संस्मरण

52 सालों बाद दादीमाँ के मायके में एक दिन…

 

दादीमाँ का मायका-याने मेरे पिता-काका…आदि का ननिहाल और मेरा अजियाउर। दादी को आजी भी कहा जाता है-दक्षिण भारत में अज्जी। हमारे यहाँ रिश्ते-नातेदारियाँ स्त्रियों के अपना घर छोड़कर अन्य घर जाने से बनती हैं – याने स्त्री-संचालित है हमारा कुटुम्ब व समाज। जन्म का घर, जो होश सँभालते से ही अपना होता है, जिसे स्त्री अपने कठिन जाँगर से बना-सजा के रखती है, जहां बचपने से सारे अपने लोग रहते हैं…उस समग्र अपनापे व अधिकार को छोड़कर एक दिन वह किसी अजनवी घर भेज दी जाती है और वहाँ भी वैसा ही कर पाती है। यह प्रतिभा, यह कूबत स्त्री को ही दी है प्रकृति ने। या पुरुष-संचालित समाज ने उसे ऐसे साँचे में ढाल दिया है। चाहे जैसे हुआ हो, पर स्त्री-जाति ने ही इसे साधा है। इस उजड़ने-बसने की पीड़ा और सहने का धैर्य तथा उसे अपना बनाकर रह पाने की क्षमता के लिए समूचे मानव-समाज को उसका ऋणी होना चाहिए। और ऋषियों ने जो कहा है – ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता’, इसके लिए उनका सिर्फ़ यह एक सुकृत्य ही काफ़ी है…। बहरहाल,

स्त्री-संचालित होने के कारण ही हमारी सारी रिश्तेदारियों के नाम स्त्री के बनाये या स्त्री से बने रिश्तों से रखे गये हैं। नानी का घर ननिहाल, बहन का घर बहनिआउर, मौंसी का घर मौंसियान, फूआ (बुआ) का घर फूफुआउर…आदि। तो इसी क्रम में आजी का मायका अजियाउर। और हमारी आजी के मायके का गाँव है भूपालपुर – मेरे घर से 8-9 किमी. पूरब।

वहाँ 52 साल तक न जाने का मतलब ऐसा-जैसा दिलीपकुमार ने बहुत दिनों बाद पाकिस्तान से आने पर नूरजहाँ के लिए कहा था – ‘तुम जितने दिन नहीं आयीं, हमने ठीक उतने ही दिन तुम्हारा इंतज़ार किया है’। उसी तरह मै 52 साल नहीं गया, तो ठीक 52 साल ही रोज़ जाना चाहता रहा…। बीच में एक ख़ास बात भी हुई थी, जिसके चलते वहाँ जाना बन रहा था…। हमारे यहाँ सास के मायके जाने का एक रवाज है – बल्कि कहें कि रूढ़ि है। इससे पुण्य-लाभ जैसी कोई बात लोक में है…या वेद से ही आयी हो…, मुझे पता नहीं। तो मेरी दादी का यह मायका, मेरी माँ की सास का मायका हुआ। सो, मेरी माँ भूपालपुर आना चाहती थी – कम से कम एक बार। लेकिन मैं ला न सका और अब जब ला सकता हूँ, तो 16 साल पहले मां चली गयी।

लेकिन अजिअउरे आने की मेरी यह प्रबल मंशा शायद अब भी फलित न होती, यदि इस अजियाउर के मेरे एक भतीजे एडवोकेट विनोद तिवारी का बार-बार आग्रह न होता…। पिछले 20 सालों से आज़मगढ़ में विनोद से भेंट होती रही – कभी मै कोई क़ानूनी सलाह लेने कचहरी पहुँच जाता, कभी शहर गया रहूँ, तो यूँ ही मिलने चला जाता। और एक ख़ास बात – काशी विद्यापीठ में पढ़ाने आ जाने पर आज़मगढ़ के एकमात्र नाट्यसमूह ‘सूत्रधार’ के संचालक अभिषेक पंडित के बुलावे पर मै प्राय: अपने गृह नगर आ जाता…तो एकाध बार कार्ड में मेरा नाम देखकर प्रिय विनोद वहाँ आये और मिले। याने ऐसे कई तरह के आसंगों से यह सिलसिला चलता रहा, जिसे फ़ेस बुक ने ज्यादा गहरा भी दिया व फैला भी दिया। इधर उनका आग्रह यूँ भी सामने आया – ‘एक बार आ जाइए…अभी आपको पहचानने वाले कई लोग मौजूद हैं’। फिर इसी के साथ नयी पीढ़ी से भी परिचय हो जायेगा…। इससे यह रिश्तेदारी एक पीढ़ी और आगे चल लेगी…के आकर्षण से भी मेरा इरादा सक्रिय हो उठा…। और इन सबके परिणाम स्वरूप पिछले 5 जून (2022) की सुबह रवाना हो लिया…।

