प्रो. दयाराम पांडेय: साँवरिया ज्ञानी गुरु से इकली लाश तक…!

प्रो. दयाराम पांडेय मशहूर थे – डी.आर. पांडे नाम से…फिर बोलने में ‘डी.आर. सर’ कहा जाता था, जिनके पहले दर्शन हमें बी.ए. की कक्षा में ही हुए…और याद है कि एक सप्ताह के इंतज़ार के बाद…। बी.ए. के पहले साल में ग़ुरु नानक खालसा कॉलेज, मुम्बई के पाँच अध्यापकों में दो के दो-दो और दो के तीन-तीन व्याख्यान प्रति सप्ताह होते थे। बस, एक श्रीमती अंतर्ध्यान कौर सदाना थीं, जिनका एक ही व्याख्यान होता था। और इस विधान में पांडेयजी के बुध और शनि को 8.15 से 9 बजे के दो व्याख्यान समय-सारिणी में बोर्ड पर लगे थे। पर वे ही ऐसे निकले, जो पहले सप्ताह की दोनो कक्षाओँ में नहीं आये, तो मन में थोड़ा आक्रोश भी था और उत्सुकता तो अपने चरम पर आ गयी थी। फिर अगले बुधवार को 5 मिनट – याने 8.20 तक देख के हम जाने ही वाले थे कि किसी ने कहा – दस-पाँच मिनट और देख लो…शायद आ रहे हों…। याने उनकी लेट-लतीफ़ी सरनाम थी। और सचमुच पूरे दो सालों में वे शायद ही कभी समय पर आये हों…बल्कि दो-एक अपवाद शायद छोड़ दें, तो कभी समय पर नहीं आये थे – यही सच है। कभी-कभार तो ऐसा हुआ कि हम सवा आठ के बदले पौने नौ बजे तक इंतज़ार करके जा रहे होते…और वे सीढ़ियाँ चढ़ते दिख जाते, तो हम लौट आते…।
आप कहेंगे कि फिर ऐसे आदमी पर संस्मरण क्यों? तो इसलिए कि उनकी बात कक्षा में आने के बाद शुरू होती – फिर उनके सामने तो क्या, आसपास भी कोई न होता फटकने वाला मीलों तक!! वे कक्षा में पहुँच जाते, तो सारे नुक़सान की भरपाई हो जाती – चक्रवृद्धि ब्याज-सूद समेत। तब वे न एक मिनट कुर्सी पर बैठते, न एक मिनट एक जगह खड़े होते…बल्कि निरंतर गतिशील रहते – और चहलक़दमी नहीं, बोलने के आवेग में पूरे वेग से घूमते-चलते…और उसी त्वरा में हाथ भी चहुं ओर (आगे-ऊपर, दाएँ-बाएँ) चलते रहते, जिसे विभागाध्यक्ष महोदय अपनी कुंठा में ‘चकती-बान चलाना’ कहते…। उसी रौ में गरदन भी ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ व गोलाई में भी घूमती रहती तथा उसमें बंधी टाई भी इधर से उधर लहराती-तड़फड़ाती रहती…। अपनी गतिशीलता में सबसे अधिक खुलती-फ़ैलती-बंद होती रहतीं मध्यम आकार की तेज आँखे, जो तरह-तरह के भाव व्यक्त करती हुई सदा मुखर रहतीं। सिकुड़ती-चढ़ती भौहें…बल खाते हुए लकीरें बनाता-बिगाड़ता ललाट…याने ज़ुबान के साथ बोलता हर अंग…। लेकिन स्वयं उन्हें न समय का भान रहता, न अपनी परवाह – नौ के साढ़े नौ तो रोज़ बज ही जाते…। इसके बाद उसी कक्षा में दिन पाली (डे शिफ़्ट) के बच्चे आ जाते, वरना और भी चलता ही। फिर भी कभी-कभी दस भी बज ही जाते…। फिर भी सब लोग सहर्ष बैठते – नौकरी पर लेट जाने का जोखम उठाकर भी। मैंने तो अपनी ‘अहर्निशम् सेवामहे’ वाली डाक सेवा का लाभ उठाते हुए आवेदन करके अपराह्न तीन बजे से रात के साढ़े दस बजे के सेवा-समय का स्थाई बंदोबस्त करा लिया था – पर इनके व्याख्यान के लिए ही नहीं, वरन 9 बजे से दो बजे तक पुस्तकालय में बैठ के पढ़ने के लिए, क्योंकि पढ़ने का न कोई दूसरा समय मिलता था, न मेरे पास कोई जगह थी…।
तो उस दिन पहली बार वे साढ़े आठ बजे कक्षा में प्रकट हों…, उसके पहले बरामदे में बड़ी स्टाइल में भागते हुए आते-दिखे…, तो दूसरे साल वाले छात्र चीख पड़े…पांडेयजी। बाद में पता लगा कि पहले एनसीसी में प्रशिक्षक रह चुके थे, जिसकी देन थी – भागते हुए चलने की यह शैली, जिसमें उनके दोनो हाथ बड़े ज़ोर से आगे-पीछे हो रहे थे और खट-खट बूट की आवाज सुबह की शांति में पूरी मंज़िल को गुंजा रही थी…। इस तरह जब कक्षा में नुमायाँ हुए और ठीक सामने दिखे, तो मुझ पर गोया बिजली गिरी – ‘हाय राम इतने काले’…!! लेकिन तब तक तो वे कुर्सी पर बड़ी अदा से बैठ चुके थे…।
फिर तो छात्रत्व की मर्यादा में जो नीचे से देखना शुरू हुआ…, तो मोज़े के ऊपर काले बूट पर तत्कालीन चलन के अनुसार पतली मोंहड़ी (नैरो बॉटम) का बेल्ट लगा श्यामवर्णी (डार्क शेड) पैंट…और उसमें अंदर (इन) किया हुआ कड़क इस्त्री वाला उजला-शफ़्फ़ाक पूरी बाँह का शर्ट…। थोड़े-से बाहर निकलते-से पेट को संतुलित करता पर्याप्त प्रशस्त सीना तो था ही, कुछ और रंग़-रोगन चढ़ा देती थी – दाएँ-बाएँ झूलती चटक बहुरंगी (मल्टीकलर) टाई, जिसमें कुछ-कुछ दबी-सी गरदन पर जड़ी मुखाकृति में सानुपातिक व सही-सुती नासिका के नीचे सफ़ाचट मूँछ और उसके ठीक नीचे क़ुदरतन काले ओठों पर पान खा के चुकने से पड़ी ललाई की गुलाबी हो गयी छाप। चहरे पर सबसे चौकन्नी व भेदती-सी मध्यम आकार की आखें…मज़े के प्रशस्त ललाट के ऊपर हल्के तेल के साथ करीने से संवरे क्या जड़े-से बड़े-बड़े बाल…। और इन सबमें उनका काला रंग़ भी दमकने लगता…। कुल मिलाकर इस सबसे बनते स्वरूप की अपनी विरलता में वे इतने आकर्षक भी लगे कि एक बार नज़र पड़े, तो ‘तुलसी तिन ते मन फेरि न पाये’ बेशक न हो, लेकिन कोई भी एक मिनट ठहर के देखने पर तो विवश ज़रूर हो जाये…। यही उनकी सजी-सजायी सनातन धज एवं अपनी विकसित की हुई अदा थी…जो अपने अंदाज में छा जाती…।
कुल मिलाकर बड़े सुदर्शन ही नहीं, बल्कि आकर्षक भी लगे थे पांडेयजी…और फिर ऐसे ही हमेशा लगते रहे…जब तक साथ रहे…। मजाल क्या कि कोई उन्हें बिना टाई के कभी कॉलेज में देख ले या पूरी बाँह की सफ़ेद शर्ट के अलावा किसी पहनावे में देख ले…!! जाड़े के दिनों में इसी पर सफ़ेद या हल्के सफ़ेद (ऑफ़ व्हाइट) रंग़ का कोट डाल लेते…। इस सज-धज भरे व्यक्तित्व पर एक पंक्तीय टिप्पणी मैंने फ़िशपॉंड के रूप में बी.ए. पास हुए बैच के विदाई-समारोह में यूँ दी थी – ‘सुंदर हैं इतने कितने भँवरों के कुटुम्ब ख़राब किये हैं’। और उन्होंने खुद इसके खूब मज़े लिये थे…इन मामलों में काफ़ी खुले व ख़ुशमिज़ाज थे…। प्रसंगत: याद आ रहा कि विभागाध्यक्ष के लिए मारे आक्रोश में मैने ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ का फ़िशपॉंड दे दिया था, जिस पर तीन महीने उन्होंने मुझसे बात न की थी। वैसे छात्रत्व की सीमा पार की बेवक़ूफ़ी में अति कड़वा हो भी गया था और इस पंक्ति के रचयिता पंतजी को पढ़ाते थे पांडेयजी, जिसने अध्यक्ष महोदय की क्रोधाग्नि में घी का काम किया था। ख़ैर,
लेकिन लोगों ने बताया कि अपनी सेवा के अंतिम दिनों में वे सफ़ारी पहनने लगे थे…, पर वह भी पूरा सफ़ेद ही। सफ़ारी का फ़ैशन तब भी था, जब हम थे – कभी कभार हम बहुत से प्रोफ़ेसरों को अलग अलग रंगों की सफ़ारी में देखते थे – अपने अध्यक्ष महोदय एवं टी. एन. राय को भी, लेकिन तब किसी को भी सफ़ेद सफ़ारी में नहीं देखा था और तब तक पांडेयजी ने अपना बानक नहीं बदला था….।
अब चलें कक्षा में और बैठ जाने दें पांडेयजी को…और बैठते ही ‘हृदय न हरष-विषाद कछु’ वाले सहज-सामान्य भाव से फूटी पहली वाणी – मैं दयाराम पांडेय हूँ, आपको इस साल मैथिली शरण गुप्त लिखित ‘यशोधरा’ काव्य और सुमित्रा नंदन पंत की बच्चनजी द्वारा चयनित-संकलन की कविताएँ पढ़ाने के साथ ही कमलेश्वर की श्रेष्ठ कहानियाँ भी पढ़ाऊँगा। आज शुरुआत यशोधरा से करेंगे…। फिर ज़रा सा मुस्कुराए… मुस्कान बड़ी प्यारी-सी लगी, अपनत्व से भरी हुई। साथ में सुन पड़ा – ‘आप लोग भी ज्यादा नहीं हैं, तो बस, अपने नाम और कहाँ से इंटर पास करके आये हैं, बता दें – फिर पढ़ाई शुरू हो’…। इस तरह अपना परिचय देने के बाद हमारा परिचय पूछना भी मुझे वाजिब लगा और भा गया। उन्होंने पीछे की तरफ़ हाथ से इशारा किया…और एक-एक कर सबने बताया – वे सुनते रहे…। मैं आगे बैठा था, तो मेरा नम्बर अंत में आया। नाम सुन के बोले – यहाँ सत्यदेव त्रिपाठी नाम के एक छात्र पहले भी आ चुके हैं – पढ़ने में मेधावी व स्वभाव से शालीन… अच्छे छात्र थे। तो, परम्परा क़ायम रहनी चाहिए…! मैंने कहा – जी मैं उन्हें जानता हूँ। बी.एल.रुइया विद्यालय में पढ़ाते हैं और मेरे बड़े भाई के मित्रों में हैं। उन्होंने ही मुझे यहाँ आने का सुझाव दिया और अध्यक्ष गुरुजी के घर ले गये थे मिलाने। इस पर उनकी सहज टिप्पणी – ‘फिर तो अच्छी बात है – उनके सम्पर्क में रहिएगा….’।
ध्यातव्य है कि अब तक शेष सभी चारो शिक्षकों की कक्षाएँ हो चुकी थीं – ऐसा परिचय लेना किसी ने नहीं किया था। विभागाध्यक्ष डॉ पारसनाथ मिश्र और कभी उनके शिष्य रहे और अब सहकर्मी होकर विभागीय कार्यों में उनके परम सहायक (कर्त्ता-धर्त्ता) डॉ. टी.एन. राय तो प्रवेश-प्रक्रिया में शामिल ही थे, तो सबको जान गये थे, लिहाज़ा परिचय देने-लेने की ज़रूरत ही न थी। सदाना मैडम को कक्षा में आके नोट्स देने के सिवा कोई मतलब ही न था, तो परिचय क्या लेते-देते!! विभागीय वरिष्ठता-क्रम में नंबर दो पर स्थित डॉ श्रीधर मिश्र भी पढ़ाने में सदानाजी के ही बँवार (बाएँ चलने वाले) थे – सदियों पुराना एक नोटबुक लेकर आते…और अपनी इस कमी को ढँकने के लिए ग़ुरु-गम्भीरता का घटाटोप पहने रहते थे। कक्षा में क्या बोलते थे, हम कभी न समझ पाये – खुद पता नहीं समझते थे या नहीं!! विभागाध्यक्ष का हाल भी इसी तरह का था, जिनके ‘दिव्या’ पढ़ाने को लेकर सिमरजीत नाम की छात्रा ने कहा था – गुरुजी क्या समझते हैं हमें – बी.ए. की कक्षा में श्वेत का मतलब सफ़ेद बताते हैं…।
ले-देके रह गये पांडेयजी, जिनकी लेट-लतीफ़ी का न ही सबको सिर्फ़ पता था, बल्कि विभाग स्वयं इनकी कक्षा का ध्यान रखता था – शायद उनकी ज्ञान-सम्पदा और बहुत अच्छे शिक्षण के चलते, जिसे कहता कोई न था – जानते सब थे। इसीलिए उन्हें सुबह के पहले-दूसरे क्लास दिये ही नहीं जाते थे। उनके दोनो ही व्याख्यान अंतिम होते थे, ताकि शायद समय पर आ सकें। और नज़दीक रहने के कारण ही डॉ टी.एन.राय के दोनो ही व्याख्यान साढ़े छह बजे वाली पहली ही कक्षा में होते और वे सदा ही प्रायः समय पर आते। फिर बाद में जब पांडेयजी से मेरे बड़े अच्छे सम्बंध हो गये और दूर (विक्रोली) होने के बावजूद मैं प्रायः उनके घर जाने लगा, तो पता लगा कि ऐसा कोई काम व कारण भी नहीं है देर से आने का…। यह भी नहीं कि बड़ा पढ़ते-वढ़ते हों…!! बस, आदतन खाते-पीते-सोते-उठते-बैठते और पान लगाते-खाते…परिवार से गप्पें मारते…आदि में अनायास ऐसी लत ही लग गयी थी कि लेट हो ही जाते…!! विभागाध्यक्ष उन्हें सामंती वृत्ति वाला (विलासी) कहते। मैंने उनके न पढ़ने -ख़ास कर न लिखने- को लेकर कभी पूछा था, तो व्यंग्य में बोले थे – यहाँ की जमात के बीच रहने लायक़ बनने के लिए मैं तो पहले का पढ़ा ही भुलवाने पर लगा हूँ सत्यदेव…, जो सच भी था। इसी तरह उनके बहुत पान खाने पर पूछा था – इतना ज़हर क्यों खाते हैं? वे पान तो कक्षा के सिवा हरदम खाते ही थे। उन्हें इस रूप में जाना भी जाता था – ‘अरे वही पांडेयजी, जो टाई पहनते हैं और बहुत पान खाते हैं!! लेकिन यह हम जैसे कम ही लोग जान पाते कि पान में 120 व 32 नम्बर की दोनो जर्दाएँ ख़ासी मात्रा में डलवाते। किंग्सर्कल पर उडिपी रेस्टोरेंट की बग़ल में सड़क पर एक उनका ख़ास पान वाला था, जो जर्दे की उनकी मात्रा जानता था, वरना बाक़ियों को तो तीन-तीन बार ‘और-और’ कहके डलवाना पड़ता था। हाँ, उस बंदे का पान लगाना भी एक साधना की तरह था। पान पर चूना-कत्था-तम्बाकू रखकर वह अंगूठे-अनामिका से ऐसे फेटता, जैसे कोई देव जगा रहा हो…उँगलियों के साथ उसका पूरा बदन झूमता …। ख़ैर, ज़हर वाले प्रश्न पर उनका जवाब घोर साहित्यिक था – ‘विषस्य विषमौषधम्’ सुना है न? मेरे अंदर दुनिया ने इतना ज़हर भरा है कि उसके शमन के लिए यह बाहरी ज़हर ज़रूरी है’।
वह ज़हर क्या है? दयाराम पांडेय इतने लेट-लतीफ़ क्यों हुए होंगे? नौकरी जितना पढ़ने के अलावा क्यों पढ़ना-लिखना छोड़ दिया? विभाग की किसी गतिविधि में क्यों तटस्थ भाव से रहने भर के लिए रहते…? मीटिंग में कुछ क्यों नहीं बोलते – जबकि सबसे अच्छा बोल व कर भी सकते थे?…आदि-आदि!!
