संस्मरण

खानदान भर के चाचा : प्रभाकर त्रिपाठी

 

30 अप्रैल, 2019 को अपराह्न घर से पोती चुनचुन का फोन सबसे पहले आया – ‘बाबा, चाचा नहीं रहे…’। सुनकर बडा धक्का लगा – ताज्जुब भी हुआ, क्योंकि अभी परसों ही तो बनारस आते हुए मिलकर आया था। याद दुरुस्त थी, बातें टनाटन थीं…। मैंने कहा था– चाचा, अभी कोई चिंता की बात नहीं – दो-तीन महीने आप आराम से चलेंगे…। मैं जून में लौटूंगा…तब जाइयेगा…। विदा करूँगा, दस दिनों घाट नहाऊंगा…डटकर भोज करेंगे तेरहवीं का…।

लेकिन क्या पता था कि मेरे बनारस पलटते ही वे कूच कर जायेंगे…। अचानक फैसले लेकर कुछ भी अयाचित कर देने की उनकी पुरानी आदत थी…। सो, आज ताज्जुब कैसा…!! सब एक स्वर से कहते पाये गये – इतने दिनों से आप ही की राह देख रहे थे। मिल लिये, चले गये…।

शव बनारस ही आना था। 9.30 बजे रात को सीधे पहुँचा – मणिकर्णिका घाट। लकड़ी…आदि लेने चिता सजाने (बनाने-तैयार करने नहीं) में एक-डेढ घण्टे निकल गये…। इकलौते बेटे महेन्द्र ने मुखाग्नि दी। दो पोते मौजूद, एक मुबई से आने के रास्ते में…आके मिल गया था। पूरा खान्दान व गाँव के सभी सक्रिय लोग उपस्थित। उम्र पूरी कर ली थी चाचा ने – 85 साल के थे। मुझसे पहली पीढ़ी की आख़िरी कड़ी…। सो, बहुत आघात की बात नहीं। अंत अप्रत्याशित न था। सभी नात-हित, दूर-दराज़ रहती बहनें-बेटियां, भतीजे-पोते-नाती…आदि आ-आके मिल गये थे। कम ख़ुराक व खाने की सोफियानी रुचियों वाले चाचा दुबले-पतले तो थे ही, इधर महीने-दो महीने से खाना काफी छूट गया था। पखवारे भर से प्राय: ग्लुकोज़ और पानी पर ही थे…सो, शरीर में मांस बचा न था। तन के क्षार होने में बमुश्किल डेढ़ घण्टे लगे। फिर रात के 12 बजे से ज्यादा हो गया था, जब अस्थियां गंगा में प्रवाहित हुईं और सारे लोग वापस चले गये…। मेरा मुम्बई जाना अ-निवार्य था। लिहाजा नाती के साथ अपने आवास पर लौट आया। नहाके बैठा हूँ…चाचा की यादों के अन्धड़ मन को विह्वल व आँख़ों को भरभराये दे रहे हैं…। रात के 3 बज रहे हैं। बेहाल मैं लैपटॉप की शरण आ गया हूँ – पिशाचे स्मृती चे, भुते वास्तवा चे, सगे सर्व माझे नकारूं कुणा ला? (सच के भूत, यादों के पिशाच…सब तो मेरे ही हैं…नकारूं किसे?) अस्तु,

चाचा का मतलब हमारे खान्दान में होता है – प्रभाकर त्रिपाठी। उनके चाचत्व का कमाल तो आपने ऊपर देख ही लिया कि उनकी परपोती (प्रपौत्री) श्वेता उर्फ चुनचुन ने खबर देते हुए मुझे तो बाबा कहा और मेरे चाचा को चाचा – यही उनके चाचा होने की ख़ासियत थी। मेरा क़यास है कि नयी पीढी के तमाम बच्चे ‘चाचा’ के अलावा उनका नाम ही नहीं जानते रहे होंगे…। लेकिन उनके पिता व बडे भाई अवश्य उन्हें नाम से बुलाते…और उनके पिता, हमारे हरिहर बाबा, के ‘प्रभाकर’ बुलाने में जो ठसक व मिठास होती, वह आज भी कानों में टकोर रही है, मिश्री घोल रही है…। वैसे सचमुच तो वे चाचा थे मेरी ही पीढ़ी के, लेकिन पूरे खान्दान के चाचा हो गये। चन्द दिनों के लिए ननिहाल करने आने वाले नाती-नातिनों ने ही उन्हें नाना कहा, वरना घर रहने वाले सभी के चाचा रहे…। उनके पहले और साथ के सब लोग ‘काका’ हुआ करते थे…। इस चाचा के भी बाकी भाई – भागीरथी ‘काका’, सुधाकर ‘काका’ ही रहे …। मुझे पता नहीं कि यही क्यों और कैसे चाचा हो गये…!! फिर तो चाचा हमीं हुए – याने मेरी पीढी ही चाचा हुई और यहीं तक महदूद रह गया ‘चाचा’ – मेरे बाद सब अंकल हो गये हैं…। और फिर तो अपने ये प्रभाकर चाचा हमारे पूरे गाँव के ही चाचा हो गये – यही उनका उपनाम हो गया…। और वही चाचा आज चले गये…यह ‘आज’ कितना मनहूस होके आया…!!

हमारी स्मृतियों के पहले चाचा होने के साथ कई और भूमिकाओं में भी प्रभाकर चाचा खान्दान और गाँव में पहले और इकले सिद्ध हुए – कुछ अलग करने के इरादे से नहीं – जीवन के सहज प्रवाह में अपने आप…। मसलन –

– वे पहले हाईस्कूल फेल शख़्स हुए गाँव में। तब तक कोई हाईस्कूल तक पहुँचा न था। बाद में तो हम कई लोग पास-फेल हुए…।

– वे गाँव के पहले ऐसे ब्राह्मण हुए, जिन्होंने यजमानी का पल्लव ताजिन्दगी हाथ से न छुआ। ऐसा और कोई आज तक नहीं हुआ। लेकिन ऐसा भी नहीं कि वे अधार्मिक थे।

– सबसे पहले मैंने रोज़ के खर्च का हिसाब लिखते उन्हीं को देखा, वरना गाँवों में यह प्रथा कभी न थी – आज भी नहीं के बराबर है। मैं लिखता हूँ, जो आदत तो पत्नी की धरायी हुई है, पर यादों की थाती तो चाचा की ही है।  

– और यह तो शायद पूरी दुनिया में सबसे बडा अजूबा और अविश्वसनीय अपवाद हो कि चाचा ने अपनी करनी से कभी एक पैसा नहीं कमाया। इस बात को वे कहते भी थे – अपने ऊपर व्यंग्य बनाकर विनोद की तरह…बाप की कमाई खर्च की, दो-दो भाइयों की, फिर बड़े भतीजे (स्व. सत्यप्रकाश भाई साहब) की। फिर बेटे (महेन्द्र) की और अंतिम दिनों में पोते की कमाई भी खर्ची नहीं, पर खा जरूर रहा हूँ’। ऐसा कहते हुए मुस्कराते भी थे, लेकिन उस मुस्कान में किंचित् कचोट भी मिल ही जाती थी।

– और बिना कुछ कमाये जितना खर्च उन्होंने अपने हाथों से किया, उतना उस पीढी तक तो क्या, आज तक भी किसी ने न किया होगा।   

– हाईस्कूल फेल होकर खेती में लग गये थे, लेकिन कभी एक काम करने वाले की हैसियत से उन्होंने खेत में काम भी नहीं किया।

वरना गाँव में ऐसा कोई भी न होगा, जिसने एक आदमी की एवजी में अपने खेतों में काम किया ही न हो – मोके-झोंके ही सही, किया है अवश्य…बल्कि हमारे गाँव में ब्राह्मणों-ठाकुरों के खेत में काम करने की स्वस्थ परम्परा रही, जिसे आप सामंतवाद-विरोधी प्रथा भी कह सकते हैं। मैंने तो नियमित काम किया है। और यह सब बतौर विद्रोह नहीं, सहज ही हुआ उनसे।

बता दूँ कि खेती में बस हल जोतना मना था सवर्णों के लिए। इसे लेकर कभी मुझे कयास होता है कि घनघोर दलित-उत्पीडन के बीच भी हल जोतने के लिए सवर्णों पर रोक में शायद मज़दूरों के कभी मुकम्मल बेरोज़गार न होने देने की नीयत भी कार्यरत रही होगी। हाँ, हर गोसयां (मालिक) की तरह चाचा भी बोये जाने वाले खेत का फावड़े से ‘कोन-डाँड’ करते थे – याने जहाँ हल नहीं पहुँचता, ऐसे कोने-किनारे को कुदाल या फावड़े से गोड़-खन देना और किनारे-किनारे के पूरे हिस्से की मिट्टी फावड़े से उठाकर बीच खेत की तरफ फेंक देना…।

