पुस्तक समीक्षा

उम्मीदों के आतिशदाने

 

मुस्लिम विमर्श की कहानियाँ 

 

विभा रानी के कहानी संग्रह ‘आतिशदाने’ में मुस्लिम विमर्श की कहानियाँ है। अन्य विमर्शों से भिन्न मुस्लिम विमर्श वास्तव में मुसलमानों विशेषकर भारतीय मुसलामानों को जानने समझने का विमर्श है। अन्य विमर्श जहां शोषण के  विरोध, विद्रोह और सहानुभूति अथवा अधिकारों के साथ शुरू होते हैं आगे बढ़ते हैं मुस्लिम विमर्श के अंतर्गत हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि हमारे भारत में उनका धर्म, आचार विचार त्योहार आदि का संबंध भारतीय परिवेश से किस तरह से संबंधित है, उनका इतिहास उनका विकास और भारत में उनकी स्थिति का अध्ययन मुस्लिम विमर्श के प्रमुख बिंदु है । मुस्लिम विमर्श मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम चिंतक या लेखक द्वारा किया जाता है ।  गैर मुस्लिम उनकी स्थिति किस रूप में जानते समझते और व्यक्त करते हैं जबकि मुसलमान के लिए उनके सोचने  समझने का मनोवैज्ञानिक तरीका क्या है। वास्तव में यह मुस्लिम समाज का मनोवैज्ञानिक अध्यन भी है । कुल मिलाकर भारतीय संदर्भ में मुस्लिम विमर्श की वैचारिकी उनकी पहचान और अस्तित्व पर आए संकट पर चिंता व्यक्त करती है जिसके अंतर्गत माना जाता है कि उन्हें मुख्य धारा से जानबूझकर काटा जाता है जबकि देश के विकास में भी बराबर के सहभागी रहे हैं।जो मुसलमान भारत में जन्मे हैं शतकों से यहां रह रहे हैं वे भारतीय क्यों नहीं माने जा सकतें, उनके देश-प्रेम पर चिह्न क्यों उठाए जाते हैं और विशेषकर विभाजन के बाद उन्हें अपनी  भारतीयता बार-बार प्रमाणित क्यों करना पड़ती है। इन सभी प्रश्नों आलोक में यदि हम इन कहानियों का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि ये कहानियाँ भारतीय मुसलमान को जानने समझने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन सकती  है क्योंकि जैसा कि खुद विभा रानी भूमिका में लिखती है कि वे  बचपन से ही मुस्लिम समाज और संस्कृति से  जुड़ी रही है इसलिए उन्होंने कभी अपने भीतर इनके प्रति किसी तरह का अलगाव अनुभव नहीं किया कि यह हमसे कहीं अलग है। खानपान में बर्तन अलग रखना जैसे कुछ भेदभाव को यदि अलग कर भी दिया जाए, तो भी इनके साथ हमेशा एक मजबूत रिश्ता रहा है। खान साहेब कहानी हिन्दू चरना और अन्य गाँव वालों के साथ इस मुस्लिम परिपार के साथ पनपते विकसित होते संबंधों को बेहद खूबसूरती के साथ प्रस्तुत करती है कि भारत के लोग साझी संस्कृति, अनेकता में एकता में विश्वास रखते रहे हैं लेकिन विभाजन ने लोगों के मन मस्तिष्क के साथ साथ साहित्य में भी विभाजन कर दिया।

