद ‘मंच’ की कभी कोई ऐसी लाइन नहीं बन सकी, जो उसे आगे ले जाये…। बड़े-बड़े रंगकर्मियों का ऐसा हुआ, जिनमे शंभू मित्र, श्रीराम लागू से लेकर अब लगभग हबीब तनवीर तक के नाम शुमार हैं कि उनके बाद उनके समूह न चले – कोई ऐसी लाइन न बनी…। लेकिन अपने रहते विजय के ‘मंच’ का ऐसा हो रहा…!!

तो इसके लिए उसकी कार्य पद्धति ज़िम्मेदार है। नाटक शुरू करते हुए लड़के आते और शो न होने पर ‘मंच’ उनकी कोई परवाह न करता…। नाटक में काम करने का भी कोई निश्चित-नियमित भुगतान नही होता। सिखाने के एवज़ में शो करा लेना होता था। हाँ, उनके आगे बढ़ने को लेकर पैरवी-प्रयत्न पूरा करता, लेकिन काम के नियमित पैसे आदि न देने की यह धारणा व रवय्या ही रूढ़िवादी (ऑर्थोडॉग्स) है। लिहाज़ा यदि उन बच्चों को कोई काम मिल जाता, तो ‘मंच’ की ज़रूरत पर वे भी क्यों मिलते? अतः हर नाटक में ही नहीं एक ही नाटक के अलग-अलग शोज़ में बहुधा कलाकार नये हो जाते थे, जिसका असर शो पर ही नहीं, विजय के नाट्य-कर्म पर पड़ा। समूह निरन्तर नौसिखिया (इम्योच्योर्ड) ही रह जाता। मुझे याद आता है कि ‘राग दरबारी’ का मुम्बई के बाहर कहीं शो था और चम्पा (एकमात्र लड़की भूमिका) करने के लिए पहली बार किसी नाटक में मंच पर जाने वाली हमारी छात्रा लक्ष्मी तिवारी गयी थी। उसकी तो करने की इच्छा भी थी, लेकिन दूसरी बार तो अपने बीटो पावर से अनिता तिवारी को भेजा था। रात भी रहना था, इसलिए उसका भाई भी साथ गया। यह बात दूसरी है कि वह लौटकर आयी, तो खुशी अगली बार जाने को भी तैयार…!! कुल मिलाकर यह कि विजय ने ‘मंच’ को स्थायित्त्व देने का सुनियोजित प्रयास वैसा नहीं किया जैसा अपेक्षित होता है। तीन-तीन जगह चलाने की ईहा ने भी इस बिखराव को बढ़ाया और विजय इस श्रेय के भ्रम में पड़ा रहा। संस्कृति मंत्रालय व सरकारी संस्थानों से अनुदान आदि लेकर ‘मंच’ को रंगमंडल (रिपर्टरी) के रूप में खड़ा करने का प्रयास कभी उसकी वरीयता में नहीं दिखा, वरना सम्पर्क तो उसके थे…। लेकिन उन सम्पर्कों से वह अपने लिए कार्यशाला…वगैरह के काम लिया करता। यही उसकी कार्य पद्धति बन गयी। फिर रंगमंडल बनाने-चलाने व प्रबंधन के लिए जिस तरह की लिखा-पढ़ी (फ़ाइल वर्क) होनी चाहिए, वैसा करते, ऐसे कौशल विकसित करने की कोशिश करते कभी दिखा नहीं विजय। लव्वोलुबाब यह कि निजी आमदनी के आयोजन करता…। यह आदत उसके व्यवहार में भी व्याप्त हो गयी है या व्यवहार से ही नाट्यकर्म में उतरी है…कुल मिलाकर व्यक्तित्त्व का अविभाज्य हिस्सा बन गयी है।