रास्ते में भूपालपुर के सम्बंधों का अतीत नुमायाँ होने लगा…

…दर्जा 7 में पढ़ते हुए (1965) से मैं अपने बड़के बाबू –कुबेर त्रिपाठी उर्फ़ पुजारी- के साथ इस गाँव भूपालपुर पैदल जाता रहा…। तब हमारे गाँव में ठीक से सायक़िलें भी नहीं हुआ करती थीं। बड़के बाबू रात को 3-4 बजे मुझे उठा के चला देते…और कई बार तो सूरज उगते-उगते हम भूपालपुर होते। तब तक वहाँ कुछ लोग सोते ही मिलते, जिन्हें हम जगाते…। बता दूँ कि हमारे यहाँ ननिहाल जाने और रहने की परम्परा बड़ी सुदृढ़ और खूब रवाँ रही है। अपने ननिहाल में तो मैं 2-4-6 महीने रहता था और उन दिनों वहीं के स्कूल में नानी पढ़ने भेज देती। कुछ बच्चे तो ननिहाल से ही सारी पढ़ाई-लिखाई भी करते…। महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपने ननिहाल ‘पंदहा’ (आज़मगढ़ शहर से बहुत दूर नहीं) में ही पले-बढ़े थे। और इस परम्परा के बड़े वाहक रहे मेरे बड़के बाबू भी, जो 85 साल तक जीवित रहे और अपने जीवन के अंतिम दिनों (जब तक चल-फिर पाते रहे) तक नियमित रूप से अपने ननिहाल भूपालपुर जाते रहे…और सप्ताह से कम तो कभी न रहते – कभी तो महीने भर भी रह जाते…।

मेरी जानतदारी में इस घर के ज्येष्ठ पुरुष थे पंडित रामविलास तिवारी। वे मेरे पितादि के बड़े ममेरे भाई थे – याने मेरे पितादि उनके छोटे फ़ुफेरे भाई थे। बड़े और हर फ़न में कुशल होने तथा अपने फ़ुफ़ेरे भाइयों के प्रति अगाध स्नेह…आदि के कारण वे मेरे घर के संरक्षक की तरह थे। इनकी चलती थी मेरे घर में। मै उन्हें भी बड़का बाबू ही कहता। मेरे घर के सारे फ़ैसले इनसे पूछ के इनके बताये-अनुसार ही होते…। एक उदाहरण दूँ – मेर पिता ज्योतिष के बड़े विद्वान थे, लेकिन मैं एक ही साल का था, वे मर गये। मेरे साधुवत बड़के बाबू और पहलवान काकाओं ने मुझे भी ज्योतिष पढ़ने के लिए उसी गुरु (पंडित-प्रवर रघुनाथ उपाध्याय) के पास भेजना शुरू किया, जहां से पिता ने पढ़ाई की थी। एक महीने ऐसा चला होगा कि ये बड़के बाबू याने पंडित रामविलासजी मेरे घर आये। वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने वैसा ही जीवंत है, जब शाम को कौड़ा (अलाव) तापते हुए उन्होंने पूछा था – ‘अरे बचवा पढ़ने जाने लगा – कहाँ जाता है’? काका-बाबू ने बड़ी शान से बताया – ‘भइया, रघुनाथ पंडितजी के यहाँ जाने लगा है। हम चाहते हैं कि यह भी अपने पिता जैसा ही विद्वान बने…’। सुनते ही वे चिल्लाए – ‘मूर्खो, बच्चे की ज़िंदगी ख़राब करोगे? कल से चुपचाप प्राइमरी पाठशाला, ठेकमा में पढ़ने भेजो’। अब यह तो मेरे बाबू-काकाओं के लिए ब्रह्म-वाक्य हुआ…। बस, अगले दिन से मुझे ‘वृहत होड़ाचक्रम्’ व ‘शीघ्रबोध’ …आदि (ज्योतिष के शुरुआती) ग्रंथों से मुक्ति मिल गयी। इस प्रकार मेरे जीवन के बुनियादी निर्माता मेरे यही बड़के बाबू हैं।      

वे स्वयं प्राइमरी पाठशाला में प्रख्यात मुख्याध्यापक थे और संस्कृत के दबंग विद्वान। ‘प्रकांड विद्वान’ नहीं कह रहा हूँ, क्योंकि उनकी संस्कृत की पढ़ाई तो मध्यमा (इंटरमीडिएट के समकक्ष) तक ही हुई थी, पर शास्त्रार्थ में वे शास्त्री तो क्या, आचार्य की उपाधि वालों से भी भिड़ जाते थे और अपनी बुलंद आवाज़ व वक्त्तृत्व-कौशल से श्रोताओं के लेखे उन पर भारी पड़ते…। एक बार की तो ऐसी याद है कि ये हाथी पर थे और उधर द्वारपूजा पर अपनी तरफ़ का पंडित कमजोर पड़ रहा था। बस, बड़के बाबू ने पिलवान से चिल्लाकर कहा-हाथी को बिठाओ। और हाथी पूरा बैठा भी नहीं कि एकदम गोरे बदन वाले ये बड़के बाबू कंधे पर साफ़ा, बदन पर सिल्क का कुर्त्ता व फर्राटेदार धोती पर म्हरून रंग़ के पम्प जूते पहने ही कूद पड़े और भागते हुए द्वारपूजा-स्थल पर पहुँच के शास्त्रार्थ में दहाड़ने लगे…। 