इसी तरह गाँव का हर आदमी गाहे-ब-गाहे गमछा लपेटे या धोती को दोहरा करके लुंगी की तरह पहने मिल जाता। चाचा के बडे चचेरे भाई भागीरथी काका तो गावटी (लाल गमछा) लपेटे गाँव-सिवान घूम आते थे – अब तो बरमुडे चल गये हैं। किंतु चाचा को कभी मैंने गमछा-धोती लपेटे हुए बैठे नहीं देखा – नहा के आने तक के सिवा। हमेशा धोती ठीक से पहने रहते और घर रहने पर उसके ऊपर बाँह वाली अच्छी बनियान पहनते, जिसे नीचे से पार करके दाहिने पट्ठे पर दिखती जनेऊ में बँधी आलमारी की चाबी उनकी गतिविधियों का स्थायी भाव थी। दिन भर में दर्जनों बार ओसारी में मुख्य दरवाज़े के ठीक दाहिने स्थित आलमारी को कुछ-कुछ निकालने-रखने के लिए उसी चाबी से खोलते-बन्द करते उन्हें देखा जा सकता था। बाहर जाते हुए अच्छी धुली धोती व बिना कॉलर वाला सामान्य कुर्त्ता। धोती-कुर्त्ता उन पर छजता था। आम तौर पर बिना फीते वाला रबर का जूता या चमड़े की परेटी होती, पर जब यदा-कदा काले रंग का ‘पम्प शू’ पहने दिखें, तो समझ लिया जाये कि समधियाने या कहीं अच्छी जगह पर जा रहे हैं। उस वक्त दोहरा किया हुआ सफेद लम्बा गमछा भी कन्धे पर सोहता…। क़द लम्बा न था चाचा का, पर नाज़-नक्श सही थे। सानुपातिक दृष्टि से नाक लम्बी थी, पर उन पर फ़बती थी। नाक तो उस घर में सबकी औसत से लम्बी थी, जिसका प्रमाण यह कि उस घर के मेरे बड़े भाई सत्यप्रकाश को स्कूल में चिढ़ाते हुए बच्चे ‘नकुरहवा’ कहते थे। लेकिन लम्बी नाक तो चाचा के पिता, हमारे हरिहर बाबा पर जैसी खिलती थी, किसी पर क्या खिलेगी!! नाक के नीचे चाचा के पतले होंठ ध्यान खींचते थे। उनका किंचित् टेढा तो नहीं, बाँका होना भी विरलता में शोभता था।

प्रभाकर त्रिपाठी

पान खाना उनकी आदत तो नहीं, पर शौक़ था। कैसे न होता – उनके पिता हमेशा मुँह में पान घुलाते रहते। बीसों पान एक साथ बिछाके लगाते (बनाते) और डब्बे में रखे रहते। सो, चाचा भी दिन में दो-चार तो खा ही लेते और जब तक उसकी ललाई रहती, होंठों की शोभा दुगुनी होती। और जब किसी महीन बात पर मन्द-मन्द मुस्कराते, तो होठों के बाँकपन के सुयोग से चेहरे की शोभा नयनाभिराम हो जाती। चिकनी गदोरियों से उभरी हाथों की उंगलियां एक खेतिहर के हिसाब से तो कोमलता की परमान ही थीं, हारमोनियम बजाती हुई और प्यारी लगने लगती थीं। जी हाँ, चचा हारमोनियम बजा लेते थे। थोड़ा-मोड़ा गा भी लेते थे। चाचा के बड़े भाई श्रीनिवास काका तो अच्छा ख़ासा गा लेते थे। ख़ास बात यह कि बोलते हुए स्थायी रूप से तुतलाने की उनकी आदत गाने में एकदम गायब हो जाती थी – संगीत का दैवी असर!! हरिहर बाबा से ही शुरू हुआ गीत-संगीत उस घर की इकली सांस्कृतिक शान थी। खेद है कि इस पीढी में लुप्त हो गयी। लेकिन पिछले दिनों देखने को मिला कि चाचा के इकलौते बेटे महेन्द्र ढोलक बजा लेते हैं, पर बजाते नहीं। चाचा का पोता कल्लू (महीप) भी शायद गाता है – मैंने सुना नहीं। लगता है कि बाबा से शुरू हुआ संगीत तत्त्व खान्दानी जड़ पकड़ चुका है, पर उसे वांच्छित हवा-पानी नहीं मिल रहा, जो आज की मात्र खाऊ-कमाऊ वृत्ति का परिणाम है!!      

चाचा का रंग साफ था, बल्कि उनके सगे बडे भाई श्रीनिवास काका मजे के साँवले थे – पिता हरिहर प्रसादजी की चटक गोराई व लम्बाई तो किसी को न मिली। वह दादी (चाचा की माँ) पहले ही चल बसी थीं, वरना उन्हें देखा होता, तो पिता के मुकाबले इन भाइयों के छोटे क़द व उनसे कम गोराई का राज़ समझ में आता…। हाँ, चाचा की बडी माँ (भागीरथी काका की माई) को हमने अलबत्ता खूब-खूब देखा था। खेले-खाये थे उनके साथ। उनके दाने (भूँजे या चबेने) बड़े याद आते हैं। वो शाम को भरसाँय (भाड़) जलते ही ढेर सारा चावल, चना (लाई-चन्ना), मौसम के अनुसार मटर-मक्का व परमल के लिए गेहूँ… आदि लेके निकलतीं। मैं जहाँ भी खेलता होता, वहाँ आतीं और मुझे मुट्ठी में दाना पकडाते हुए लौटतीं…। उनकी गोराई-लम्बाई उनके बेटे भागीरथी काका को मिली थी, लेकिन उस दादाजी (सुन्दर त्रिपाठी) को हमने नहीं देखा और फोटो आदि का ईजाद या चलन तब था नहीं। घर की मालकिन यही आजी थीं। ‘मलकिन’ नाम ही पड़  गया था – हम मलकिन आजी कहते…। उन्हीं के दाह-संस्कार में मैंने पहली बार बनारस का मणिकर्णिका घाट देखा था। तब मैं दर्ज़ा 9 में पढ़ता था और शायद उस दिन घर पे कोई और न था, जिससे मुझे जाने का मौका मिला होगा…तो लगे हाथों मै अपने घर में पड़ी पिताजी की बनायी कुंडलियाँ (जन्मपत्रिकाएँ) भी गंगा में प्रवाहित करने के लिए लेते गया था, जिन्हें मेरे स्व. पिता ने बनायी थीं, लेकिन उस व्यक्ति की असमय मृत्यु…आदि अशुभ योगों के चलते देने नहीं गये थे। और उसके बाद उस घर से किसी के दाह-संस्कार में शामिल होने के नाम पर मैं अब यही चाचा के समय ही गया, क्योंकि मुम्बई रहते हुए कभी मौजूद ही न रह पाया।

इसी मलकिन आजी के अशक्त हो जाने पर चाचा को मिला था मलिकाना…। और प्रभाकर चाचा का शेष सारा जीवन इसी मलिकाने की गाथा है। इसी दौरान हुआ घर-परिवार का सारा उत्थान-पतन, दुखांत-सुखांत इसी मलिकाने का परिणाम भी रहा और सबका परमान भी सिद्ध हुआ…।

लेकिन उस  ह्रासोन्मुख गाथा के पहले मैं आपको उस मोड़ पर ले चलूँगा, जहाँ से मेरे और चाचा के रास्ते एक दिशा में चलने लगे…। इसे मेरी उनकी रफ्त-ज़फ्त या फिर इस उत्कट प्रेम-सम्बन्ध का प्रथम मिलन कहिये, पर यह शुरू हुआ मेरे नाट्यप्रेम और गायकी के प्रति उनके गहन लगाव से। मेरा नाट्य-प्रेम जन्म से नहीं, नौटंकी देखते बचपन से शुरू हुआ था। फिर तो हम विजयदशमी के मेले से किताबें लाते और अपनी बरदौर (गोशाला) में नाटक खेलते…। लेकिन भर दिन बौराया हुआ मैं उन नौटंकियों के बहरत-तबीलों को अपने गर्दभ-स्वर में चिल्लाते रहता। (क्षेपक स्वरूप बता दूँ कि यह गर्दभता कितनी ठोस-ठस्स है कि अपने इस अपूर्ण-अतृप्त शौक को बेटे में पूरा करने के लिए जब उसे संगीत-विद्यालयों में ले गया, तो उसकी स्वर यंत्रियां (वोकल कार्ड्स) गायन के लायक नहीं पायी गयीं – वह ‘संगीत महाभारती’ में तबले के लिए चुना गया)। ऐसे ही एक दिन मैं खाट पर लेटे मजनूँ का संवाद चिल्ला रहा था –

तेरी बाँकी अदा पे मैं ख़ुद हूँ फ़िदा, अपनी चाहत का दिलवर बयाँ क्या करूँ

ये ही ख़्वाहिश है तुम मुझको देखा करो, औ दिलोजान मैं तुमको देखा करूँ

इसे चाचाने सुना-देखा – वे फावड़ा कन्धे पर लिये खेत से घर जा रहे थे। और बरबस मेरी ओसारी में हेल आये। तब मैं 6 -7 में पढता रहा होऊँगा। उन्होंने फावड़ा नीचे रखा। किताब मेरे हाथ से ले ली। उसी खाट पर बैठ गये। और बेहद मद्धम स्वर में गाने लगे, ताकि कोई सुन न ले। मुझे उनका गाना हू-ब-हू नौटंकी वालों जैसा ही लगा और मैं तो बस, फ़िदा हो गया चाचा पर। और चाचा को फ़िदा पाया नौटंकी की गायकी पर – “फ़िदा थी कैस पर लैला, वो लैला पर दीवाना था’। वे खुलेआम नौटंकी गा नहीं सकते थे, क्योंकि वो तो ‘नचनियों-पदनियों’ की निकृष्ट मान ली गयी चीज़ थी। सो, हम मिलने लगे – कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी उस खेत की मेंड़ पर, कभी उनके घर की बगल में रास्ते पर आम के नीचे, कभी पौहारी बाबा वाली कोठरी में…याने जहाँ भी हो, मिलने लगे…। बड़े होने पर इन मिलनों को याद करते हुए मुझे प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन-रूपक की याद आती। तब समय की कोई किल्लत थी नहीं। मैं कोई न कोई नौटंकी की किताब लिये रहता हरदम – लैला मजनूँ, शीरीं-फ़रहाद, गरीब की दुनिया, अमर सिंह राठौर, भक्त मोरध्वज…आदि। खड़े-खड़े भी चचा गाने लगते और मैं विभोर होके सुनता…।

