संस्मरण

सुरेंद्र वर्मा ‘तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता’…!

 

अथ भूमिका उर्फ़ दो खड़ूस रचनाकारों की पसंदगी के सबब – मेरे हमनिवाले-हमप्याले दोस्त मुझसे प्रायः पूछते –बल्कि चिढ़ाते- रहे हैं – ‘तुझे दुनियादारी से दूर रहने वाले एकाकी व कुछ खड़ूस क़िस्म के अंतर्मुखी (‘निस्पृह-असंग-एकाकी’) वृत्ति वाले साहित्यकार क्यों पसंद हैं’!!

उनके पास इसके दो शीर्ष प्रमाण होते हैं – स्व. शिवप्रसाद सिंह और सर्वश्री सुरेंद्र वर्मा। इसके पीछे राज़  यह है कि ये दोनो उस तरह से कम लोगों को पसंद हैं, इसलिए मेरी यह पसंदगी अपने लोगों के ध्यान में आती है, वरना चारो प्रतिनिधि भक्त कवियों के बाद बिहारी-घनानंद, फिर इधर प्रेमचंद-प्रसाद-निराला-महादेवी तथा रेणु के बाद दुष्यंत-धूमिल-गोंडवी, …जैसे ढेरों रचनाकार मुझे समान रूप से ख़ासे पसंद हैं…लेकिन इन पर अपने लोगों में किसी का ध्यान नहीं जाता और पसंदगी में शिवप्रसादजी व सुरेंद्र वर्मा तक बहुत लोग नहीं पहुँचते…!! क्योंकि पसंदगियों के बड़े पैमाने इधर बन गये हैं – मतवाद एवं संगठन…आदि, जिनसे सुरेंद्र वर्मा तो एकदम ही दूर हैं और शिवप्रसादजी भी झोले-झंडे के साथ सक्रिय नहीं रहे कभी – और मेरे लिए भी साहित्य के आधार ये सब मत-मतवाद बिलकुल नहीं हैं।

और जहां तक ग़ैर दुनियादारी, अंतर्मुखता…आदि का सवाल है, ये दोनो ही जितने कठोर दूर से लगते हैं, नज़दीक जाने पर उतने नहीं रहते। हाँ, सबसे कुछ अलग, कुछ कम व्यावहारिक, कुछ अधिक ऐकान्तिक तो हैं ही…। लिहाज़ा, ऐसों को साधना-निभाना पड़ता है। उनके नज़दीकी होने और बने रहने के लिए थोड़ा झेलना पड़ता है…। और इन्हें झेलने या चला लेने की इच्छा, धीरज व हिम्मत बनाये रखने के बहुत सारे आसंग इनके साहित्य में मौजूद हैं, जिनके भरोसे चलकर एक बार करीब हो गये… (अंतस् तक तो ये जाने नहीं देते), तो प्रयत्न पूर्वक इन्हें थोड़ा-सा सह के रह सकते हैं – कन्हैयायालाल मिश्र प्रभाकर के कहे को सार्थक करते हुए – ‘आप किसी के साथ उतने ही दिन रह सकते है, जितने दिन उसे सह सकते हैं’। यह यूँ तो सबके लिए सच है। बस, इन दोनो के लिए ज़रा ज्यादा सच है। और ये दोनो यह बात जानते भी हैं, लेकिन जानबूझकर ऐसा करते हुए मुझे लगते नहीं।   

और इन दोनो रचनाकारों की बावत अपनी पसंदगी की हक़ीक़त तो यह रही कि जब एम.ए. (1975-77) के पाठ्यक्रम में निर्धारित शिवप्रसाद सिंह का उपन्यास ‘अलग अलग वैतरणी’ पढ़के मैं उनका दीवाना हुआ, तो न उनके जीवन के बारे में कुछ जानता था, न ही उनकी दो कहानियों – ‘नन्हों’ और ‘कर्मनाशा की हार’– के अलावा कुछ पढ़ा था। लेकिन 1993 में सुरेंद्र वर्मा का ‘मुझे चाँद चाहिए’ पढ़कर जब उन पर फ़िदा हुआ, तो उनके पहले उपन्यास ‘अंधेरे में’ का नाम भी नहीं सुना था। हाँ, उनके नाटक अवश्य पढ़ चुका था, जिसके चलते उस फ़िदाई में ‘सूर्य की अंतिम किरण…’, ‘आठवाँ सर्ग’ एवं ‘क़ैद-ए-हयात’ ...आदि की ख़ुमारें भी शामिल थीं…। और अब तो इस सूची में ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से’ जैसे क्लासिक व ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ जैसे ढाँसू उपन्यासों के साथ बिल्कुल विरल थीम पर आधारित व अब तक का उनका अंतिम नाटक ‘रति का कंगन’ भी जुड़ गया है। और यह सब तो पढ़-पढ़ के जाना, लेकिन मिलने के बाद कभी उन्हीं से सुना कि वे ‘धर्मयुग’ के लिए दिल्ली रंगमंच के अहवाल बताती ‘दिल्ली की चिट्ठी’ नामक स्तम्भ के साथ कभी-कभार ‘बैठे ठाले’ वाले लोकप्रिय स्तम्भ के लिए भी लिखते थे…।    

लेकिन ‘अलग अलग वैतरणी’ के प्रति मेरी दीवानगी तो एक तरह से ‘लरिकइवाँ का नेह’ था – लड़कपन से किशोरवय के दौरान वही ‘…वैतरणी’ वाला जीवन जीया था, जिसे गाँव से दूर मुम्बई में रहते हुए किताब में पाकर फ़िदा हो गया था। परंतु ‘मुझे चाँद चाहिए’ पढ़ने के समय तो मैं गोवा विवि में पढ़ा रहा था। वहाँ का पुस्तकालय यूँ तो समृद्ध था, लेकिन नयी व नामचीन किताबें उतनी पर्याप्त नहीं थीं। सो, मै हर एक-दो महीने पर जब घर (मुम्बई) आता, तो पुस्तकालय के लिए वांच्छित किताबें ख़रीदकर ले जाता – उसी में ‘मुझे चाँद चाहिए’ भी गया, जिसे नाम के आकर्षण में मैंने तुरत पढ़ने के लिए ले लिया। बता दूँ कि कृति इतनी प्रिय लगी कि लगातार बार-बार पढ़ने के मोह में उसे लौटाया ही नहीं। कालांतर में ख़रीदकर दूसरी प्रति दे दी पुस्तकालय में और मेरे पास वही प्रति आज भी है।

इसमें फ़िल्म व नाटक तो भरपूर हैं ही – नायिका वर्षा वशिष्ठ ‘राष्ट्रीय नाटय विद्यालय’ से उत्तीर्ण होकर थिएटर जगत और फिर फ़िल्म नायिका के रूप में सिने-संसार की यात्रा करती है…। उन्हीं दिनों इसे पढ़ने के दौरान किसी ने बताया था कि सुरेंद्र वर्मा एनएसडी में प्रायः पड़े रहते थे। यह वाक्य सुन के अच्छा नहीं लगा था, पर उसी से ‘मुझे चाँद चाहिए’ के उद्भव-विकास-उपराम…आदि की बात समझ में आ सकी। और कहना होगा कि ‘दिन-रात पड़े रहने’ ने यदि इतनी अच्छी रचना दी है, तो ऐसे पड़े रहने वालों के साथ नाट्य विद्यालय की भी बलैयाँ लेना बनता है…।

और पढ़ने के बाद वर्षा को लेकर अटकलें लगने लगी थीं कि रानावि की तत्कालीन छात्रा अभिनेत्रियों में कौन है वर्षा वशिष्ठ? कई नामों की चर्चा के बीच अंतिम रूप से यह पाया गया कि वस्तुतः वह किसी एक अभिनेत्री तक सीमित न होकर कइयों की मिली-जुली चरित्र होने के साथ बहुत कुछ कल्पना से निर्मित नायिका भी है। और ऐसा ही अनुमान-संधान नायक हर्ष को लेकर भी हुआ। फिर इनके माध्यम से कृति में निहित प्रेम के कई-कई पुरा कालीन एवं समकालीन तथा भविष्य क़ालीन अभिनव कोण भी हमारी फ़िदाई के कारक बनते हैं…। नायक हर्ष के माध्यम से कलामूल्यों और कला के प्रति गहन मरणांतक अनुरक्ति की पहचान होती है, तो वर्षा के माध्यम से कला-साधना के साथ जीवन को साधने और अपने प्रेम के प्रति अंतरिम समर्पण में मृत प्रेमी के बच्चे की बिनव्याही मां बनने तक का प्रौढ़-परिपक्व फ़ैसला लेने में आधुनिक व प्रगत नारी की मिसाल भी बनती है, जिसमे अपनी अनुरक्ति के निर्वाह की सार्थकता तथा सामाजिक व्यवस्था से ज़बरदस्त विद्रोह के बानक बनते हैं। फिर उसी के लिए न्योछावर हो जाने के रू-ब-रू होते हुए अन्य पात्र-पात्राओं से बनी इस रचना के प्रति मेरी दीवानगी तिहरी हो जाती है, जो उस पर विस्तृत समीक्षा में उपराम पाने का रास्ता ढूँढने लगती है…।

लेकिन कृति की बेहद पसंदगी के चलते मेरे मन में लिखने के पहले लेखक से मिलने की भी इच्छा बड़ी बलवती होती जा रही थी…। इस पर निर्णायक रद्दा रख दिया इसकी समीक्षा लिखने के सिलसिले से होती बातचीत के दौरान ‘धर्मयुग’ एवं ‘नभाटा’ के तत्कालीन सम्पादक श्रीयुत् विश्वनाथजी सचदेव ने – ‘लेखक से बात भी कर लेते, तो समीक्षा के साथ साक्षात्कार भी लगा देते – थोड़ी सीधी (फ़र्स्ट हैंड) जानकारी भी पाठकों को मिल जाती…और उनके मिज़ाज का भी कुछ पता लगता’…। फिर क्या था – ‘जैसय रोगिया भावै, वैसय बइद बतावै’ (वैद्य ने वही बता दिया, जो रोगी को भाता था) की दोहरी नियति के साथ मैं एकदम से जुट गया…।