इतना ही नहीं, वे क़ानून के दांव-पेंच भी बड़ा अच्छा जानते थे, जिसके चलते वे अपने सारे मुक़दमे जीत जाते, जो किसी से भी तनाजो आदि के कारण उन पर दायर होते या वे किसी पर दायर करते…। इस पक्ष पर उनके व्यावहारिक ज्ञान का फ़ायदा एक बार मुझे भी मिला था, जब मेरे कारबारदारी काका मर गये और दसवीं में पढ़ते हुए मुझे घर की सारी ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी, तो चकबंदी में पता चला कि पितादि ने बिजौली गाँव के ज़मींदार संतन-संतोषी साहु से कुछ ज़मीनें ख़रीदी थीं, जिसमें एक गाटा मतरूक हो (पड़ताल में लेखपाल से छूट) जाने के कारण ग्राम समाज में चला गया था और मैंने अपने नाम की इंदराजी (नाम जोड़ने) का मुक़दमा दायर किया था। अब एक प्रमाण उस ज़मींदार की रसीद भी हो सकती थी, जो काकादि से खो-खा गयी थी। इस बड़के बाबू ने सुना, तो बताया कि उस ज़मींदार के वारिसों को कुछ लेके-देके पुरानी तारीख़ में मुसन्ना (रसीद) बनवा लो। उन साहुओं का दामाद मारकंडेय साहु वारिस था। उससे मैंने बनवा लिया। लेकिन वह काग़ज़ बड़ा ताज़ा लग रहा था। बड़के बाबू को मैंने अपनी शंका बतायी। उन्होंने कहा – जहां खाना बनता है, वहीं चूल्ह के ऊपर एक काँटी (खीला) गाड़ के इसे लटका दो। दो-चार दिन में धुँअठ के (धुआँ खाके) पुराना लगने लगेगा…। वही किया और युक्ति काम कर गयी। इतने हरफ़नमौला बड़के बाबू के बारे में सोचकर आज लगता है कि अपने समय से पचासों साल आगे की सोचते थे। खेद है कि बहुत दिन उनके साथ रहने का मौक़ा न मिला, वरना काफ़ी कुछ सीखा जा सकता था।

उनकी चिरसंगिनी थीं – हमारी बड़की माई। हमारे यहाँ माइयों-दादियों के नाम नहीं होते – वे माई-दादी ही होती हैं। तो बड़की माई बड़ी सीधी, बड़ी स्नेहल। वही खाने-वाने के लिए बुलाके घर में ले जातीं। उनसे कुछ लम्बी बात सुनने का एक ही मौक़ा याद आ रहा है, जब वे बड़के बाबू के साथ तीर्थयात्रा से आयी थीं। और यात्रा का वह वृत्तांत बताया, जिसमें किसी स्टेशन पर बड़के बाबू गाड़ी में चढ़ गये थे और वे छूट गयीं थीं – ‘हड़बड़ी त ई हमेसे के हउएं। गाड़ी अवते ‘चढ़ो-चढ़ो’ कइके न जनी कब, कवने डिब्बा में घुस गइने – हम देखी ना पवली। गाड़ी चल गइल। अब बचवा, हम हैरान…। भित्तर दुगदुगी-कि का होई!! बकिन बहरे से एकदम सांत बैठल रहली कि ना पैहें, त अइबे करिहें’। ऐसा विश्वास व ऐसी निश्चिंतता उस समय के सम्बंधों का शाश्वत जीवनमूल्य थी – कहने-सुनने की बात नहीं। और बड़की माई ने बताया कि दो घंटे बाद अगले स्टेशन से फिर इस दिशा में आने वाली कोई गाड़ी पकड़ के आये बड़के बाबू।

भूपालपुर की यजमानी बहुत बड़ी थी और रामबिलास बाबूजी के अलावा कोई करने वाला न था। यूँ तो उस घर में तीन खूँटें थीं, जिनके वंशज आज भी हैं। लेकिन मेरे सामने उस पीढ़ी के अकेले बचे थे रामबिलास बाबू और तीनो खूँट अलग-अलग हो गयी थी – याने चूल्हें अलग हो गयी थीं, घर एक ही था। खाते अलग थे, रहते साथ थे। तब अलगौझा का यही स्वरूप हुआ करता था। दूसरी खूँट में उनके दो भतीजे शुकदेव व सत्यदेव सरकारी नौकरियों में थे। शुकदेवजी दुनिया के सबसे सज्जन इंसानों में एक थे, लेकिन दुनियादारी की उनकी कमी को शायद पूरा करते हुए सत्यदेव भाई ज़रूरत से ज्यादा दुनियादार थे। और घर की दुनिया भी इन्हीं की थी, क्योंकि बड़े भाई तो नि:संतान थे। सत्यदेव का घर का नाम बंगाली हुआ करता था-हम ‘बंगाली भैया’ कहा करते थे। इन्हीं के बड़े बेटे हैं अपने ये एडवोकेट विनोद, जिनके कारण आज मेरा जाना हो रहा…। दूसरी खूँट के दो भाइयों में बड़े वाले जगदीश गूँगे-बहरे थे। छोटे वाले हरदीस ने भी ठीक से पढ़ा-लिखा नहीं। घर का भी खुद कुछ खास काम न करते – बस, बड़े भाई से खेती का सारा काम कराते…(जैसा मेरे देखने में आया है)।