यह मिलना कब व्यावहारिकता में बदल गया, हमारे साथ को गाँव में आदृत पहचान मिल गयी, पता ही न चला। फिर इस निजता वाली बचकानी दीवानगी के बाहर झाँका, तो हमारे व उनके घर के रिश्ते पहले से ही घरेलू मिले – बड़े दिली अपनापे से भरे हुए। बात-बात पर मेरी माँ को ‘भौजी हो’ पुकारते हुई चाचा आते दिखने लगे। यह पहले भी था, मुझे लक्ष्य अब हुआ – गोया होश सँभाला हो मैंने…। तब दिखा कि दर्ज़ा चार में पढ़ते हुए मेरी बड़ी बहन की शादी हो रही थी…वह हमारे खान्दान में मेरी पीढ़ी की किसी लड़की की पहली शादी थी। तो श्रीनिवास काका ही तो सप्ताह भर पहले से पूरी ओसारी भर गेरू व पेंट लेकर चित्रकारी कर रहे थे – रँगी थी बाहर की दोनो केवाड़ियां, सजाया था शादी का मण्डप। बारातियों का सारा खाना तो अकेले भागीरथी काका ने ही ऐसा बनाया था कि सारे लोग उँगली चाटते रह गये थे…इसके विशेषज्ञ थे वे। शादी का सारा बन्दोबस्त इसी प्रभाकर चाचा ने किया था – मेरे दोनो काका व बड़के बाबू तो बस निमित्त मात्र थे। इसी तरह उनके घर कोई काम-परोजन होता, तो मेरी माँ ही भीतर घर का सारा इंतजाम देखती पायी जाती – दोनो काका और चाचा तो भौजी-भौजी करते हर आधे घण्टे पर कुछ पूछते-माँगते सुने जाते और कभी तो बाबा भी कुछ बताने-पूछने के लिए खड़ाऊँ खटकाते दालान में से ही ‘अरे दुलहिनियां…’ पुकारते चले आते और अधढँके चेहरे से माँ उनकी चिताओं का शमन करती। काकियां तो जैसे इस बड़ी बहन के भरोसे निश्चिंत हो जातीं – अचल भये जिमि जिव हरि पाई

उस समय कुछ तो ऐसी मान्यता थी कि कतिपय माँएं अपने बेटे का नाम नहीं लेती थीं। तो माँ की तरह बड़ी काकी भी मेरा नाम नहीं लेतीं – बचवा कहतीं और यही कहते चली गयीं। उनकी जैसी शालीन स्त्री मैंने दूसरी नहीं देखी। मुझे पा जातीं, तो क्या खिला-पिला दें, के लिए दौड़ पड़तीं। और आज भी उस घर के वे बच्चे बड़े रूप में मौजूद हैं, जिन्हें अपनी बड़की माई व आजी (मेरी माँ) के दही महते हुए हँड़िया से निकले मक्खन-छाछ याद होंगे। पूजा-पाठ से आये चद्दर-धोतियां चाचा द्वारा मेरे काका-बाबू को भी घर की तरह मिलतीं। लेकिन माँ की तीर्थ-यात्रा के हवन के अवसर पर जब चाचा के कुर्त्ते के लिए मैं सिल्क का कपड़ा व धोती देने लगा, तो मेरे दबंग स्नेह के सामने इनकार तो कर न सकते थे, पर लेते हुए वैसे ही ‘सरमा’ गये, जैसे मुँहदिखायी पाते हुए नयी आयी दूल्हनें ‘सरमा’ जाती हैं। मरे लिए किताबें कभी खरीदी ही न गयीं। सत्यप्रकाश भइया मुझसे दो दर्ज़ा आगे थे और उनकी किताबों पर मेरा पुश्तैनी हक़ जैसा था। कुल मिलाकर हमारी घनिष्ठता कोई नोखे की नहीं, विरासती थी – परिवार-प्रदत्त।

फिर जब मैं भी सायकल-वायकल चलाने लगा था, तो कहीं भी जाना हो, चाचा मुझे ले लेते। मै दर्जा आठ में पढ़ रहा था, तो सत्यप्रकाश भाई की शादी हुई, जिसमें बॉम्बे हिन्द सायकल मिली, तो चाचा के घर दो सायकलें हो गयी थीं। बाज़ार…आदि तक जाना तो सामान्य था। लेकिन हम दोनो के रसूख व नताइयां काफी कुछ समान ही थीं, तो शादी…वग़ैरह में न्योता लेके भी हम साथ ही जाते…। उन्हीं के साथ मैंने जौनपुर का चौक बाज़ार पहले पहल देखा। वहाँ से फल-मिठाई…आदि खरीदने के गुर सीखे…। यहाँ विस्तार-भय से एक ही यात्रा का उदाहरण दे रहा हूँ…। तब मैं मुम्बई रहने लगा था, लेकिन आने पर वह आना-जाना बदस्तूर होता। चाचा के बड़े पिता पौहारी बाबा (केदारनाथ त्रिपाठी) का बनाया चेलाना उनके घर का बहुत बड़ा सरनाम और अच्छी आमदनी का सम्मान्य जरिया था।  सो, चेलानों से मिले सामान लाने अक्सर जाना होता रहता…। उस बार सरायमीर (कैफी आज़मी के गाँव) से अन्दर के पास कहीं से लाने हम दोनो गये थे। 5 -7 बोरी अनाज थे, जो लेके बस से ही आ सकते थे। तब निजी या भाड़े के भार वाहनों का चलन न था। लेकिन बस-मार्ग सीधा न था – द्वारा-द्वारा आना था। ऐसे में अपने सीधे मार्ग वाली बाज़ार मुहम्मदपुर आते-आते शाम हो गयी और दुर्दैव से कोई साधन न मिला। 8 बजे गये, जो गाँवों में तब आधी रात की छाप छोड़ते थे, तो हारकर हमने दुकानों के सामने पड़ी बेंच पर सो जाने का फैसला किया। मिष्ठान्न-फल आदि की दुकानें बढ़ायी जा चुकी थीं। बस, रातों को चलती ट्रकों…आदि वालों के लिए खाने का एक ढाबा था सामने खुला हुआ। मैं तो मुम्बई की मजबूरियों में होटलों में खाने लगा था, जो फिर आदत व शौक़ भी हो चला था, लेकिन चाचा का तो विशुद्ध ब्राहणत्व कायम था। होटल में खा न सकते थे। भूख जोरों की लगी थी दोनो को। उन्हें भूखे छोड़कर अकेले खा लेना भी गुनाह लग रहा था। तो साहित्य का हथियार आज़माने की ठानी। मैंने उन्हें यशपाल की ‘खच्चर और आदमी’ कहानी सुना दी, जिसमें अपनी जान पे बन आने पर कुदरती शाकाहारी खच्चर ने कमज़ोर खच्चर को ही खाके अपनी जान बचा ली थी। लेकिन पण्डित-बच्चे ने बर्फीली प्रदेश की ठंडी में भींग जाने पर प्रशिक्षक की हिदायत तोड़कर ब्रैण्डी नहीं पी, बिना कपड़े के सोने की शर्म वश गीले कपड़े भी नहीं निकाले। परिणाम यह हुआ कि सुबह सभी सोके उठे, लेकिन पंडित-कुमार सदा के लिए उठ गया। मतलब यह कि परिस्थिति के अनुसार बदलाव अपना लेना ही जीवनोन्मुख होना है, वरना तो…!! सुनने के बाद चाचा मान गये, परंतु ‘किसी से न कहने’ का पक्का वायदा लेकर ही ढाबे में खाने आये…याने साहित्य का अस्त्र काम कर गया। मैंने वादा निभाया भी। आज पहली बार कह रहा हूँ। उस रात खाने के लिए सामान मँगाते हुए ‘तड़का वाली दाल’ या ‘छौंकल दाल’ के बदले मुम्बई के असर में ‘दालफ्राइ’ बोल गया, जिसे चाचा ने पकड़ लिया। इसके कुछ ही दिनों बाद हम दोनो कहीं निमंत्रण में खाने गये थे। खाना आया, तो बेहद बेस्वाद था। मैंने धीरे से पूछा – चाचा कैसा लग रहा खाना? गाढ़े इशारे से चाचा बोले – वही…फ्राइ नहीं है, वरना आता मज़ा…।