पहली भेंट : खट्टे-मीठे आस्वाद – उन दिनों सुरेन्द्रजी का मुंबई-निवास मुझ मुरीद के लिए आँचल का छोर बन गया। यह भी उजागर करने लायक़ सच है कि ‘मुझे चाँद चाहिए’ में रानावि से पढ़े नायक को मुम्बई आना ही था। और उसके लिए मुम्बई को क़रीब से जानने के लिए लेखक का दिल्ली छोड़कर मुम्बई आ बसना भी क़ाबिलेगौर तो है, क़ाबिले तारीफ़ ज्यादा है। हालाँकि वे किशोरावस्था में एक बार मुम्बई आ चुके थे – तब ग्यारहवीं में पढ़ते थे और अपने सहपाठी सुबोध वर्मा के पिता सुबोध वर्मा के यहाँ कोलाबा में दो महीने रह भी चुके थे। वहां के स्थानीय होटेल ‘लियोपोर्ट’ में बैठने को बड़ी मसर्रत से याद करते हैं। अपने ख़ैर, इस तरह शुरू हुई – इस क्लासिक सर्जक के साथ मुझ मुरीद पाठक की प्रेम-कथा…। और तब पता चला कि इनके साथ तो सचमुच ही ‘प्रेम क पंथ कराल महा, ‘तरुवारि की धार पे धावनो है…’। लिहाज़ा उस मिलन को ‘प्रथम ग्रासे मच्छिकापात:’ कहना भी अत्युक्ति न होगी, पर उसमें विचित्रता भी ऐसी रही कि वह तरतीब से और तफ़सील में बताने लायक है…।  

वो हुआ यह कि ‘धर्मयुग’ से प्रस्ताव पाकर मैंने आनन-फ़ानन में पता किया, तो उन दिनों मेरे रोज़ के मित्र प्रसिद्ध रंगकर्मी व सिने अभिनेता स्व. दिनेश ठाकुर से उनके घर का नम्बर मिला और दोनो के दिल्ली-साथ के कारण लगे हाथों कुछ प्राथमिक जानकारियाँ भी मिल गयीं…। फिर घुमा ही तो दिया फ़ोन…तब दबाने वाला (मोबाइल) था ही नहीं)। ‘हेलो’ सुनते ही नाम व मक़सद बताया, तो उधर से बड़ी साँय-साँय की आवाज़ में गोया बम फूटा हो – ‘आपसे धर्मयुग के लिए बात कर लूँगा, तो क्या मुझे ‘ज्ञानपीठ’ मिल जायेगा’? सुनकर मनोविज्ञान का चलता-फिरता पाठक मेरा मन अपने कान में बोल पड़ा था – ‘बंदा ज्ञानपीठ के लिए तड़प रहा है’!! यह बात दूसरी है कि जब आगे चलकर उनके साथ  अपनी रफ़्त-जफ़्त रवाँ हो गयी और उनकी बावत यहाँ-वहाँ से बातें-चर्चाएँ भी आने-होने लगी थीं, तो पता लगा कि जिस बार प्रतिभा रॉय को ‘ज्ञानपीठ सम्मान’ मिला था, उस बार सुरेंद्र वर्मा को मिलने की बात भी फ़िज़ाओं में उड़ी थी, जिसका एक सूत्र भी सम्मान-समिति के एक आजीवन सदस्य की वर्माजी के प्रति प्रियता से जुड़ा था। सो, कह सकते है कि मिलते-मिलते रह गया था। बहरहाल, उस वक्त तो वर्माजी के उक्त इतने बेतुके और मुंहतोड़ जवाब पर मेरा भी लठैत ख़ानदान (मेरे दो काका लोग बाक़ायदे बद (तय) करके रातों को ‘लठियाही’ करने जाते थे) जाग गया था और मेरे मुंह से भी अनायास निकल गया – ‘कोई बात नहीं, आपके बात न करने से न ‘धर्मयुग’ बंद हो जायेगा, न मेरी रोज़ी-रोटी रुक जायेगी…। अरे, मुझे उपन्यास बेहद अच्छा लगा, तो सोचा कि इस पर विस्तृत चर्चा हो जाये…और वह आपके माध्यम से (फ़्रोम हॉर्सेज़ माउथ) हो, तो क्या कहने’!!

अब थोड़ी-सी चुप्पी हुई, फिर सुनायी पड़ा – ‘आप वही सत्यदेव त्रिपाठी हैं, जो नाटकों पर लिखते हैं’? सुनकर मेरी निराशा को थोड़ी आस बंधी, आक्रोश तो ठंडा पड़ा ही, राहत भी हुई कि कुछ तो पहचान निकली…। फिर मिलने पर इसकी बावत पूछा, तो सुन पड़ा – ‘नेमिजी ने ‘नटरंग’ का आजीवन सदस्य बना दिया था, तो उसके अंक उलटते-पुलटते बार-बार आता यह नाम ज़ेहन में रह गया…’, जो सुरेंद्रोचित ही है, क्योंकि उन जैसे सर्जकों के पढ़ने लायक़ वैसा कुछ मैने लिखा भी नही है।

किंतु वर्माजी के लिए यह हाल ‘नटरंग’ का व मेरा ही नहीं है – लगभग तमाम साहित्य व पत्र-पत्रिकाओं का है, क्योंकि उनके अध्ययन के मेयार बहुत ऊँचे हैं…साहित्य में कालिदास-ग़ालिब जैसे शीर्षों से नीचे उतरते ही नहीं…जिसके केंद्रीय प्रमाण तो हैं ही – सत्ता के समक्ष तन कर खड़े होने वाले कालिदास पर ‘आठवाँ सर्ग’ जैसा नाटक, जिसमें कवि के अड़ व रूठ जाने पर राजा स्वयं कविकुलगुरु को मनाने आता है। और इसके साथ ही ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखरी की धार से’ जैसा उपन्यास एवं ऐसे ही शायर ग़ालिब पर ‘क़ैद-ए-हयात’ जैसा दमदार नाटक, जिसमें घर के भीतर क़ैद हो जाने पर भी शायरे आज़म की गालिबी नहीं जाती…। इस तरह सुरेंद्र-साहित्य में ‘सत्ता बनाम कलाकार की समक्षता’ का ज़बरदस्त आयाम सामने आता है, जिसमें राजकीय सत्ता पर कलाकार की साख स्थापित होती है…और ध्यातव्य है कि ‘कलाकार बनाम सत्ता’ का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा सुरेंद्र-साहित्य की रीढ़-रज्जु जैसा है। इसीलिए वर्माजी की साहित्यिक ऊँचाई व गहराई का परमान यह भी कि किसी हिंदी किताब की तारीफ़ इनके मुखारविंद से मुझे कभी सुनायी न पड़ी…। कभी मुम्बई-निवास के दौरान मेरी लिखी प्रसादजी की जीवनी ‘अवसाद का आनंद’ उन्होंने माँगी, तो मैं दे आया, पर सालों हो गये…, कभी एक शब्द बोले नहीं। तो समझ में न आया कि पढ़ा, लेकिन बोलने लायक़ न पाया या शुरू करके पढ़ने लायक़ ही न पाया!! और अपनी किताब के नाते संकोच ने पूछने न दिया…! बहरहाल,

जैसा कहा गया कि सुरेंद्र वर्मा के पढ़ने-लिखने के मेयार बड़े ऊँचे और बड़े गहरे हैं, परंतु व्यापकता का पता अलबत्ता ज्यादा नही है मुझे – उनकी रचनाओँ से मिले सूत्रों के सिवा…। हाँ, अख़बार भी अंग्रेज़ी के व विदेशों के पढ़ते हैं। और छपित माध्यम की पड़ी नहीं इन्हें – गूगल-पारायण में दक्ष हैं। कभी उन्हीं से सुना कि सुबह जल्दी उठ के कई सारे अख़बार नेट पर खंगाल डालते हैं। इसी के ज़रिए देश व दुनिया के बारे में जानकारी पूरी रखते हैं और इनकी बावत उनके अपने दृढ़ विचार व अटल विश्वास भी हैं, लेकिन उन्हें साझा करने की इच्छा बिल्कुल नहीं रखते – जब तक कि उन्मुक्त बातचीत के दौरान जब मूड में हों, तभी कोई अ-निवार्य प्रसंग न आ जाये…। याने उनकी ज्ञान-समृद्धि व जागरूकताएं उनके अपने लिए हैं, अपने सृजन व उसकी समृद्धि के लिए हैं – जताने-बताने के लिए बिलकुल नहीं। उनकी बात किसी को एकांगी व वायवी लगती है, तो उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता – वे अपने में मुतमइन होते हैं। मुझे लगता है कि यह बहस में न पड़ना और अपनी बातें बताने-मनवाने से परे रहना, लोगों से कम मिलना…आदि सब उनकी आदतें भी उनकी ताक़ते ही हैं, जो निश्चितत: उनके सृजन को बिखरने व लेखकीय एकाग्रता को भंग होने से बचाती हैं। सो, वे रहते सदा अद्यतन (अपडेट) हैं, पर अ-निवार्य हुए बिना बोलते नहीं – बस, खुद में गुच्च (फुल्फ़िल्ड) रहते हैं।

फिर आगे मिलते रहने पर उनकी साँय-साँय की आवाज़ का भी पता चला कि बहुत पहले किसी वजह से स्वर-तंत्र में कुछ ऐसा हो गया था कि ऑपरेशन करना पड़ा…और तब से हमेशा के लिए आवाज़ की यही क़ुदरत हो गयी है – शुक्र रहा कि आवाज़ एकदम से गयी नहीं, जिसकी सम्भावना थी…। ख़ैर,