इधर रामबिलास बाबू के चार बेटों में सबसे बड़े रामसूरत भइया बीडीओ थे। बहुत कम बोलते। प्राय: पान भरा रहता मुँह में। शफ़्फ़ाक धोती-कुर्त्ता पहने सायकल चलाते हुए वही हमारे यहाँ के आयोजनों में शरीक होने (न्योता-हंकारी करने) भी आते…। दूसरे थे राजदेव भाई। फ़ौज में थे। अपने घर भी आयोजनों में ही दिखते। तीसरे गौरीशंकर तब व्यापार-सा कुछ करते थे और बाहर रहते, पर प्राय: घर आते रहते…और घर होते हुए वही निर्द्वंद्व भाव से यजमानी करने भी जाते। वे तब भी सबसे छटपट, बड़े बात्यायी, चलता-पुर्ज़ा याने हरफ़नमौला थे – आज भी हैं। चौथे उमाशंकर घर रहते – आज भी हैं। उन दिनों सबने मिलके वहाँ की स्थानीय ‘गोसाईं की बाज़ार’ में उमाशंकर के लिए कपड़े की दुकान खुलवायी थी…। अभी खुली-खुली ही थी कि उस दुकान पे एक दोपहर हुआ वह भोज भी मुझे याद आ रहा, जिसमें हम दोनो के साथ हरदीस भाई और वहीं पास स्थित गाँव रजमो के हमारे एक और रिश्तेदार सुरेंद्र मिश्र भी शामिल हुए थे। शायद भूपालपुर के मुतालिक वही अंतिम जाना हुआ था मेरा…। और समय के इसी मोड़ पर मैं मुम्बई प्रयाण कर गया था। बहरहाल, 

इस प्रकार उन दिनों दिव्यांग जगदीश को लेकर उस घर में कुल आठ युवा थे और उन्हें छोड़कर तथा आधे समय वाले गौरी भाई को मिलाकर ढाई लोग घर भी रहते थे, लेकिन यजमानी के काम पूरे हो नहीं पाते थे। हरदीस तो कभी चले भी जाते, उमाशकर भाई तो कभी न जाते। इसलिए तब बड़के बाबू ने मुझसे कहा था – ‘तुम अपने ख़ाली समय में या समय निकाल के आ जाया करो। जितना बन पड़े, पूजा-पाठ कर-करा लिया करो। यजमान का काम भी हो जायेगा और तुम्हारी कुछ आमदनी भी हो जाया करेगी…। मुझे पैसों की ज़रूरत भी होती थी और घर की मेरी यजमानी बहुत छोटी और छोटी जाति वालों की थी, जिसमें आमदनी बहुत कम होती थी। यहाँ की यजमानी ठाकुरों की भी थी, तो आमदनी ज़्यादा होती। लिहाज़ा बात काम की थी और मुझे भा भी गयी। सो, अपने घर के खेती-यजमानी के काम निपटाके मैं आ जाता। ख़ाली समय में शाम-सुबह पढ़ने के लिए दो-एक किताबें भी लेते आता। फिर तो दस में पढ़ने (1968) से लेकर मुम्बई-प्रयाण (1971) तक मैं सायकल से जाके आठ-आठ, दस-दस दिन वहाँ रहता और पूजा-पाठ कराके ठीकठाक कमाई करके लौटता, जिससे मुझे घर चलाने में काफ़ी सहूलियत हो जाती…।

उस दौरान बड़की माई की देख-रेख में उनकी बड़ी बहू सिरताजी भाभी बाहर निकलने और हमारे खाने-पीने की देखभाल करने लगी थीं। उनकी स्नेहिल छबि आज तक नहीं भूलती…। इतने वत्सल-ममतालु-प्रेमल लोगों के बीच मुझे कभी लगा ही नहीं कि अपने घर में नहीं हूँ। इसीलिए बहुत याद आता रहता है भूपालपुर-अजियाउर का सुख…। आज के समय के लिए मज़ेदार उल्लेख यह भी कि जिस आजी को मैंने देखा नहीं, उसके मायके यूँ रहा, इतना रहा कि कोई अपने ननिहाल भी क्या रहेगा…!! यूँ अपने ननिहाल तो मै छह-छह महीने रहता, जो एक अलग मर्म है – अलग क़िस्सा, जिसे नानी पर लिखे विस्तृत लेख में बता चुका हूँ।   