जबकि आरंभ से ही हमारे हिंदी साहित्य में मुस्लिम लेखक (अब्दुल रहमान, जायसी, ख़ुसरो) तथा कथा साहित्य में मुस्लिम पात्र नजर आते रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे हिंदी साहित्य में उनकी स्थिति समाप्त होने लगी ऐसे मैं गैर-मुस्लिम द्वारा एक पूरा कथा संग्रह मुस्लिम विमर्श को समर्पित करना  हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण देन है । मुस्लिम समाज की इन इन कहानियों के अध्ययन से हमें है समझ आता है कि सभ्यता और संस्कृति का संबंध कभी भी धर्म के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता बल्कि संस्कृति राष्ट्र की धरोहर है जो इतिहास के साथ बनती, बिगड़ती और विकसित होती रहती है उस पर किसी एक किसी धर्म जाति और संप्रदाय का आधिपत्य नहीं है हमारे देश में अब फ्रेंच, तुर्क, मुगल, अंग्रेज अनेक जातियां धर्म संप्रदाय के लोग आए और यही की मिट्टी में रच-बस गए देश में वे अपनी इच्छा अनुसार रहे तो हमारे देश ने भी उन्हें अपनाया और धीरे-धीरे साझा संस्कृति का विकास होने लगा पर अंग्रेजों ने भाषा के आधार पर  फूट डालो शासन करो से विभाजन की नीव बनाई । आज उस पर विभाजन की बहुत बड़ी बिल्डिंग खड़ी हो चुकी है और इस बिल्डिंग की दीवारों को तोड़ना आसान नहीं लग रहा इसलिए भी आज मुस्लिम विमर्श की जरूरत है ताकि इन दीवारों को तोड़कर पुन: एक  साझा संस्कृति विकसित हो जिसमें सभी का समान विकास हो । पर साम्प्रदायिकता और अलगाववादी विचारधाराओं ने दंगो की आग ने विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया “लौटेगी सबीहा ?” कहानी हो या ‘इसी देश के इसी शहर में’ वर्ष 92,9/11 या 13 दिसम्बर के कुपरिणामों के बाद इनकी स्थितियों को मार्मिकता से उभरने का प्रयास करती है । मुस्लिम होने के कारण सईद साहब को घर नहीं मिल पा रहा तो आबिद मियां और सबीहा जैसे परिवार मुंबई शहर के विकसित परिवेश को छोड़ गाँव के पिछड़ेपन की और लौटने को विवश है ।

जब मुस्लिम स्त्री की बात आती है तो हमारे सामने बुर्के में कैद स्त्री का बिंब आता है जहाँ हम उसका चेहरा भी नही देख पा रहे उसे समझेगे कैसे ? ‘इसी देश के इसी शहर में की टीचर नबीला को यह सुनना पड़ता है कि नजर रखो इस पर जाने हमारे बच्चों को क्या क्या पढ़ाने लग जाए या तुम ये बुर्का उतार क्यों नहीं देती ताकि उनकी औरतों जैसी लगो !  ऐसी स्थिति में मुस्लिम स्त्री को जानना समझना और भी कठिन काम है तो लेकिन विभा रानी के स्त्री पात्र अपनी मूल प्रकृति के साथ ही आते हैं जो जहां वे पितृसत्ता के साथ साथ से धार्मिक कट्टरता से भी संघर्ष कर रही हैं। उनके स्त्री पात्र अपनी सादियों की खामोशी को तोड़ रही है अब और अत्याचार सहने को तैयार नहीं बल्कि जा ज़रीना की पति के साथ हाथा-पाई होती है तो वह बराबरी का मुकाबला करती है और पुलिस में खबर करती है । बेमुद्दत कहानी की बड़ी बी अपनी बहू शब्बो को इन रूढ़ियों के खिलाफ लड़ने के लिए मानसिक रोप से तैयार कर रही है जबकि पितृसत्ता को बनाए रखने में  सास का महत्वपूर्ण योगदान रहता है   औरतें, अक्से वज़ूद, कठपुतली, रोल में परवीन अजब शीला की गज़ब कहानी स्त्रियां भी अपनी अस्मिता, आत्म चेतना और अस्तित्व दिशा के प्रति जागृत हो रहे हैं अपने साथ होने वाले भेदभाव शोषण अत्याचार के प्रति कहीं  विद्रोह करतीहैं कही बच्चों की खातिर समझौता लेकिन अपनी आवाज़ उठने की पुरज़ोर कोशिश में लगी हैं ।इन कहानियों में पिता तो बदल रहें हैं लेकिन पति का स्वरूप अभी भी कट्टरता लिए हुए है लेकिन ये औरतें पितृसत्ता विशेष कर धार्मिक कुरीतियों से रूढ़ियों से सीधे टक्कर ले रहीं हैं धर्म के नाम पर होने वाले अपने साथ अनाचारों पाखंडों के के खिलाफ संघर्ष कर रही है ।