अच्छी बात – बल्कि कह लें कि बड़ी बात…यह हुई कि बिना किसी ना-नुकुर के मिलने को तैयार हो गये। लेकिन बात के लिए मिलन-स्थल के रूप में उन्होंने ‘न्यू अंपायर कैफ़े’ का नाम लिया…। अब तो ‘अपन के’ आश्चर्य का ठिकाना न रहा…लेकिन ‘मरतिउ बार कटक संहारा…’ की पाठशाला में पिजकर निकला हुआ मैं भी चुपचाप मान लेने वालों में न था। अतः अपने समूचे ऊहापोह पर क़ाबू पाते हुए निवेदन की मुद्रा में कह ही तो दिया – ‘आपके फोन नम्बर (तब मोबाइल न थे) से लग रहा कि आप अंधेरी में कहीं हैं और मैं बिलकुल इसके पास विलेपार्ले में रहता हूँ। फिर इतने आसपास से हम दोनो का एक-डेढ़ घंटे की यात्रा करके ‘न्यू अंपायर’ जाना, फिर आना…!! इससे तो अच्छा कि इधर ही कहीं मिलें…!! इस पर उनका सहज सवाल – ‘इधर कहाँ’? और इस पर मेरा गँवईं या घरेलू जवाब – ‘मैं यह तो कैसे कहूँ कि आप के घर मिलें, लेकिन आपको अपने घर तो आमंत्रित कर ही सकता हूँ’…। लेकिन उधर से आये तपाक उत्तर – ‘नहीं, घर पर तो बिलकुल नहीं’… ने मेरे सारे देशज (नेटिव) उत्साह पे तुषारापात कर दिया…!! बावजूद इसके, ‘मुझे चाँद चाहिए’ की फ़िदाई ने मिलनेच्छा के मासूम कमल को सूखने भी नहीं दिया…। फिर तो कई होटलों से लेकर मेरे परम प्रिय जहू-तट तक के विकल्पों के ख़ारिज होने ने लगभग निराश ही कर दिया था कि उन दिनों अपनी रोज़ की शामों के अड्डे ‘पृथ्वी थिएटर’ की याद आयी और मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकला – ‘पृथ्वी कैफ़े’ कैसा रहेगा? और ख़ुदा का करम…कि ‘हाँ, यह ठीक रहेगा’ के रूप में तुरत मंज़ूर हो गया…तो मेरी जान में जान आयी। बता दूँ कि उन दिनों कलाकारों-बुद्धिजीवियों के बीच ‘पृथ्वी थिएटर’ जाने, वहाँ नाटक देखने के साथ ‘पृथ्वी कैफ़े’ में बैठने की सनक (क्रेज़) और शान तो थी ही, साथ ही वहाँ के तब के ‘मक्के की रोटी, सरसो का साग’…जैसे लजीज़ खाने या पृथ्वी की तब की ख़ासियत ‘आयरिश कॉफ़ी’ पीने का आकर्षण भी कम न था। आज तो वहाँ ‘चलते-फिरते खाने’ (फ़ास्ट फ़ूड) की बहार और अग्रिम कूपन…जैसी व्यवस्थाओं से बनी तथाकथित प्रगत संस्कृति ने ‘पृथ्वी कैफ़े’ की पूरी कैफ़ियत ही बदल डाली है…। बहरहाल,

शाम का वक्त तय हो गया…। अब यहीं यह भी साफ़ कर दूँ कि घर आने की उनकी बंदिश भी सम्बंधों के नये होने तक ही चली…और तीन दशकों के दौरान यह सम्बंध पुराना तो अभी तक हुआ नहीं, जिसका कारण दिल्ली-मुम्बई की दूरी के चलते मिलने की बारम्बारता का नितांत कम होना भी है!! हाँ, उस प्रथम मिलन के बाद से ही इतना सहज हो गया कि जब भी मिलने की बात हो, घर के प्रस्ताव पर सहज ही राज़ी हो जाते…। और अच्छा संयोग है कि मुम्बई आके अपने जिस परम मित्र के यहाँ खार में कभी महीनों ठहरते हैं…, वह मेरे घर से ऐसा कोई दूर भी नहीं है। सो, एकाध बार दिखा देने के बाद कुछेक बार ऑटो से आ भी गये – इतने सहज भी हैं। और आने पर कुछ नाश्ते-वास्ते या खाने-वाने की पड़ी नहीं – बन जाने पर ज़ायक़ा भर ले लेते हैं, वरना ‘कॉफ़ी पर कॉफ़ी’ में ही मेहमान-नवाज़ी परवान चढ़ती है…। और कॉफ़ी-प्रेमी कल्पनाजी (पत्नी) भी हैं। सो, एक संगति भी बन जाती – अपवाद स्वरूप दोनो में मज़े की बातें भी होतीं…। लेकिन यह भी उन दिनों ही कुछेक बार हो पाया…। इधर लम्बे समय से सब बंद है – वे इन दिनों मुम्बई आते भी कम हैं।

गरज़ यह कि सुरेन्द्रजी की दुनियादारी या ग़ैर दुनियादारी का मामला न सार्वभौम है, न अक्खड़, बल्कि आपसी पसंदगी का है, जिसे थोड़ा चला लेना…और थोड़ा साधना पड़ता है…!! और ‘रहिमन फिरि-फिरि पोइये टूटे मुक्ताहार’ के तौर पर उक्त उल्लिखित ‘…चाँद चाहिए’, ‘सूर्य की अंतिम किरण…’ एवं ‘आठवां सर्ग’, ‘क़ैद-ए-हयात’, के साथ ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’, ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से’ एवं ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ एवं ‘रति का कंगन’…आदि मुक्ताओं (रचनाओं) से बने हार (लेखक) के लिए इतना तो बनता है…। बाक़ी जाने दुनिया… और वह सब दुनिया को ही मुबारक़…!!

लेकिन इस भावी प्रथम मिलन की विचित्रता की असली कहानी तो अभी बाक़ी है, जिसके लिए आइए – अब उस शाम के ‘पृथ्वी कैफ़े’ चलें…।

आपको याद होगा कि फ़ोन पर ‘धर्मयुग’ के लिए ‘मुझे चाँद चाहिए’ पर बात करनी है, से ही तो मिलन-प्रसंग की शुरुआत हुई थी। सो, वहाँ बैठकर कहने की बात तो थी नहीं कि उस पर बात की जाये…बल्कि कोई और होता, तो उसी से बात शुरू करता और उसी पर बात करने के लिए ज़ोर देता। लेकिन यहाँ जब-जब मै शुरू करना चाहूँ, वे कोई और बात शुरू कर दें…। ज्यादा बातें मेरे बारे में पूछें…मसलन – मुम्बई क्यों और कैसे आये, कहाँ-कैसे रहते हो, नाटकों में रुचि कैसे बनी, गाँव क्यों छोड़ा…गाँव में क्या है – कौन-कौन लोग हैं…आदि। और इन सबके उत्तर को अपनी आदत के मुताबिक़ व्योरेवार बताने में ज़ाहिर है कि घंटों निकल गये। लेकिन वे बड़े चाव से सुनते ही नहीं, बीच-बीच में पूरक प्रश्न भी पूछते रहे…, जो मेरे बताने के उत्साह को बढ़ाता रहा…। इस बीच उनकी सम्मति से समोसा-चाय भी ली जा चुकी थी…। फिर आख़िर तो मुझे अख़रियाना (आग्रह पर अड़ना) ही था कि अब ‘मुझे चाँद चाहिए’ की प्रेरणा और रचना-प्रक्रिया…आदि के बारे में बात शुरू की जाये…तो टका-सा उत्तर आया – ‘नहीं, उस पर कोई बात नहीं होगी – पहले हिंदी के विद्वानों को बोल लेने दीजिए’...।

अब तो मैं पाँचो खाने चित – चार खाने चित तो फ़ोन पर बात से यहाँ तक पहुँचने-बतियाने में ही हो चुका था…! क्या यही सुनने के लिए मैंने इतनी मशक्कत की थी…!! ऐसा था, तो शुरू में ही कह देते!! कहाँ तो किसी की परवाह न करने की ठसक और कहाँ हिंदी के विद्वानों की बातों का ऐसा इंतजार!! और मैं भी कहाँ तो मुम्बई के पेशेवर इंटरव्यू-कर्त्ताओँ की भाँति मन में धार के चला था कि घंटे-डेढ़ घंटे बात करके निकल लूँगा और रात को या सुबह दो घंटे में आलेख तैयार करके कल ही युनिवर्सिटी के काम पूरे होने के बाद ‘धर्मयुग’ में सम्पादक के सुपुर्द करते हुए उनकी चाय के साथ दो गाल बतिया के निकल लूँगा – किसी और काम-काज पर…। लेकिन यह तो ‘प्रथम चुंबने ओष्ठ भंग:’ हो गया…। दो-तीन घंटे गप्पें हुईं, पर काम की बात शुरू भी न हुई…। बता दूँ कि ‘धर्मयुग’ के लिए यह काम थोड़े दिनों बाद हुआ – एक विभागीय सज्जन ने किया, जिसे देखते ही जड़ संस्कारवश मेरे मन में यही कौंधा – ‘आख़िर वर्माजी सधे, तो श्रीवास्तव से ही’…ज़य हो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लेखक की…’!! मिलन के ‘अथ’ का ऐसा हस्र आगामी मिलनों की ‘इति’ का ही फ़ैसला लेके ‘पृथ्वी’ से निकला – याने मेरी ऊब-क्षोभ ने तय कर लिया था – ‘एहि तन भेंट सुरेंद्रहिं नाहीं’…(बाबा से क्षमा-याचना)!!

‘ओष्ठ भंग:’ के बाद फिर तक़ल्लुम – लेकिन कह दूँ कि इस झटके से सुरेन्द्रजी की रचनाओं के प्रति मेरी दीवानगी की राह में कोई फ़र्क़ न पड़ना था…। फिर मेरा यह निर्णय जीवन में उतरे, इसके पहले – याने इस प्रथम मिलन के कुछ दिनों बाद ही एक दिन उनका फ़ोन आ गया और उसी साँय-साँय की आवाज़ में सुन पड़ा – अरे भाई, वो हज़ारी प्रसाद द्विवेदीजी की एक किताब मुझे चाहिए, जो मिल नहीं रही…। दिल्ली होता, तो खोज लेता – यहाँ का मुझे ख़ास पता नहीं…’!! मैंने व्यवहारतन औपचारिक-सा उत्तर दिया – मेरे पास उनकी रचनावली है। आप नाम बता दें, मैं छायाप्रति कराके डाक से भेज दूँगा…और भेज भी दिया…गोकि इसी बहाने मिल भी सकता था, लेकिन तब ‘ज़ोर से’ वाला झटका जल्दी का ही लगा था, शायद इसी से इच्छा ही न हुई होगी…!!

परंतु इसके बाद जो हुआ, उसने मेरे मन में टूटने की कगार पर खड़े इस रिश्ते को जोड़ने का चमत्कार कर दिया…। किताब की छायाप्रति भेजने के सप्ताह भर में ही डाक से एक लिफ़ाफ़ा मिला, जिसमें एक चेक था – याने छाया-प्रतियाँ कराने का दाम व डाक-खर्च लौटाया गया था, जो मुझे यूँ तो क़ुबूल न होता, लेकिन लौटाने की वह अदा भा गयी – जिसमें लहालोट कर देने वाली चीज़ थी – लिफ़ाफ़े से बरामद हुई एक चिट्ठी नहीं, चिट, जिसमें लिखा था – ‘इसे आप स्वीकार नहीं करेंगे, तो आगे से कुछ भी करने के लिए न कहूँगा…’। और ‘लैला-मजनूँ’ नौटंकी के मजनूँ की शब्दावली ‘तेरी बाँकी अदा पे मैं खुद हूँ फ़िदा’ में कहूँ, तो इस पंक्ति के बाँकपन पर मैं फिर फ़िदा हो गया – वैसे ही जैसे कोई आशिक़ अपनी माशूका का पूरा बदन छोड़ कर सिर्फ़ उसकी ठोड़ी के तिल पर फ़िदा हो जाये…!!