तो वे ऐसे थे नहीं – बस, हो गये – बल्कि बनाये गये…। वही घटना उनके जीवन की कुंजी है – ‘मास्टर की’, जिसने असली दयाराम पांडेय को बदल दिया। घटना मुख़्तसर में यह है कि नियुक्ति के बाद सत्ताबरदार ने अपनी पीएच.ड़ी की थीसिस के ‘प्रेत-लेखन’ (घोस्ट राइटिंग) के लिए इनसे भी कहा और इनके बाद विभाग में आने वाले से भी कहा…। मामला पढ़ाई-लिखाई जैसे सम्मानित काम का था। सो, पांडेयजी की जहनियत को यह भ्रष्टता मंज़ूर न हुई। उन्होंने अपने बनारसी तेवर में इनकार कर दिया। लेकिन भूल गये – उन्हें अंदाज़ा न था कि यह इनकार उनकी नौकरी ले लेगा। उधर से सेवा को स्थायी करने के लिए यही अनलिखी शर्त लगा दी गयी। इन्होंने तब भी नहीं माना…। तो अंततः नकारात्मक आख्या (रिपोर्ट) लगा के सेवा ख़त्म करा दी गयी। दुर्दैव से कहीं काम न मिला। संयोग से परिवार ला चुके थे। सो, बेरोज़गारी की समस्या इतनी वीहड़ हो गयी कि आख़िर जाके शरणागत होना पड़ा। सेवा में फिर लिये गये, पर अपने कनिष्ठ (जूनियर) सहकर्मी से कनिष्ठ हो गये। वे कनिष्ठ वाले अध्यापक काफ़ी बचपन से मुम्बई रह रहे थे। ख़ासे जरूरतमंद के साथ दब्बू भी थे। सो, प्रेत-लेखन की बात मान गये थे। लिहाज़ा उनकी सेवाएँ बदस्तूर जारी रहीं। उन्हें व्याहारिक (प्रैक्टिकल) कहा गया। आख़िर काम दोनो ने मिलकर ही किया। इन दोनो बातों को पांडेयजी जीवन भर पचा न सके। खंडित-काल (ब्रेक पीरियड) दो-तीन दिनों का ही था, जिसे निरस्त करने के लिए पांडेयजी ने कॉलेज से कोर्ट तक मामला उठाया – उन दिनों हम पढ़ने आ गये थे, लेकिन व्योरा जान-समझ पाये बाद में। सारांश यह कि कहीं से बात बनी नहीं। इस घटना ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। वे मात्र अध्यापक का पुतला बन के काम करते। कक्षा में आ जाने पर तो रोक न पाते अपने को – खाँटी साहित्यिक थे, लेकिन कक्षा के बाहर जितनी लंतरानियाँ हो सकती थीं, सब करते थे – यही अपने दमन की उनकी प्रतिक्रिया थी। और अपनी करतूत के ही चलते विभागाध्यक्ष इनकी सारी लंतरानियों को चला लेते…। लेकिन इतनी मोटी चमड़ी वाले (थिक स्किंड) थे कि किसी भी तरह के अपराध-बोध से परे थे। प्राध्यापकों की सूचियों, सूचना पत्रकों में पांडेयजी का नाम तीसरे नंबर पर होता, पर दस्तावेज़ों में चौथे पर था।
मेरी समझ में न यह बात आयी, न उनकी दुखती रग को छेड़ना उचित लगा कि जब विरोध किया, तो चंद दिनों में समझौता क्यों कर लिया? या जूझते – परिवार को भले गाँव भेज देते… या कहीं और कोई नौकरी-चाकरी खोजते-करते…। और यह हिम्मत न थी, तो उस सज्जन की तरह पहले ही मान जाते। कोई मुद्दा ही न बनता…। वरना यह तो न इधर के हुए, न उधर के हुए। मैं यह सवाल इसलिए कर पा रहा हुं कि उसी शख़्स ने एम.ए. करने के बाद मुझे भी प्रेत-लेखन के लिए प्रस्ताव भेजा था। अपनी दूध की दुकानों व चक्कियों की तरह इसे भी उन्होंने धंधे के रूप में चला लिया था। लेकिन मैने जूनियर कॉलेज में पढ़ाना मंज़ूर कर लिया, वह प्रस्ताव नामंज़ूर कर दिया – और विश्वविद्यालय पहुँचने में 12 साल लग गये, पर पहुँचा सही…। रामदरश मिश्र के शब्दों में ‘जहां लोग पहुँचे छलाँगे लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे। ख़ैर, जब दोनो वरिष्ठ एक-एक करके सेवामुक्त हुए और अध्यक्षता का मामला आया, तो इन्हें न मिली – कैसे मिलती? काग़ज़ बोलते हैं, तो सबको सुनना पड़ता है। और अपने वास्तविक कनिष्ठ के अंतर्गत काम करने के लिए पांडेयजी का मन-मानस तैयार न हुआ। यह दूसरी बदगुमानी थी!! इतने विद्वान के लिए, जो जीवन व साहित्य को -उन्हीं से सुने मुहावरे में कहूँ, तो – हस्तामलक (हाथ पर रखे आँवले) की तरह देख सकता था, उसके लिए यह दुनियादारी की बात इतनी महत्तवपूर्ण क्यों हो गयी? याने उनका वह भाग भी लचीला ही था। अंततः उनके अंतर्गत काम करने के बदले उन्होंने ऐच्छिक सेवा निवृत्ति लेना क़ुबूल कर लिया। मुझे पता नहीं, पर वे कहते कि आर्थिक नुक़सान ज्यादा न हुआ…। प्रो दयाराम पांडेय के सारे जीवन का यही निचोड़ रहा कि इस हादसे ने उन्हें तभी से तोड़ दिया था – फिर आख़िरस नौकरी भी छुड़वा दी…।
अब उस अपनी पहली कक्षा पर आयें…सबका परिचय बमुश्किल पाँच मिनट में पूरा होते ही ‘तो अब पढ़ाई शुरू करें’…कहते हुए पांडेयजी झटके से उठे और श्याम पट पर खड़िया से बड़ी चुनमनवां लिखावट में लिखा – ‘यशोधरा’ और उसके नीचे लिखा – मैथिशरण गुप्त – गोया दोनो शब्द अविरल लिखे गये हों – पूरा शब्द बिना खड़िया उठाए। बाद में तो खूब-खूब देखने को मिला कि यह उनकी अपनी शैली है लिखने की, जिसे चलती लिखावट (रनिंग राइटिंग) कहते – उनके भागते हुए चलने जैसी, पर ऐसी साफ़-सुथरी, समानुरूप-सुदर्शन लिखाई मैंने पहली और अब तक आख़िरी बार ही देखी…। पांडेयजी ने लिखने के बाद कहा – ‘यशोधरा’ को काव्य रूप में ‘चंपू काव्य’ कहते हैं – हिंदी का एकमात्र चंपू काव्य। गद्य-पद्य दोनो होते हैं इसमें…। फिर झटके से मुड़े और श्याम पट पर लिख दिया – गद्य-पद्यमयं वाक्यं चंपूरित्यभिधीयते’। यही उनका दिया पहला सूत्र था, जो तुरत याद हो गया…और फिर तो हिंदी-संस्कृत-भोजपुरी व कुछेक अंग्रेज़ी के भी ऐसे-ऐसे इतने सूत्र-सूक्ति-कविताएँ-श्लोक-शेर…आदि मिले उनसे…कि किंबहुना…और क्या कहना…! फिर भी एक-एक सुन लें – उन्हीं के मुख से पहली बार सुना – ‘उपसर्गेण धात्वर्थों बलादन्यत्र नीयते। प्रहाराहार संहार विहार परिहारवत’ याने ‘हृ’ धातु है एक ही, जिसका अर्थ होता है हरण करना, लेकिन उसके पहले लगे उपसर्गों -प्र, आ, सं, वि एवं परि ने प्रहार, आहार, संहार, विहार और परिहार जैसे कितने-कितने अर्थ कर दिये हैं…!! इसी क्रम में कहें कि विद्यापति को हमने बाद में पढ़ा – एम. ए. में जाके, पर ‘अनुखन माधव-माधव रटइत सुंदरि भेलि मधाई’, याद ही नहीं, हृदयंगम हो गया था डी.आर.सर से कक्षा में सुनके और उनके दिये कई उदाहरणों से समझ के। फिर तो उसी साल अनिवार्य अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रम में ‘उदरिंग हाईट्स’ जैसा क्लासिक उपन्यास था। वहाँ कैथरीन का अपने प्रिय हीथक्लिफ (अनाथ-कुरूप-दलित, घर का नौकर, लेकिन उस पहाड़ी पर सुलभ एकमात्र किशोर) के लिए अकेले में बैठकर ‘आइ ऐम हीथक्लिफ, आइ ऐम हीथक्लिफ, आइ ऐम हीथक्लिफ’…कहना भी ‘अनुखन माधव-माधव…’ के सहारे खूब समझ में आया। अंग्रेज़ी का भी उनसे सुना एक सूत्र देख ही लें – ‘देयर इज नो डिज़ाइन इन ह्यूमन लाइफ़’…।
और ऐसा बहुत-बहुत कुछ है…। इन सबसे उन्होंने हमें अच्छा पढ़ने और याद करने के लिए इतना भर (चार्ज कर) दिया था कि जब एक दिन ‘रामचरित मानस’ की एक पंक्ति ‘दसरथ भेद भगति उर लायो’ का पहला चरण उन्हें याद न आया, तो उस दोपहर की सारी पढ़ाई मैने पुस्तकालय में बैठ कर वह पंक्ति खोजने में लगा दी थी और दूसरी सुबह जाके जब अपना यह प्रयत्न भी बताया और पंक्ति भी – ‘ताते उमा मोच्छ नहिं पायो’, तो उन्होंने झट से खींच के गले लगा लिया। फिर कई लोगों को बुला-बुला के तारीफ़ें करते, दुआएँ देते रहे…जो सब तो भूल गया, पर गले लगाने वाली गरमाहट आज भी महसूस हो रही – जैसे हनुमान ने सीता के सारे आशीष ‘अजर अमर ग़ुन निधि सुत होहू…’ आदि भुलाकर याद रखा सिर्फ़ – ‘करहिं सदा रघुनायक छोहू’।