प्रसंगत: इतना और बता दूँ कि मेरी दादी का नाम था-कुलवंता देवी। उनकी बहन याने मेरे पिता की मौंसी के यहाँ (अंदोईं) से भी हमारे अच्छे रिश्ते रहे अभी हाल-फ़िलहाल तक…। यह सोचकर मुझे नरेश मेहता का उपन्यास ‘उत्तरकथा’ बेतरह याद आ रहा है, जिसमें ऐसे ही ढेरों रिश्तों का मसृण जाल फैला हुआ है और जो वस्तुतः हमारी संस्कृति रही है। कुलवंता दादी ऐसी अन्नपूर्णा थीं कि रास्ते चलतों को भी बुलाके खिला-पिला देतीं। कोई आधी रात को भी आये, तो ताज़ा खाना बनाके खिला देने में न उन्हें आलस्य होता, न थकान लगती…। ऐसी ढेरों चर्चाएं मैंने अपने गाँव-देहात के लोगों से सुनी हैं। उनकी इस आदत का एक बड़ा लाभ भी मुझे मिला। जिस जनता इंटर कॉलेज ठेकमा-बिजौली में छठीं कक्षा से लेकर इंटर तक की मेरी पढ़ाई हुई, उसके मैनेजर स्व. रामसेवक राय बहुत बड़े ज़मींदार ख़ानदान से थे। उनके पिता बाबू कोमल राय तपे हुए ज़मींदार थे। लेकिन उनके ख़ानदान में 6-7 मुसामातें -याने नावल्द (नि:संतान) विधवाएँ- हुआ करती थीं, जो अपना हिस्सा अलगाने या बहुत सारा पैसा लेने…आदि को लेकर कोमल राय को तंग किया करती थीं। लेकिन उनके मरने पर सारा हिस्सा कोमल राय को मिलता, इसलिए वे उनसे बच-बचा के समय बिता रहे थे। इसी सिलसिले में बाबू साहब रात-रात भर खेतों-बागीचों… आदि में भटका करते और कभी देर रात मेरे दरवज्जे पहुँच गये। दादी ने सुनते ही भोजन बना डाला। ज़बरदस्ती खिलाया और कभी भी आते रहने का ऐसा आग्रह किया कि वे कभी-कभार आने भी लगे…। यह बात बाबू कोमल राय ने अपने बेटे रामसेवक राय को बतायी थी। तो मेरे पढ़ने आने पर जब काका ने जाके मैनेजर से फ़ीस-माफ़ी की अर्ज़ की और बात-बात में वे जान गये कि काका उसी पंडिताइन के बेटे हैं…तो बस, दर्जा सात से लेकर 12वीं तक मेरी फ़ीस माफ़ रही…। इसी के लिए कहावत है-‘बाढ़हिं पूत पिता के धर्मे’ – पूर्वजों के किये पुण्यों से पुत्र आगे बढ़ते हैं। अगली पंक्ति पुत्रों के लिए अच्छी नसीहत भी है – ‘खेती उपजे अपने कर्मे’ याने खेती अपने जाँगर से ही होती है…।   

दिमाँग में चलती रीलें तब रुक गयीं, जब भूपालपुर की स्थानीय गोसाईं की बाज़ार से आगे गाँव की ओर चला। दिशा व भूगोल का पता था, लेकिन इन 52 सालों के दौरान चकबंदी व तमाम योजनाओं के तहत हुए विकासों ने परिवेश की कायापलट कर दी है – सब रास्ते बदल गये हैं। ऐसा मुंबई में भी हुआ है। जिस मुम्बई को किशोरावस्था से जवानी के दौरान जाने कितनी बार पैदल माप चुका हूँ, उसे आज हवाई पुलों (फ़्लाई ओवर ब्रिजेज) तथा नयी शैली की ढेरों बड़ी-बड़ी इमारतों ने ऐसा बदल दिया है कि सारे स्थल अजनवी लगने लगे हैं। विनोद ने दिशा-निर्देश दे दिये थे, लेकिन ‘सास्त्र सुचिंतित पुनि-पुनि पेखिय’ के अनुसार मैं आते-जाते लोगों से पूछ-पूछ के और रास्तों पर ध्यान दे-देके गाड़ी चलाने लगा, ताकि इधर-उधर बहक के लौटना न पड़े। विनोद ने बताया था कि वे पुराने घर को छोड़कर खेत में आके नया मकान बनवा के रह रहे हैं, जो गाँव में प्रविष्ट होते हुए पहले ही पड़ेगा। बग़ल में प्राइमरी स्कूल की पहचान (लैंड मार्क) भी बता दिया था। स्कूल दिखते ही जो आदमी सामने से आता दिखा, पास से उसका चेहरा देखते ही विनोद का घर पूछने के बदले सहसा पूछ लिया – ‘तू प्रमोद हउआ’? वह तो अवाक् – मेरा मुँह देखने लगे…। तब मेरे मुँह से निकला – ‘हमार घर सम्मौपुर हौ’ और प्रमोद झट से पाँव छूने की शैली में ‘चाचा प्रणाम’ करने लगे…, तो 52 साल की दीवाल पल भर में ढह गयी…। भूपालपुर में कदम रखते ही गोया मेरा वही अपना अजियाउर मिल गया…। इसे मराठी में कहने का मोह मान नहीं रहा – ‘जणू मला माँझी आजी साक्षात भेंटली’।