चाचा की सबसे खुशनुमा छबि तब देखने को मिलती, जब खानदान के लड़कों की शादी में द्वारपूजा के बाद आयसु के समय थोड़ा-सा और दूसरे (जनवासे के) दिन दोपहर के भोजनोपरांत खूब निश्चिंत होके महफिल जमती और नाच-गाना होता। वही उनके सबसे सुहाने क्षण होते।  हमारे दोनो घरों की हर शादी में मुख्य प्रबन्धक चाचा ही होते, लेकिन उतनी देर के लिए सारी जिम्मेदारियों से अपने को एकदम मुक्त करके उस आनन्द में डूब जाते…। इसके रसिया थे चाचा। मुँह में पान चुलबुलाते हुए मस्ती में नाच-गान का लुत्फ़ उठाते। छककर मज़े करते…। बड़ी अदा से लौण्डे को रुपये देते और हमसे भी दिलवाते। मेरी छोटी बहन की शादी में ससुराल पक्ष के गाँव बरदह के गवैयों व लौण्डा-नचवैयों वाली घूँड़ (ग्रुप) आयी थी, जो चाचा को इतनी पसन्द आ गयी कि उसके बाद घर के जन्माष्टमी से शादी-व्याह के सारे आयोजनों में तो आते ही, उनकी पहुँच में जितने भी कार्यक्रम होते, सबमें यही समूह बुलाया जाता। इसके संचालक थे जदुराई-रघुराई यादव-बन्धु। लहुरे जदुराई बजाते तबला और नाचने वाले के साथ जुगलबन्दी में ठेके के साथ जमके, हहा के शह देते तथा बड़के भाई रघुराई जोड़ी टुनटुनाते हुए रमे रहते। वे लोग पारम्परिक कीर्त्तनों के साथ बिन्दु आदि भक्त कवियों के न शुभ कर्मधर्मादिधारी हूँ भगवन, तुम्हारी दया का भिखारी हूँ भगवनजैसे भक्तिगीतों से लेकर परेशान करेला ससुरे में सजनवाँ, गवनवाँ जब हम पहिले गइलीं ना तक के वैविध्यभरे गीत खूब सधे-संगत अन्दाज़ में गाते। फिर जब लौण्डा पिहकता – दिनवाँ के कुटावे धनवाँआँ आँ, रतियां गोदिया में सुतावे होओओ…. तब तक जदुराई तबले पर दबाके ठेका देते हुए बुलन्द आवाज में सहारते – ‘बेजाँह हौ भाई, ई तौ बन्नै बेजाँह हौ’ (बेज़ा है, भाई ये तो बहुत बेज़ा है)…और जनता का खुला हास व झमकी तालियां गूँज उठतीं…। तब जाके गवैया फिर से उठाता और अपना बन्ध पूरा करता – हमसे ना सँपरी दूनो काम…!! फिर तो नाच-गान पूरा हो जाने के बाद जब हम लोगों के अलावा कुछ चुनिन्दा श्रोता रह जाते, तो रघुराई के लड़के उदई से फ़रमाइश करते चाचा। वह बिना बाजा-साज के लम्बे दृष्टांतों वाले कथात्मक गीत सुनाता – समाँ बँध जाता। सबसे मशहूर था – बिन्दु लिखित उद्धव-गोपी संवाद पर आधारित –‘है प्रेम जगत में सार, और कुछ सार नहीं चाचा के बिना इन महफिलों की मैं कल्पना न कर पाता…, लेकिन चाचा के ख़ूब रहते ही जमाने ने ऐसी करवट ली कि महफिल-वहफिल…सब खत्म हो गयीं…। डीजे के बेइंतहा शोर, जयमाल की धकापेल व बफर (बूफे) की खच्चम-खच्चा में गीत-संगीत ही नहीं, मंत्रोच्चार-द्वाराचार ही नहीं, भतखवाई, गारी-गवाई, फगुआ-खेलाई…आदि सारे आचार ही लुप्त हो गये…।

ऐसी पहली महफिल मैंने भाई सत्यप्रकाश की शादी में देखी थी। हमारी देहात के मानिन्द ठाकुर राजनाथ सिंह, जो आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारी दल के नेत्तृत्त्व करने वालों में थे, के लिए खाट को लेकर कुछ कहा-सुनी हो गयी थी, जिसके चलते श्रीनिवास काका ने रात का खाना नहीं खाया और सुबह बारात छोड़कर घर लौट आये। मैं वही 8 में पढ़ता था और रात के झगड़े से डर गया था। लेकिन फिर भी चाचा की महफिल जमी। और वो भाभी जब आयीं, तब तो उस घर में मेरा आना-जाना और भी बढ़ गया। हम दोस्त हो गये। उस घर में दो बहुत बड़े-बड़े कोठे थे, जहाँ हम कबड्डी खेलते। इतनी गप्पें मारते कि पूछिए मत। मेरे अपने सगे भाई नहीं हैं, लेकिन सगी भाभी का सुख मैंने खूब पाया। भइया मज़े के चुप्पा थे। सो, मेरी गप्पें उन्हें सुहाती थीं और चाचा इस रिश्ते को खूब शह देते। मुझे याद है कि सावन में उन्हीं के घर के सामने की नींम पे झूला पड़ता था। देर रात तक मैं पेंग मारता और भाभी के साथ खूब हँसी-ठिठोली होती, जिसमें चाचा भी नीचे से झूले के आस-पास टहलते हुए हिस्सा लेते – इतने रसिक व आधुनिक थे। लेकिन इतने भी आधुनिक न हुए कि मुम्बई में गुजराती लड़की से मेरी शादी को पचा पाते। इतने अंतरंग सम्बंध में चाचा को पहले न बताने की गलती तो मैंने की – मेरी हिम्मत न पड़ी। डर था कि ‘ना’ कह देंगे, तो एक और नैतिक संकट खड़ा हो जायेगा। लेकिन उम्मीद की थी कि  जानने पर साथ-सहाय मिलेगा। किंतु ऐसा न हुआ। यूँ तो हर बात पर संवाद होता – लम्बे-लम्बे पत्र आते-जाते हमारे…हम दोनो को पत्र लिखने की अच्छी आदत रही, जिनमे सारे कार्यक्रमों की खबरें होतीं – मेरे आने-जाने की योजनाएँ बनतीं… लेकिन शादी की घटना के बाद अपने पोते का गवना रख लिया – मुझे बताया तक नहीं कि मैं आ न जाऊँ। लेकिन तब तक इस समाज-संस्कारों की असलियतों का खूब पता चल चुका था, इसलिए मैं सबके सारे विरोधों के लिए बिलकुल बुरा न मानने का निश्चय कर चुका था…। ऐसा समाज-विरोधी काम करने के कुछ तो तक़ाज़े होते हैं। समाज की संस्कारी कठोरता के समक्ष सहनशीलता-विनम्रता-नज़रअंदाजी दरकार होती है। आप उनसे नाराज़गी व बेरुख़ी करके नहीं निभा सकते, वरना ‘इकला चलो रे’ में रहना पड़ेगा, जो गाँव में अव्यावहारिक क्या, असम्भव होता। यह मैंने महर्षि कर्वेजी से सीखा था, जिनके द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय में पचीस सालों पढ़ाया। ससुराल से निष्कासित व मायके से ठुकरायी पाँच विधवाओं को घर रखकर पढ़ाने के जुर्म में उन्हें बिरादरी बाहर कर दिया गया था। लेकिन उस ब्राह्मण संत ने बुरा न माना। इतने विनम्र हुए कि गाँव के एक सदस्य की हैसियत से ज़मीन पर बैठकर अपने खाने का प्रस्ताव रखा। वह तो सामाजिक सुधार का मामला था। अपना तो व्यक्तिगत था। करना ही था।             

मैंने चाचा में यह ख़ासियत पायी थी कि उन्हें प्रेम से समझा के राजी कर लिया जाये, तो कुछ भी करवाया जा सकता था। मैंने कई काम कराये, जो मेरी समझ से उचित थे। यहाँ बतौर उदाहरण दो के जिक्र करता हूँ। पहला ख़ासा सामाजिक है…मेरे घर के सामने के लालजीत बरई की पत्नी मर गयी थी। लगा था कि अब शादी न होगी। लेकिन कहीं से पता पाकर एक दिन अपने ही आरी-पास की रहने वाली एक सजातीय लड़की दिल्ली से ख़ुद ही आयी और शादी का प्रस्ताव रखा – पूरा गाँव इस अजूबे से हैरत में…। लेकिन लालजीत तैयार हो गये – अन्धे को क्या चाहिए? दो आँखें!! पर उनकी बिरादरी अनट गयी। नारी की पहल – और ऐसी ढाँसू पहल… को बिरादरी पचा न पा रही थी। तो अपनी साख़ दिखाने के लिए बहिष्कार कर दिया (याद कीजिए रेणुजी की ‘पंचलाइट’ के पंचों को)। मैं उस वक़्त गाँव आया था। घर के सामने की बात…दिमाँग में हलचल-सी मची थी। आख़िर उपाय सूझ गया। किंतु तब मैं युवा था और शहरी भी। सो, मेरे कहे से होना न था। तो चाचा की याद आयी। जाके उनसे कहा – ‘आख़िर गलत क्या है। एक घर बस रहा है। यह तो बिरादरी की मनमानी है’। चाचा समझ गये। पूछा – तो क्या करें, बोलो। मैंने कहा हम सभी ब्राह्मण उसके दरवाज़े बनाके खा लें, फिर बिरादरी झख मारके खा लेगी – ऐसा मेरा विश्वास है। चाचा ने कहा – तो देर किस बात की? कर डालो। लालजीत को अकेले में बुलाके बताया। वह समझ गया। ब्राह्मणों को आमंत्रित किया और स्वीकृति का हवाला देते हुए बिरादरी को न्योंत आया…बात बन गयी।