पैसे न खर्चने, उसे दांत से पकड़ रखने की वृत्ति तो हमने जीवन में सदा देखी-भोगी…कभी अशालीन बनते भी देखा… ‘रागदरबारी’ का एक शो मैंने दिलवाया आगरे में। किसी और को न चला जाये, इसके लिए आयोजक पर रद्दा रखते हुए कह दिया – ‘मंच’ को मेरा समूह ही समझो। और इसी प्रभाव में शो होने के बाद आयोजक ने शुल्क के तीस हज़ार रुपए लाके मेरे हाथ में रख दिये। नेपथ्य में पूरा समूह व कुछ अन्य भी मौजूद थे। और एक-दो मिनट में वहीं विजय ने पैसे मेरे हाथ से लगभग छीन लिये और उठ के चल दिया। वे सज्जन मेरी तरफ़ देखने लगे और मैं कुछ कह न सका…। इसी तरह जीवन में हमारे उसके बहुतेरे आसंग थे…। छोटी-छोटी बातों में उसकी आत्मकेंद्रित वृत्ति दिख जाती। शायद समूह के बच्चों से काम लेने की तरह नाटक के लिए कुछ करना हमारा फ़र्ज़ है, की वही रूढ़िवादी वृत्ति मन में पैठी हो…!! गाँवों में रहते बचपन में ऐसी वृत्तियों के जन्म व विकास बड़े स्वाभाविक हैं, लेकिन शिक्षा-कलादि के संस्कार उन वृत्तियों-ग्रंथि को खोलते हैं, परिवेशजन्य संस्कारों को बदलते हैं। विजय के भी बहुत बदले, लेकिन ‘भजैहौं नाहीं’ की वृत्ति के अपने घेरे को अपवाद स्वरूप उसने खुद ही अभेद्य बना लिया, जिससे विजय व ‘मंच’ की ही नहीं, ‘मंच’ के मिस पूरे रंगमंच की हानि हुई है।

बनारस से मेरे लौट आने याने 2010 के बाद मेरी जानतदारी में विजय ने दो नाटक तैयार किये। पहले ‘सखाराम बाइंडर’ किया। शो कराने की दिक़्क़त पर मैंने पहला शो कराया – ‘महात्मा गांधी मेमोरियल’ में अपनी परम मित्र व बहुत वरिष्ठ सहकर्मी सुशीला गुप्ता से कहकर। हॉल का हाल वही – एलियाँस फ़्रांसिस वाला, लेकिन विजय की जुझारू वृत्ति भी वही कि हर हाल में कर लेगा। गांधी मेमोरियल के दर्शक भी मिल गये। विजय ने सखाराम की केंद्रीय भूमिका की। अन्तिम नाट्य-अभ्यास जैसा ठीक-ठाक शो हुआ। लेकिन ज्यादा शोज़ न कर पाये, क्योंकि तेंदुलकर जी के वारिस बड़ी मुँहफट्टई से बहुत बड़ा शुल्क लेते थे और उतनी आमदनी न होती। कुछ दिनों बाद उसने ‘आधे अधूरे’ तैयार किया। शो के स्थल का फिर टोटा…। तो मीरा रोड में जलेस के मित्रों मयंक-शैलेश आदि से कहकर शो फिर कराया। लगातार दो दिन दो शोज हुए। दूसरे शो में सावित्री की भूमिका विजय की पत्नी गीता त्यागी करने वाली थीं, इसलिए दूसरा भी देखने का मन बनाया था मैंने। वैसे बाद में यह भी खबर लगी कि उस दिन भी वे न आयीं – सीरियल के सामने नाटक का शो ऐसा ही भिखारी होता है – फेरा देखो बाबा, हाथ खाली नहीं है। ख़ैर, पहले शो में दिखा की विजय ने मूल आलेख में कुछ-कुछ सम्पादन किया है, जो अच्छा होते हुए भी मूल पाठ में निहित किसी महतत्वपूर्ण पहलू में किंचित रिक्ति का सबब बना दिखा था। इस पर मैं बात करना चाहता था…और ऐसी चर्चाओं में विजय को भी रुचि है। सहमत होने पर तदनुसार बदलता भी है। लेकिन शो के बाद सब बदल गया…।