किसी को जानने के लिए जब  तक आपके भीतर जिज्ञासा नहीं होगी आप जोखिम नहीं ले सकते क्योंकि जिज्ञासाएं आपको उत्तर खोजने के लिए विवश करती है, आपको साहसी बनती है अगर दूसरे को जानने समझने से पहले ही यदि आपकी आंखों पर पूर्वाग्रह के चश्मा चढ़ा दिया जाएं तो असुरक्षा, संदेह, भय और विश्वास ही पनपता है जो आपको आगे नहीं बढ़ने देता। खान साहेब के चरना नामक कपड़े देखकर समझ जाता है और मुस्लिम को अपने तांगे में नहीं बैठाता लेकिन अनजाने खान साहेब को जा लेकर जाता है तो उनसे जुड़कर उसके तमाम पूर्वाग्रह टूट जाते है विभा रानी के इस कहानी संग्रह का मकसद भी यही है कि हिन्दू मुस्लिम एक दुसरे के प्रति पूराव्ग्र्हों की दीवार को ढहा दें । यह समझना बहुत जरूरी है कि किसी भी समाज विशेष में रहने वाले लोगों का मनोविज्ञान उसके सामाजिक परिवेश के आधार पर बनता है इसके लिए आपको उनके भीतर झांकना होता है उनके व्यक्तित्व से जुड़ना होता है जब तक आप उनसे बात नहीं करेंगे उनके साथ नहीं रहेंगे आप नहीं जान पाएंगे जब आपको पहले ही समाज बता दिया जाता है कि इसे दूर रहना है फल से दूर रहो उससे दोस्ती मत करो उनका खाना नहीं खाना है तो बात कैसे आगे पड़ेगी विमर्श तो बहुत दूर की बात है। लेकिन अगर जैनेंद्र त्यागपत्र लिख सकते हैं विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा लिख सकते हैं प्रेमचंद ठाकुर का कुआं लिख सकते हैं तो विभा रानी आतिशदाने    लिख सकती है परदे के पीछे छिपी औरत के मन में झाँक सकती है,यह वास्तव में लेखक की प्रतिबद्धता से जुड़ा प्रश्न है क्योंकि लेखक का कोई धर्म नहीं होता ।

संस्कृति का संबंध मात्र ईद या होली दीवाली से नहीं होता । आज़ाद भारत में अगर हम देखे तो पायेंगे कि किस तरह से धीरे-धीरे हर राज्य, शहर मोहल्ले में हिंदू और मुस्लिमों के मोहल्ले अलग होने लगे अब जब मोहल्ले अलग होंगे तो ये दोनों एक दूसरे की संस्कृतियों को जानेंगे समझेंगे कैसे? और फिर उनके बारे में कैसे लिखा जायेगा ।  विभाजन की त्रासदी पर हमने खूब कहानी पढ़ी है और उनके भीतर के दर्द को महसूस किया है लेकिन वर्तमान समय में जिस तरह सांप्रदायिकता का रंग मनुष्यता पर हावी हो चुका है, ऐसे में मुस्लिम विमर्श की कहानी लेकर आना और यथा स्थिति को हमारे सामने रख देना आसान काम नहीं था लौटेगी सबीहा? कहानी विभाजन के दृश्यों की पुनरुक्ति लगता है जबकि वह आज़ाद भारत के बड़े शहर मुबई की कहानी है इसी तरह खान साहेब कहानी पढ़ते हुए आपको यदि रामवृक्ष बेनीपुरी का संस्मरण सुभान खान याद आ जाए आपकी संवेदनाएं आंदोलित होने लगे  तो मान लीजिये विभा रानी का प्रयास सफल है दोनों ही कहानियों में धर्म से ऊपर एक सांस्कृतिक पक्ष सामने लाती है ।    