बता दूँ कि दयाराम पांडेयजी ने हिंदी साहित्य में बीएचयू से और उसमें भी हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के कार्य-काल में एम.ए. किया था। नामवरजी ने मेरे सामने ही इन्हें ग़ुरु भाई कहते हुए गले लगाया था। इन पढ़ाइयों ने उन्हें कथ्य की समझ व विश्लेषण की क्षमता अता की, लेकिन इसके पहले वे व्याकरण से मध्यमा या शास्त्री कर चुके थे। लेकिन उसे छोड़कर साहित्य में इसलिए आ गये कि किसी ने उन्हें संस्कृत पढ़के ‘पोंगा पंडित’ बनने का ताना मार दिया था। तो यह दिखाने-सिद्ध करने के लिए आ गये हिंदी से एम.ए. करने। इस शुरुआत को तो मैं ‘बिस्मिल्ला ही ग़लत हुआ’ कहूँगा, लेकिन इसका अंत बिलकुल सही अल्लाह पे हुआ – वरना यह संस्मरण न होता…। जी हाँ, यह प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति उनमें बड़े गहरे धंसी थी, जो सारी पढ़ाई-लिखाई के बावजूद पिघल (डायलूट हो) न पायी और जिसने उनके जीवन में बड़े गुल खिलवाये – जिसमें काँटे भी कम न थे। याने इस वृत्ति ने उन्हें बहुत भटकाया भी और बहुत बनाया भी, जिनके ज़िक्र व उल्लेख आगे आयेंगे थोक में…। अभी तो यह एक देख ही रहे कि एक ताने ने उनकी ज़िंदगी की पूरी धारा बदल दी। लेकिन उनकी संस्कृत वाली पृष्ठभूमि ने उन्हें शब्दों के संस्कार एवं भाषा पर ग़ज़ब का अधिकार अता किया। और इन सबका फ़ायदा खूब उठाया मैने…। इस बावत यह कहना ग़लत या अर्ध सत्य होगा कि उन्होंने अपना फ़ायदा उठाने दिया, सच यह रहा कि उन्होंने मुझसे अपना फ़ायदा उठवाया। अपने ज्ञान बाँटने पर मेरे लूटने को शुरू में ही एक-दो बार देख कर उन्होंने कहा था – ‘सीख जाओगे तुम, पर गलती पर मेरे डाँटने और कभी सरेआम टोकने को लेकर बुरा नहीं लगाओगे, तो’…और मैने डाँटने-फटकारने की खुली छूट सहर्ष दी।
इसके एक-दो उदाहरण तो बनते हैं। जो सबसे पहले याद आ रहा कि जब एक-दो बार बताने पर भी मैं ‘रुपया’ को स्त्रीलिंग ही बोलता रहा – रुपया गिरी, तो एक दिन कई लोगों के बीच बोल देने पर उन्होंने कहा था – यह है ही स्त्रैण (औरताना), तभी पुल्लिंग को बताने पर भी बदल नहीं रहा। और मैं झेंपा ज़रूर, लेकिन बुरा बिलकुल न लगाया, जिसके नतीज़े खूब अच्छे निकले…। खेद है कि मैं इस वृत्ति को आगे न बढ़ा पाया – अपने एक भी छात्र को सिखा न पाया – कैसे कहूँ कि कोई लागी (लगन वाला) शिष्य मिला ही नहीं!! और मुझ पर अपनी बड़वारगी करने का दोष न लगाया जाये, तो बताऊँ कि पांडेयजी भी यही कहते चले गये कि मेरे सिवा सीखने का ऐसा लागी उन्हें भी दूसरा नहीं मिला!! लेकिन मैं तो वह न आदतन कर रहा था, न पैसे-पेशे…आदि की गरज से इरादतन। बस, अच्छा लगता था – मज़ा आता था। आज भी आता है – उतना ही…।
अब एक उदाहरण ज़रा व्यापक वाला लेता हूँ – ‘ने’ के ग़लत प्रयोग का। पहली बात यह कि हम पूर्वी उत्तरप्रदेश व बिहार की लोक भाषाओं में ‘ने’ है ही नहीं। अतः ‘हम खइली’ से लोग सीधे ‘हम खाये’ पर उतर आते हैं – ‘हमने खाया’ को पढ़-पुढ़ के जानते हैं, पर पहचानते कम हैं – व्यवहार में तो बहुधा उतारते ही नहीं। मेरी अज्ञानता की यह बात तो पिछली शती के आठवें दशक की है। हम बच्चे थे – भाषा व साहित्य में चंचु-प्रवेश कर रहे थे। लेकिन यह आज भी हिंदी के बड़े-बड़े प्रोफ़ेसरों तक में आप देख सकते हैं…। मुम्बई में तो फिर भी ग़नीमत है, जब मैं 2009 से 11 के बीच काशी विद्यापीठ में पढ़ाने गया था, तो अपने गाँव-जेवार के सुख के अलावा सब कष्ट ही कष्ट थे, जिसमें भाषा की बदमली सबसे बड़ा कष्ट थी। ‘ने’ का प्रयोग तो गिने-चुनों के अलावा कोई ठीक नहीं करता था। जिस विवि में मैं था, वहाँ तो सौ प्रतिशत बदमली थी। और छोड़ के आना तो पड़ा तकनीकी कारणों से मज़बूरी में, लेकिन बड़ी राहत हुई – भाषा के ऐसे भदेस मंजरों से बच जाने की। यह वही लकड़हारे वाली बात है, जिससे राजा ने पूछा था – भारं बाधति किम्? (यह लकड़ी का) भार तुम्हें कष्ट देता है क्या? लकड़हारे का उत्तर था – भारं न बाधते राजन्, यथा ‘बाधति’ बाधते – अर्थात् यह भार उतना कष्ट नहीं दे रहा राजन, जितना आपके वाक्य में यह ‘बाधति’ शब्द – याने कर्म वाच्य में आत्मने पद (बाधते) के बदले परस्मै पद (बाधति) लगाना। ख़ैर, यह ‘ने’ का भीषण ग़लत प्रयोग जाने कब ठीक होता या नहीं, यदि बी.ए. में ही कोंच-कोंच कर सही-सही समझा ही नहीं, हमारी भाषिकता की ज़ेहन में उतार न दिया होता गुरुवर दयाराम पांडेयजी ने…!!
अब आइए फिर कक्षा में चलें – ‘यशोधरा’ में आगे बढ़ें…, तो सर ने बताया कि उनके पिता का नाम था शुद्धोदन। फिर उसकी व्याख्या दी – जिसका ओदन शुद्ध हो और उदक् याने पानी, जिसके लिए फिर परथोक दिया – जल-उद्चन केंद्र (ट्यूपवेल)। यह भी तभी मैने सुना पहली बार – नलकूप तो जानते थे – जलकूप (कुआँ) के वजन पर। फिर उस ओदन को ‘ओदन-भोजन दै दधि-काँवर भूख लगे पर खैहौं’ से भात बताया। आज तो भात शब्द ही मर गया है। लोग चावल-दाल खाते हैं, जो अंग्रेज़ी राइस-दाल का पर्याय है। शायद अंग्रेज़ी में भात के लिए शब्द नहीं होता क्या!! और हम हैं कि अंग्रेज़ी की नक़ल में चावल खाने लगे, वरना अच्छा ख़ासा भात खाते थे। तब जो रोटी कम या न खाता हो, उसे ‘भतहा’ कहते थे – अब क्या ‘चवलहा’ कहेंगे? ख़ैर, यहाँ भात इसलिए कि भात-दाल को कच्चा भोजन माना जाता है – वह शुद्ध होना चाहिए। वरना पक्का भोजन याने पूरी-भाजी तो कहीं भी खायी जा सकती है। इस प्रकार डीआर सर ने शुद्धोदन नाम का अर्थ दिया – जिसका भात व पानी याने खान-पान शुद्ध हो – वह शुद्धोदन। तात्पर्य है – खाँटी कुलीन के रूप में शुद्धोदन का जगत प्रसिद्ध होना…। आज भले इन व्याख्याओं पर मत-मतांतर हों – कदाचित् खींचा-तानी लगे…, लेकिन तब तो यह हमें इतना ज्ञानवर्धक लगा और शब्दों को समझने की यह प्रक्रिया इतनी आकर्षक लगी…कि मैं शब्दों को ऐसे ही तोड़-तोड़ कर उनके दूर-दराज के अर्थ खोज-मिला के समझने का आदती होता चला गया…। गरज ये कि उनका यह तरीक़ा मुझमें भाषिकता का एक संस्कार बनाता गया…।
क्षेपक रूप में इस प्रवृत्ति का एक मज़ेदार प्रसंग बता दूँ कि विश्वविद्यालय में नियुक्त होने के बाद मैं पुनश्चर्या कार्यक्रम (रेफ़्रेशर कोर्स) के लिए कालीकट गया था, जहां शब्द को ऐसे ही तोड़-जोड़ के बताने वाले साउथ कनारा के एक पंडितजी मेरे कक्ष-सहवासी (रूममेट) हुए – गोपाल भट्ट, जिनकी मूल प्रवृत्ति ही थी ऐसी खींच-तान भरी विच्छेद-व्याख्या की…और एक बार हम सब शंकराचार्य की जन्मस्थली की पर्यटन यात्रा पर थे, तो एक जगह गोपालजी ने किसी बात पर आक्रोश में आकर अपने पाठ्यक्रम के समन्वयक प्रोफ़ेसर के नाम की व्याख्या की – जिसके एक-एक बाल में अहम और मद हो – वह इक़बाल अहमद। लेकिन इसी प्रसंग में इस भाषिक वृत्ति का चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स) यूँ आया कि इसके बाद ज़ोरदार हँसी के बीच साथिन मंगल देसाई ने कहा – गोपाल तो ‘फक्कड़’ है…और मैंने झट से गोपाल को बरजा – इस फक्कड़ की विच्छेद-व्याख्या (फक्+कड़) न कर देना पंडित…वरना ‘ड़’ को ‘र’ कर देने में भाषा को देर नहीं लगती! याने पांडेयजी की इस वृत्ति ने बड़े-बड़े गुल खिलवाये…!!