ये प्रमोद ऊपर बताये बीडीओ भइया के बड़े बेटे हैं – विनोद से थोड़ा छोटे। ये अपने छुटपन में मेरे यहाँ आते व कभी दो-चार दिनों रहने की भी याद है। जब कि विनोद के तो उन दिनों एक ही बार आने की याद है – जेठ की खड़ी दुपहरी में सायकल से। तब भी बहुत प्रगत (ऐडवाँस) ढंग से रहते विनोद – उस समय की भाषा में टीप-टॉप। ज्ञान व समझ भी अच्छी थी, जिसका सुपरिणाम है – आज की उनकी सही-सधी ज़िंदगी, उनकी वकालत, संयमित व्यावहारिक-सामाजिक जीवन। इसका प्रमाण यह कि गोसाईं की बाज़ार से गाँव के बीच एहतिहात वश जिन 7-8 लोगों से पूछा, सबने ‘विनोद’ पूछने पर – ‘अरे वही वक़ील साहब’? और विनोद वकील पूछने पर – ‘अरे वही तिवारीजी न’…की पूर्ण पहचान कराते हुए उन्हें बड़े आदर से याद किया तथा बड़े सलीके से रास्ता बताया…।

ख़ैर, प्रमोद से मिलते ही पता लगा कि हम विनोद के घर के सामने ही थे। तब तक विनोद भी घर से बाहर आ गये। प्रमोद खेती के किसी काम से निकले थे। उन्हें जाना था, तो तय हुआ कि पहले यहाँ चाय पीके हम वहीं पुराने घर जाके सबसे मिलते हैं। फिर लौट के यहीं दोपहर का खाना-वाना खायेंगे। वही हुआ और चाय पीते हुए ही विनोद के साथ हुए हिसाब में तय पाया गया – कि मैं 52 साल बाद आ रहा हूँ…।

लेकिन पुराने घर पहुँचें कि तब तक प्रमोद से सुनकर मेरे आने की बात पूरा घर जान गया था, जिससे ‘अचानक’ वाला भाव ख़त्म हो गया, तो बाक़ियों -ख़ासकर मेरी पीढ़ी के मुझसे बड़े गौरी व उमा भइया- के पहचानने की परीक्षा न हो पायी, तो मैं वंचित रह गया पहचनवाने के अपने चिर वांछित जिज्ञासु-सुख से…।

लेकिन कोई बात नहीं, क्योंकि जाते ही देख के अच्छा लगा कि उसी अपनी जगह पर पुराना घर गिराके सबके अलग-अलग नये घर बन गये हैं। सबसे पहले पड़ा राजदेव भइया (फ़ौज वाले) का घर और मिले उनके बड़े बेटे अशोक, जो तब मेरे सामने 5-6 साल के रहे होंगे। ज्यादा बातें उन लोगों की पढ़ाई, नौकरी-चाकरी…आदि को लेकर हुईं। वहीं प्रमोद भी आके शामिल हो गये, तो सबके घर चलने में साथ रहे…। अब लिखते हुए याद आ रहा कि प्रमोद के भाई विजय भी तब छोटे थे, जिनके बारे में में पूछ न सका। दूसरे नम्बर वाले घर पर गौरीशंकर भइया साक्षात मिले…। मेरे लिए उनकी सराहना कुछ ताज्जुब के साथ मुखर हुई – ‘सत्देव आज यह रूप में मिलला’!! इसका राज़ बाद में समझ में आया, जो शायद मेरे वेश (फ़्रेंच कट दाढ़ी व जींस के पैंट पर कुर्त्ते) में निहित था। और यह आश्चर्य तब के देखे किसी के लिए भी स्वाभाविक ही था, क्योंकि तब तो सादे कुर्ते-पाजामे या बुशर्ट-पाजामे में चुर्की (शिखा) वाले ‘सतदेव’ होते…। लेकिन धूप के लिए कंधे पर अँगोछा तो तब भी होता।  

हाँ, गौरी भइया की वैसी ही खूब सारी बातें सुनने मिलीं…। उनके पास बातों का कभी टोटा नहीं होता और वही लाजवाब अदा, लेकिन मेरे बारे में उन्होंने कुछ ख़ास व ज्यादा न पूछा, जिसकी मुझे अपेक्षा थी। शायद सुन चुके रहे हों विनोद…आदि से, क्योंकि मेरे लिखे-पढ़े की बानगी विनोद लेते रहते हैं और सबसे साझा भी करते रहते हैं। ऐस न भी हो, तो लिखने-पढ़ने की बातें न करना आज हमारे गँवईं समाज का स्थायी भाव हो गया है। वह कहावत अक्षरश: लागू हो रही है – ‘तीन चीज़ याद रही नून-तेल-लकड़ी’। इसी में पिले-पिजे हैं सभी। मज़ा आया देखके कि बेटे सहित गौरी भइया जम के यजमानी और खेती कर रहे हैं। इसका प्रमाण बना-दही के साथ गुड़ खाने को मिलना, जो गर्मी के लिए मुफ़ीद भी होता है और मुझे पसंद भी है। उनके बड़े बेटे राजेश ने बड़े सु-मन से उत्फुल्ल बातें करते हुए सब खिलाया-पिलाया और फिर बा-इजाज़त यजमानी के लिए निकल गये। उनका ‘राजेश’ नाम तो अब जाना, वरना तब मैं ‘गया’ नाम को ही असली नाम समझता था, जो असल में गया (बिहार का तीर्थ) में पैदा होने के कारण पड़ गया था। तब दो-तीन साल के इस बड़े दुलरुए बालक की किसी आयोजन में सफ़ेद कुर्त्ते-पाजामे में लोट-पोट करते हुए जो प्यारी-सी छबि मेरे मन में थी, वह इस गबरू जवान को देखकर गड्ड-मड्ड हो गयी। पर बेहद दुनियादार राजेश बड़ा भला लगा।