दूसरा मामला है – गल्दराजी करके गलत बात मनवाने पर रोक लगाने का। हमारे गाँव के रामलखन सिंह की शादी न हो रही थी, तो उनकी बड़ी बहन रज्जी फूआ ने भारी रक़म दिलाकर किसी अछूत जाति की पगलेट लड़की मँगा दी थी। स्वाभाविक ही वे पूरे गाँव द्वारा बहिष्कृत हो गये – खाना-पीना बन्द। फिर काफी दिनों बाद अपने भाई को खान-पान में शामिल कराने रज्जी बुआ आयीं। ख़ुद तो बगल के कहाँर के घर बनवाके खाने लगीं, लेकिन भाई के घर सत्यरायण की कथा कराके सभी को खिलाने का उपक्रम कर दिया। गाँव में बहनों की बड़ी इज्जत आज भी है, लेकिन तब तो बहनें ही कम होती थीं। मुझे अपने खान्दान में किसी बुआ की याद नहीं आती, लेकिन बहनें कुल नौ हुईं। तब उन दिनों गाँव भर के भाइयों-भतीजों पर बहनों का हुकुम चलते मैंने देखा है। ऐसा लगा कि रज्जी बुआ की बात गाँव मान जायेगा, लेकिन उनका ख़ुद न खाना और गाँव भर को खिलाना मुझे सहन नहीं हो पा रहा था। उधर कथा हो गयी, खाने का बुलावा आने ही वाला था…कि मैं चला गया चाचा की शरण। सुनकर चाचा ने कहा – ‘मुझे नहीं पता था कि रज्जी बहिनी दूसरे के घर खा रही है। फिर तो ये गलत है…’। 10-15 मिनट में रज्जी फूआ पहुँचीं। चाचा की खाट के सामने खम्भे से टिक के बैठ गयीं। उनका व्यक्तित्त्व प्रभावी था। गर्मी के दिन थे। चाचा कच्चे आम काटके नमक से खा रहे थे। बुआ ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा ‘भइया परभाकर, आजु लखन भाई कथा सुनन हैं। तोहन लोगन के आज खाये के हौ ओनके घरे’। और मेरी ओर देखकर कहा ‘बचवा तोहँऊँ से कहत हई’। एक मिनट का अंतराल (पॉज़) लेकर चाचा बोले – ‘बहिनी, हम त ना खाय सकित’।

‘काहें भला’ – आश्चर्य के साथ फूआ का सवाल – उन्हें ऐसी उम्मीद न थी।

‘बहिनी तू काहें ना खात हऊ अपने भाई के घरे’? चाचा ने निठुरे ढंग से पूछा।

इस बात का जवाब न देकर बुआ ने तलब किया – ‘भर’ जइसन छोट जाति सिचरन के घरे खइला लोगन औ लखन ‘सिंह’ के घरे ना खइबा’? (बात यह थी कि भर जैसी छोटी जाति की मां की तेरहवीं में हम ब्राह्मणों ने कहके उनके घर के बाहर बनाके खाया था, क्योंकि सिचरन भर की मां का व्यक्तित्त्व, अपनी अफाट गरीबी में भी, ऐसा निखरा था कि वह पूरे गाँव के हर बड़े-छोटे की मां व दादी हो गयी थीं। इस व्यक्तिमत्व की ऐसी इज्जत हमारे हिंदू समाज व संस्कृति की ख़ासियत है – इसमें जाति के समक्ष गुण के सम्मान का भाव निहित है – ‘मोल करो तलवार का पड़ी रहा दो म्यान’ का यही मतलब है। इसके समक्ष पूरा समाज आदर से झुक जाता था…। इसी का अनिवार्य सिला था कि हमने सामने से कहके भर जैसी छोटी जाति के घर खाया, लेकिन उस बस्ती की बग़ल के खेत में स्वत: बना के। ऐसे उदाहरण कई हैं। बहरहाल,    

फूआ की इस बेजा बहस से चाचा चिढ़ गये। फिर तो क्या…!! बस, दोटूक जवाब दे डाला – ‘हम जुम्मन (मुसलमान) के घरे खाब, तोहँसे मतलब? तोहरे लखन के घरे ना खाब…का करबू’? 

बस, बुआ चनचना के उठीं और हम दोनो को कोसती हुई चल पड़ीं। चाचा के पनियाफार दो वाक्यों से सारी भँड़ेहर उलट गयी। और यह चाचा ही कर सकते थे…। 

लेकिन चाचा ऐसा किसी के भी साथ कर सकते थे – चाहे भले कोई अपने से भी बड़ा अपना क्यों न हो…। क्योंकि उनके ‘अपने’ वक़्त-दर-वक़्त बदलते रहते थे।

कभी मेरे साथ भी कर देते थे। एक किस्सा बता ही दूँ – तब उनके ‘अपने’ बने थे उनके पड़ोसी बैजनाथ यादव। गुड़ ठण्डा करके भेली बाँधने वाला मेरा कड़ाहा माँगकर लाये थे चाचा। जब मेरा गुड़ बनना था, मैंने पहुँचवाने के लिए कहा। तो बोले – ‘ऊ त हमार हौ। जैनाथ भाई (मेरे काका) ने बनवाया जरूर है, लेकिन पतरे सब हमारे लगे हैं – दो-एक पतरे शायद अपना भी लगाये हों’!! लेकिन सच का पता मुझे क्या, सबको था। बनवाते हुए कम पड़ जाने पर दो बेकार पड़े चाचा के पतरे माँगके काका ने लगवा लिये थे। लेकिन उनकी गल्दराज़ी सुनके मैंने भी ताव में आकर दूसरे दिन जाके उठा ले आने की चुनौती दे दी। लेने गया, तो संयोग से चाचा थे नहीं…या जान-बूझकर कहीं चले गये थे – चाचा कुछ भी कर सकते थे। उस वक्त मुझे लेकर कोई बात उनके मन में रही होगी। लेकिन बाद में पूछने भी न आये। गाँवों में सम्बन्ध पुश्तैनी होते हैं। यह सब होता रहता है…। कहावत है – जहाँ दस बर्तन रहते हैं, ख़टख़टाते हैं, टकराते हैं, पर रहते हैं।

अब मलिकाने की उस मुख्य बात पे आयें…। इज्जत-दौलत से समृद्ध भरे-पूरे घर का मलिकाना मिला था चाचा को। उस घर को ‘बाबा की बखरी’ कहते थे। बखरी की शान थी सोलह पावों (ईंट के खम्भों) वाली ओसारी। पाये सफेद व गेरुए रंग से रँगे होते। गिनती सीखने की उम्र में हम ये पाये रोज़ गिनते, रोज़ भूल जाते। यह ओसारी पूरी देहात में अकेली, ख़ास और सरनाम थी। बखरी का सांस्कृतिक मेयार भी ऊँचा और देहात में अकेला था। जन्माष्टमी मनती – आठ दिनों का भव्य आयोजन होता। पूरा देहात जुटता। अपने सम्मौपुर गाँव का नाम होता…। रोज़ शाम को सोहर के साथ तरह-तरह के गायन होते। सभा-विसर्जन पर क्या ही स्वादिष्ट प्रसाद बँटता!! भागीरथी काका कृष्ण की माँ बनते, तब मेरी माँ अपने देवर को खूब चिढ़ाती। दोनो में जबर्दस्त मखौल होता – सभी मज़े लेते। छ्ट्ठी-बरही के सारे लोकाचार निभाये जाते। अंतिम दिन बड़ा भोज होता। इसी तरह होली भी मनती। हारमोनियम-ढोलक-सितार…आदि घर पे थे। बाबा इन सबमें निष्णात थे। आज साहित्य में मैं जो कुछ गूँ…गा कर लेता हूं – कमाया-खाया तो है ही इसी से, उसके बीज पड़े इन्हीं उत्सवों में गाये जाते कबीर-सूर-तुलसी…आदि के दर्जनों पदों से, जो सुन-सुन के ही याद होते गये। कह सकते हैं कि साहित्य-संसार में बकइयां (हाथ-पैर से) चलना मैंने यहीं से सीखा। इस दर का मुझ पर यह दाय बड़ा है, लेकिन भारी नहीं। अदायगी की कुछ कोशिश करता हूँ, किंतु आज के व्यावसायिक फल इतने ऊँचे जा लगे हैं कि साहित्य की जानिब से उठे मेरे हाथ वहाँ पहुँचने की कोशिश में कालिदास के बौने सिद्ध होते हैं –प्रांशुलभ्ये फले लोभादुबाहुरिव वामन: !! इस विरासत का अवसान चाचा के नेतृत्त्व-काल में ही हो गया।

लेकिन जैसा कि ध्रुव सत्य है – जीवन में सबकुछ का मुख़्य निर्णायक अर्थ-तंत्र होता है, तो इस संस्कृति व घरेलू इतिहास के अवसान को उस जानिब से देखना ज्यादा मायने रखता है। घटना …आदि के विस्तार में न जाकर बखरी की उक्त ओसारी के प्रतीक से कहूँ, तो इस गिरावट की स्थिति व गति के मर्म को सीधे समझा जा सकेगा…। उस घर की मेरी सबसे छोटी बहन सुमन की शादी में बड़हार (वराहार) के दिन बारिश हो गयी। तम्बू तो गिरना ही था, ओसारी में शरण लेना चाहा गया, तो एक खाट की भी जगह ऐसी न मिली, जहाँ पानी न चू रहा हो। सवाल सबके मन में उठता था कि इतना समृद्ध घर आख़िर इस दशा को क्योंकर पहुँचा? और सबके समक्ष कटघरे में चाचा ही आते। चलन पुराना है – लूट-पाट करके घर चलाने वाले वाल्मीकि भी तो अकेले कटघरे में आये थे…पर चाचा न बन सके ऋषि, क्योंकि उनमें कूट-कूट कर भरा था खाँटी गृहस्थ। उन्हें पीना था जीवन का सारा सहज गरल। रहना था अपने परिवार के साथ – जीना-मरना था उनके लिए। कोई वैसी बुरी आदत दूर-दराज़ तक चाचा में न थी, जिनसे बड़े-बड़े घर बर्बाद हो जाते हैं, ज़मींदारियां बिक जाती हैं, सल्तनतें तबाह हो जाती हैं। मेरी गणित के अनुसार चेलाने की आमदनी कुछ ज्यादा न थी। जब खर्च न थे या पारम्परिक जीवनपद्धति में खर्च कम थे, वह आमदनी इफरात होती थी। लेकिन जब परिवार बढ़ा, बच्चे पढ़ने लगे, छह-छह बेटियों की शादी करनी पड़ी, तब स्थिति बिगड़नी ही थी। वक़्त पर चेलानों के पैसे न मिल पाते, तो यहीं उधार ले लेते। इस सिलसिले में चाचा ने एक फनी अवसर हासिल कर लिया था। उन दिनों परदेसी लोगों के पैसे डाकखाने से आते थे। चाचा के बचपन का सहपाठी दोस्त मिस्टर पॉल आजीवन डाकिया रहा ठेकमा में। वह गाँव भर के पैसे चाचा को पकड़ा देता था। और जब अभाव आया, तो चाचा चुपचाप उसमें से भी खर्च कर लेते। फिर जब शहर से चिट्ठी आती, लोग डाकखाने जाके पता करते, तब दे देते या उसी से मुहलत ले लेते…। इसी तरह सरकारी सोसाइटी में करते। वे सेक्रेटरी थे। किसी के नाम का पैसा आ जाता, इस्तेमाल कर लेते। देते सबका, क्योंकि संस्कार ऐसे थे कि मार सकते ही न थे। लेकिन बदनाम तो होते थे…।