यह इत्तफ़ाक़ ही था कि गद्य-पद्य वाली कृति ‘यशोधरा’ के बाद बी.ए. में पांडेयजी ने ‘पंतजी की श्रेष्ठ कविताएँ’ एवं ‘कमलेश्वर की श्रेष्ठ कहानियाँ’ के रूप में दोनो विधाओं को अलग-अलग भी पढ़ाया। पहली कविता ‘प्रथम रश्मि’ व किंचित लम्बी व उनकी प्रतिनिधि कविता ‘उच्छ्वास’ पढ़ाते हुए वो मज़ा आया कि आज तक उस अहसास से पुलकित हो उठता हुं। समझ में आ गया कि कविता कैसे पढ़ी-समझी जाती है और कैसे साहित्य अपने युग को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में विश्लेषित करता हुआ रूप ग्रहण करता है और इसी से यशस्वी होता है। पंतजी को पढ़ाने चले, तो पहले दो व्याख्यानों में 19वीं सदी के उत्तरार्ध से शुरू होकर रूढ़िवादी-जड़ स्थितियों की जो तस्वीर पेश की, उससे मैं अंदर तक हिल गया था। लेकिन इसी के चलते जब पहली कविता ‘प्रथक रश्मि’ में पंक्तियाँ आयीं – ‘निद्रित थीं इंद्रियां, स्तब्ध जग, ज़ड़-चेतन सब एकाकार’ ‘शून्य विश्व में फैल रहा था, साँसों का आना-जाना’ तो इस पर कुछ कहने-सुनने की ज़रूरत न पड़ी। इसके बाद से 1857 के आंदोलन एवं उसी के बाद शुरू हुए भारतेंदु-युग के साथ पनपी साहित्य-चेतना पर ज़ोर देते हुए फिर उन्हीं दिनों कांग्रेस की स्थापना से बनती गति-अगति-प्रगति से होते हुए 1918 में गांधीजी के कांग्रेस-अध्यक्ष बनने तथा उसी वर्ष से ‘छायावाद’ की शुरुआत को जोड़ते हुए उसी 1918 के आसपास की कालावधि में लिखी गयी ‘प्रथम रश्मि’ तक आये…। मुझे आज भी अपने भीतर बदली उन स्थितियों का अहसास भूलता नहीं कि उन दो दिनों के लगभग तीन घंटों के बाद हम वही नहीं रह गये थे, जो इसके पहले थे। और उसी इतिहास के बदले जाने को गुंजायमान करती है – ‘प्रथम रश्मि’ याने बदलाव-विकास की पहली किरण। खूब-खूब पढ़-सुन-लिख आये थे कि ‘साहित्य समाज का दर्पण होता है’, लेकिन समझ में अब आया – भरपूर अहसास के साथ। फिर शुरू होती है क़वि की अभिव्यक्ति-शैली…कि इस परिवर्तन के लिए पंतजी अपनी कवि-चेतना से ही पूछते हैं – प्रथम रश्मि का आना रंगिणि तूने कैसे पहचाना? तूने ही पहले बहुदर्शिनि गाया जागृति का गाना, श्री-सुख-सौरभ का नभचारिणि गूँथ दिया ताना-बाना!! ये रंगिणि, बहुदर्शिनि, नभचारिणि…आदि सब कवि-चेतना ही तो हैं…।
इसके बाद उसी धारा में खाँटी कविता ‘नौका-विहार’ पढ़ाते हुए प्रकृति के मानवीयकरण व बिंबात्मक-चित्रात्मक एवं मूर्त्तता जैसे शास्त्रीय व आलोचकीय एवं पारिभाषिक…शब्द व इनकी मूल अवधारणाएँ उन्हीं से सुनकर पहली बार जानने को मिलीं। ‘ग्रामयुवती’ में मजदूरिन के बोझ लेकर मेंडों से होते हुए चलने के चित्रणों में वर्गीय चेतना से बनते श्रिंगार व उसके चित्रणों में निहित वर्गेभेदी सोच…आदि से परिचय हुआ…। ऐसे में पांडेयजी की कुछ सहज-त्वरित टिप्पणियाँ भी बड़े मार्के की होतीं…। जैसा अभी याद आ रहा है कि इसी ‘ग्राम-युवती’ कविता के ‘वह मग में रुक/ मानो कुछ झुक/ आँचल सँभालती फेर नयन मुख/… वाले बंध में इसके बाद आया – ‘पा प्रिय पद की आहट/ आ ग्राम युवक/ प्रेमी याचक …तब तक सर ने उसी प्रवाह में बड़ी मसर्रत भरी अदा से जोड़ दिया – बल्कि जोड़ा नहीं, जुड़ गया – ‘लो, आ गये हज़रत’ और हम सब हंस पड़े…। इस तरह की मज़ाक़िया टिप्पणियाँ देकर साहित्य की पढ़ाई को अनौपचारिक सहजता से भी अलग आस्वाद पैदा कर देते अपने पांडेयजी। इनकी टाइमिंग एवं कहने का अंदाज ऐसा सध के आता क़ि तब तो बेहद मज़ा आता ही, आज तक याद भी रह गया है। फिर ऐसे प्रसंगों में आकस्मिकता, नाटकीयता…जैसे समीक्षकीय शब्द भी आते…। फिर उस संकलन में ‘युगांत’ व उसके बाद की ‘ग्राम्या’… आदि की कविताओं को पढ़ाने के पहले प्रगतिवादी सोच-विचार की मूलभूत बातें भी पांडेयजी ने कीं…। इसी तरह कुछ कविताएँ अरविंद दर्शन से प्रभावित वाली भी थीं, तो उन्हें पढ़ाने के पहले मुख़्तसर सी चर्चा उसकी भी हुई…। मतलब कि साहित्य के चक्रव्यूह के सारे द्वार उन्होंने खोल दिये, दिखा दिये – अब जिसे जितना चरना-चलना हो…अपनी यात्रा करे…। और कह दूँ कि तब तक वह सब कुछ गाँव से इंटर करके आये हुए मेरे लिए -और शायद सभी के लिए- बिलकुल नया था – अजाना-अनसुना। इसलिए रोज़ ऐसा लगता था कि ढेरों नए क्षितिज खुल रहे हैं – जीवन के, इतिहास के, सोच व दर्शन के…। उनके हर व्याख्यान के बाद लगता कि हम कक्षा में जाने के पहले जो थे, निकलते हुए वही नहीं रहे…!! बहुत कुछ बदल जाता – अपना विकसित (ग्रो) होना हम लक्ष्य कर पाते…अपने पहले और अब की तुलना कर पाते…।
अथ क्षेपक – ऐसा अहसास उनके पढ़ाने के बाद सिर्फ़ प्रो. भगीरथ दीक्षित की कक्षा में हुआ, जो हमें एम.ए. में ‘उर्वशी’ पढ़ाने आये थे। जहां पांडेयजी तो बैठना क्या, एक मिनट एक जगह खड़े न रहते, वहीं दीक्षितजी आके बैठ जाते, तो कुर्सी की परिधि से बाहर न होते। फिर घुटने से एक पाँव दूसरे पर आ जाता, जो हर दस मिनट पर अपने आप बदलता रहता…। थिएटरनुमा कक्ष था। वे नीचे होते – हम ऊपर से उन्हें देखते। उनके स्वर-सुर के आरोह-अवरोह में बहते…। क्या बुलंद वाणी थी, जिसके पतवार होते – हर भाव को अपने संचालन से सहाय देते उनके हाथ…और आरोह-अवरोह के क्या कहने!! कभी-कभी उसी प्रवाह में जैसे धारा में नाव उछले, वे कुछ उछालते…पुरुरवा की बाँहों में कसी उर्वशी कसमसाती ‘अरे आह यूँ नहीं, तनिक तो शिथिल करो बाँहों को’…और सर उछालते – ‘अरे, नौटंकी है – नौटंकी’…। उर्वशी के प्रसंग से बीच-बीच में पुराण-उपनिषद आते, वात्स्यायन का कामसूत्र आता – उद्धरण सहित। ‘कामायनी’ कई बार आती, जिसके पाँवों में बिछी होती ‘उर्वशी’…। और इस तरह घंटे भर हम किसी और ही दुनिया में विचरते होते…। लेकिन पूरे सत्र में जहां लगभग 16 कक्षाएँ होनी थीं, वे सिर्फ़ तीन ही में आये। पछता के रह जाना पड़ा, लेकिन वे सच्चे विद्वान थे, बहुत लिखा भी है उन्होंने और अच्छा भी। उनकी पुस्तक ‘कामायनी विमर्श’ पढ़-पढ़ के हमने कृति को समझा। तो, इसी विद्वत्ता के कारण वे छक्के-पंजे से अनजान तो न थे, पर कर नहीं सकते थे…और व्यवस्था से -बल्कि कह लें व्यवस्था के घुनों या घुन्नों से- पस्त होके हाशिए पर रह गये। बहुत ठगे गये – जिस सबको हम बता तो सकते हैं, पर यहाँ इससे ज़्यादा बताना क्षेपक के बावजूद ‘आउट ऑफ़ कोर्स’ होगा…। और इसीलिए व्याख्यानों में उनकी अनुपस्थिति पर भी कुछ कहते नहीं बनेगा… – ‘क़हतो न बने, सहतेई बने, मन ही मन पीर पिरैबो करे’…!! इति क्षेपक।
फिर गुरुवर दयाराम पांडेय से कथा साहित्य को समझने का माध्यम बनीं – कमलेश्वर की कहानियाँ। कविता के लिए तो डीआर सर किताब खोलते भी थे, लेकिन कहानियों के लिए कभी किताब नहीं खोली – सिर्फ़ समझाना और बहस-विमर्श। कहने की बात नहीं कि सवाल-प्रति सवाल भी मैं ही करता – बाक़ी लोगों में कुछ लड़कियाँ थीं – अधिकतर पंजाबी, जिन्हें इतनी रुचि न होती। लड़कों में प्रायः प्राइमरी के अध्यापक थे, जो कक्षा पूरी होने की राह देखते और नौकरी पर चले जाते। लेकिन मैं लगा रहता…और कक्षा के बाद कैंटीन से स्टाफ़ रूम तक घंटों बहस चलती। ‘राजा निरबंसिया’ में पति की लैंगिक अक्षमता के समक्ष नारी का जैविक ज़रूरतों के लिए अपनी राह बनाना और ‘देवा की मां’ में आर्थिक हैसियत के बल पति के अतिचार के ख़िलाफ़ स्वावलंबी होकर खड़े होने की चेतना…गाँव से आये मुझ किशोर वय के लिए सहज स्वीकार्य न होती…संस्कारग्रस्त मानस की जकडबंदी टूटने में समय लग रहा था, पर जैसे कच्ची मिट्टी को कुम्हार गढ़ता है, शायद सर मुझे उसी धीरज से गढ़ रहे थे…। उनका प्रिय वाक्य था – ‘संस्कार जल्दी पीछा नहीं छोड़ते बालक’। फिर कहते – लेकिन आधुनिक जीवन और साहित्य को समझने के लिए उनको तोड़ना होगा…। इस प्रयास में न कभी उन्होंने जल्दी की, न ऊबे, न थके…। पढ़ाई में उनका यह सहाय और बासे (निवास) पर दूर के भाइयों के अपनत्व भरे सहयोग-संभार के बीच मैं महानगर की उस अजनवीयत को भी मान नहीं पा रहा था, जो कमलेश्वर की ‘खोई हुई दिशाएँ’ कहानी में है – ज़ाहिर है कि तब तक मेरे अति सीमित अनुभव-विश्व के समक्ष यह आधुनिक चेतना मुझे कँपकँपा दे रही थी, जिसे ‘भीतर हाथ सहारि दै बाहर-बाहर चोट’ की तरह डी.आर. सर थामे ही नहीं थे – सवाच भी रहे थे…।
याद आता है कि एक दिन सीढ़ियाँ उतरते हुए पांडेयजी कुछ पढ़ने या किसी की तरफ़ देख के बतियाने में एक के बदले दो सीढ़ियाँ उतर गये…और संतुलन गड़बड़ा जाने से गिर गये…और घुट्ठी की हड्डी में मोच आ गयी…। मैं टैक्सी से घर तक छोड़ने गया, तो उन्होंने रास्ते में कहा – सत्यदेव, सूअर का तेल कहीं से मिल जाता, तो जल्दी आराम हो जाता। अब मैं दीवानों की तरह तेल खोजने में लग गया। अपनी कक्षा के ही जयप्रकाश यादव ने कुम्हारवाड़ा से तेल दिलवाया। मैं देने चला, तो दूसरे सहपाठी -मेरे परम मित्र आज तक- मुहम्मद तौफ़ीक़ खान भी साथ गये। देने के बाद मैने मल देने का प्रस्ताव रखा और उन्होंने सहज भाव से मान लिया…। लौटते हुए तौफ़ीक़ ने कहा – तुम ब्राह्मण लोग तो सुअर-वुअर का तेल-वेल छूते नहीं…आज मल कैसे दिया? मैने जवाब दिया ‘देख़हु ज्ञान-प्रताप बड़ाई’!! (पंक्ति में एक शब्द बदलने के लिए क्षमा-प्रार्थी!) और यह ज्ञान तो उन्हीं का दिया हुआ है। अब आज उसमें जोड़ने का मन होता है – ‘जान दी, दी हुई उसी की थी, हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ!!