कहानी “लौटेगी सबीहा?’ शीर्षक में भले ही प्रश्न चिह्न है लेकिन कहानी का अंत उस आशा के साथ होता है जो हमें जीने की, संघर्ष की, ताकत देता है कहानी पढ़ते हुए एक बार को लग सकता है कि विभाजन के दौरान की कहानी है वही भय के दृश्य वही असुरक्षा का माहौल, अविश्वास, भविष्य का संशय ? यह कैसा विभाजन हुआ जो आज तक सभी के मनों को विभाजित किए हुए हैं ?  सबीहा के परिवार ने इस मुंबई में और मुंबई ने सबीहा को पनाह दी, तरक्की दी, जीवन जीने का हौसला दिया लेकिन धर्म और राजनीति का ऐसा चक्रव्यूह भी रचा गया जिसमें मानवीयता पिस रही है, आज हर आम और खास इसमें फँसते चले जा रहे हैं। गाँव में  जहां सबीहा की ननदें तीसरी जमात में घर पर बैठा दी गई थी शर आकर तरक्की पसंद आबिद मियां ने उन्हें पढ़ाया लिखाया इस काबिल बनाया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी है , एक सामान्य सा परिवार स्वाभाविक गति से विकास कर रहा था लेकिन अचानक इस गति में ब्रेक लग गया ‘सांप्रदायिकता’ ने एक तरक्की पसंद शहर को भी नहीं बख्शा। मुंबई के दंगों ने सारा परिदृश्य बदल दिया। वे सपरिवार वापस गांव की ओर लौट रहे हैं । वापस लौटने की कोई उम्मीद है? हां है! यह उम्मीद लेखक ने उस टैक्सी वाले के रूप में दिखाई है जिसकी हँसी में पहले पूर्वाग्रह के चलते कांइयापन झलक रहा था लेकिन जब उसने गणपति बप्पा मोरया कहते हुए “उनलोगों” से कहा कि यह अपनी ही फैमिली है और वह आगे बढ़ गए ! आज सबीहा यह सोच रही है कभी तो हम वापस लौटेंगे, फिर विकास का मंजर देखेंगे । कहानी में ‘लौटना’ वस्तुतः हिंदू मुस्लिम के पहले- से संबंधों की खोज है , जिज्ञासा जरूर है जिस पर प्रश्न चिन्ह है लेकिन अंत में एक आशा भी है।”

संग्रह की प्रमुख कहानी ‘आतिशदाने’ पढ़ते हुए लगेगा ज़रीना इकबाल की प्रेम कहानी है, जिसमें इकबाल और ज़रीना विवाह के दायितों से भटक गये लेकिन भटक कर जाएंगे कहाँ? रहना तो इसी समाज में है! यह कहानी विवाह से थके-पके,संबंधों से ऊबे हुए दो लोगों के संबंधों की कहानी है जिसमें इकबाल की पत्नी या बेगम के रूप में तमाम पत्नियों के बेचारगी को भी हमारे सामने रखा है तो उनके स्वाभिमान की भी रक्षा की गई है। इनमें ख़ास यही है कि ये विभा रानी की क़लम से निकले पात्र हैं। एक टेनिस कोर्ट में बॉल से अकेले खेलते हुए खिलाड़ी की तरह विभा रानी संवादों से खेलती हैं, पात्रों के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव, मनोभाव और उनकी संवेदना को उजागर करतीं हैं इसलिए हर बार ‘पति-पत्नी और वो’ सभी अपनी-अपनी जगह सही लगते हैं क्योंकि ‘चोट’ बिल्कुल सही जगह लग रही है। लेखनी का बल्ला हर संवाद को चरित्र की कसौटी पर खरा उतरा प्रतीत होता है और तब आप ‘व्यक्ति’ से होते हुए पितृसत्तात्मक समाज की संरचना पर पुनः विचार करने लगते हैं जहाँ शौहर या बेगम/ पति-पत्नी एक ही साँचे में कैद कर दिए जाते हैं जिसमें पड़े-पड़े व्यक्तित्व सड़ जाते हैं, ताजी हवा के झोंके के लिए वे तरस जाते हैं, कोई नन्हा सा रोशनदान भी नहीं होता जिसकी धूप से उनका कोई चारित्रिक विकास ही हो पाए लेकिन जहाँ कहीं थोड़ी भी खुली हवा का झोंका दिखाई पड़ता है, मर्द अंगड़ाई लेने लगता है लेकिन ‘घर’ नहीं छोड़ना चाहता दोनों हाथों में लड्डू लेना चाहता है और औरत की बात करें तो अनामिका के शब्दों में वह एक ‘दरवाजा’ होती है जिसे जितना पीटा जाए वह उतना खुलती जाती है ‘ज़रीना’ एक दरवाजा है वह खुलती तो है, लेकिन अपनी शर्त पर! और यही उसके चरित्र की खूबी भी है, अब वापस उसी दरवाज़े के भीतर क़ैद नहीं होना चाहती, प्रेम की स्वच्छंद उड़ान और विवाह की कैद दोनों पक्षों को अपने-अपने ढंग से समझता है।यह एक बहुत ही दिलचस्प रोचक और विचारोत्तेजक कहानी है  आप ज़रीना की मोहब्बत और नफरत दोनों की दिलेरी पर हैरान हो सकते हैं इकबाल की तरह इकबाल से मोहब्बत की तो वह भी उतनी ही शान से और शहर को हवालात भेजा वह भी इतनी हिम्मत से।