हालात में एक निर्णायक कारण यह भी रहा कि जिस भतीजे को पढ़ाया-लिखाया – नौकरी लायक बनाया, वह ज्यों ही कमाने लायक हुआ, उसके पिता भागीरथी काका अपनी आधी सम्पत्ति और घर का आधा कर्ज़ लेकर अलग हो गये। यह अलगा दुनियादारी की दृष्टि से चाहे जैसा भी हो, लेकिन बाकी बच्चों के छोटे होने की असहाय स्थिति में घर के अरमानों, भावी योजनाओं को तो रोका व पीछे किया ही, अंतस् में एक अपूरणीय दंश भी दे गया। बीटीसी के लिए सारनाथ में प्रवेश से लेकर पूरा कराने तक के चाचा के बेले पापड़ों का मैं चश्मदीद रहा हूँ…। इस तरह समग्रता में देखा जाये, तो घर की आर्थिक पतनोन्मुखता के लिए अकेले चाचा को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन त्रिकाल में गौरव की बात यह रही कि घर-खेत ही बँटे, मन-नेह नहीं बँट पाये आज तक। व्योरों के बदले यह बात भी प्रतीक में कहूँगा। चाचा की आदत रही कि जागते के अलावा सोते बच्चों की भी ख़ास देखभाल करते। रात-रात को पास जाके सबको टोहते, हाथ-पाँव सीधा कर देते, गिरते ओढ़ने को ठीक से ओढ़ा देते…आदि। ऐसा करते चाचा के हाथ में चोरबत्ती (टॉर्च) यूँ चस्पा हो गयी थी, जैसे युद्ध में आहतों की अहर्निश सेवा में लगी ‘लेडी विथ द लैम्प’ नाम से मशहूर फ्लोरेन्स नाइटेंगल के हाथ में मोमबत्ती। और उन्हीं की तरह चाचा भी अलगा के बावजूद आजीवन कभी बच्चों में भेद न कर सके कि कौन अपने हैं, कौन उनके…। इसी क्रम में कोठों पर रखे अनाज को भी जरूरत पड़ने पर बेचते हुए यह भेद नहीं कर सके कि अनाज उनका है या अपना। उनके कोठे पर से भी उतार लिया, तो अपना समझ के, क्योंकि चाचा (के अचेतन मन) ने अलगा को कभी स्वीकार ही नहीं किया। उनके लिए अलगा हुआ ही नहीं। और उनके लिए यही स्वाभाविक था – उनका सच था, जिसे लोग समझ न पाते। चाचा का भौतिकता नहीं, संवेदना के स्तर पर जो प्रदेय है, उसे न बाँटा जा सकता, न आँका जा सकता…। लेकिन संवेदना के स्तर पर भाभी व भतीजों ने अलग रहने के बावजूद चाचा को हमेशा किसी भी अपने से ज्यादा ही माना। सब कुछ करने को तैयार क्या रहते – करते ही रहते। ऐसा कि बाहर का कोई अनजान यह समझ ही न सके कि लोग अलग हैं। इस तरह कुल में लगभग ढाई दर्ज़न की संतति का जो सुख चाचा को मिला, आज के युग में दुर्लभ है।    

इस शृंखला में किसी का ध्यान नहीं गया कि खान्दानी व पारिवारिक उतार-प्रक्रिया की सबसे पहली शिकार हुई थीं – इस चाचा वाली मेरी शांति चाची और उसकी जो कीमत चाचा ने चुकायी, उनके बच्चों ने जो सहा, उसकी कोई भरपाई हो ही नहीं सकती। इसीलिए दुनियादारी के लिहाज से गोपनीय व अनुचित होने के बावजूद आज मैं यह चर्चा करूँगा…। चाचा के संस्मरण में यही मुझ नाचीज़ की तरफ से उस बड़े दिल वाली अपनी चाची को श्रद्धांजलि होगी, जिसकी प्रथा हमारे समाज में है ही नहीं…। चाची मरी दिन में 11-1 बजे। हम स्कूल चले गये थे। मैं दर्जा सात और उस घर के भाई सत्यप्रकाश दर्जा नौ में पढ़ते थे। किसी तरह संदेश गया था और मध्यांतर में हमें मिल गया था। सुनते ही मै पुक्का फाड़के जोर-जोर से रोने लगा था। भाई कब चले गये, मुझे पता नहीं। मध्यांतर के बाद की मेरी कक्षा भूगोल की थी। मास्टर साहब राम अवध राय कक्षा में पढ़ाने आ गये, तब तक मैं अहक रहा था और बच्चे मुझे घेरे हुए थे। मामला जानते ही उन्होंने कहा – बेटा, तुम घर चले जाओ – मैं तुम्हें छुट्टी देता हूँ…।

चाचा का घर गाँव के पूरब बाहर ही पड़ता है। पहुँचा, तो मजमा लगा था – दो-तीन गाँव के लोग जमा थे। ऐसे में हमारी या किसी की किसे पड़ी थी। सब बेहाल थे। मां-चाचियों-बहनों को ज़ोर-जोर से रोते देखकर मैं फिर रोने लगा था। कोई किसी को चुप नहीं करा रहा था, क्योंकि सभी रो रहे थे – मौत ही ऐसी जवान थी। क़रीब 4 बजे लाश उठी दरवाज़े से सुरुजघाट (जौनपुर) श्मशान के लिए। हम कब घर गये और कैसे…की याद नहीं। लेकिन अपनी पीड़ा और रोने के आसंगों को अब निबेर सकता हूँ, तब तो सिर्फ़ रो रहा था…     

असल में उस चाची के संवेदन-सूत्र इतने तीव्र थे कि बमुश्किल चल पाने की उम्र में जब उनके घर की ओसारी की ऊँची-चौड़ी चौखट किसी-किसी तरह मैं जिस क्षण लाँघ लेता, ठीक उसी क्षण चाची को आहट मिल जाती। फिर चाहे वे उस विशाल घर के किसी भी कोने में हों, झड़प से पहुँचकर गोद में उठाके जोर से भींच लेती थीं। उन क्षणों के अहसासात की उम्र मेरी यादों में अक्षय संजीवनी बनकर आज भी जीवंत है। बड़े होने पर बड़की काकी के अश्रु-विगलित स्वरों ने कभी बताया कि छोटकू जने (यही चाचा) ने सबसे पहले उन्हीं चाची (अपनी पत्नी) के सारे गहने एक-एक करके बेचे – बल्कि इन्हें जरा भी चिंतित देखकर हमारी चाची ने ख़ुद ही दे दिये – एक-एक करके सब…!! और ऐसी हमारी प्यारी चाची अपनी अंतिम विदाई में सुहाग का कीमती ज़ेवर पहनकर इतराती हुई गयी होगी अपनी महायात्रा पर उस परमपति के पास…। चाची की यादें बहुत कम हैं। मेरे घर तो शायद वह आ भी नहीं पायी थीं। उसके साथ को हम छक के जी न सके, उसे जान न सके, पर चाची की इक पीर पुरानीसी हमारे जिगर में है 

दूसरे दिन तब भी मैं मौजूद था, जब सबकुछ से अनजान महेन्द्र सुबह देर से उठकर आँखें मीचते हुए अपनी माँ के पास जाने के लिए दालान में हेला ही था कि बड़ी काकी ने बढ़कर गोद में उठा लिया था। माँ के पास जाने के लिए छइलाते उस बच्चे को चुप कराने की कोशिश में सारा घर विलाप करने लगा था। महेन्द्र को तो अपनी माँ की याद भी नहीं होगी, लेकिन उससे बड़ी थी बेटी – इतनी बडी कि माँ के मरने का उसे पता था, पर परिणाम व असर से अनजान थी। अब वह अपने परिवार के साथ दिल्ली रहती है। बड़े होकर जाना कि अपनी इस छोटी बहन के नाम का विधान बडा रोचक है। मुझे कब से सबको बताना था…लें आज ही सही। उसे होना चाहिए था – ‘नर्मदेश्वरी’, पर थी ‘नर्मदा’ और बोलचाल में हो गयी थी ‘नर्वदा’, जो मेरी जानकारी में शब्द ही नहीं है, लेकिन हमारे लोक को इससे मतलब नहीं – वह बोलने की आसानी (मुख-सुख) के बहाव में बहता है। इसी ने नर्वदा को ‘नरबदवा’ बनाया। फिर बुलाने की टेर में ‘नबवा’ हुई और जिक्रों में ‘नब्बा’ होके रह गयी…।  