बी.ए. प्रथम श्रेणी में और विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक पाके पास होने पर मुझसे अधिक खुश सर हुए…। बी.ए. के पहले साल के बाद ही मुझे नि:शुल्क छात्रावास मिला था और अब तो विभाग में ‘फ़ेलो’ ही बन गया। 125/ प्रति माह मिलता, जो एक सम्मान-सा था। और संयोग से उसी साल 10+2+3 की नयी शिक्षा नीति आ गयी, तो विभाग के पूरे कार्य-भार में 9 कक्षाएँ बढ़ गयीं, जिनके लिए कालांश के हिसाब से नये अध्यापक नियुक्त करने की बात पर तत्कालीन प्राचार्य सरदार डॉक्टर रघुवीर सिंह ने कहा – अपने उसी फ़ेलो छात्र को दे दीजिए, तो मुझे वह भी दे दिया गया, जिसकी तुरत सूचना देने पांडेयजी हुलसते हुए छात्रावास के कमरे में आ गये थे। इसके पैसे अलग से मिलते – 15 रुपए प्रति कक्षा के हिसाब से, जो 1975-77 में कम न था। यहाँ भी कहना होगा कि पढ़ाने के पहले हर पाठ पर पांडेयजी से विमर्श कर लेता। सो, परीक्षा के लिए पढ़ने के साथ सर से पढ़ाने का भी प्रशिक्षण मिलने लगा मुझे। और यह प्रशिक्षण तो एम.ए. के बाद चेतना कॉलेज में पढ़ाते हुए भी लिया – ख़ासकर पाठ्यक्रम में लगी ‘मधुशाला’ के लिए…। ख़ैर,
अभी एम.ए. वाली बात पर आयें…वहाँ भी पांडेयजी को सप्ताह में एक दिन पढ़ाने के लिए यूनिवर्सिटी आना होता – फ़ोर्ट इलाक़े में। पहले ही व्याख्यान के बाद वहाँ के भी सभी सक्रिय छात्र मेरी ही तरह अपने डीआर सर के दीवाने हो गये…। और अगली ही बार ये गुरुजी नहीं आये – वही लेट-लतीफ़ी वाली पुरानी आदत!! लेकिन तब तक सब जान गये थे – हम दोनो की आपसी प्रियता और साथ आने-जाने को, तो सब मिलकर ऐसा पीछे पड़े कि अगली बार से उन्हें हर व्याख्यान के दिन लेके आने की ज़िम्मेदारी मुझे लेनी पड़ गयी, किंतु मैने सहर्ष ली भी, क्योंकि मेरा भी सुख था उन्हें सुनना – बतर्ज़ ‘नयन स्रवहिं जल निज हित लागी’!! तो ऐसा था उनके पढ़ाने का जल्वा!! सो, अब मुझे हर उस दिन (शायद गुरुवार होता) 12 बजे से ही उन्हें घेरना पड़ता। इसके लिए कॉलेज के बाद एक दो बजे के आसपास उन्हें लेके छात्रावास के अपने 33 नंबर वाले कमरे में आता। वे सो जाते…यह भी ख़ास बात थी उनकी – कि सोते बहुत थे…आलसी तो परम थे…। चार बजे उनको उठाता। कैंटीन से चाय के साथ कुछ नाश्ता मंगाता। और पाँच बजे हम साथ निकलते…। टिकिट ख़रीद के ट्रेन में ले जाता और फिर साथ में आते – मैं माटुंगा उतर जाता और वे घर जाते विक्रोली।
यहीं यह भी बता दूँ कि उनके साथ बाहर रहते हुए जो भी कुछ खर्च होता – चाय-नाश्ता-पान-टिकिट… आदि, वे कभी पैसे न देते। जेब में हाथ तक न डालते…!! न ही कभी पूछते कि तुम नौकरी पर तो आधे समय जाते नहीं – पोस्ट ऑफ़िस का वेतन होता ही कितना था…!! उनका यह सब न पूछना ख़याल में आता, लेकिन कभी खलता नहीं था। फिर भी पांडेयजी की इस वृत्ति से भी मैने यह सीख ली कि अपने अध्यापक जीवन में छात्र-छात्राओं के साथ बहुत खाया-पीया-घूमा, लेकिन कभी मैने किसी छात्र-छात्रा को पैसे देने नहीं दिये…। और उन दिनों भी पांडेयजी मुझे कंजूस नहीं लगते थे, क्योंकि यह हिसाब भी समझ में आता कि दो प्राणी खुद व दो बेटे, दो बेटियाँ – सबके सब पढ़ने वाले…फिर बेटियों की भावी शादियों का भार…। और ठीकठाक स्तर से रहने के चलते परिवार का खर्च काफ़ी होता होगा – तो शायद उसके बाद किसी ऐसे खर्च का औसत न बैठता हो। लेकिन निस्संदेह इसमें उनकी मितव्ययता (कंजूसी) की वृत्ति भी अवश्य शामिल थी। इधर बी.ए. में पूरे विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक के लिए अच्छी छात्रवृत्ति मिलने से मुझे थोड़ी निश्चिन्तता भी आ गयी थी – और मैं करता भी सहर्ष था तथा ऐसे विद्वान ग़ुरु के लिए करना बनता भी था…।
लेकिन इसी से जुड़ी एक बात सर्वोपरि है – मेरे प्रति उनके व उस परिवार के नेह-छोह की…। एक ही उदाहरण दूँगा – न भूतो, न भविष्यति वाला…। बी.ए. के दिनों में जब एक दिन मुझे ज़ोरों की भूख लगी थी…और शायद मेरे पास पैसे न थे, तो मैने जाके उनका ब्रीफ़केस खोला और खाने के डिब्बे (लंच बॉक्स नही कहना मुझे) से दो पराठे निकाल के खा गया…। सर ने जब आके खाने के लिए डब्बा खोला, तो स्टाफ़ रूम के सेवाकर्मी रामजी भाई से पूछा – मेरा ब्रीफ़केस किसी ने खोला था? रामजी भाई को तो स्टाफ़ रूम के ज़र्रे-ज़र्रे का पता होता – इसी काम में ज़िंदगी बिता दी थी। एक बार एक बल्व को दिखा के मुझे बताया था – ‘तिरपाठीजी, यह 23 साल से चल रहा है – कभी फ्यूज़ नहीं हुआ’!! वे हर महीने में दो दिन मेरे कमरे में आते थे – अपने विदेश में रह रहे बेटे का खत पढ़वाने और हिंदी में जवाब लिखवाने, क्योंकि न बेटे को पंजाबी पढ़ने-लिखने आती थी, न इन्हें हिंदी। और इसके लिए रामजी भाई ने मुझे सुपात्र समझा, यह क्या कम गर्व की बात थी !! सो, उन्होंने बता दिया – ‘तिरपाठीजी को देखा था – खोल के कुछ ढूँढते हुए’। और असली बात गुल कर दी – जबकि उन्होंने खाते हुए देखा भी था। यह खाना कुछ अनोखा भी न था – खाते हुए मौजूद रहने पर मैं अक्सर खा ही लेता था…। हाँ, एक बार साथ खाते हुए एक-दो ग्रास खाके मैने कह दिया था – आप खाइए – आपको कम पड़ जाएँगे…तो उन्होंने जिस अदा से कहा था – आई रिफ़्यूज टु बी पिटीएबल मिस्टर त्रिपाठी’, वह भी अविस्मरणीय है। ख़ैर, उस घटना के दूसरे दिन सुबह 9 बजे के आसपास रामजी भाई मुझे खोजते हुए मेरे कमरे में आये और बोले – पांडे साहब ने कहा है कि आपके लिए तीन पराठे आये हैं – जब मन हो, आके खा लीजिएगा। और यह रोज़ आयेगा…’। क्या कोई विश्वास करेगा कि यह रमना दो साल चला – चेतना कॉलेज में मेरे लग जाने तक। सभी जान गये थे यह बात। मैं इसे गुरुआनी-प्रसाद कहके प्रचारित भी करता…, क्योंकि रोज़ बनाने का श्रेय तो उन्हीं को जाता है। जैसे डीआर सर ने मुझे पढ़ाया-सिखाया, वह तो कहीं मिल भी जाये, पर यह तो शायद दुनिया में इकला उदाहरण होगा। यह बात अलग है कि उत्तर भारत में शिष्य रहा भी करते थे ग़ुरु के घर – विश्वनाथ त्रिपाठी का आचार्य हज़ारी प्रसादजी के घर रहना जग ज़ाहिर है, लेकिन मेरी समझ में उससे बड़ी बात है यह!! और रींवा के विश्वविद्यालय का अध्यापक के घर छात्र के रहने-खाने के एक मामले का जैसा विद्रूप अभी कुछ दिनों पहले रू-ब-रू (फ़ेस बुक) पर सामने आया है, जिसमें ग़ुरु खाने-खिलाने का ताना मारता है और शिष्य बर्तन मँजवाने-झाड़ू-पोंछा लगवाने का उलाहना देता है…वह तो इस सम्बंध की गलाजत का चरम है…शिष्य तो क्या, इस स्तर तक उतरने वाले ग़ुरु को क्या कहें, उसका क्या करें…!!
खालसा कॉलेज का प्राध्यापक कक्ष यादगार था, जो सुना है कि अब बदल गया। लेकिन तब था – बड़े से सुसज्जित कक्ष में एक काफ़ी बड़ा गोलाकार मेज़ (बिग-बिग राउंड टेबल), जिसके चारो तरफ़ कुर्सियाँ होतीं…। प्रवेश द्वार तो पश्चिम दिशा से था और दक्षिण की तरफ़ की ख़ाली जगह से होते हुए पूरब स्थित बड़ी-सी बालकनी तक जाने की जगह थी। वहाँ एक मेज़ व कुर्सियाँ होतीं – शायद बैठ के खाने के लिए। लेकिन लोग मुख्य गोलमेज़ पर भी खा लेते थे। पांडेयजी अपने उसी वेश-चाल में हाथ में ब्रीफ़केस लिये हुए आते थे और गोलमेज़ पर पूरब व दक्षिण के कोने पर जा बैठते थे। जगह का कोई आरक्षण न था, पर आम तौर पर पांडेयजी की वही जगह थी। लिहाज़ा वहीं हमारा मजमा लगता था। इतिहास के प्रो सरदार दिलीप सिंह एवं प्रो. आर.आर. सिंह से पांडेयजी का ख़ास याराना था। तीनो मौजूद हों, तो एक दूसरे की हँसी उड़ाना, खिंचाई करना चलता रहता था। कुछ लतीफ़े बने थे। सबका तो नहीं, पर अपने विषय (पांडेयजी) का तो झलकी दिखाने के लिए एक सुनाना बनता है…।
तो प्राध्यापकों में संस्कृत की प्रोफ़ेसर हुआ करती थीं – श्रीमती आभा गुलाटी। हमें भगवद्गीता पढ़ाती थीं और सोमवार को साढ़े छह बजे की पहली कक्षा में प्रायः लेट हो जाने से पाठ्यक्रम रह जाता था, तो बांद्रा में लिंक रोड के पॉश इलाक़े में स्थित अपने घर (गोल्डन पीक) बुलाके पढ़ाती थीं। बहुत सलीके की सुलझी महिला और उससे भी ज्यादा सुंदर थीं। इसका प्रमाण यह भी कि कॉलेज के मुस्टंडे सरदार छात्र, जो पढ़ने के लिए नहीं, मटरगश्ती के लिए आते थे…कभी हमें रोक के पूछते – तुम पढ़ने के लिए संस्कृत पढ़ते हो या मिसेज़ गुलाटी को देखने के लिए? कभी वे प्राध्यापक कक्ष में बैठतीं, तो प्रवेश करते ही पहली-दूसरी कुर्सी पर। और एक दिन वे बैठी थीं क़ि पांडेयजी प्रविष्ट हुए, तो उन्होंने सहज भाव से इस्तक़बाल कर दिया – ‘पांडेयजी आज आपकी टाई बड़ी सुंदर है’…और पांडेयजी ने ‘थैंक्स’ कह दिया’। बस, यह चर्चा अध्यापकों में फैल गयी। फिर तो आर.आर. व दिलीपजी को इस वाक़ये में पंख लगाके पांडेयजी को रिझाने-सताने का मौक़ा ही मिल गया…। पटकथा यूँ बनी कि गुलाटीजी के कहने के बाद पांडेयजी ने जाके अपना ब्रीफ़केस अपनी जगह पे रखा और बड़ी अदा से पूरे गोलमेज़ का चक्कर लगाते हुए श्रीमती गुलाटी के पास पहुँचे और कहा – मैडम, मेरी टाई तो सुंदर है…और मैं?? तब उन्होंने कहा – अरे पांडेयजी आप तो सुंदर हैं ही…। इसके बाद दो संस्करण बने – पहला यह कि पांडेयजी ने प्रस्ताव ही रख दिया – फिर चलिए कहीं घूम आयें… यहाँ क्यों बैठे हैं? और दूसरा यह कि उस दिन से पांडेयजी रोज़ गांधी मार्केट (वहीं बग़ल में स्थित) जाके नयी टाई लेते हैं। उसे पहन के आते हैं और मिसेज़ गुलाटी के सामने से गुजरने का मौक़ा खोजते हैं कि कैसे नज़र मिले और बात आगे बढ़े…!!