फिर तो हमारे रिश्तों की गाड़ी जो चली…तो चलती जा रही…

मुख्य कारण – ‘मुझे चाँद चाहिए’ – अब आगामी भेंटों व बढ़ते रिश्ते की कथा को रोक कर यहाँ ‘मुझे चाँद चाहिए’ की छोटी-सी कथा सुना दूँ, क्योंकि हमारे बीच जो भी बना-पला-बढ़ा, उसके मूल में है यही किताब…। यह न होती, तो सुरेंद्र वर्मा के साथ मेरे ये सम्बंध न होते…, जिसे मैं हिंदी (बाक़ी भाषाओं का बहुत कम पढ़ने से कहने का अधिकारी नहीं) का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास सिर्फ़ कहूँगा ही नहीं, कोई चाहे और इसके बरक्स कोई उपन्यास रखे, तो विमर्श करके सिद्ध भी करना चाहूँगा…भले वह सिद्ध हो, न हो – जैसा कि साहित्य में ‘इदमित्थम’ (यह ऐसा ही है) जैसा कुछ होता ही नहीं। इस पर समीक्षा मैंने लिखी, पर जब सब लोग लिख चुके, तो लगभग दर्जन भर समीक्षाओं (जिन्हें पाने-जुटाने  की भी एक कथा-यात्रा है, जिसमे नहीं जाना) को पढ़ने के बाद…। कहना होगा कि सभी ने उपन्यास की तारीफ़ें तो कीं या कह लें कि अच्छाइयाँ तो बतायीं, पर नुक़्स सभी ने कम न निकाले…। सुरेन्द्रजी के प्रगत (प्रगतिशील नहीं) सोच, क्लासिक रचनाशीलता को ख़ास तवज्जो किसी ने न दी। ग़ज़ब की भाषिकता, चमत्कारी नाट्यमयता व खूबसूरत अंदाज़े-बयां…आदि के अनोखेपन को न किसी ने ठीक से विवेचित किया, न खुल के सराहा…! ऐसा नकार करने वालों में प्रसिद्ध कथाकार पंकज विष्ट उन दिनों सबसे अग्रणी लगे थे मुझे, जिनने कृति की विशिष्टता की चर्चा कम की थी, बल्कि मीन-मेख ज्यादा निकालने की रौ ‘मुझे चाँद चाहिए’ के लिए हिंदी भाषा को भ्रष्ट करने वाला भी कह दिया था, जो डकरै ग़लत है। उनके ऐसे विचारों, बल्कि प्रतिक्रियाओं, में इस कृति की श्रेष्ठता व लोकप्रियता के समक्ष उन्हें अपने उपन्यास को मिली कमतर तवज्जो के ‘भाव’ की कुंठा भी साफ़-साफ़ दिख रही थी। लेकिन मुझे तो उनके भी उपन्यास काफ़ी अच्छे लगे हैं और मज़े की बात यह कि सुरेन्द्रजी से मिलने के बाद पता लगा कि इन्हें भी विष्टजी के पहले दोनो उपन्यास -‘लेकिन दरवाज़ा’ और ‘उस चिड़िया का नाम’- पसंद हैं। ख़ैर, गरज़ यह कि पहले की सारी समीक्षाओं के संदर्भों को सहेजते, सबके सवालों-एतराज़ों की चर्चा करते हुए उपन्यास में निहित स्थापनाओं पर तेज रोशनी डालते हुए जो समीक्षा मैने लिखी…,उसे छापते हुए ‘दस्तावेज’ के सम्पादक वि.प्र. तिवारी ने कहा था – ‘मैंने खुद इसकी समीक्षा लिखी है, पर पढ़ने के बाद मुझे आपकी ही देना पड़ रहा’। यहीं यह भी बता दूँ कि सतत मुलाक़ातों-बातों के बावजूद अपनी समीक्षा की बात मैंने सुरेन्द्रजी को कभी बतायी नहीं, तो उन्हें भी देखने की कौन कहे, पता भी न चला था। फिर कुछ दस-एक सालों के लम्बे अंतराल पर कहीं से उन्हें मालूम हुआ…, तो मुझसे ही लेके पढ़ी…। उस पर उनकी टिप्पणी मेरे लिए यादगार है – ‘हिंदी में ऐसी समीक्षाएँ भी लिखी जाती हैं’!!

लेकिन कथा यह नही थी…। कथा तो यह है कि अपनी दीवानगी को क़ुर्बान करते हुए इस उपन्यास को मैंने अपने ‘एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय’ के पाठ्यक्रम में रखा दिया। रखते हुए खूब विरोध हुआ – अध्ययन मंडल (बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़) के अधिकांश सदस्य (कुछ तो नितांत अपने होते हुए भी) बिलकुल ख़िलाफ़ थे – विशेष याद अपनी मुस्कराती अदा में विरोध करते अपने ख़ास मित्र दामोदर खडसेजी की है, जो मेरे प्रस्ताव पर ही बाहरी विशेषज्ञ (एक्सटर्नल एक्सपर्ट) के रूप में उपस्थित थे। और विरोध का ख़ास निशाना था – नायक-नायिका का सम्भोग दृश्य, जो पाँच सौ से अधिक पृष्ठों के उपन्यास में बमुश्किल सात-आठ पंक्तियों का ही है। हाँ, उसमें नायिका का कुँवारी मां बनना तब अवश्य कुछ लायक़ था बहस के, लेकिन मेरे पास साहित्य की अवधारणाओं के सिवा इस जीवन-सत्य के कुछ प्रत्यक्ष व सरनाम उदाहरण भी थे, जिनमें सर्व विदित नीनाजी गुप्ता एक हैं, जिन्होंने ‘सूर्य की अंतिम किरन…’ खेला था और नायिका की मुख्य भूमिका भी निभायी थी..। किंतु मेरे लिए सबसे अधिक सोचनीय व विस्मय का मामला यह था कि सुरेन्द्रजी की कालिदास से जुड़ी एवं अन्य क्लासिक रचनाओं की महत्ता-रोचकता आदि जैसी तमाम ख़ासियतों से उन विरोध करने वालों को कोई मतलब ही नहीं लग रहा था…। हाँ, पूरे देश की ही तरह महाराष्ट्र के सुदूर गाँवों के महाविद्यालयों में ऐसी बोल्ड कृति से ‘लड़कियों के बिगड़ने के ख़तरे’ का अंदेशा साबित कर देना कोई अजूबा भी न था…।

किंतु इन सबके बावजूद मैंने बड़ी कोशिश की, बल्कि कहूँ कि विभागाध्यक्ष की हैसियत से कुछ दबंगई भी की और एक साल के लिए प्रयोग के तौर पर इस शर्त के साथ रखवाने में कामयाब हो गया कि बहुत अधिक दिक़्क़तें आयीं – ज्यादा विरोध हुए, तो विशेष बैठक बुलाकर बदल देंगे। सुना था कि उसी शाम समिति के कुछ लोगों ने इसके एवज़ में रखने के लिए कुछ अपने-अपनों एवं मतलबों के जोड़-घटाने के साथ दूसरा उपन्यास तय भी कर लिया था, जो हमारे अध्ययन-मंडलों की सरनाम ख़ासियतें या अनिवार्य शैतानियाँ (निसेसरी इविल्स) होती हैं। लेकिन कमाल यह हो गया कि जब साल भर बाद कोई कुछ नहीं बोला, तो मैंने ही सबसे सामने से पूछा…, तो पता चला कि कोई भी इसे बदलने को तैयार न था…। और मज़ा यह कि उन प्राध्यापकों में अधिकांश महिलाएँ ही थीं। मुझे बच्चनजी याद आ रहे – ‘बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला, पी लेने पर तो सबके मुंह पर पड़ जायेगा ताला’। और यहाँ तो ताला ही न लगा, तलब बढ़ गयी…!! सो, यह पाठ्यक्रम में लगा ही रहा…। मैं 2016 में सेवामुक्त हो गया, पर यह 2022 में तब निकला, जब विश्वविद्यालय की तरफ़ से पाठ्यक्रम का पूरा ढाँचा ही बदलने की योजना आयी। किसी कृति का तेरह साल तक पाठ्यक्रम में चलना भी विश्वविद्यालयों के इतिहास में एक विरल दस्तावेज ही होगा…!! लेकिन मेरा दृढ़ मानना है कि ऐसी लियाक़त हो, तो ऐसे अपवाद इतने बनने चाहिए कि वे अपवाद न रहकर नियम बन जायें…।  

‘चाँद’ का विस्तार हुआ ‘गुलदस्ता’ में – और बता दूँ कि उस प्रक्रिया में बंबइया जीवन को उन्होंने इतना जान लिया कि इसी मुम्बई महानगर के जीवन की एक दीगर ज़मीन पर एक और उपन्यास ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ भी लिख दिया। इसकी बावत यह भी बता दूँ कि वह पढ़ा तो काफ़ी गया, लेकिन मेरी जानकारी में उस पर लिखा कुछ नहीं गया – सिवाय गोपाल राय की अपनी पत्रिका (समीक्षा) में लिखी एक टिप्पणीनुमा समीक्षा के, जिसका शीर्षक ही सारी हिक़ारत की कहानी कह देता है – ‘तीसरे मुर्दे के लिए आख़िरी गुलदस्ता’। हिंदी अकादमी, दिल्ली की पत्रिका के लिए मैने लिखा, पर बहुत बाद में। कौन कहे कि उस पर लिखने के भीषण अकाल में उपन्यास के शीर्षक के साथ राय साहब की समीक्षा भी काफ़ी हद तक कारण न बनी होगी…। आख़िर अपना देश तो ‘कौआ कान ले गया’ सुनने पर अपना कान न देखकर उड़ते कौए के पीछे भागने वाला ठहरा…!! और गोपाल रायजी को मैं ऐसा शुद्धतावादी नहीं समझता था कि जीवन की ऐसी अनिवार्य ज़रूरत वाले मुद्दे पर हुए लेखन को लेकर इतनी हिक़ारत से पेश आयेंगे!! यदि वेश्या-जीवन पर लिखकर कुछ लेखक बड़े हो सकते हैं – बड़े-बड़े लेखक बड़े-बड़े सम्मान पा सकते हैं…, तो पुरुष वेश्या पर हिक़ारत क्यों? क्या इसलिए कि यह नया व विरल है – बड़े शहरों…आदि में ही सम्भव है? लेकिन पुरुष की ज़रूरत पूरा करने के लिए वेश्या-जीवन यदि सहानुभूति पा सकता है, उदात्त हो सकता है, तो स्त्री की ज़रूरत पूरा करने पर लिखना गुनाह क्यों? क्या यह लिंगभेद के अंतर्गत नहीं आता? लेकिन ताज्जुब और सोचनीय है कि इस पर न कोई पुरुषवादी बोला, न नारीवादी। न बामपंथी बोले, न दक्षिणपंथी। याने ‘लकीर की फ़क़ीर’ दुनिया ने इसे समझने की कोशिश ही नहीं की!! और ऊपर से कूढ़मगज लोगों की सुनी-सुनायी को लेकर ‘जिगालो (पुरुष वेश्या) व मुम्बई की काली दुनिया’ पर लिखे उपन्यास’ का अनलिखा लेबल लगा दिया गया!! लेखकों-समीक्षकों की इन सारी शिकायतों का असर कम-ज्यादा, जो भी सही, पाठकीयता पर अवश्य पड़ा होगा और चर्चा तो नहीं के बराबर हुई ही…।