बस, एक ही आदत थी चाचा की – शाहखर्ची। वह भी अपने लिए नहीं। आने वालों के लिए – अतिथि-अभ्यागतों, नात-रिश्तेदारों के स्वागत-सत्कार के लिए। यह तो हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है – ‘अतिथि देवो भव’। यह भाव बहुत बेहतर मनुष्य में ही हो सकता है या यह मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाता है। लेकिन चाचा की स्थितियों में इसी की अतिशयता विचार व विवाद का विषय रही। घर में कोई भी आ जाये, तो कलेजा निकालकर खिला-पिला देने में वे गुरेज़ न करें। शुरू में यही उनकी ख्याति बनी। लेकिन फिर चाचा ने अति कर दी और उन्होंने इस कार्य में आचार के बदले संवेदना भर ली। उसे दायित्त्व व आचार के बदले अनुरक्ति (ऑब्सेशन) बना लिया। एक बार आने वाले को बार-बार बुलाने लगे। इसके लिए पूरे इलाके में मशहूर हो गये। ऐसा सेवाभाव यदि संत-महात्माओं, गरीब-ग़ुरबाओं तक पहुँचता, तो एक बात होती…, लेकिन उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को परका दिया, जो हर तरह से गुनाहे बेलज्जत हुआ। लेखपाल-अमीन-पतरौल…आदि तो तनख़्वाह पाते – ऊपर की आमदनी भी करते। उन्हें खिलाने-पिलाने का क्या मतलब? वह भी कैसे कि अमीन अपने हरकारे के साथ आते, दस गाँवों की लगान वसूलते और 15 दिन टिक के रहते-खाते चाचा के यहाँ। वर्षों-वर्षों चला ऐसा। ऐसे उपकृत लोग चाचा की मुँहदेखी बतियाते। चाचा उसे मित्रता समझते। और चाचा का खिलाना भी मध्यम न होकर उच्च श्रेणी का होता। क्या-कैसे बने, से लेकर कैसे परसा जाये, तक का शालीन-सभ्य तरीका…आदि का काफी कुछ मैंने चाचा से सीखा…। लेकिन इतने उदार चाचा ने एक बार बड़की काकी के भाई श्रीनाथ मामा के दो साल यहाँ रहके पढ़ने के दौरान खाने का पैसा वसूल लिया था। कारण थे, पर यह कार्य उन कारणों पर बहुत भारी पड़ा, लेकिन किसी ने चूँ न की – मामा की सगी बहन मेरी बड़की काकी भी। कभी-कभार ही सही, इस चाचा को समझ पाना नामुमकिन होता।     

हद तो तब हुई, जब चकबन्दी के समय दर्जन भर लोग अक्सर खाते। उनके लिए भी लाने-बनवाने-परसने-खिलाने में मैं होता। तब 11वीं-12वीं में पढता था, सब कुछ जानने-समझने लायक हो गया था। तो देखा कि कभी-कभार ख़ास तौर पर चकबन्दी वालों को खाने पर बुलाने वाले गाँव के एकाध लोग शुक्ला एसीओ को ब्राह्मण के नाते और हशमत अली कानूनगो को मुसलमान के नाते अलग बिठाते – आड़ में। वहीं खिलाते हुए अच्छे चकों के सौदे पटते…। लेकिन चाचा सिर्फ़ खिलाते – विनम्र सत्कार करते। एक बार मैंने अपने लिए कुछ कराने को कहा था, तो चाचा का जवाब था – ‘झूरी दाई पालगी ना होत सत्देव’ – याने पैसे देने होते हैं। अब यह औरों का कराने से मिला अनुभव रहा हो या उन सबकी कारस्तानी पर व्यंग्य, लेकिन तलिया पर का उनका चक इस बात का स्पष्ट प्रमाण बना कि उन्होंने अपना कुछ नहीं कराया या न करा पाये। उस चक को बदलने के लिए चाचा ने सीओ के यहाँ दरख़्वास्त दी थी। पूरे गाँव के साथ मैं भी मौजूद था। सीओ ने छह आने की उसकी मालियत को सस्ता करते-करते चार आने तक लगा दिया, फिर भी गाँव का कोई लेने को तैयार न हुआ। तब वह खेत इतना ख़राब था, लेकिन धन्य है नहर का पानी कि आज चाँदी कटा रहा है।

अब उस वाक़ये पर आना ही पड़ेगा, जो जीवन में हमारे रिश्ते की नाज़ुक कड़ी सिद्ध हुआ और इस लेखन के लिए भी चुनौती है। उसी भाभी के बेटे याने मेरे भतीजे व चाचा के प्रिय पोते की शादी हुई। लडकी वालों ने जिस कमी को छिपाके शादी की थी, बहू के आते ही उसके प्रकट होने पर रिश्ता तोड़ने की बात-चीत चल ही रही थी कि भइया सत्यप्रकाश दिवंगत हो गये। कुछ दिनों बाद जब फिर बात शुरू हुई, तो संयोग से मैं भी मुम्बई से आया था और चाचा ने ही मुझे बात में शामिल कर लिया। तलाक़ का फैसला हो गया। लेकिन मेरे व चाचा के बीच द्वन्द्व तब शुरू हुआ, जब इसी भतीजे की शादी की बात आयी। असल में जैसे हमारे यहाँ जाति-सम्प्रदाय…आदि कुछ ऐसी निश्चित मान्यताएं हैं, जिनसे शादी-विवाह आदि संचालित होते हैं, उसी में एक है – ‘दूसरी शादी’ भी, जिसे कामचलाऊ माना जाता रहा…। और इनके सामने योग्यता, समानता, कला-कौशल, रुचि…आदि का कोई वजूद व वास्ता ही नहीं बनता…। याने ‘दूसरी शादी’ हो जानी चाहिए – कहीं भी कैसी भी। इसी के तहत जिस अमीन की ऊपर चर्चा हुई, उन्हीं की एक लड़की से शादी करने के लिए भाभी व भतीजे की इच्छा के विरुद्ध चाचा दबाव डालने लगे…। स्तरभेद इतना ज्यादा था कि शादी यूँ ही नाक़ाबिल थी, फिर अमीन ने ‘दुआह सादी हौ, कुछ चुन्न-पुन्न दे देब’, का अहसान जता दिया। यह अपमानजनक था। किसी को भी जबुर लगता – भाभी व भतीजे को लगा ही – भाभी से सुनने पर मुझे भी लगा, लेकिन चाचा की दोस्तियाँ ऐसी ही थीं – मेरे साथ भी थी ही कि जब है, तो कलेजा निकाल के दे दें…। अब इस शादी में उनके सामने पोते की क्या बिसात!! सो, भाभी के साथ अपवाली करने लगे, जो मुझे नागवार गुजरा। और हमारे मतभेद हो गये। चाचा को इसकी उम्मीद न थी। फिर तो उन्होंने चुनौती दे दी कि इससे अच्छी शादी कर लो, तो जानें। और संयोग से बहुत अच्छी शादी हो गयी।

चाचा का कुण्ठित होना स्वाभाविक था। उन्होंने इस सबको इस रूप में ले लिया कि सब मैंने ही कराया है – गोकि कराया होता, तो भी कोई हर्ज़ न था। काम अच्छा था – कोई भी करे-कराये। लेकिन चाचा ने मुझे निशाने पर लेते हुए बहुत कुछ कहने के साथ मेरे घर की लड़कियों की शादियों की भी खुली भर्त्स्ना कर डाली। पर उस दिन अपने सहज उग्र स्वभाव पर मुझे ख़ुद ताज्जुब हुआ कि मैं ‘एक चुप, हजार चुप’…!! शायद चाचा की मेरे मन में बसी सम्मानित औक़ात का ही असर रहा हो…!! बातचीत तो बन्द होनी ही थी, पर विश्वास था कि चाचा का गुस्सा शान्त होगा, तो सब ठीक हो जायेगा। लेकिन नहीं हुआ। और दो साल बाद मेरी माँ की मृत्य हुई, तो चाचा न दाह-संस्कार में आये, न घर का कोई भी खाने आया। चाचा ने स्वत: ही निमंत्रण तक लौटा दिया। माँ का मामला मेरे लिए तो अति संवेदनशील था ही, पर चाचा ने जिन्दगी भर की अपनी ‘भौजी’ (मेरी माँ) के आसंगों का भी ख्याल न किया…ऐसे भी थे चाचा!! और तब से हमारे बीच सब कुछ बन्द हो गया, जो मृत्यु के तीन दिन पहले खुला…।

लेकिन उस दौरान मुम्बई से गाँव आता, तो रहा न जाता। यादें ही यादें ….