हरदीस से मिलना बड़े दिनों से लगी भूख की तृप्ति जैसा महसूस हुआ। यही सर्वाधिक आते-जाते थे मेरे यहाँ। अन्य नातेदारियों में भी इनसे बार-बार भेंट हो ज़ाया करती थी। हरदीसजी मेरी बड़ी बहन के घर भी आते-जाते थे। इनकी शादी भी मेरे गाँव के पास ही करायी थी मेरे बड़के बाबू ने ही। इनके ससुर मेरे स्वर्गीय पिता के सहपाठी हुआ करते थे, इसलिए वे मेरे ‘भागीरथी काका’ थे। भागीरथी काका के भी मेरे ख़्याल में 5-6 बेटियाँ ही थीं और हरदीसजी के भी बेटे न होकर 5-6 बेटियाँ ही हैं, जिसका मुझे पता था। इनमें से एक को उन्होंने अपने यहाँ बसा दिया है, जो हमारे यहाँ की वाजिब रवायत (चलन) है। उन्हें स्वस्थ-सुखी देखना  विशेष सुखकारक रहा। बस, कान से न सुनायी देने के कारण पहले जैसी बतकही न हो पायी, वरना आधुनिक-शहरी असर से मुक्त यही खाँटी गंवई आदमी बचे हैं।

सबसे अंत में उमाशंकर भइया के घर पहुँचे। हैं तो मन-मस्तिष्क से ये भी विशुद्ध गँवई, पर बाहर से लगते नहीं। जैसा कि कहा गया – यही कहीं बाहर नहीं गये। तो उन दिनों हमेशा घर पे मिलते – तकनीकी अर्थ में यही आतिथेय (होस्ट) होते…ख़ातिरदारी में बड़े तत्पर। इस पीढ़ी के लोगों में हरदीस के अलावा इन्हीं की शादी में मैं बारात में गया था – खुटौली शादी हुई, जो तब साधनों के अभाव में बड़ा दूर लगा था, लेकिन मज़ा भी खूब आया था। उसी शादी में मेरे बड़के बाबू, जो इस घर के सदस्य की तरह और सबके सफ़रमैना हुआ करते थे, के सर पे साफा बांध के, दूल्हे की तरह सजा के ‘व्याह में व्याह’ का स्वाँग खेला गया था…। मेरे खेलवाड़ी बाबूजी ने भी मज़ा लेते हुए जिस तरह सहर्ष खेलने दिया था कि मुझे तब भी रसखान याद आये थे, अब भी आ रहे – ‘मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी…….

                              भावतो तोहिं कहा ‘रसखानि’ सो तेरे कहे सब स्वाँग भरौंगी’

इसी उमा भइया के साथ उन दिनों सर्वाधिक बातें हुई थीं और यही सबसे कम बोलते थे – आज भी बहुत कम बोले। लेकिन सम्प्रेषण (कहने-सुनने) की फ़ितरत देखिए कि मैं इन्हीं को ज्यादा सुन सका – जबकि बोले ज्यादा गौरी भाई…। बक़ौल ग़ालिब –

‘देखिए तक़रीर की लज्जत कि जो उसने कहा, मैंने ये समझा कि गोया वो भी मेरे दिल में है’

लिहाज़ा इसी प्रक्रिया में जान पाया कि एकाधिक बेटियों में से अंतिम की शादी इसी जुलाई में होने वाली है। बेटा एक ही है, जो अच्छी नौकरी में सपरिवार जौनपुर रहता है। माता-पिता व घर की सारी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाता है, पर उमा भइया की अपेक्षा कुछ ज़्यादा रहती है-पीढ़ी के अंतराल का यह मज़ेदार भेद भी सनातन है…।

और इस तरह अजिअउरे के पुश्तैनी घर की परिक्रमा पूरी हुई। अब पुन: चलें उपसंहार के लिए भी इस यात्रा के उपक्रम-विनोद के आवास पर…