अब अगले सोपान की तरफ़ चलें…। पांडेयजी ने चाहे जिन कारणों से खुद तो पीएच.डी. की नहीं, लेकिन मेरी पीएच.डी उन्होंने करायी…। उनके लिखने की अफाट शून्यता की चर्चा ऊपर हुई, जिससे आप समझ ही गये होंगे कि वे शोधनिर्देशक हो नहीं सकते थे, तो उनके अंतर्गत शोध करने की आशा रखके इंतज़ार करना ‘ऊसर बीज बयें फल जथा’ ही होता! और सर्वोच्च अंक लेकर एम. ए. करने के बाद मेरे लिए शहर के नामचीन शोध-निर्देशकों की तरफ़ से छोरहरिया लग गयी थी, क्योंकि विश्वविद्यालय का विभाग तो रीडर-अध्यक्ष डॉ सी.एल.प्रभात की करनियों से लम्बे समय तक ‘एकल प्राध्यापक’ वाला रहा, तो काम चलता था शहर के महाविद्यालयों के वरिष्ठ अध्यापकों से, जो सप्ताह में एक-एक कक्षा लेने आते। इस तरह सभी लोग जान गये थे और सब किसी न किसी रूप में मुझे अपने-अपने अंतर्गत पीएच.डी कराने के प्रस्ताव भेजते रहते…। लेकिन इसमें सर्वाधिक अग्रणी रहे अपने खालसा के ही विभागाध्यक्ष (वही ‘द्रुत झरो’ वाले)। वे अपने अध्यापक भी थे। उनका हक़ भी था। हाथ धोके पीछे भी पड़ गये थे। महीने में एक-दो बार शाम को मेरे उस चेतना कॉलेज आ जाते थे, जहां मैं पढ़ाने लगा था और जो इत्तफ़ाक़न उनके निवास से कुछ क़रीब भी था। मैं होटेल (संजय स्नैक बार) ले जाता – अपनी वृत्ति के मुताबिक़ जम के नाश्ता-चाय करते…और लौटने के लिए बस स्थानक पर खड़े होते थे, तो हर बार अलग-अलग शब्दावली में कहते थे, जिसका मतलब यही होता था कि शोध के लिए पंजीकरण करा लो – काम आराम से करना। एकाध बार कुछ अनखा कर बोले – भाई, अब तो पर निकल आये हैं, तुम शायद कहीं और उड़ना चाहते होओ…!! उनका आशय विश्वविद्यालय वाले प्रभातजी से था। पर मैं चार सालों से डाक विभाग की क्लर्की, फिर पढ़ाई-तैयारी, आंतरिक परीक्षाएँ…प्रपत्र लिखने…आदि के साथ खालसा की फ़ेलोशिप व सप्ताह में 12 कक्षाएँ लेने…आदि की चरम व्यस्तता से बहुत ऊबा-थका कुछ दिन आराम करना चाहता था – कुछ अपने मन का पढ़ना-लिखना चाह रहा था। फ़िल्म देखने की अपनी लत, जो कई सालों से मजबूरन बहुत कम हो गयी थी – कभी-कभार रात के 9 से 12 वाले शो के सिवा -वह भी नज़दीक के कारन बग़ल की भकठही टॉकिज़ में- फिर से रवाँ करनी थी…। लॉज में मस्त-मौला प्यारे आर. आर. सिंह के साथ निश्चिंत होकर गप्पें मारने…आदि के मज़े करना चाह रहा था। लेकिन इन सबने नाक में दम कर रखा था और पीएच.ड़ी. करना तो था ही…।
फिर आख़िर यह सब एक दिन मैने जाके पांडेयजी से कहा। और उनकी उदारता देखिए कि जिसने उन्हें इतनी बड़ी क्षति (खंडित सेवा वाली) पहुँचाई – पूरा कैरियर बिगाड़ दिया (मुझे भी जीवन की सबसे बड़ी क्षति पहुँचायी, मगर इस सबके काफ़ी बाद में), उसके अंतर्गत काम करने की सलाह देते हुए उन्होंने यह तर्क भी जोड़ दिया कि सभी गधों के बीच अपने गधे को ही क्यों न चुना जाये। फिर एक दुनियादारी की समझदारी वाली बात कही – ‘कुछ भी हो, छात्रावास से लेकर ‘फ़ेलो’ बनाने तक जो भी इस कॉलेज में अच्छा हुआ तुम्हारे साथ… उसमें भले तुम्हारी योग्यता मुख्य कारण रही, जिसके चलते प्राचार्य भी चाहते रहे, सबकी सदिच्छाएँ भी तुम्हारे साथ रहीं…लेकिन प्रस्ताव तो उन्हीं के हस्ताक्षर से गया न? तुमने ‘द्रुत झरो’ की भयंकर टिप्पणी भी की थी…। ऐसे में वे चाहते, तो कोई कारण बता के इनकार भी कर सकते थे। लिहाज़ा दाय तो मानना पड़ेगा। इस तरह पांडेयजी ने बहुत कुछ जो साहित्य सिखाया, वह तो मेरे जीवन का मुख्य कर्त्ता बना ही, लेकिन उनकी इस सूझ को तो मैने न ही सिर्फ़ माना, बल्कि गाँठ बाँध ली। ज़िंदगी में ऐसे व्यावहारिक निर्णय लेने के मौक़े आने पर राग-विराग रहित होकर तथ्यगत रूप से सही फ़ैसले लेने की मानो सही दृष्टि ही दे दी हो गुरुवर ने…जिससे मेरे जीवन में सोच-विचार के अनोखे क्षितिज खुलते गये…। लेकिन उस वक्त उनकी इस सान धराने (जंग लगे लोहे के सामानों को तेज कराना) का फ़ायदा भी मैने उठाया…। यह यूँ भी निश्चित था कि असली मार्गदर्शन तो पांडेयजी ही करेंगे, लेकिन इसी रौ में इस बात का खुला ज़ुबानी कौल भी करा लिया – साक़ी शराब दे दे, कह दे शराब है!! इस प्रकार गुरु को सीधे साधकर पंजीकरण करा लिया…।
शोध के लिए विषय की बात निकली, तो एम.ए. के पाठ्यक्रम में ‘अलग अलग वैतरणी’ उपन्यास लगा था, जिसका मैं दीवाना हो गया था, क्योंकि वही जीवन जीकर गाँव से आया था, तो समझा भी ज्यादा और इसीलिए बिलकुल अपना-सा लगा था। सो, उसी के लेखक शिवप्रसाद सिंह पर शोध करने की ठान ली थी। और मेरे लिए महत्त्व की बात यह थी कि यह खूब प्रिय था पांडेयजी को भी – बीएचयू के कारण शिवप्रसादजी और अनुपम रचनाशीलता के लिए ‘अलग अलग वैतरणी’। तो उन्हीं की राय से विषय ठहरा – ‘शिवप्रसाद सिंह का कथा साहित्य’। गाइड महाशय को तो न विषय से कुछ लेना-देना था, न काम से – उन्हें तो इसी का गर्व व दिखावा था कि अव्वल आने वाला अपना (टॉपर) विद्यार्थी कहीं और नहीं गया – दिष्टया धूम्राक़ुलित यजमानस्याहुति: अग्नेरेव पतिता!! तो विषय जो भी हो, अपनी रुचि के होने का संतोष था तथा ख़ुशी थी कि असली गाइड को भी रुचता था। तकनीकी गाइड की गाइडेंस इतनी ही थी कि उन्होंने बिना किसी पहचान-परिचय के शिवप्रसादजी से मिलने के लिए मुझे ठेल के बनारस भेज दिया…और जाते हुए यह भी ताईद कर दी कि रूपरेखा (सिनॉप्सिस) बनवा लेने की कोशिश करना। अब यह संयोग ही था कि उन पर यह पहली पीएच. डी. होने ज़ा रही थी (एम.फ़िल. हुआ था) और मैं किसी के घर जाते हुए सौग़ात की प्रथा स्वरूप उन पर एक आलेख लिख कर ले गया था, जिसे उन्होंने तुरत पढ़ा – मुझे बाहर बिठा के। पढ़ने के बाद बुलाया और हहा के कहा था – ‘मुझे मेरा रिसर्चर (शोधकर्ता) मिल गया’। फिर तो पाँच मिनट में अपने हाथों रूपरेखा लिख के दे दी, जिसमें किसी परिवर्तन का सवाल ही न था। बस, इतने के सिवा मेरे शोध-कार्य का सारा मार्ग-दर्शन पांडेयजी का था। और यह बात मेरे वैधानिक या काग़ज़ी गाइड क्या, सब लोग हमारे बिना बताये ही जानते थे। सबसे अधिक मुतासिर करने वाली बात यह कि मेरी पीएच.डी. के लिए पांडेयजी ने शिवप्रसाद सिंह की सारी कहानियाँ पढ़ीं – ‘गली आगे मुड़ती है’ उपन्यास फिर से पढ़ा – ढेरों तक़ादों-मनुहारों के बाद ही सही, जो उनकी आदत में शुमार था। ‘अलग अलग वैतरणी’ उनका बहुत पढ़ा हुआ उपन्यास था, तो फिर से पढ़ने की ज़रूरत न थी। और गाइड महोदय ने न एक कहानी पढ़ी और न मेरे लिखे की एक पंक्ति, पर नाम तो उन्हीं का हुआ!! अध्याय पूरा होने पर मैं फ़ाइल दे आता उनको। फिर एक-दो महीने बाद जाके ले आता। हर बार उनका एक ही कहना – पढ़ नहीं पाया, पर ले जाओ – तुम ठीक ही लिख रहे होगे…। लेकिन कभी फ़ाइल देने के लिए लाने से मना भी नहीं किया – कैसा-कैसा अहम गाइड होने के अधिकार का…!!
इधर पांडेयजी को पूरा-पूरा अध्याय दो-दो बार सुनाता…पहले टुकड़ों में – जैसे-जैसे लिखता जाता, फिर पूरा एक साथ पढ़ता। यह कार्य समय-सुविधा के अनुसार कई जगहों पर होता…। बता दूँ कि पंजीकरण के थोड़े दिनों बाद छात्रावास छोड़ के मैं कुर्ला स्थित ‘गंगा जमुना’ लॉज़ के उसी कमरे में रहने चला गया था, जो हमारे खालसा कॉलेज के इतिहास के प्राध्यापक डॉ आर.आर. सिंह का स्थायी निवास था। फिर मेरे लिए इससे बड़ी बात यह थी कि उसी कमरे की उसी खाट पर कभी सालों साल पांडेयजी भी रह चुके थे। तो, मेरी पीएच.डी. के अधिकांश विमर्श पांडेयजी के साथ वहीं होते…। इसके अलावा कभी सबके जाने के बाद कॉलेज के प्राध्यापक कक्ष में भी, जो अपनी शुरुआती जगह थी, तो कभी किसी होटेल में भी – ज़्यादातर कॉलेज के पास स्थित ‘आनंद भवन’ व ‘मद्रास कैफ़े’ में, जो छात्र-जीवन में हमारे ‘दूसरा घर’ हुआ करते थे, जहां एक कप चाय लेके घंटों बैठते और चलते हुए काउंटर वाला ‘बस, हो गयी बात’ इस तरह पूछता – गोया न हुई हो, तो और बैठ लीजिए…। कहाँ गये वे दिन!! याद आता है कि एक बार किसी अनिवार्यता में हम घाटकोपर में लाल बहादुर शास्त्री मार्ग पर किसी चाय की टपरी वाली बेंच पर घंटों बैठ के शोध-कार्य का कोई अंश पढ़ते-विमर्श करते रहे थे…!!
गुरुवर पांडेयजी न कभी अध्याय की फाइल घर ले गये, न सामने भी खुद से खोल के पढ़ा – कह सकते हैं कि छुआ तक नहीं। हाँ, सुना एक-एक अक्षर पूरे ध्यान से – कभी कोई वाक्य फिर से, तो कभी कोई पैरा फिर से, कभी दो पृष्ठ पहले का लिखा फिर से…याने भाषा-भाव-विचार-शब्द…आदि से लेकर सबकी संगतियाँ, औचित्य, सबकी प्रासंगिकताएं, कुछ छूटे-अधूरे को पूरा करने, कुछ बढ़ जाने को संतुलित करने…और भाषिकता की तो ख़ास…याने सर्वांगीण विचार-विवेचन…। कई बातों को लेकर मतवैभिन्य पर बहस भी खूब होती – घंटों-घंटों…। कुल मिलाकर सब कुछ पर मुकम्मल नज़र रहती उनकी। शिवप्रसादजी की एक किताब है अस्तित्ववाद पर – शायद हिंदी में पहली किताब। वे सारे लेख श्रिंखला के रूप में पहले छप चुके थे – ‘धर्मयुग’ में। तो उनके लेखन में इसका असर होगा ही। पांडेयजी से मेरे सर्वाधिक विमर्श इसी मुद्दे पर हुए, क्योंकि किसी वजह से उन्होंने अस्तित्ववाद का अच्छा अध्ययन किया था – बहुत उद्धृत भी करते थे, जिसका वे तो कुछ कर न सके – मैने उसका पूरा फ़ायदा उठाया…। उसी में पांडेयजी की सर्वाधिक मदद मिली मुझे। यदि पांडेयजी न होते, तो अमूमन पूरा प्रबंध ही वैसा न होता, जैसा हुआ, लेकिन यह वाला अंश ऐसा कदापि न होता…।
उन्हीं से पढ़-सुन के हमने पढ़ना-समझना-लिखना सीखा था, इसलिए एक संगति ज्ञाता-ज्ञेय की भी थी और काम हम दोनो की क्षमता की चरम सीमा में एक बिंदु पर पहुँच कर शुक्लजी के ‘ज्ञान की चरम सीमा ज्ञाता और ज्ञेय की एकता है…’ की प्रक्रिया को मानो पुष्ट करता – उस पर खरा उतरता…।
गरज ये कि इतने सब उल्लेखों के बाद अब मैं कह सकता हूँ कि दयाराम पांडेय नाम के शख़्स यदि जीवन में मुझे न मिलते, तो भी मैं बी.ए., एम.ए. तो करता – शायद पी.एचडी. भी कर ही लेता…अध्यापक भी हो जाता, लेकिन साहित्य की थोड़ी-बहुत ही सही, जैसी समझ यदि मुझमें आयी है, वह कदापि न आयी होती। और साहित्य की समझ याने जीवन की समझ…और वह न आयी होती, तो मैं जो लिख पाया, वह तब पता नहीं लिख पाता या नहीं! यदि लिख भी पाता…, तो वह ऐसा ही बिलकुल न होता, जैसा हुआ है – कैसा होता…, क़तई कह नहीं सकता…। और पढ़ने-पढ़ाने का यह रिश्ता जीवन में भी ऐसा उतरा कि पांडेयजी मेरे ऐसे मित्र भी हुए कि चेतना में रहते हुए ‘मधुशाला’ पढ़ाने के दिनों ही वहीं पढ़ाने आयीं कल्पना भट्ट से मेरी दोस्ती जब प्रेम में बदलने लगी, तो उस समय के ख़ास मित्रों के साथ इस रिश्ते को लेकर पांडेयजी से भी बात हुई थी, जिसे उन्होंने सहर्ष उत्साहित किया था और मेरे दोस्तों में जो पाँच ही लोग उस सीधी-सादी शादी में उपस्थित हुए थे, उनमे पांडेयजी भी एक थे – लॉज के सहवासी आर.आर. सिंह को भी बुलाया था, पर वे नहीं आये – बड़ा शर्माते थे ऐसे मौक़ों पर!!