रोल में परवीन रोल मतलब भूमिका में विभा बताना चाहती है आपकी पहचान आपके कर्मों से होती है इसलिए जब परवीन तमाम कटाक्षों को सुनकर भी अन्य लड़कियों को अपनी समझदारी और बहादुरी से गुंडों से बचा लाती है तो सभी का नजरिया बदल जाता है आज वह हीरो बन चुकी थी। ये दो साल कहानी के मिस्टर शौकत को जब नौकरी के दो साल और मिल जातें हैं तो वे खुश होने के बजाये चिंता में पड़ जाते हैं उन्हें याद आतें है अपने दोनों बेरोजगार बेटों के उदास चेहरों के साथ-साथ लाखों युवकों की बेरोजगारी। कहानी सिक्के का दूसरा पहलू हमारे सामने रखती है। हालांकि खान साहेब की ही तरह शौकत बाबू का किरदार आपको आदर्शवादी या फिल्मी लग सकता है जो जरूरत से ज्यादा नेक बेहद अच्छा नजर आता है लेकिन क्या इन पर सिर्फ इसलिए विश्वास न किया जाए क्योंकि ये मुस्लिम हैं? शौकत साहब के दोनों बेटे भी नेकमंद दानिशमंद है। यह कहानी भी इस यकीन और आशा के साथ खत्म होती है यह हमारे मुल्क के ये आफताब मेहताब और सितारे हैं उनके वजूद के चिराग को आबाद कर, इनके आसमान में आबाद रहे । खान साहब की नजरों में भी धर्म का इतना ही है कि लोग अपने काम में पूरा करें ईश्वर पर यकीन करें।

बेमुद्दत कहानी मुस्लिम समाज में इद्दत जैसी रूढ़ परम्परा का विरोध कराती है मुस्लिम औरतों की विधवा होने पर 4 महीने 10 दिन का अंधेरे कमरे में बिताने होते हैं जिस दौरान वे किसी पुरुष के संपर्क में नहीं आती लेकिन बड़ी बी को उनका 8 महीने का पोता जो की देख लेता है और उसे नए सिरे से इद्दत शुरू करनी पड़ती है। बड़ी बी बेटी जाहिदा माँ के प्रति सहानुभूति नहीं रखती लेकिन बहू शब्बो सास के लिए ननद के आगे लगभग गिड़गिड़ा रही है । ‘अमी की उम्र देखो उनके सेहत देखो यह दोहरी इद्दत उनके लिए क्या जायज है। पर बेटी अम्मी की तकलीफ को समझने की बजाय  दुगना कर रही है तुम औरत औरत के दर्द को बेहतर समझ सकती हो पर नहीं समझ रही हो। शब्बो कहती है ‘हम औरतें ही औरतों की दुश्मन है’ यह कैसा महा वाक्य है जो भाईचारे के सामने बहनापा सखियापा या सिस्टर हुड के महत्व को सामने लाना चाहता है कठपुतली कहानी की निलोफर विवाह की डोरी से बंधी नाज़ुक लड़की के दर्द को बयां कराती है। निलोफर तरह-तरह के डोरियों में फँसी हैं, यह डोरियां संबंधों की, रूढ़ियों की, जिम्मेदारियां की हैं ।