फिर उपन्यास से गुजरे बिना कोई यह कैसे देखता कि कृति का नायक पात्र जिगालो (पुरुष वेश्या) बनने पर विवश किसके चलते हुआ…? शिक्षा-जगत की चोटी -याने राजधानी की बड़ी यूनिवर्सिटी में हिंदी के विभागाध्यक्ष पद- पर बैठे उस प्रोफ़ेसर के चलते, जिसकी लड़की इस नायक से प्यार करने लगी थी। और बेटी के उस बाप ने दंड-स्वरूप ऐसा क्रूर जाल बुना कि देश की राजधानी की यूनिवर्सिटी में सर्वोच्च अंक पाने वाले उस ज़हीन युवा को पूरे देश में कहीं प्राध्यापकी न मिली। जी हाँ, राजधानियों से लेकर तमाम शहरों के विश्वविद्यालयों में ऐसे-ऐसे दबंग हुए हैं…। यह एक अलग ही निहित मुद्दा है इस उपन्यास में…लेकिन विडम्बना यह कि ऐसी ज़हीन समस्या पर लिखे उपन्यास को श्रेय न देकर इसकी छीछालेदर हुई – लानत-मलामत की गयी…, जिसके चलते यह मुख्य धारा में न आ सका!! और मेरा कयास है कि इस समस्या पर आज तक कोई उपन्यास नहीं आया (और आया हो, तो सरनाम नहीं हुआ)। ऐसे प्रतिभाशाली पात्र को ऐसे मामले में अक्सर मज़दूर-ट्यूटर-सेल्समैन या छोटा-मोटा धंधा… आदि करने वाला बना दिया जाता है…। किंतु यहाँ जिगालो बना देने का विद्रूप रचा गया, जो रचनात्मकता के लिहाज़ से क्या कम मारक व्यंग्य व विरोध का सबब है?  

फिर जिगालो के कलेवर में निहित क़समसाती न सही, शांत पड़ी उस आत्मा को भी लोगों ने नहीं देखा, जो मूलतः प्रेम से बनी है – प्रेम में बसी है, इसी में पगी है और इसी पर क़ुर्बान हो जाती है… वरना कौन ऐसा युवक होगा, जिसे ज़िंदगी चलाने के लिए जिगालो बन जाने के दौरान मनचाही सर्वांग सुंदरी कन्या के साथ बड़े व्यावसायिक समूह में निदेशक का पद, समुद्र-किनारे शानदार फ़्लैट व बड़ी गाड़ी… आदि की सारी भौतिक सुविधाएँ मिली हों…और वह छोड़ दे यह सबक़ुछ – अपने बचपन के प्यार के लिए? इसमें रेखांकित तो क्या उजागर करने वाली एक बात या एक ज़बर्दस्त सचाई यह उघाड़ी गयी कि उस बाला के पति ने उक्त सारी सुविधाएँ जानबूझकर दीं, ताकि कोई मामला न खड़ा हो…और युवा पत्नी उधर अपने प्रेमी युवा के साथ तुष्टि पाती रहे…और इधर यह बंदा निछद्दम भाव से अपना धन्दा-व्यापार कर-करा सके – गोया ‘ताको टुकड़ा डारि दै भजन करो निस्संग’। अब इस कटु-विद्रूप भरे यथार्थ जीवन व इससे नि:सृत ऐसे सम्भावित सोच को आप जो भी नाम दें – उत्तर उत्तर-आधुनिकता, उत्तर बाज़ारवाद या फिर उत्तर उपभोक्तावाद…आदि, लेकिन घीसू-माधव द्वारा पुत्रवधू-पत्नी के ‘कफ़न’ के पैसों की शराब पी जाने जैसी बाहोशी-बेहोशी के बरक्स एक अलग व अजीब सीमांत पर खड़े या पड़े जीवन की ऐसी मारक रचनात्मकता बेशक ही मात्र विचारणीय नहीं, अपितु विचारोत्तेजक भी है।  

फिर इसके बाद का निष्कर्ष तो सबसे मार्मिक… उस जिगालो उर्फ़ पक्के प्रेमी में से ऐसा खाँटी मनुष्य निकलता है कि गाँव की लड़की से अपने पहले प्रेम के लिए वह इस सारी सुख-समृद्धि वाली प्रेमिका को छोड़ देता है और कॉरपोरेट ख़ानदान की उसी लड़की व उसके पैसों के दम पर किराये के टट्टुओं द्वारा दी जाती मरणांतक यातना-अपमान सहते हुए लावारिस मौत मारा जाता है…। तो फिर इस अपार सुख-समृद्धि के समक्ष अपने बाल-प्रेम पर क़ुर्बान हो जाने को लेकर रचा गया यह उपन्यास ‘जिगालो का उपन्यास’ हुआ या ‘सच्चे प्रेम एवं खाँटी मनुष्य’ का…? इसके साथ उसके दोस्त के ज़रिए काली दुनिया (अंडरवर्ल्ड) के डॉन व उसके गैंग की कथा भी चलती है…, जिसमें आज की घनघोर भौतिकता के दुर्निवार मोह में खोती मनुष्यता के विस्फोटक मामले बड़े पेशेवराने अंदाज में नुमायाँ होते हैं। लेकिन इसे हिंदी जगत ने कोई तवज्जो न दी, जिसे मैं अपने साहित्य-समाज की दक़ियानूसी दृष्टि का परिणाम व प्रमाण ही कहूँगा…। लेकिन इसे शायद भविष्य का पाठक कभी पढ़े…तो फिर समझ पायेगा। खुद सुरेन्द्रजी ने इसका नाट्य-रूपांतर भी कर दिया है और फ़िल्म के लिए इसका अनुबंध होना भी सुन पड़ा था। लेकिन अनुबंध हुआ था – सतीश कौशिक के साथ, जो अब रहे नहीं। परंतु फ़िल्में देखने, उस पर किंचित लिखने-पढ़ने के अपने अनुभव के बल मैं कह सकता हूँ कि यदि कोई सुबुद्द्ध निर्देशक व दिलदार निर्माता मिल गया…और यह मंच व मीडिया पर आ गया, तो अपनी ढांसू कथा और मौजूँ कथ्यों के चलते दोनो ही प्रारूपों में इसके झंडे गड़ेंगे…याने इन प्रदर्शनपरक कला-माध्यमों में इसे अपना दाय मिलेगा, तो ‘उत्पस्यसे हि मम कोsपि समानधर्मा, कालो ह्ययम् निरवधि विपुला च पृथ्वी’…की धारणा फिर एक बार सार्थक होगी…। बहरहाल, अब कुछ और भेंटों के माध्यम से आगे बढ़ें…।

दो औचक भेंटें और घर जाने-आने के सिले-सिलसिले – पृथ्वी कैफ़े की परिणामहीन वाली उस अजूबा भेंट के बाद कुछ-कुछ दिनों के अंतराल पर दो औचक मुलाक़ातें हुईं…। पहली तो आज़ाद मैदान (चर्चगेट) में लगे पुस्तक मेले में टकरा गये…। मैं पत्नी के साथ था – वे अकेले घूम रहे थे। आमना-सामना हो जाने पर ‘नमस्ते’ और पत्नी से परिचय कराने के बाद दो मिनट की औपचारिक बातें हुई और चल पड़े…लेकिन थोड़ी देर बाद बड़ी हड़बड़ाहट में चलते व इधर-उधर चकबकाते हुए फिर टकरा गये…और सहसा पूछने लगे – आपने किसी लड़की को देखा…और लड़की का हुलिया बताने लगे…। हमने ‘ना’ की…और साथ में खोजने का प्रस्ताव रखें…तब तक बदहवास-से चल पड़े। बहरहाल, उस दिन मेले में कुछ देर बाद मशहूर रंगकर्मी व सिने अभिनेता स्व. दिनेशजी ठाकुर मिले अपनी अभिनेत्री पत्नी प्रीता माथुर ठाकुर के साथ, जो दिल्ली के ताल्लुकात के चलते खूब जानते रहे सुरेंद्रजी को…। मैंने आश्चर्य की तरह उनसे यह वाक़या बताया, तो वे सहज भाव से बोले – वह ऐसा ही है। कब क्या करेगा-कहेगा, पता नहीं, पर शख़्स बड़ा है और अपने ही ढंग का…। इस पर मुझे याद आयी अनन्वय अलंकार के उदाहरणस्वरूप याद की गयी पंक्ति  – ‘उपमाहीन रचा विधि ने बस भारत के सम भारत है’। और इसी ढर्रे पर ये अपने सुरेंद्र वर्मा भी मुझे बस सुरेंद्र वर्मा के ही समान लगते हैं…!!

दूसरा आमना-सामना बांद्रा-स्थित बहुत बड़े सभागार ‘रंगशारदा’ से लौटते हुए हुआ। राजा बुंदेला के निर्देशन में नागबोडस के सुपरिचित नाटक ‘खूबसूरत बहू’ का पहला प्रदर्शन था। नाटक के साथ वे कई कलाकार भी जुड़े थे, जो अशोक वाजपेयीजी के ‘भारत भवन’ छोड़ने के बाद पलायित होकर मुम्बई आये थे…। नाटक का खूब प्रचार हुआ था। अपवाद स्वरूप शाम के बदले अपराह्न का शो था। शहर का पूरा कला-समाज जुटा था…। तब वहाँ आसपास यातायात के आज जैसे ढेरों साधन न थे। सो, नाटक छूटने पर सभी लोग पैदल ही सामने के बड़े मैदान से होके स्टेशन या बस के लिए एस.वी. रोड की तरफ़ जा रहे थे…। देखा, तो सुरेंद्र वर्मा हम सबसे 50 फ़िट की दूरी बनाये अलग-थलग अकेले चल रहे थे…। मेरा मन न माना, जाके नमस्ते किया…दो मिनट बातें कीं। साथ चलने का आग्रह किया, पर वे बिना जवाब दिये अनटे-से अपनी राह चलते रहे…तो मैं वापस आ गया। हमारे समूह के लोग तो उधर बार-बार देखते रहे…लेकिन एकाकीपने की निरपेक्षता, जिसे असामाजिकता के सिवा क्या ही कहा जायेगा, की हद यह कि इन्होंने हमारी पूरी जमात की तरफ़ एक भी बार नज़र तक न उठायी…!! यह स्वभाव किसी भी तरह समझ में आने वाला नहीं। ऐसे व्यक्ति पर लिखने को लेकर कोई उनके व्यक्तिमत्व ही नहीं, मेरे इस लिखने पर भी सवाल उठा सकता है…कि ऐसे शख़्स पर लिखना क्यों? पर सृजन में इतना सुंदर-ललित, मूल्यपरक-सरोकार युक्त संसार खड़ा करने वाले को क्या इसलिए छोड़ दिया जाये – उपेक्षित किया जाये कि वह व्यावहारिक नहीं है!! फिर तो ऐसे पाठक को भी कोसा ही जाना चाहिए…। फिर प्रतिभाओँ का कुछ खब्ती होना तो कुदरती ही ठहरा!!    