हालाँकि मेरे देखे में तो प्रो दयाराम पांडेय ने कुछ लिखा नहीं…। मेरे संज्ञान में सिर्फ़ दो चीज़ें हैं। पहली यह कि कभी उन्होंने ‘ने’ के प्रयोग पर एक लेख लिखा था, जिसका ज़िक्र एक बार मेरे सामने किसी प्रवाह में अचानक उन्हीं से हो गया, तो उसकी हस्तलिखित प्रति भी मैने घर जाके जबरन खोजवा के निकलवायी और पढ़ा। लेख बहुत पहले का था – शायद उनके छात्र-जीवन के दौरान का। लेकिन था ज़बरदस्त। कई बार पढ़ने पर तो जाके पल्ले पड़ा। तकनीकी भी था और ‘ने’ की उत्पत्ति के सारे मत-मतांतरों से समृद्ध। और अंत में पांडेयजी के सुबुद्ध निष्कर्ष थे। किंतु इसे मेरा भी बचपना या नाकारापन ही कहें – कि टाइप कराके छपाने या कम से कम उसी को सुरक्षित रख लेने का काम न कर सका…, जिसके लिए मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा…।
लिखने का मेरी जानकारी में एक ही काम हमारे साथ के दौरान हुआ – मजबूरी में। असल में किसी शोध-कार्य के बिना उनकी सालाना वेतन-वृद्धि रुकने वाली थी, फिर भी वे लिख नहीं रहे थे। तब हम सबने बहुत कोंच-कोंच के, ठोंक-पीट के उन्हें एम.फ़िल. करने के लिए तैयार किया था, जिसके लिए उन्होंने अज्ञेयजी के उपन्यास ‘अपने अपने अजनवी’ पर 60-70 पृष्ठों का लघु शोध प्रबंध लिखा था, जिसको हमने भी नहीं पढ़ा – सिवाय लिखने के दौरान मोके-झोंके से कुछ अंशों के, क्योंकि खानापूर्त्ति के लिए बेमन से किये गये काम को क्या पढ़ा जाये…!! उस लघु शोध-प्रबंध को भी पूरा करने के बाद पांडेयजी ने कई महीनों तक टाइप नहीं करवाया कि जमा किया जा सके। उन्हीं दिनों संयोग से मेरी पीएच.डी का प्रबंध टाइप हो रहा था, तो उनसे भी वह लिखा हुआ माँग के लाया और टाइप कराके जिल्द (बाइंड) ही नहीं बनवायी, उनके दस्तख़त भी ऐसे लिये – जैसे प्रबंध मेरा हो और वे अग्रेषित (फ़ॉर्वर्ड) कर रहे हों। जी हाँ, ये नाज़-नख़रे (स्टाइल) भी उनके थे, जो मैं उठाता तो था सहर्ष, लेकिन ताना मार-मार के। इतना ही नहीं, उनके शोध-निर्देशक के घर जाके दस्तख़त करायी और विश्वविद्यालय में जमा भी कर आया था, वरना शायद रह ही जाता…। क्या विडम्बना है कि इस एम.फ़िल. की थीसिस के शोध-निर्देशक भी वही अपने अध्यक्ष (द्रुत झरो वाले) ही हुए। इसे कह सकते हैं – ‘बकरवा कसइए के माना ला’ या फिर बदले के कह दें – ‘पावा ला’। उन्हें डिग्री मिली – वेतन वृद्धि रुकी नहीं। लेकिन उस प्रबंध की तरफ़ न कभी उन्होंने देखा, न कहीं उसका ज़िक्र करते…। उसकी चर्चा भी उठे, तो चुप रह जाएँ या बात बदल दें…। अपने शोध-कार्य की तरफ़ उनकी इस घोर उपेक्षा के लिए दो उदाहरण याद आ रहे – एक तो शकुंतला के दुर्वासा-शाप के असर की कालिदासीय उपमा – ‘कथां प्रमत्त: प्रथमं कृतामिव’ – ‘किसी पागल द्वारा अपने पहले के किये काम की तरह (भूल जाना)’। और दूसरा उस हाथी की तरह, जो बच्चा जन के उसकी तरफ़ पीठ कर लेती है।
यहाँ कहना होगा कि साहित्य पर पांडेयजी की इतनी गहरी व ठोस पकड़, इतना ज्ञान व ऐसी समृद्ध भाषा…सब हमने देखी, महसूसा। अब ‘अपने-अपने अजनवी’ को लेकर उनका बर्ताव हम देख रहे हैं…इन सबसे निस्संदेह सिद्ध हो रहा है कि उनके साहित्यिक मानदंड बहुत ऊँचे थे, लेकिन उसे साकार करने की कोशिशें एकदम शून्य!! अब यह कहने की स्थिति है कि यदि ‘प्रेत-लेखन’ वाली एक घटना का परिणाम इतना दूरगामी व घातक हो सकता है, तो इस सारी ज्ञान सम्पदा का मतलब क्या है, जो एक ग्रंथि को तोड़-उखाड़ न सकी!! दशरथ के लिए राम के शब्दों में कहा जाये, तो ‘थोरेहिं बात पितहिं दुःख भारी, होति प्रतीति न मोहिं महतारी’। यह अतिरेकी प्रतिक्रिया कहीं न कहीं उनकी प्रकृति में निहित आलस्य-आरामतलबी का भी नतीजा रही है। उन्हीं का बताया हुआ शब्द है – शतुर्मुर्गी आड़। सारा शरीर बाहर रहते हुए बालू में गरदन छिपाकर शतुर्मुर्ग को आत्म-रक्षा का भ्रम… कि वह सुरक्षित है। यही तो किया पांडेयजी ने भी, जिसके लिए उन्हें भी माफ़ नहीं किया जा सकता…!! अपनी मेधा से वे जो कुछ दे सकते थे, उसकी भ्रूण-हत्या करते जाने की कुवृत्ति को उन्होंने अपने ज़ेहन में मूल प्रवृत्ति (नेचुरल इंस्टिंक्ट) बना कर अवसित कर लिया था। प्रेत-लेखन का असर तो उन्हें बचाने-बख्शने का हम मुरीदों के हाथ एक बहाना लग गया था। और इन्होंने उसे अपने पूरे जीवन को ग्रस लेने दिया…। इसकी गवाही देता है सेवामुक्ति ले लेने के बाद का उनका जीवन…।
…उस जीवन-कथा पर चलने के पहले बता दूँ कि जब शुरू-शुरू में मिले थे, तो परिवार-प्रेम में सराबोर थे…। उसका रस उनकी रग-रग में ऐसा भिना था कि जहां छू दो, रिस-रिस पड़ता था…। बच्चों में ही साँस लेते। सबसे बड़ी बेटी चिंता की बड़ाई अक्सर निकल-निकल आती। बड़े बेटे सुरेंद्र, जो प्रोफ़ेसर होकर अब पाँच साल से सेवामुक्त है, के ज़िक्र में उनका गर्व किंचित छलक-छलक उठता। दोनो छोटे बेटे-बेटी की नींद सोते-जागते – उन्हें बड़े लाड़ से गुच्चन एवं बिटियवा कहते…। चिंता की शादी में मैं उनके गाँव गया था – बीएचयू से 5 किमी सीधा दक्षिण – तारापुर। और घर की बहन-बेटी की शादी की तरह अंदर-बाहर के सारे काम किये थे – हलवाई के लिए घर में से आँटा-चावल-दाल-तेल-घी-मसाला…आदि लाने-देने, उसका हिसाब रखने से लेकर पत्तल-पानी परसने और खिचड़ी पर दूल्हे के हाथ में घड़ी-अंगूठी…आदि पहनाने तक के सारे काम…। और यह सब करते हुए उस घर ने मुझे एक मिनट के लिए भी बाहरी नहीं माना – प्रताप गुरुआइन का, उनके द्वारा मेरे बारे में परिवार को बताने का। विशेष याद पांडेयजी के दोनो बड़े भाइयों की है। अपने पांडेयजी तीनो में छोटे थे। सबसे बड़े वाले सालिक राम पांडेय बेहद सज्जन, गाँव के खाँटी सु-मन वाले गृहस्थ – अपने पांडेयजी को बड़ी मसर्रत से उनका ‘दयाराम’ कहके बुलाना आज भी कानों में कूकता है। लेकिन किरदार (कैरेक्टर) तो थे दूसरे वाले भाई – कृष्णाराम पांडेय। बड़े वाले जितने सीधे, दूसरे वाले उतने ही काइयाँ, नाटकीय। कह सकते हैं कि हमारे गुरुजी दयाराम पांडेय रहे – उन दोनो के सही मिश्रण याने बराबर के काइयाँ और बराबर के नेक इंसान – दोनो को देखा हमने। लेकिन गाँव में मैने अपने निवास के आधे समय में पूरे परिवार को देखा, तो आधे समय में सिर्फ़ कृष्णाराम को। पर उन्हें तो आजीवन देखिए – समझ न पाएँगे…। उनकी इतनी चालबाज़ियाँ-कलाबाज़ियाँ-नाटकीयताएँ…ऐसा बातूनीपन, दिखावा और ऐसा शातिराना दिमाँग…कि उनके बारे में जितना कहा जाये, कम होगा। एक पैसा टेंट से निकला नहीं…और हर मौक़े पर ऐसा करते – जैसे सब खर्च वही कर रहे हैं। किसी काम, किसी चीज़ में हाथ नहीं लगाया…और छाप ऐसी छोड़ी कि शादी की पूरी छान वही उठाये हुए हैं अपने कंधे पर!! मुझसे मिले थे हहा के, पर निरंतर एक पैनी तिर्यक् नज़र गड़ी रहती मुझपे…कि कौन है यह, जो मुम्बई से चला आया है अपने मास्टर की बेटी की शादी में और ऐसे रह-कर रहा है, जैसे घर का लड़का हो!! पांडेयजी भी हैं तो काफ़ी चालाक, लेकिन इन बड़ों के सामने बिलकुल आज्ञाकारी छोटे भाई को साकार करते हुए बड़े मासूम-सरल बने रहे…। कुल मिलाकर बड़ा मज़ा आया था यह सब देखने-जानने में, जो तब मुझे बड़ा पसंद भी था।
इस बड़ी बेटी चिंता की शादी, यदि मुझे ठीक याद है, तो 1987 की गर्मियों में हुई और उसके बाद 1989 में मैं गोवा विश्वविद्यालय में नियुक्त होकर मुम्बई से देशबद्र (देश निकाला) हो गया…और पाँच साल बाद वहीं से एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय की मूल शाखा पूना चला गया, जहां से पुनः साढ़े चार साल बाद उसी विश्वविद्यालय की केंद्रीय शाखा मुम्बई में स्थानांतरित होकर आया। और इन दस सालों के बीच पांडेयजी ही नहीं, उनके पूरे परिवार की दुनिया बदल गयी…। बड़े बेटे सुरेंद्र की नियुक्ति वडाला स्थित कॉलेज में हुई थी, यह पता था, लेकिन शादी कब हुई, मैं न जान सका। लेकिन उड़ती-उड़ती इतनी खबर लगी कि शादी के एकाध साल बाद ही वह अलग रहने चला गया, तो भी कुछ ख़ास न लगा; क्योंकि बड़े होते बच्चों का छोटे पड़ते जाते घरों को छोड़कर अलग घर लेकर रहने जाना सामान्य बात है। लेकिन बहुत बाद में पता लगा कि उसे पांडेयजी ने खड़े-खड़े घर से निकाल दिया था और वह सपत्नीक किसी दोस्त के घर में जाके कुछ दिनों रहा। फिर भाड़े का घर लिया और धीरे-धीरे अपने तईं अपना संसार बनाया-बसाया। इसके बाद दूसरी बेटी वंदना की शादी मुम्बई से की, तो मुझे आमंत्रण या सूचना तक नहीं भेजी – शायद कारण वही रहा होगा – मेरा मुम्बई से बाहर रहना। लेकिन सूचना देके तो देखते…!! जब मुम्बई से में गाँव के अदने आदमी की बेटी की शादी में चला जाता हूँ, जो उन्हें पता भी था…, तब यह सलूक मुझे ‘आँख से दूर, मन से दूर’ के सिवा क्या लगता!! लेकिन जब उसके बाद कभी मिले और मैने वंदना की शादी में न बुलाने का उलाहना दिया, तो पहले बड़ा शरमाए – दुःख व्यक्त करने और क्षमा माँगने लगे…। और मैं जब ‘कोई बात नहीं’ कह के अपनी शिकायत का मार्जन करने लगा, तो उन्होंने दूसरा पैंतरा बदला…। हम सायन स्टेशन के सामने वाले होटेल रामदेव में बैठे थे। उन्होंने एक काग़ज़ निकाला, उस पर लिख कर मुझे निमंत्रण देने और कहने लगे कि यदि तुम सचमुच मुझे इस भूल के लिए माफ़ कर रहे हो, तो एक रुपया ही सही, दैजा दे दो, तब मैं मानूँगा…। यह वही बीच वाले भाई की पैंतरेबाज़ी थी कि कम से कम 1100 रुपए तो निकलवा ही लूँ…!! लेकिन अब तक तो मैं उनके तमाम पैंतरे जान ही चुका था…जितना ज्ञान लिया उनसे, उसी अनुपात में उनकी कारस्तानियों को भी समझा। अच्छा तो न लगा – बहुत उचित भी न था, लेकिन उनके झाँसे में न आते हुए ऐसा मारक जवाब देना पड़ा कि उन्हें अपनी हरकत पर चुप होने के सिवा दूसरा रास्ता न मिला…। लेकिन आज यह याद करके मर्मांतक पछतावा हो रहा है, नियति की बेआवाज लाठी की मार की मरणांतक पीड़ा हो रही है कि पांडेयजी से वही मेरी आख़िरी मुलाक़ात सिद्ध हुई…!!
मुम्बई लौट आने पर मैं मिलने जाना चाहता था, लेकिन एक दिन अचानक यूँ पहुँचना हुआ कि अपने परम मित्र रमन मिश्र के साथ उन्हीं के कुछ काम से हम ऑटो में जा रहे थे और मैने अपने को ‘पार्क साइट’ कोलोनी से गुज़रते हुए पाया…। फिर तो रमनजी को सहमत करके पांडेयजी के घर की तरफ़ ऑटो मोड़वा लिया। पाँच मिनट में आता हूँ, कह के घर में गया, तो एक युवती ने आके दरवाज़ा खोला, जिसे मैं पहचानता न था – कोई और घर में था नहीं। इस घर में, जहां के पड़ोसी भी मुझे पहचानते थे, जिस घर में मैं पांडेय-परिवार की अनुपस्थिति में छात्रावास के अपने मित्रों के साथ आके, ताला खोलवा के रविवार की फ़िल्म देखता था (‘मंथन’ देखने की याद बिलकुल ताज़ा है), उसी घर में अपना परिचय देना पड़ेगा, इसकी कल्पना न थी। फिर भी बड़े बेमन से नाम बताया, तो चौंक कर, चिहा कर वह युवती मेरे पैरों पर गिर पड़ी…। मैं जी उठा – अकारथ नहीं गया इस घर का अपना होना। वह पांडेयजी के छोटे बेटे गुच्चन की पत्नी थी। फिर उसने सादर बैठाया और बताया कि माँजी (श्रीमती पांडेय) आपकी चर्चा रोज़ करती थीं…। फिर तो गुरुमाता के अवसान को सुनकर मैं आँखों के आंसू पोंछू…कि तब तक उसके सालों पहले पांडेयजी के घर छोड़कर कहीं और चले जाने की खबर से वही हुआ कि – ‘भरतहिं बिसरेउ पितु मरन, सुनत राम बन गौन’। याने उम्र थी, ग़ुरुआइन का जाना तो प्राकृतिक रहा, पर दूसरी खबर बज्राघात-सी लगी – त्रिकाल में अकल्पनीय…!!