शो पूरा होने पर हॉल मुहय्या कराने वाले जलेस के मित्रों को तो धन्यवाद दिया– मेरा नाम न लिया, जो उचित न होते हुए भी यहाँ उल्लेख्य नहीं। लेकिन वहाँ मौजूद एनएससडी के दो बहुत ही जूनियर बंदों को मंच पर बुलाकर बलैयाँ लेने और क़सीदे काढ़ने इसलिए लगा कि वे देखने आये– गोया उनके आने से नाटक धन्य हो गया। बस, वहीं मैं क्षुब्ध हुआ कि बाक़ी दर्शकों का आना क्या है? अरे, वे दोनों तो नाटक सीखने के लिए देश का पैसा खाके आये हैं। उनका देखना कौन सा बड़ा ख़ास है!! यहीं बग़ल में रहते हैं। ख़ाली बैठे थे, चले आये। फिर कभी न झाकेंगे, न पूछेंगे। एनएसडियंस को लेकर मेरा अनुभव है कि इनका आपस में लगाव बेहद जातिवादी, बल्कि ब्राह्मणवादी क़िस्म (याने बाक़ी अछूत) का होता है। इसने इस आग में घी का काम किया…। फिर विजय के घरेलू विवाद में जो खल भूमिका एनएसडी के उसके सहपाठियों ने निभायी, उसका दंश खुद विजय ने मुझसे साझा किया…!! तब भी अनुरक्ति ऐसी!!

विजय कुमार

फिर तो मैं उस शाम शो के बाद बिना मिले ही चला गया। विजय का फ़ोन दूसरे दिन आया…वही मसखरापन – सर, कहाँ भटक गये कल? … और मैं तो फट पड़ा। उसे जवाब देने का मौक़ा तक न दिया…। लेकिन वह सब फ़ौरी था – हिंदू दाम्पत्य की तरह कि हर बात पे लड़ेंगे, पर सम्बन्ध जन्मांतरों का होगा…। लिहाज़ा मित्रता को तो कुछ होना न था –तेज हवाओं में पत्ते झरते हैं, डालियाँ हिलती हैं – ज़ड़ नहीं। लेकिन इसी सब में उस सम्पादन पर चर्चा तो क्या होती, पूरा नाटक ही भूल गया –‘कथां प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव’ (पागल के पहले की सुनी कथा की तरह)!! इसे भी अजीब इत्तफ़ाक़ ही कहें कि उस घटना के बाद से आज तक न विजय का कोई नाटक देख पाया, न देखने का मौक़ा आया और न शायद उसने कोई नाटक तैयार ही किया, जिसका बड़ा कारण कोरोना-काल भी है। इस बैठकी-काल में उसने अपनी नाट्य-यात्रा के वीडियो बनाए, जिनकी अति मंथर गति से मैं तो न सुन सका, लेकिन उसे काफ़ी ‘लाइक्स’ मिले। आजकल आपसी सवादों से पता चलता है कि अपने गाँव में रहते हुए वह आसपास के गाँवों में घर-घर जाकर नाटक करता-कराता है, जो पहले से ही उसका एक सपना या सोच था। वह आज साकार हो रहा है। किंतु उसके स्वरूप, प्रकृति व भविष्य का कुछ पता नहीं!! लेकिन जहां पहले हर बात नाटक से शुरू होती थी…और नाटक पर ही पूरी होती थी, वहाँ अब हालचाल में सुनायी पड़ता है -एक शूट था भोपाल में, वहाँ से आया हूँ…दो दिन बाद शूट के लिए अलीबाग़ जाना है…। यह कहके मै कोई उलाहना नहीं दे रहा… बस, अपने पुराने दिनों के आईने में आज की तस्वीर भर पेश कर रहा हूँ। जीवन की विकट सचाई को स्वीकारता हूँ।

और हम अब उस मुक़ाम पर पहुँच चुके हैं कि उसके आगे नामाकूल होते हुए भी सब कुछ हस्बमामूल-सा हो गया है। लेकिन इसी वजह से कहना तो बनता है – लेखन की संहिता के तहत भी। फिर उषा प्रियंवदा कृत ‘रुकोगी नहीं राधिका’ की जानिब से ‘जो जैसा है, उसे उसी रूप में -गुणों-अवगुणों के साथ- स्वीकारना ही सच्चा प्रेम है’ को बढ़ा लिया कि यही दोस्ती भी है। फिर मेरे शीघ्र आवेशी (शॉर्ट टेम्पर्ड) स्वभाव को विजय भी तो चला लेता है। छोटी सी बात पर बेतरह भड़क जाने के कितने वाक़ये हुए होंगे…पर विजय समप कर लेता…अपनी उसी मसखरी अदा में मुस्कुराते हुए…। बच्चनजी की कविता याद आ रही है –

मुझमें है देवत्व जहां पर, झुक जायेगा विश्व वहाँ पर,

अब न मिलेंगे पर मेरी दुर्बलता को दुलराने वाले

बीते दिन कब आने वाले...

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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