इसके बाद कभी कुछ ख़ास पूछने के लिए मैंने फ़ोन किया, तो उन्होंने ठीकठाक सामान्य ढंग से बात की…और चलते-फिरते ढंग से चलता हुआ यह रिश्ता औपचारिक से कुछ आगे बढ़ने लगा…। फिर एक बार वो चमत्कार हुआ कि उन्होंने सामने से कहा – घर आ जाइए – उसी अंधेरी वाले आवास पर। वहाँ भीतर पहुँचते ही लगा कि बैठक-रसोईं व एक शयनकक्ष वाले छोटे से घर को वे बड़ा चुनमुनवां बना के रखते हैं – एकदम साफ़-स्वच्छ-व्यवस्थित, जिसकी उम्मीद अब तक के देखे सुरेन्द्र वर्मा से बनी छबि के मुताबिक़ मुझे बिलकुल न थी। इसके काफ़ी अरसे बाद जब वे मुंबई छोड़ चुके थे और हमारे मिलन-संवाद काफ़ी बढ़ गये थे…, वे कोई फ़िल्म लिखने मुम्बई आये और निर्माता के दिये घर पे सातबंगला में रहने लगे थे…। वहाँ गया, तो बिलकुल ही अस्त-व्यस्त घर देखने को मिला। अंधेरी में तो बातों के बीच मिश्रक (मिक्सर) से बना के कोई शर्बत पिलाया था, पर यहाँ पूछा तक नहीं…!! क्या इसलिए कि घर तो निर्माता का है, फिर वे आतिथ्य क्यों करें, उसे स्वच्छ क्यों रखें? ख़ैर, यह तो दिल्लगी हुई। हाँ, उनकी बावत मेरा सोच व सच यह है कि कब-क्या-कैसे करेंगे…, सब उनके मूड की बात है!!

दोनो घरों के सलूक में एक फ़र्क़ और दिखा…। अपने घर में तो घंटे भर खूब धाराप्रवाह बातें की थीं… फिर उसी रौ में बड़े इत्मिनान से कह दिया था – बस, अब आज इतना ही… जैसे यह आवाज़ नियोजित न होकर अंदर से आयी हो…। तब तो मुझे लगा था कि ज्यादा समय एकाकी रहने से वे देर तक किसी से बात नहीं कर सकते या एकदम खुल-खोल के कहूँ, तो किसी को देर तक सह नहीं सकते। इसी सब के चलते मुझे भी अचानक ‘अब बस’ कहने से झटका न लगा…और मैं तुरत उठ खड़ा हुआ। नमस्ते करते हुए कदम बढ़ाये कि उन्होंने झटपट दरवाजा भी खोल दिया – याने कोई विदा-उदा की रस्मी बात नहीं – ‘फिर आइएगा’, की दुनियादारी नहीं – सब कुछ सीधे-सीधे, पर यांत्रिक भी नहीं…!! लेकिन सात बंगले वाले उस निर्माता के दिये घर में उस शाम दो-ढाई घंटे बात करते रहे…जैसे बातें ख़त्म ही न हो रहीं हों..। अंततः मुझे ही ‘अब चलूँगा…’ कह के उठना पड़ा…। याने साहित्यकार सुरेंद्र वर्मा नाम्ना प्राणी ऐसे मामले में ‘देयर इज नो डिज़ाइन इन ह्यूमन लाइफ़’ के साक्षात नमूने ठहरते हैं!!  

इस ‘नो डिज़ाइन’ का एक और हवाला इसी सातबंगला के आवास से याद आ रहा…। ‘मुझे चाँद चाहिए’ के लम्बे समय तक पाठ्यक्रम में रहने से विश्वविद्यालय की छात्राएं प्रभावित होती ही थीं, लिहाज़ा सुरेन्द्रजी पर कुछेक एम.फ़िल. के और दो शोध-कार्य पीएच.डी के हुए – एक मेरे मार्गदर्शन में, दूसरा किसी और प्राध्यापक के। मेरी वाली छात्रा पढ़ाकू तो है, लेकिन बिलकुल घरेलू। उधर वह दूसरी वाली पढ़ाकू के साथ सक्रिय भी रही, तो उसके भी सुरेन्द्रजी से मिलने-जुलने के सहज रिश्ते बने। उसे भी सुरेन्द्रजी मेल-मेसेज-फ़ोन करके सूचित करते…। वह भी उनके सातबंगला रहने के दौरान कभी आयी थी मिलने…। सब कुछ सहज चल रहा था…कि अचानक एक दिन उसने मुझे फ़ोन पर बताया कि सुरेन्द्रजी ने उसे मेल-संदेश-रु-ब-रु (फ़ेसबुक)…हर जगह से अमित्र (अनफ़्रेंड) कर दिया है। कारण का न कुछ पता, न पते का कोई ज़रिया – इनकी तरफ़ से कोई ज़िक्र नहीं, मेरे पूछने का प्रश्न नहीं…!!  

अभी थोड़ा पहले (2021-22 के दौरान) ऐसा हुआ, जब मुम्बई वाले अपने दोस्त के यहाँ स्नानघर में गिर पड़े थे, जिससे पट्ठे की हड्डी टूट गयी थी। उसके एक दिन पहले मैं उनसे उसी घर में मिलने गया था। खूब दो-तीन घंटे बातें हुई थीं। उस अपने मित्र-परिवार से बड़े विनोद भरे अंदाज में मेरा परिचय कराया था। लेकिन हड्डी टूटने की खबर के बाद मैं हाल-चाल के लिए फ़ोन कर-कर के हार गया – उठा ही नहीं फ़ोन!! और मुझे शंका हो गयी कि नाराज़ हो गये। और नाराज़गी का कारण भी खोज निकाला मेरे मन ने…उस शाम घर पे हुई भेंट के दौरान हँसी-हँसी में मैने प्रस्ताव रख दिया था कि इतने लोग आप को पढ़ते हैं, आप के साहित्य पर काम करते हैं, पर कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं है कि आपके जीवन के बारे में जाना जा सके। तो इस मुम्बई-यात्रा में आप काफ़ी मुक्त भी हैं (ऐसा बताया था उन्होंने ही कि किसी किताब पर काम-वाम नहीं कर रहे हैं), तो क्यों न दो-तीन बैठकें कर ली जायें…और मेरे सवालों के ज़रिए आपके जीवन पर कुछ सही-सही सामग्री सुलभ हो जाये। लेकिन वे कुछ बोले नहीं – एक विद्रूपमय मुस्कान देके रह गये…। तो मैने भी ज़ोर न दिया…। इसके बाद ही फ़ोन उठाना बंद हुआ था, तो मुझे लगा कि शायद मुझे बेहद कामकाजी-मतलबी…वग़ैरह समझ के कट या काट रहे हों…। लिहाज़ा मैने भी फ़ोन करना रोक दिया…। वे दिल्ली चले गये और दो महीने बाद तक कोई संवाद न हुआ। तबियत की खबर अन्य स्रोतों से मिल जाती। लेकिन फिर घनघनाते हुए फ़ोन आने लगे…सब कुछ सहज था…। तो यह अनिश्चितता सुरेंद्र वर्मा नामक शख़्स की चिरसंगिनी है – बल्कि कहें कि ऐसी अनिश्चितताओं से वे बने हैं या इन्हीं ने उन्हें बनाया है…। हाँ आजकल मेरे साथ यह अनिश्चितता काफ़ी कुछ कम हो गयी है – बल्कि कह सकते हैं कि निश्चितता में बदल गयी है, जिसका मतलब है कि एकदम से गैरदुनियादार नहीं हुए हैं अभी। बहरहाल,

सुरेंद्र वर्मा की नायाब फितूरी फ़ितरतें उक्त बातें तो फिर भी लगे हाथों होती रहीं…लेकिन ताल्लुकात के शुरुआती वर्षों में मुझे जाने कैसे अपने ये सम्बंध घरेलू तो क़तई नहीं, लेकिन कुछ अधिक सहज एवं थोड़े अनौपचारिक महसूस होने लगे थे…। और शायद इसी से मेरे कुछ गँवईं व कामकाजी स्वभाव के चलते कुछेक अजूबे वाक़ये घटते रहे…जिनके सप्रसंग आख्यान विरल-विचित्र होते हुए भी ज़रूरी इसलिए हैं कि इन्हीं में बसते हैं अपनी तरह के अनोखे सुरेंद्र वर्मा…।

सबसे पहले वह वाक़या लें, जो सबसे विचित्र व इसीलिए सर्वाधिक रोचक व मेरे लिए मारक सिद्ध हुआ है। एक समय में बेवजह यह बात फैल गयी थी कि सुरेन्द्रजी से मेरे काफ़ी अच्छे सम्बंध हो गये हैं…। सो, मुम्बई से पूना-गोवा तक पढ़ाने के नाते इन इलाकों के लोग मुझसे सम्पर्क करने लगे और मुझे यह जान के सुखद लगा था कि उनके साहित्य पर उधर बहुत काम हो रहे थे। लेकिन सबकी एक ही माँग या शिकायत होती कि उनके निजी जीवन के बारे में कुछ मिलता नहीं…और पता चला है कि वे किसी से मिलते नहीं!! सो, अहमद नगर के पास का एक शोधार्थी (अब पचीसों साल बाद नाम याद नहीं आ रहा), जो उन दिनों मेरे काफ़ी निकट हो गया था, के लिए मैने उनसे समय ले लिया…और उन्होंने आराम से समय दे भी दिया। मैं प्रमुदित…कि कुछ अच्छा बदलाव हो रहा है…। सो, वह बालक चर्चगेट स्थित मेरे विश्वविद्यालय में मुझसे मिलकर, वर्माजी के अंधेरी स्थित घर (जहां मैं शेक पी आया था) जाने का भूगोल जानकर और ‘क्या पूछना चाहिए’…पर थोड़ी सलाह-चर्चा भी करके बड़े उत्साह व आस के साथ गया…, लेकिन दो घंटे में मुंह लटकाये उल्टे पाँव वापस…और जो क़िस्सा बताया, उस पर आप ही तय करें कि इस अनूठे-अजूबे रचनाकार पर हंसें या रोयें…उसे कोसें या सराहें…?

