पुस्तक समीक्षा

स्त्री जीवन का दस्तावेज़-बेहटा कलाँ

 

बेहटा कलाँ, बैसवाड़ा उत्तर प्रदेश का एक गाँव। इस गांव की बेटी अन्नु के माध्यम से देश ही नहीं विश्व की समस्त कर्मठ, स्नेहशील परिवारिक स्त्रियों के संघर्ष और व्यथा की जीवन गाथा को लेखिका इंदु सिंह ने बड़ी आत्मीयता के साथ इस उपन्यास में उतारा है।

इस उपन्यास के बारे में लमही संपादक विजय राय का कहना है कि -“स्त्री शोषण पूरे विश्व में लगभग प्रत्येक समाज में अबाध और समान रूप से प्रचलित है”।

एक स्त्री का जीवन कितना संघर्षपूर्ण होता है उसके विभिन्न पहलू हमें मार्मिक रूप में दिखाई पड़ते है, मानों हमारे आस पास की कहानी हो।

एक अबोध बालिका की तरह अन्नु भी अपने पिता के घर में बहुत खुश रहती है। गाना सुनना और फिल्में देखना उसे बेहद पसंद था। वह एक पंक्षी की तरह खुले आकाश में उड़ा करती थी। अन्नु और उसके पिता के बहुत सपने हैं। अन्नु एक दिन डॉक्टर बनेगी किन्तु अन्नु कि माँ चाहती है कि अन्नु कि शादी जल्द से जल्द हो जाए और यह चिंता उन्हें दिन पर दिन खाये जा रही है। वह अन्नु को अपने पास गाँव में रखना चाहती थी, ताकि अन्नु पढ़ाई के बजाए घर के काम- काज सीख ले। उनका मानना है कि “बेटियों की पढ़ाई का क्या काम? उन्हें तो घर के काम- काज आने चाहिए। घर पढ़ाई –लिखाई से नहीं बल्कि गृहस्थी की पूरी जानकारी से चलते हैं”। यह मानसिकता केवल उसकी माँ की नहीं बल्कि समाज के बड़े तबके की है।यही वजह है कि अन्नु के ससुर भी अपनी पोती मंगला की पढ़ाई भी नहीं कराना चाहते थे। आज भी हम इसी जकड़न के शिकार हैं।

लड़कियों को सिर्फ उतना ही पढ़ाया जाता है, जिससे उसकी अच्छे घर में शादी हो सके न की अपने पैरों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भर बन सके।

अन्नु अपने पिता की तरह ही सोचती थी। वह चाहती थी कि उसकी बेटी पढ़े इसके लिए वह अपने पति से पहली बार जिद्द करती है और सफल भी होती है।वह खुश होती है कि अपनी बेटी को उच्चतर शिक्षा दिला पाई,किन्तु अन्नु के समय उसके पिता को भी अन्नु की माँ और समाज के इस नियम के आगे झुकना पड़ा और अंततः उन्होंने अन्नु की शादी तय कर दी। कोई माँ यह नहीं चाहती कि उसकी बेटी दूसरे के घर जाए। वह भी डरती है किन्तु समाज की व्यवस्था के सामने वह भी मजबूर हो जाती है। शादी के बाद अन्नु ने जब पहली बार अपने ससुराल में कदम रखा तो उसे महसूस हुआ कि “अचानक ही आकाश में उड़ रहे किसी पक्षी को जमीन पर गिरा दिया जाये। अन्नु को समझ नहीं आ रहा था कि अब उसे उड़ने के लिये खुला आकाश मिलेगा या घर के आँगन भर आकाश को देखकर ही जीवन बिताना होगा”। ससुराल के रास्ते अन्नु अपनी माँ की दी हुई सीख को याद करती रही कि “चाहे कुछ भी हो जाये मायके का नाम खराब मत करना। सब बड़ों का सम्मान करना। सारे काम करना और चाहे कोई कुछ भी कहे बर्दाश्त करना ,पलट कर कभी भी जवाब मत देना”। कैसी विडम्बना है कि बेटियों को सीख दी जाती है क्योंकि परिवार को एकजुट रखने कि ज़िम्मेदारी उनके ऊपर है,पर ये बात कोई माँ अपनी बेटी को नहीं सिखाती कि किस बात को किस हद तक बर्दाश्त करना चाहिए! इसी सीख की वजह से बेटियाँ खुद को भूल कर अपना सारा जीवन दूसरों के लिए झोंक देती है।“अन्नु समझदार थी और उसने मन ही मन यह निश्चय किया था कि चाहे कुछ भी हो जाये उसकी वजह से कभी भी उसके बाबू और अम्मा का सिर नहीं झुकेगा”।कल तक जो सिर्फ अन्नु थी,शादी के बाद ही अन्नु के साथ कई रिश्तें जुड़ जातें है। इन रिश्तों का मान भी उसे रखना होता है।