बेवजह कहानी लिखने की बहुत वजह हमारे सामने आती हैं जैसे यह कहानी लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठाती है  इसीलिए विभा रानी कहती है कि मैं जो यह कहानी कह रही हूं उससे आपको हँसी  आए तो हँस लेना है रोना आए तो रो लेना यदि मूड ऑफ हो तो होने दीजिए लेकिन यह मेरी मेहरबानी है विनती है प्रार्थना है गुजारिश है कि इन आफसानो को सुनकर अपना आपा मत खोइये क्योंकि यह तो एक दास्तान गोई है। बेवजह कहानी लिखने का मकसद अगर हम समझने की कोशिश करें तो सबसे पहले तो लेखक और लेखन की प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिह्न  उठाती हैं जनता से अपील करती हैं कि अफसाना या अफवाह पर यकीन ना करो अपनी विवेक का इस्तेमाल करो क्योंकि  कल्पना की उड़ान पर आप तो हकीकत के दंगे फोड़ देंगे अपना आपा खो बैठेंगे  कहानी बेवजह लिखने की दूसरी वजह है कि जब तक आपकी जरूरत है आप एक हैं यानी संगी-साथी की जरूरत बनी रहने तक आप धर्म, जाति, संप्रदाय के झंझट में नहीं पड़ते लेकिन जैसे ही ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं आपको धर्म, जाति, संप्रदाय सब नजर आने लगते हैं जैसे कहानी में  दो राहगीर एक ही रास्ते चलते जा रहे हैं ये राहगीर इस धरती संसार के प्राणी है जिनकी मंजिल एक है यानी मृत्यु ही सबका अंतिम लक्ष्य यदि सबका एक लक्ष्य है तो रास्ते में टकराहट क्यों? कहानी का तीसरा मकसद जो प्रत्यक्ष नजर नहीं आता लेकिन देश के विकास पर अपनी नजर गढ़ाते हुए सरकार की योजनाओं पर व्यंग करना क्योंकि गांव में भी आज विकास के नाम पर कुरूपता,अभाव, गंदगी और साम्प्रदायिक दंगे बढ़ते चले जा रहे हैं जैसे ‘गांव है क्या बाबा आदम जमाने का है जिसमें बिजली के तार है बिजली नहीं नलकूप दिखते हैं नाल में पानी नहीं और चौथा और सबसे महत्वपूर्ण मकसद है कि भगवान ईश्वर अल्लाह परम शक्ति जो भी है वह मनुष्य मनुष्यता मानव या मानवता में भेदभाव नहीं करता यह तो मनुष्य ही है जिसे ईश्वर का बटवारा कर दिया वह कहता है मेरी मर्जी क्या कहीं तुम्हारे शास्त्र में लिखा है कि हम तुम्हारे भगवान का नाम नहीं ले सकते? कहानी काल्पनिक थी मगर दंगा सचमुच का हो गया ।

अपने लोग  कहानी बस को देश के प्रतीक के रूप में हमारे सामने रखती है यह बस जिसमें सब सफर कर रहे हैं लेकिन सभी एक दूसरे को अविश्वास की नजर से देख रहे हैं। एक धर्म विशेष के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे और दूसरे धर्म के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे यह पहले से ही सब निर्धारित कर दिया गया जैसे माँ बाप कहते है मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा बेटे से कोई नही पूछता कौन आतंकवादी बन जाएगा कौन देश भक्त ये कपड़ों से बिंदी सीधे पल्ले की साड़ी और सिंदूर से तय कर दिया जाता है ।  घटना प्रधान इस कहानी के दृश्य हमारे मस्तिष्क में उतरते चले जाते हैं और हृदय को आंदोलित  करते हैं। कहानी बताती है कि हम कितने असहिष्णुता और असंवेदनशील होते जा रहे हैं ।  इस कहानी में विभा रानी शाहरुख खान का उदाहरण देता है डॉक्टर कलाम का उदाहरण देकर सप्शत करना चाहती हैं कि लोकप्रिय हस्तियों के साथ है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं कि यह हिंदी ह्यूमुलेशनसे गुजरना पड़ता है तो आम मुसलमान के मानसिक आघातों का क्या जिनसे वे पल पल गुजरतें है!

आतिशदाने कहानी संग्रह आपको सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए कि यह मुस्लिम विमर्श की पृष्ठभूमि तैयार करती है बल्कि ये कहानियां आपको चेतना के स्तर पर संवेदनशील बनाती हैं मानवीयता का सबक सिखाती है, वर्तमान परिदृश्य में सोचने समझने के लिए भी तैयार करतीं हैं जिसे हमने नज़रन्दाज़ किया हुआ है। भाषा के स्तर पर भी देखे तो उर्दू को थोपा नहीं गया पात्र स्वाभाविक ढंग से हिन्दुस्तानी का प्रयोग कर रहें पात्रों की संकल्पना भी स्टीरियोटाइप नही अपने स्वाभाविक स्वरुप में विकसित किये गयें है जिन्हें अलग से मुस्लिम जामा पहनाने की कोशिश नज़र नहीं आती । पात्र आदर्शवादी और यथार्थवादी दोनों ही तरह के है लेकिन मंतव्य को सिद्ध करतें है । आतिशदाने की भी विचारोत्तेजक कहानियाँ बहुत सूक्ष्मता से हमें समझाती हैं हमें मुस्लिम विमर्श की क्यों आवश्यकता है!    

रक्षा गीता

लेखिका कालिंदी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिन्दी विभाग में सहायक आचार्य हैं। सम्पर्क +919311192384, rakshageeta14@gmail.com
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