हुआ यह कि बालक ने दरवाज़े की घंटी बजायी…सुरेन्द्रजी ने दरवाजा खोलके सवालिया चेहरे से घूरा… बालक ने आकुल उत्साह से कहा – ‘वो सत्यदेव त्रिपाठीजी ने आप से समय’…तब तक वे बोले – ‘आ जाइए’। और उसके अंदर पहुँच के बैठते ही कहा – ‘आपके लिए मेरे पास पाँच मिनट का समय है। पूछिए, क्या पूछना है’? अब ठेंठ देहात के उस सुदूर गाँव से 7-8 घंटे की यात्रा करके गया अहिंदीभाषी वह युवा यूँ घबराया कि पाँच मिनट में क्या कहे, उसकी कुछ समझ में ही न आया…!! और उसकी इसी घबराहट के बीच इस महान साहित्यकार ने कहा – ‘आपके पाँच मिनट पूरे हो गये’…और दरवाजा खोलके हाथ उठाते हुए मशीनी अंदाज में बोल दिया – ‘अब आप जा सकते हैं’…।

इस सलूक का कस के चटकना मुझे भी लगा…। तब से मैने किसी को उनके पास भेजने की हिम्मत न की…लेकिन मज़ा यह कि ऐसा कुछ हो जाने का उन्हें तो कुछ भान भी न हुआ!! तो ऐसे एकबग्गे (एक दिशागामी) शख़्स से इन सबका गिला भी क्या किया जाये – शिकवा तो दूर की बात!! ऐसे में दुनियादारी-व्यावहारिकता…आदि बने-बनाये मानदंडों पर सुरेंद्र वर्मा की कोई आलोचना-भर्त्सना कर सकता है, पर मैं कहूँगा – ऐसे लोग दुनियादारी के लिए बने ही नहीं है – शायद ऐसी सनकों (सिनीसिज्म) में ही उनकी सृजन-वृत्ति का मर्म, उसकी प्रेरणा व प्रणयन निहित हो!!

उन दिनों का एक ऐसा वाक़या भी है, जो मीडिया पर भी प्रचारित-चर्चित हुआ…। सुरेंद्र वर्मा पर इलाहाबाद से पीएच.डी. करने वाले किसी लड़के ने इनसे मिलकर साक्षात्कार की शक्ल में कुछ बातचीत करने के लिए फ़ोन किया…बड़ी उम्मीद व आस-विश्वास से ही किया होगा! किंतु इन्होंने सीधे ‘ना’ न कहके इंटर्व्यू के बदले एक बड़ी धनराशि की माँग कर दी – खाते में डाल दो, फिर समय दूँगा…(शायद यह भी उससे बचने या उसे भगाने का एक बहाना ही रहा हो)। लेकिन वह बालक ‘काम बनाऊ’ वाली दूसरी प्रजाति का निकला…। सो, वह इनके उत्तर को ‘अपने अधिकार का हनन’ व सुरेन्द्रजी का ‘अपने कर्त्तव्य से च्युत होना’ से लेकर ‘पैसे की माँग को भ्रष्टाचार’ तक मान बैठा। ऊपर से वह ऐसा उद्दंड भी निकला…कि इनके ऐसे उत्तर पर ताव खा गया। यह भी कह सकते हैं कि इस बार सुरेन्द्रजी को भी ‘जैसे को तैसा’ मिल गया…!! उसने पूरा वाक़या रू-ब-रू (फ़ेसबुक) पर डाल दिया – गोया सुरेन्द्रजी मुजरिम हों…!! सम्बद्ध हल्क़ों में थोड़ी चर्चा भी हुई…, लेकिन सुरेन्द्रजी को इसकी खबर भी शायद ही मिली हो – मैंने भी कभी न कहा। हाँ, उस वक्त मैंने उस लड़के के रू-ब-रू पृष्ठ पर जाके जवाब लिखा…, जिसका आशय था कि अब सब कुछ पेशेवराना है – पीएच.डी. भी ज्ञान के लिए नहीं के बराबर और नौकरी-कमाई के लिए ही प्रायः सर्वाधिक होती है। शोध-निर्देशक के भी नाम-दाम का मामला होता ही है। शोधकार्य को नौकरी की योग्यता का अनिवार्य हिस्सा बना देना ही इसमें निहित ज्ञान की हानि -बल्कि हत्या- होने का सबसे बड़ा कारक सिद्ध हुआ है। मैंने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा कि यह काम करके भविष्य में आप शायद लाखों रुपए महीना कमायेंगे…तो फिर कोई लेखक मुफ़्त में अपना समय क्यों दे? जो लेखक देते हैं, उन्हें मान लें कि या तो बहुत अच्छे हैं या फिर पटाऊ क़िस्म के महत्वाकांक्षी हैं – जो दोनो ही सुरेंद्र वर्मा नहीं हैं। लेकिन आम तौर पर असली बात यह है कि ऐसा ‘सह योग’ देने वाले लोग अपना प्रचार व अपने पर हुए कामों की फ़ेहरिस्त से बड़प्पन पाना, अपना ख़ास होना, सिद्ध और प्रचारित करना चाहते हैं। यह सुरेंद्र वर्मा जैसे लेखक को नहीं चाहिए…आदि-आदि। पता नहीं चला कि मेरी डाक उस बंदे ने देखी या नहीं – उसकी कोई प्रतिक्रिया मेरे देखने में नहीं आयी!!

यहाँ वह सच कह भी दूँ कि हमारे तमाम साहित्यकार अपने पर पीएच.डी. कराने, लेख-किताब…आदि लिखाने या सेमिनार…आदि कराने के लिए सहज ही उत्सुक रहते हैं। ऐसा करने-करवाने वाले अनपढ़ क़िस्म के प्रोफ़ेसर व शोध-निर्देशक भी हैं, क्योंकि बिना उनकी सहमति-सम्मति के ऐसा हो ही नहीं सकता। लेकिन उक्त घटना के साक्ष्य एवं यूँ भी वर्माजी की निस्पृह-कड़क वृत्ति से बनी छबि के आधार पर पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि सुरेन्द्रजी (और अधिकांश बड़े साहित्यकार) ऐसे क़तई नहीं हैं – न करते, न कराते…। और इनके पास ऐसा कोई आता भी नहीं – आने की हिम्मत भी नहीं करेगा, क्योंकि ऐसे आने वालों को धता क्या बताएँगे – उघाड़ के, फाड़ के रख देंगे, क्योंकि ऐसे लोग व सुरेन्द्र जी…दोनो अलग प्रजातियाँ हैं। और यह भी ताज्जुब ही है कि ऐसे कड़क रवैए के बावजूद साहित्य व कला जगत तथा विश्वविद्यालयीन इलाक़ों में इन्हें काफ़ी तवज्जो मिली है…। ‘मुझे चाँद चाहिए’ को ‘साहित्य अकादमी’ से नवाज़े जाने की बात जगज़ाहिर है। ‘आठवाँ सर्ग’ व ‘मुझे चाँद चाहिए’ तो कई एक जगहों पर पाठ्यक्रम में लगे। ‘सूर्य की अंतिम किरण…’ के एकाधिक जगहों पर लगे होने की याद है…। शोध-कार्य भी काफ़ी हुए हैं – हो रहे होंगे और आगे भी होते रहेंगे…। ‘सूर्य की अंतिम किरण…’ पर बनाये नाटक के लिए अमोल पालेकरजी को सेंसर बोर्ड से लड़ते-जीतते देखा-सुना है मैने खुद…। फिर इस पर उन्होंने मराठी में फ़िल्म भी बनायी – ‘अनाहत’, जो ज्यादा चली नहीं। इसका प्रदर्शन भी अपनी यूनिवर्सिटी के ‘विद्यार्थिनी सम्मेलन’ में मैं करा सका, जो मेरे लिए गहरे संतोष का सबब है। सम्मेलन में इस फ़िल्म के शो के बाद अमोलजी के साथ हुई मेरी खुली बातचीत भी हुई, जो सराही भी गयी और अमोलजी भी उससे संतुष्ट नज़र आये…। इन सबसे सुरेंद्र-साहित्य की मूल्यवत्ता-महत्ता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है…। बहरहाल,

कहना होगा कि साक्षात्कार वाले उक्त उदाहरण में सुरेन्द्रजी कड़क व बेबाक़ सही, अपनी जगह व अपनी तरह से बिलकुल सही थे – बस, अंदाज उनका ग़ैर दुनियादार था, जो वे काफ़ी हद तक हैं ही। और ऐसा सब तमाम मामलों में है, जिसे विरल कहें या सामान्य जीवन के हिसाब से अपवाद कहें…, पर है, तो है…। काफ़ी दिनों तक मुझे असमंजस था कि अपनी इस ग़ैरदुनियादारी का उन्हें पता है या नहीं…!! लेकिन धीरे-धीरे प्रतीत हुआ कि बिलकुल पता है उन्हें। और करते-करते अब यह उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया है, जो ग़लत तो बिलकुल नहीं है – बस, वही अव्यावहारिक भर कह सकते हैं। और खाँटी प्रतिभाएँ व्यावहारिक कहाँ होती हैं? बस, उनके रूप व प्रकार अलग होते है। तुलना नहीं, महज़ उल्लेख स्वरूप कहूँ, तो निरालाजी का उदाहरण विश्रुत है। किशोरीदास वाजपेयी तमाम अभावों के बावजूद अलग तरह से अक्खड़ बने रहे, जिससे उनके बहुत कुछ से हम वंचित रह गये…। ‘क़र्ज़ की पीते हैं मय…’ वाले अपने ग़ालिब साहब अलग तरह से चुटकियाते थे। और जब ‘हमदोनो’ फ़िल्म का ‘इरोज’ सिनेहॉल (मुंबई) में ‘उद्घाटन शो’ हो रहा था, तो उसमें बेजोड़ संगीत देने वाले अपनी तरह के अनूठे संगीतज्ञ जयदेवजी, जिन्हें ससम्मान मंच पर उस वक्त फूल-मालाओं से लदे होना था…और जो चर्चगेट स्थित ‘इरोज’ के सामने ही लॉज में रहते भी थे, लेकिन उस शाम वे वहीं सड़क पर खड़े भेलपूरी खा रहे थे…!! तो यह प्रजाति ही अलग होती है। और ऐसे सब प्रतिभाशाली, अव्यावहारिक या खड़ूस लोग मुझे ख़ासे पसंद हैं, जो दुनियादारी के लिए नहीं जीते – उससे समझौते नहीं करते – पंडित ह.प्र. द्विवेदी के ‘कुटज’ की मानिंद ‘खीसें नहीं निपोरते, तलवे नहीं चाटते…जीते हैं और शान से जीते हैं’ – नुक़सान व उपेक्षा सह के भी अपनी अना के साथ…। ये लोग साहिर साहब के ‘दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या, ये बोझ अगर दिल से उतर जाये तो अच्छा’ को साध चुके होते हैं, जिसे हम जैसे बहुत लोग जीवन में उतारना चाहते हैं, पर उतार पाते कहाँ हैं!! सुरेन्द्रजी 80% कर पाते हैं। इनके प्रति अनायास मेरी मुरीदी भी शायद अपनी इसी ईहा की क्षतिपूर्त्ति हो, जिसका मुझे मज़ा भी आता है!!