  “जिम्मेदारियों के साथ अन्नु बचपन में ही जवान और जवानी में ही बूढ़ी हो चली थी”। उसने अपने सारे शौक छोड़ दिये थे। यहाँ तक की हँसने –बोलने पर भी रोक लगा गई था। जिज्जी ने अन्नु से कहा कि “एक बात का ख्याल रखो कि किसी भी तरह से नयी बहू के हँसने –बोलने की आवाज़ कमरे के बाहर नहीं आनी चाहिए”। उसे आश्चर्य होता है कि- “हँसना–बोलना क्या इतनी बड़ी सजा होती है?पर बेटियों और बहुओं के लिए अलग क्यों होता है”? समाज के इस सोच पर हैरान हुआ जा सकता है क्योंकि जो माँ अपनी बेटी के लिए ससुराल में खुशियों की कामना करती है,वही अपनी बहू के लिए उतनी ही निर्मम सोच रखती है।अन्नु ने अपने माता-पिता का ख्याल करते हुए हँसना भी छोड़ दिया। अन्नु का अपनी तरह से जीवन जीने हक भी नहीं था कदम कदम पर उसे सीख दी जाने लगी यहाँ तक की कैलाश ने भी उससे कहा कि “बस अम्मा और जिज्जी को पलट कर जवाब मत देना। सभी की हां में हां मिल देना”। हमारा समाज बेटियों को पराया धन ही मानता है और यह समझता है की जितनी जल्दी उनकी शादी निपट जाए उतना अच्छा है। उसके बाद उसकी अपनी किस्मत है। अन्नु इसका एक उदाहरण है सबको लगता था की अन्नु अपने ससुराल में बहुत अच्छे से है पर यह तो अन्नु ही जानती थी की वह कैसी है! जिसने आराम से रहना ही नहीं जाना। सोते- उठते ससुराल वालों की सेवा की चिंता करती रही। जब उसे एकांत मिला तो भरपूर जी भी नहीं सकी क्योंकि उसकी इच्छाएं मर गई थी। जैसे “जब भूख लगने पर खाना न मिले और भूख के पूरी तरह खत्म हो जाने पर कोई थाली परोस कर रख दे तो उस थाली का कोई मोल नहीं रह जाता है। अन्नु ससुराल वालों की छोटी -छोटी चीजों का ख्याल रखते-रखते अंत में स्मृति लोप का शिकार होती है। अन्नु की यह दशा देख कर राघव कहता है कि मम्मी की इस दशा का भान हम परिवारवालों में से किसी को नहीं हुआ ?दरअसल हम इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि अपनी माँ का ध्यान भी नहीं रख पाते। जिसने अपना सारा जीवन हमें बेहतर करने में लगा दिया।

     एक स्त्री की संघर्ष गाथा से बढ़कर यह एक भले मनुष्य की गाथा है क्योंकि जितना संघर्ष अन्नु का है कमोबेश कैलाश का भी है “अन्नु और कैलाश स्वंय को भूल कर अपनी जिम्मेदारियों को निभाते रहे”।

इन्दु सिंह ने बेहटा कलाँ उपन्यास के माध्यम से संयुक्त परिवार की अच्छी शिनाख्त की है। लेखिका ने भावना और तर्क के सहारे एक स्त्री के जीवन के सारे पहलू हमारे सामने प्रस्तुत किया है जिसका मूल उद्देश्य यही है कि हम इस रचना से सीखें कि एक स्त्री का जीवन हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है और हम उसे एक सिरे से नजरन्दाज करते चले जाते हैं।हमारी सारी जरूरतों को याद रखने वाली स्त्री एक दिन खुद सब भूलने लगती है और हम कुछ नहीं कर पाते हैं तब हमें महसूस होता है कि हमने उनके लिए क्या किया और क्या नहीं?

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पूजा पाठक

लेखिका आसनसोल गर्ल्स कांलेज में प्राध्यापिका (SACT) हैं। सम्पर्क pujapathak018@gmail.com
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Indu Singh
Indu Singh
11 months ago

उपन्यास बेहटा कलाँ की बहुत ही सारगर्भित समीक्षा।

पूजा पाठक
पूजा पाठक
Reply to  Indu Singh
9 months ago

जी धन्यवाद दी ।

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