…पहली बार लाचार होकर मुम्बई जाते वक़्त धार-धार रोते हुए मुझे चाचा का ही कन्धा मिला था टिकने के लिए – ठेकमा तक पहुँचाने गये थे। चाचा के सहपाठी सरायमोहन के भृगुनाथ मौर्य अचानक मिल गये रोडवेज़ पर, जो आराम से मुम्बई तक ले गये। मुझे पहुँचाके चाचा सीधे मेरे घर गये थे – रो-रोके बेज़ार हो रही माँ को समझाने।

…इंटर में की गयी अपनी लोफरी में फँस जाने पर पिता बनके चाचा ही गये थे साथ।

….मैं गाँव की यजमानी में विवाह कराऊँ, तो हरपाल भर जैसों के मण्डप में भी मेरे साथ दो बजे रात तक बैठे रह जाते चाचा।     

…..इंटर के बाद की बेकारी में एक संस्कृत पाठशाला में 30 रुपये महीने की मास्टरी की। पण्डितजी ने तीन महीने वेतन ही न दिया, तो चाचा ही निकलवाके लाये तथा ‘उस लीचड़ पण्डितजी’ की नौकरी छोड़वा दी। 

….उन दिनों दो-दो रुपयों के लिए मैं मोहताज़ होता – हालात चाचा के भी अच्छे न थे, लेकिन उनके पास चार रुपये हों, तो दो मुझे दे ही देते थे – ‘ले ला, फिर देखल जाई’।

…किरन बिटिया की दूसरी शादी खोजने के लिए उस लगभग बुढ़ाई की हालत में सायकल से मेरे साथ 8 दिनों पड़े रहे पच्छूं के निचण्टों में – छोटी बहन राज्यश्री के घर को केन्द्र बनाके।  

….मुम्बई से आने पर बाज़ार के लिए निकलता। चाचा बिठा लेते, सामान मँगाके घर पहुँचवा देते। मैं रात को घर पहुँचता, तो माँ हास्य भरा ताना मारती – आये ही क्यों? वहीं रह जाते…!!

याने इतना-इतना कुछ था – पूरा जीवन इतना चाचामय था, पर जिन्दगी की यह कैसी फ़ितरत है कि 16 साल तक ठीक से देखा-देखी भी न हुई। मैं बगल में भाभी-भतीजों के पास प्राय: जाता …। एक-दो साल बाद चाचा कुछ-कुछ अंतराल पर दो बार आके मेरी ही बगल में उल्टे मुँह करके बैठ गये…। कदाचित बोलना चाहते रहे, लेकिन उनका बड़ा व बाप होना शायद मुझसे प्रणाम के पहल की उम्मीद करता रहा, जो बेहद जायज़ व सही थी। इधर पाँव छूने को मेरे हाथ भी फड़कते…, लेकिन माँ की जलती चिता सामने आ जाती और वहाँ चाचा नहीं दिखते…मेरे फड़कते हाथ काँपने लगते। फिर खाने का न्योता लौटाते हुए उनके हाथ मेरी तरफ बढ़ते…जिसमें माँ के मायूस चेहरे का क्लोज़-अप मिक्स होकर चीत्कार उठता – ‘बबुआ-बबुआ…’, लेकिन बबुआ नदारद… और इन फैंटेसियों में तडप कर पाँव छूने के लिए काँपते मेरे हाथ ठिठुर के ठिठक जाते…मैं अपने को वहाँ से उठके जाते हुए पाता…।    

आधी शताब्दी तक ज्ञान एवं साहित्य व संवेदना के इलाके में रचने-पचने के बावजूद उन त्रासद फैण्टेसियों से मुक्त न हो पाने वाली अपनी चेतना को आज मैं धिक्कार के सिवा और क्या दूँ…!! चाचा के साथ मेरे इतने प्रगाढ़ सम्बन्धों व दिली लगावों तथा मेरी अन्तस् की पीड़ा को जानने वाले मेरे बेहद प्रिय भतीजे ब्रजेश बार-बार दिल्ली से फोन पर आग्रह करते कि चाचा से मिल लूँ, वरना जीवन भर का पछतावा रह जायेगा – चाचा भी तड़पते ही चले जायेंगे। मेरे काफी हियें लगी प्यारी पोती शिखा भी बडा इसरार-मनुहार करती…। मेरी सहेली और भाभी भी कई बार कहतीं…। इन सबसे मेरा ठस्स अहम हिलता जरूर, पर पिघलता नहीं…। कई बार मन ने भूमिका भी बनायी, पर चेतना का ढक्कन खुला नहीं। लेकिन उस दिन जब मैं बनारस जाते हुए हमेशा की तरह गाड़ी सड़क पर खड़ी करके भाभी से मिलने गया…। कोई बात निकली और शिखा ने मेरा हाथ पकडके खींचना शुरू किया – बाबा, अब्बै चला (अभी चलिए)। दो दीवालों के फासले पर गिनके दस कदम दूर चाचा की खाट थी। भाभी ने भी टहोका और उठ पडीं…इस प्रकार लगभग खींचकर मुझे उनकी खाट के पास पहुँचा दिया गया।

चाचा सो रहे थे। पोता ठल्लू (सन्दीप) खाट के पास बैठा था। चाचा के सगे भतीजे सुरेन्द्र और बेटे महेन्द्र तुरत आ गये। अपेक्षाकृत अंतर्मुखी सुरेन्द्र के चेहरे पर चिर-अतरासे होने की पूर्त्ति का उछाह समा न रहा था। ये सब मेरे छोटे भाई हैं…और हम सोलह साल एक दूसरे से वंचित रहे…। जिस तरह महेन्द्र ने जगाना शुरू किया – ‘बाबू उठा, देखा के आयल हौ – सत्देव भइया आयल हउयें’…इसके आगे आवाज भाप बन गयी थी। उस भर्राई पुकार में चिर प्रतीक्षा का आवेग था, डेढ दशक लम्बे अंतराल की कसक थी। मैं अन्दर तक लरज गया था। चाचा ने आँखें खोलीं, अस्फुट-सी आवाज आयी – सत्देव…!! और हाथ उठाके मुझे छूने के लिए उठना चाहा…, तब तक मेरे हाथों ने उनके हाथ थाम लिये। लरबराते हुए बोल उनके ही फूटे – ‘अब माफ कइ देया, हमसे बहुत बडी गल्ती भइल…’ और मेरा कलेजा जैसे हलक से बाहर आ गया हो…क्या अंतिम बेला में यही सुनने के लिए एक बेटे ने बाप सरीखे इंसान को इतना तड़पाया…!! आँखें गीली हुईं चाचा की भी और आँसू भर-भर आये मेरी आँखों मे भी…। उस क्षण के अहसास को हनुमंत नायडू के शब्दों में ही कह पाऊंगा, क्योंकि साहित्य से शब्द ले-लेके बोलते-बोलते भाषा ही उधार की हो गयी है – मत माँगो हमसे अब हँसने के वादे तुम, रोना तक भूल गया मन इतना रोया है

उठने की कोशिश में अधलेटे हो गये चाचा को पूरा लिटाते हुए मेरा बायां हाथ उनके सर के नीचे चला गया था और दाहिने हाथ में उनके दोनो हाथ थे। गलकर दो मुट्ठी हो गये मेरे अदद चाचा किसी पंछी के बीमार बच्चे जैसे पोचे-पोचे लग रहे थे – उन्हें बस सेया जा सकता था…छूने या सहलाने लायक बचे ही न थे। (अण्डे की सँभाल के लिए ख़ास शब्द है ‘सेया जाना’)। दस मिनट इसी अवस्था में हम अटके-बँधे रहे…एक दूसरे में ऊभ-चूभ होते रहे…शायद डेढ़ दशक की अनकही कथाओं को कह-सुन रहे थे, अनछुए अंतराल को पूर रहे थे – समूचे खोये को पा लेना चाह रहे थे – इस पाते को सँजो लेना चाह रहे थे…। वे दस मिनट किस क़दर हम पे भारी हुए, कितना-कितना हमें हल्का कर गये… का हिसाब करना मन की वृत्ति नहीं। पर ताजिंदगी सबकी आव-भगत करने वाले चाचा के मन ने मेरे ना-ना कहने के बावजूद बच्चों से बार-बार कह-कह के मीठा-पानी मँगा ही दिया। उनके साथ तरह-तरह से जीते-खाते बीता था जीवन, यह अंतिम पानी भी बदा था। ग्रेट चाचा से मुझ अदने का यह मिलन दुनियादारी के लिए ‘अंतिम मिलन’ भले सिद्ध हुआ हो, मेरे लिए तो सतत मिलन का स्रोत बन गया है। इसी डोंगी में तिरते हुए मैं जब चाहूँ, चाचा से मिल आता हूँ…। और वह दिन अब बहुत दूर नहीं, जब मिलन की यह डोंगी छूट जायेगी और मैं अशरीरी होकर धड़धड़ाते हुए चाचा के पास सीधे पहुँच जाउंगा…।

पक्का है कि वहाँ भी किसी बारात में चाचा के बताये के अनुसार बने पकवान-मिष्ठान खाके महफिल सजी होगी। जदुराई-रघुराई के नाच-गान चल रहे होंगे…मुँह में गिलौरी दबाये गरदन को सम पर हिलाते हुए आनन्दमग्न चाचा मेरी तरफ उसी पुरलुत्फ़ नज़रों से निहारेंगे…हाथ पकड़कर पास बिठा लेंगे और रघुराई के बेटे विजय से फरमाइश कर देंगे – कवि बिन्दु रचित हम दोनो के चिर पसन्दीदा उस गीत की – है प्रेम जगत में सार, और कुछ सार नहीं और हम उस लोक को भी अपनी इसी दुनिया का विस्तार बना देंगे…।

चाचा की स्मृति के साथ उस गीत के ऊधौ-गोपी-संवाद में ज्ञान पर प्रेम की विजय के दो बन्ध आप सुन ही लें –

कहा ऊधौ ने यह बढ़कर कि मै मथुरा से आया हूँ। सुनाता हूँ संदेसा स्याम का जो साथ लाया हूँ।

कि जब यह आत्म सत्ता ही अलख निर्गुन कहाती है, तो क्यों फिर मोह वश होकर वृथा यह गान गाती है…

है प्रेम जगत में सार …

कहा श्री राधिका ने संदेसा खूब लाये हो, मगर यह याद रखो प्रेम की नगरी में आये हो

सम्भालो योग की पूँजी, न हाथों से निकल जाये, कहीं बिरहाग्नि में यह ज्ञान की पोथी न जल जाये…

कि है प्रेम जगत में सार...

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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