और भरत के उसी रूपक को आगे बढ़ाऊँ, तो ‘पितु सुरपुर बन रघुकुल केतू, हम हौं सब अनरथ कर हेतू’ के बरक्स यहाँ सारे अनर्थ का हेतु निकली – मृणालिनी – बड़ी बेटी चिंता (जिसकी शादी में मैं गया था) की बेटी। उस नातिन को पांडेयजी ने अपने यहाँ ही रख लिया था, जो हमारी गँवईं संस्कृति में बड़ी सामान्य बात है। बहुतेरे नाती-नातिन ननिहाल में पलते हैं। वहीं से शादी भी होती है। कई दृष्टियों से यह बड़ी स्वस्थ व संतुलित परम्परा है, जिसमें निहित है यह समझ-संतुलन …कि सारी सम्पत्ति तो बेटों को मिलती है, लेकिन चौथ-तीज-खिचड़ी-राखी…आदि के साथ हर तर-त्योहार पर बहन-बेटियों के साथ भांजों-भांजियों, नाती-नातिनों के नेग-उपहार…आदि के अलावा भी मदद-परवरिश…आदि सब उसी हिस्से के ‘गौण उत्पादन’ की तरह ‘गौण माध्यम’ या ‘विकल्प’ के रूप में मान्य हैं। मैं भी रहा हूँ ननिहाल में। आज मेरे नाती मेरे घर रह रहे हैं – नातिन की शादी मैने भी अभी पाँचेक साल पहले की। लेकिन बक़ौल उस बहुरिया – पांडेयजी की ऐसी आसक्ति (ऑब्सेशन) बन गयी मृणालिनी…कि वे अपने बेटे-बहू -यहाँ तक कि पत्नी की भी नितांत उपेक्षा करके सारा पैसा-सुख उसी पर लुटाने लगे …, जो अकल्पनीय था। बहू ने बताया कि कलह इतनी बढ़ी कि वे घर छोड़कर चले गये और तब से कभी न आये। गुरुआइन की मृत्यु पर शव को घर से बाहर रखकर गुच्चन उन्हें बुलाने गये थे कि सुहागन मरी हैं, तो जिस हाथ से माँग में सिंदूर डाला था, उसी हाथ से दाह-संस्कार भी कर दें…। पर उन्होंने दरवाज़े के बाहर खड़े गुच्चन से कहा – तुम्हें जो करना है, करो – मैं नहीं आऊँगा और दरवाज़ा बंद कर लिया…। इससे आगे मैं सुन न सका…इतना विदीर्ण हो चुका था कि फिर आऊँगा – कह के निकल आया। ऑटो में रमन न रहे होते…तो उस दिन मैं कैसे आ पाता…पता नहीं!!
इसके दो-चार दिनों बाद मैने खोजा, तो उनके बड़े बेटे सुरेंद्र का फ़ोन नंबर मेरी डायरी में मिल गया। तब उसने जो कहा, उसे सुनकर अपने व पांडेयजी के सम्बंधों पर गर्व करूँ या शर्म करूँ – समझ न पाया। सुरेंद्र का यह कहना मुझे अच्छा लगा कि उन दिनों पहले की तरह मैं पांडेयजी के साथ होता, तो यह सब न होता…!! मैं समझता हूँ कि होता भी, तो इस तरह न होता…। उसका ऐसा कयास है कि मेरे बदले उन दिनों भी कोई शिष्य उनके साथ था, जिसने मीरा रोड में उनके रहने वग़ैरह का इंतज़ाम किया और इस तरह उनके घर छोड़ने में सहायक हुआ – शायद प्रेरक भी हुआ हो। बहुरिया से आगे जाकर सुरेंद्र ने अपना रहस्य भी खोला – ‘मुझे तो निकाला ही घर से, गुच्चन की शादी के बाद उसे भी निकालना चाह रहे थे। लेकिन वह था कि मां और घर को छोड़ के जाने को तैयार न था। मां को भी निकाल ही देते…पर उन्हीं के किये से घर मां के ही नाम था, इसलिए ऐसा न कर सके – सत्य की नग्नताएं सचमुच कितनी वीभत्स भी होती हैं…!! मां ने सुरेंद्र को भी इसी आधार पर रुकने के लिए कहा था कि घर तो मेरा ही है, पर रोज़ की किचकिच-झगड़े-झंझट से बचने के लिए वह चला गया था। तब हारकर पांडेयजी खुद घर छोड़ने पर आमादा हुए। वे निकल तो सकते थे, किंतु गुच्चन के होते घर का सब सामान न ले जा सकते थे। इसलिए उन्होंने पुलिस में षड्यंत्र रचा – शिकायत की कि मेरा बेटा मुझे मारता है। और अपनी प्रोफ़ेसरी के बल इतनी पैरवी करायी कि गुच्चन को पुलिस गिरफ़्तार कर ले गयी। उधर योजना इतनी पक्की थी कि गुच्चन गये कि तुरत लॉरी आ गयी। उन्होंने सब सामान बांधा और एक घंटे के अंदर घर छोड़ गये…!!
यह सब सुनकर मुझे याद आ गया कि कभी मैने पांडेयजी के पड़ोसी सहकर्मियों -अपने गुरुओं- की ज़ुबानी उनके इतर सम्बंधों की कुचर्चा सुनी थी। ज़ाहिर है कि इतना टंटा हो रहा था, तो पास-पड़ोस व इलाक़ों तक गूंजते-गूंजते फैला होगा। और हजारी प्रसाद द्विवेदीजी के शब्दों में उन ‘ईर्ष्यापरायण प्रोफ़ेसरों’ द्वारा ऐसा गलीज़ गलचउर उड़ाने के प्रति मन जुगुप्सा से भर गया था। ख़ैर, मृणालिनी की शादी भी उन्होंने की – उसके कॉलेज के दिनों के प्रेमी से ही और नातिन व नतदमाद के साथ रहते थे…। लेकिन कालांतर में वे लोग भी रहने तो अलग (शायद गोरेगाँव) चले गये, लेकिन उनकी देख-भाल करते थे…। ऐसे में कभी सुबह टहलते हुए पांडेयजी गिर के बेहोश हो गये, तो जिस किसी ने देखा, मृणालिनी को फ़ोन किया…और वे लोग आये…ले गये…। यह सुनकर उन दिनों बेटों ने फ़ोन किये, लेकिन नातिन व नतदामाद फ़ोन काट देते…।
इसके बाद का कुछ मालूम नहीं हुआ कि उनका क्या हुआ, उस मीरा रोड वाले घर का क्या हुआ। लेकिन एक बात तय है कि पांडेयजी ने अपने इस कुनिश्चय को अंतिम सीमा तक निभाया – बेटों के पास तो क्या, गाँव के घर भी कभी न गये…, न अपने पहले के लोगों से कभी मिले – एकांतवास जीया। आप यह भी कह सकते हैं कि इतना सब करने के बाद किस मुंह से जाते…? लेकिन यहाँ उनकी वह वृत्ति भी ध्यातव्य है कि शान में आके वे संस्कृत व्याकरण से हिंदी साहित्य में आने और प्राध्यापकी से निकाले जाने और फिर वापस लिये जाने के बाद जो पैंतरे लिये, उन्हें निभाया। यह आवेश, यह कायरता, यह अहमन्यता नितांत ग़लत है, पर उनमे थी, जिससे वे डिगे नहीं – ‘जानाम्यधर्मम् न च मे निवृत्ति:’ की दुर्योधनी प्रवृत्ति!! बाद में सुना कि गाँव के घर का भी सारा अच्छा खेत बेच आये, जिसमें सहायक हुए वही दूसरे वाले नौटंकीबाज़ भाई, जिनका उसूल ही रहा होगा – ‘रांड़ (विधवा) ख़ुशी, जब सबकर मरे’। सात बीघे थे। क़रीब दो बीघे बचे हैं, जो ऊसर-खाभर है, जिसे लेने को कोई तैयार न हुआ!! बाक़ी सारा बोंड़री (उपजाऊ) खेत निकल गया…!! सत्यानाशी पूत इसी को कहते हैं!!
उम्मीद की जाती है कि मरणोपरांत नातिन व दामाद ने उनका क़्रिया-कर्म भी किया होगा…। वे लोग इस घर के किसी से कोई सम्बंध-संवाद नहीं रखते, इसलिए निश्चित कुछ मालूम न हुआ। मुझे ताज्जुब होता है कि जो लड़की मृणालिनी अपने पति के साथ मिलकर यह सब कर-करा रही थी या होने दे रही थी, उसकी माँ याने पांडेयजी की बड़ी बेटी चिंता इन सबको लेकर क्या कहती-करती है? वह किसके साथ है? साइबर युग में जब सब सूचनाएँ हस्तामलक के वजन पर पर्दामलक हैं, तो भी मां-बेटियों व सगे भाई-बहनों के बीच की ये सारी बातें गुमनामी में हैं – कहीं नुमायाँ नहीं होतीं। मनुष्य के मन की गति को पूरा कहाँ पकड़ पा रही हैं – आधुनिक ज़िंदगी की प्रगत (ऐडवाँस) तकनीकें भी, क्योंकि आख़िरस तो वे मशीनें हैं। बल्कि तकनीकी विकास के उसी अनुपात में ही जीवन की जटिलताएं भी बढ़ी हैं, जो अधिक गुप्त हो गयी है…!! पहले ज़िंदगी सीधी-सादी थी, तो सब सबका सब कुछ जानते थे। तब वैद्य नाड़ी पकड़ के रात को क्या खाया था…भी बता देता था। जब वैद्य द्वारा नाड़ी पकड़ के बुख़ार मापने के बदले थर्मामीटर आया, तभी कवि ने इस यांत्रिकता की सीमा बता दी थी – ‘हर ताप नपा, पर नपा आज तक मन का ताप नहीं’!! और यह सीमा सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होकर बरकरार है आज भी…!!
मैं भी एक बात के लिए अवश्य पछताता रहूँगा कि बहुरिया से सुनने के बाद उनसे मिलने नहीं गया, क्योंकि लोगों ने बता दिया कि वे किसी से नहीं मिलते – बेइज्जत होने मत जाओ। और मैं मान गया…। उस वक्त यह कैसे याद नहीं आया कि मैं ‘किसी’ नहीं हूँ और उनके सामने क्या मेरी इज्जत और क्या मेरी बेइज्जती – प्रिय मेरी अब हार-विजय क्या!! बहुत करते, दरवाज़े से लौटा देते!!
अब इस मुक़ाम पर तो उन्हें अंतिम प्रणाम करके लेख पूरा करने का ही बचा है, पर इस वाले दयाराम पांडेय का तो नहीं, उस समय वाले अपने ग़ुरु का एक अजूबा-अनोखा उदाहरण देना चाहूँगा…। मेरे घर कुर्ला व कॉलेज माटुंगा से कुछ दूर होने के बावजूद उनके घर जाना अक्सर हो जाता था…जाने पर जो भी समय रहे, खाना तो पड़ता ही था – जो कुछ भी घर में बना-बचा होता था। और कहने की बात नहीं कि जो भी होता, सुस्वादु होता – नितांत गंवई गुरुआइन की पाक-कला का परिणाम होता…। और पांडेयजी वैसे ही रहते, जैसे हमारे न रहने पर होते – याने दिखावे के आचार-स्वरूप कुछ पहनने, उठने-बैठने में बदलाव न होता…। सो, एक दिन मैं घर पहुँचा, तो वे फ़र्श पर बैठे सुई-धागे से कुछ सिल रहे थे…। हम भी वहीं बैठ गये। देखा कि वे छींट वाले बहुरंगी कपड़े की लुंगी मारे हुए हैं, लेकिन कपड़े का नाम-रूप समझ में नहीं आ रहा था। बोलने-कहने का कोई संकोच रखा न था उन्होंने…और बात भी आपस में हम लोग प्रायः अपनी प्रिय भोजपुरी में करते और बड़ा ठह के करते…। सो, आख़िर मैंने पूछ ही लिया – ‘ई एतना रंग़-बिरंगी का पहिरले हुउएँ आप’? सर ने किंचित शरमा के मुस्काते हुए कहा – ‘अरे, सत्देव, आज नहाय के निकरली, त कुछ मिलतै ना रहल…। बस, गुच्चन के माई के सारी वहीं पड़ल रहल, उहे लपेट लेहली…’ (अरे सत्यदेव, आज नहा के निकला, तो कुछ मिल ही नहीं रहा था। बस, गुच्चन की मां की साड़ी वहीं पड़ी थी, वही लपेट लिया है’!!
अब आप दहा लीजिए कि क्या घरेलूपन, क्या संसक्ति, क्या अपनापन और क्या खुलापन रहा होगा…? और देख लीजिए इसमें निहित खाँटी आधुनिकता का देहाती स्वरूप…!!
कुल मिलाकर यह कि साहित्य को समझने (और जीवन भी जीने) की जो भी समझ मुझमें है, उसका अधिकांश दयाराम पांडेय की ही देन है, जिसका दाय न चुकाया जा सकता था, न चुकाने का मौक़ा ही दिया उन्होंने। असमय ही इस कदर जीवन से अदृश्य हो गये कि न कभी मिले, न हमें खोजने का मौक़ा दिया – बल्कि सच कहें, तो हम जब तक अपने जीवन को पटरी पर लाके उन्हें खोजने-पाने लायक़ हुए, वे घर-परिवार से दूर कहीं जाके बस गये…और हम जैसे अपने परिचित जगत के लिए किंवदंती बनकर रह गये…!! किंवदंती हो या सचाई, इतनी तो है ही कि जिनके पाँव धो-धो के पीने जैसा भाव था, अब आज उनकी स्मृति को अंतिम प्रणाम के लिए भी हाथ उठ नहीं रहे…!! वह सचाई भी हमारे सामने तिर्यक दृष्टि से देख रही है कि –
अतुल प्यार का अतुल घृणा में मैने परिवर्तन देखा है!
मैने भी जीवन देखा है!!