वहाँ पहुँचकर इस सुखद संयोग का पता चला कि उसी दिन विनोद की शादी की 50वीं सालगिरह थी। तो सोने में सुहागा ही हो गया। सपरिवार उनके साथ जलपान-भोजन-फ़ोटो…आदि हुए। विनोद के पोते-पोती समेत तीन पीढ़ियाँ और उम्र उतनी ज़्यादा न सही, रिश्ते के अनुसार मुझे वरिष्ठ पीढ़ी के रूप में जोड़ लिया जाये, तो चार पीढ़ियों का फ़ोटो देखकर मैं तो कृतार्थ हो गया…। पूरे परिवार ने पाँव छूके असीस लिये, तो मन भर-भर आया…। कभी इसी घर में सबके पाँव छूते हुए मैं प्रविष्ट होता रहा, आज सिर्फ़ हरदीस-गौरी-उमा के सिवा सब मेरे पाँव छू रहे हैं…। हम बड़े होते नहीं, लोग हमें अपने सश्रद्ध भावों से बड़ा बना देते हैं…। यह अपनी संस्कृति का मूल मंत्र ही है कि आधी सदी से भूली-बिसरी दुनिया महज़ कुछ घंटों में फिर से यूँ जीवंत हो गयी-गोया कभी अंतराल हुआ ही न हो… एक अविस्मरणीय अनुभूति…!!

लेकिन मेरे लिए सबसे प्रिय प्रसंग अभी आया नहीं… शुरू तो हो गया था जब मैं पहली बार यहाँ चाय के लिए रुका था, लेकिन लिखते हुए उसे मैंने इस अंतिम सोपान के लिए बचा रखा था। और वह है विनोद के दोनो बेटों-विनीत-विवेक (तीनो में ‘वि’ का प्रास देखिए) से भेंट और थोड़ी ही देर में विनोद का मुझसे कहना – ‘मेरा बेटा आपसे कुछ बात करना चाहता है…’। सुन के मेरा तो वही हाल हुआ कि अंधे को क्या चाहिए-दो आँखें। एक बेटा बात करना चाहता है-तो एक आँख ही सही। और जब आके उसने मेरे बारे में जानने की बात की, तब तो क्या कहने – ‘आँखों का तारा’ ही हो गया। मामूली-सा लिखने-पढ़ने वाला मैं – और वह भी हिंदी का, जिसे अपने घर-खानदान-पड़ोस के बच्चे घास नहीं डालते…तो कौन न बलि-बलि जायेगा!! और जब बच्चे से यह पता लगा कि रू-ब-रू (फ़ेसबुक) और ‘क्या हाल है’ (व्हाअट्सअप) की मेरी टिप्पणियों एवं प्रकाशित लेखों को विनोद के ज़रिए देख-देख के तथा उनसे ही मेरी जीवन-यात्रा थोड़ी-बहुत सुन-सुन कर बच्चा मुझसे बात करना चाह रहा है, तब तो मेरे मन ने यही कहा – ‘हाय अल्ला, ऐसे युवा भी इस युग में पाये जाते हैं’!! ख़ानदान के बच्चों को तो बचपन से चाकलेट-टाफी खिला-खिला के कविताओं से परकाया, तब सिर्फ़ दो पोतियाँ (शिखा-चुनचुन) ही कुछ निकलीं…! ऐसे में यह बालक तो एकलव्य ही सिद्ध हुआ। यह और अच्छा लगा कि उसे इस क्षेत्र में कैरियर नहीं बनाना है, सिर्फ़ रुचि के लिए जानना-सुनना है – याने कला कला के लिए, तब तो गोया ‘फलमिच्छुदंडे’ (गन्ने में फल ही लग गये हों) ही सिद्ध हुआ। ख़ैर, यह बातचीत दो टुकड़ों में हुई – थोड़ी उस घर जाने के पहले और ज्यादा अब खाने के दौरान व बाद…। और सुखद है कि इतनी बातों के बाद भी बच्चे की उत्सुकता अभी बरकरार है…तो अगले आगमनों में जारी रहने की सम्भावना व आश्वस्ति के साथ रवाना हुआ…।

अभी जां था वहाँ से 5 किमी. आगे एक और बड़ी पुरानी रिश्तेदारी वाले गाँव ‘गौरा’ (मेंहनगर के पास) के लिए। वहाँ से दिवंगत बड़े भाई हरिशंकर तिवारी, जो बीसवीं शताब्दी में साठोत्तर काल के महत्त्वपूर्ण कवि-रचनाकार रहे, की रचनाओं को लेना था, जिसे मुम्बई-निवासी उनके सगे छोटे भाई प्रो. प्रेमशंकर तिवारी मेरी मदद से सम्पादित करके छपाना चाह रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य के कारणों से आ नहीं सकते…।        

भूपालपुर जाते हुए लम्बे अंतराल के बाद का असमंजस था, चिंता थी, कुतूहल था… अब लौटते हुए परम संतोष है, शांति है, अपार प्रसन्नता है। सुना हुआ याद था – ‘बिछड़े हुए मिलेंगे फिर, क़िस्मत ने ग़र मिला दिया…’ आज सच हो गया। खोते-बिसरते हुए एक अदद घर-संसार के पुनरुज्जीवित होने के परितोष से मन तृप्त था। सुखद स्मृतियों को जीने की आनंदानुभूति के साथ उत्फुल्ल होता-होता कब गौरा आ गया, पता ही न चला…!!

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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