यह सब वे जान-बूझकर करते हैं, ऐसा इसलिए भी लगता है कि कभी जीवन के बड़े हल्के-फुल्के कामों-मामलों के समय वे बड़े शालीन व व्यावहारिक भी हो जाते हैं – बिलकुल दुनियादार जैसी बात भी कर लेते हैं…, जिसके लिए ही इनकी ग़ैर दुनियादारी को 20 प्रतिशत कम कर रहा हूँ। फिर अब इसका भी एक उदाहरण तो बनता है। और तुरत याद आ रहा है… कि चंद ही सालों पहले -2020 के आसपास- का वाक़या…कि इलाहाबाद विवि या बोर्ड की किसी किताब में इनका एक एकांकी लगा था, जिसकी रॉयल्टी का पैसा आया नहीं था या फिर बिना पूछे ही लगा लिया था…। इन्हें खबर लग गयी थी, तो ये दावा करने चले…। लेकिन पाठ्यक्रम में लगी होने का प्रमाण चाहिए था। सो, कहा मुझसे। और उस वक़्त कहने में तटस्थता होते हुए भी ऐसी शाइस्तगी व गरज रही, जो मानवोचित भी है…कि सामने वाला कोई भी लरज जाये…और मैं तो ठहरा ही मुरीद…!! निकलवाके भेजा इनको…, तो बोले थे – एक करोड़ का दावा ठोंकूँगा…। आगे क्या हुआ, न उन्होंने कभी बताया, न मैंने कभी पूछा…। क्योंकि ऐसे जुनूनी वक्तव्य व कृत्य पूछने के लिए होते भी नहीं, ये आवेश में आते हैं…फिर अक्सर निवेश में चले जाते हैं…। ग़ैर दुनियादारों में यह वृत्ति अधिक होती है। जल्दी उभरती है, लेकिन लम्बे समय तक सक्रिय नही रह पाती। कभी हो जाये, तो नियमित पैरवी (फ़ॉलोअप) नहीं हो पाती – याने ‘क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा’ में अवसित इस वृत्ति को ‘निर्दोषता की नियति’ (डेस्टिनी ऑफ इन्नोसेंस) कह सकते हैं। ऐसे ही सब कुछ से सुरेंद्र वर्मा की सहज ख्याति बनी है कि वे कब क्या कह-कर देंगे, कहा नहीं जा सकता। और इससे दुखी व्यक्ति उसमें जोड़ देता है – अक्खड़-अकड़ू…आदि। इसी को कुछ अच्छा पढ़ा लिखा शख़्स ‘असामाजिक’, ‘अनप्रेडिक्टेबल’…जैसा सब कहता है!! इस ‘अनप्रेडिक्टेबल’ की हिंदी सुनना चाहेंगे आप? बच्चनजी ने मौज-मौज में बनाया है – ‘अनग्रकथनीय’!! ख़ैर, अब आगे बढ़ें…

‘तुम्हारे लिए पाँच मिनट हैं’ वाले बालक को बुलाने-मिलाने की अपनी करनी की भरपाई स्वरूप मैने बहुत कुछ उसे बताया इनके जीवन के बारे में, जिसका अधिकांश मुझे उसी दिनेशजी ठाकुर से तथा थोड़ा कुछ अन्य लोगों से पता चला था। उसने वह सब लिखा भी। कालांतर में किताब छपी और उन्हें दी भी गयी, लेकिन मेरे दिये तथ्यों पर सेत-असेत कुछ कहा नहीं, तो मुझे लगा कि उन्होंने उसे पढ़ने की तस्दी ही न ली…याने असहयोग की अव्यावहारिकता है, तो ख़ासी निस्पृहता भी…सचमुच की निरपेक्षता – वरना तो हमारे अधिकांश साहित्यकार व अध्यापक मुंह से तो ना-ना करते रहते हैं, लेकिन अंदर से सब कुछ अपने पक्ष में करने व पाने के लिए जुगाड़ भी करते-कराते रहते हैं…, लेकिन ये महाशय इससे परे हैं…। परंतु इन्होंने मेरी लिखी वह सामग्री पढ़ ली थी, जो वर्षों बाद एक दिन मज़े-मज़े में एक मजलिस में बयां हो गया…। वो हुआ ऐसा कि मेरी किताब ‘रंग़-यात्रियों के राहे गुजर’ पर मुम्बई में चर्चा आयोजित थी। संयोगन सुरेन्द्रजी उन दिनों मुम्बई में थे और ‘कुछ न बोलने’ की पक्की शर्त के साथ अध्यक्ष पद पर आसीन थे…। लेकिन समय आने पर मेरी चुटकी लेने की रौ में बोल गये ‘मैंने तय कर लिया है कि अब मैं अपनी आत्मकथा नहीं लिखूँगा – सत्यदेव त्रिपाठीजी ही मेरी जीवनी लिखेंगे…। और पैसा इन्हें ‘रज़ा फ़ाउंडेशन’ दे ही देगा… (फ़ाउंडेशन के तंज का सूत्र था – मेरी लिखी प्रसादजी की जीवनी – ‘अवसाद का आनंद’)। लेकिन आगे उन्होंने यह भी कहा – ‘और ये मेरे बारे में सब कुछ जानते हैं…इन्हें यहाँ तक पता है कि मेरी प्रेमिका से हमारी एक बेटी भी है, जो दोनो विदेश में रहते हैं…’। अब इसे उनका व्यंग्य कहा जाये या स्वीकारोक्ति…!! ग़लत होता, तो सीधे विरोध और सही होने पर सहज समर्थन कर सकते थे…, लेकिन ऐसा सहज-सामान्य कुछ कर लें, तो काहे के सुरेंद्र वर्मा!! और अपनी जुहाई जिस सूचना के आधार पर मैंने ऐसा लिखा था, उसी के मुताबिक़ उस रिश्ते के अलगाव वाले हस्र का कारण सुनने में यह आया था कि वह विदेशी प्रेमिकाजी इन्हें लेकर अपने देश जाना चाहती थीं…। इधर ये अपना देश छोड़ना नहीं चाहते थे। दोनो के ज़बर्दस्त स्वदेश-मोह में वे अभूतपूर्व प्रेमिकाजी वहाँ अपने देश और ये भूतपूर्व प्रेमी – ‘मिस्टर भारत’ यहाँ रह रहे हैं…!!    

सांगली की सेमिनार यात्रा और प्रेमोल्लेख – लेकिन प्रेमिका क्या, प्रेमिकाओं को लेकर एक सहज खुलासा सुरेन्द्रजी की ज़ुबानी भी है…। और उस मुक़ाम तक आते-आते हमारे सम्बंध कुछ अधिक जुड़ गये थे…। तभी तो कहीं न जाने वाले सुरेंद्र वर्मा मेरे बुलाने पर मेरे विश्वविद्यालय के एक सम्बद्ध महाविद्यालय में सांगली जैसे अपेक्षाकृत सुदूर (इंटीरियर) गाँव के इलाक़े में ख़ास अतिथि के रूप में आ गये थे – पूना तक विमान से और उसके आगे कार से…। यह बात जिसने भी सुनी, सबने इसे दुनिया का ‘आठवाँ अजूबा’ कहा था…। मुझे भी लगा था, सो मैंने पूछ ही लिया था कि आप आ कैसे गये…? उस वक्त उन्होंने बड़े ‘निठुरे मने’, बच्चों जैसी निष्कलुषता से बताया था कि ज्ञानपीठ वालों (तब वे अपनी किताबें वाणी से निकाल कर ज्ञानपीठ को दे चुके थे, जो ज्ञानपीठ बंद होने के बाद अब फिर वाणी के पास है) ने एक दिन उन्हें समझाया – ‘पाठकों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए…, इससे बिक्री पर फ़र्क़ पड़ता है…। सो, थोड़ा-बहुत आया-जाया कीजिए’। सीधे शब्दों में बात वही कि पाठक ही सबका माई-बाप है। यह बात उन्होंने ऐसे निश्छल भोलेपन से कही कि मुझे बिलकुल बच्चे लग रहे थे, जो अपने गुरुओं-अभिभावकों की सीखें मानने का सविनय सदम्भ बखान करता है। लेकिन यह मामला धंधे का था, तो सुरेन्द्रजी सहज ही समझ गये और मान भी गये – वरना उन्हें कहाँ पड़ी है!!

अब उनके उस प्रेमोल्लेख वाली बात पर आयें…सांगली में एक शाम मैने वहाँ के हिंदी विभाग की बच्चियों और मुम्बई वाले मेरे विभाग से आयी दस-पंद्रह छात्राओं के साथ उनकी बातचीत रखी…। उसमें किसी ने पूछा कि आपने दिल्ली में अपना घर लेते हुए इलाक़े का चुनाव कैसे किया? तब उन्होंने बताया कि यह बात उन युवा दिनों की है, जब मैं स्कूटर से घूमता था। और उस दिन शहर से कहीं दूर गया था, तो एक जगह चाय के लिए बैठा। वहीं मेरे साथ उस वक़्त जो भी मेरी प्रेमिका रही हो…इतने में तो वे सारी लड़कियाँ, जो प्रायः मध्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती थीं – प्रायः उत्तर भारत के व सांगली के आसपास के ठेंठ गाँवों की थीं…, सब विस्मय के साथ खिल-खिला के हंस पड़ीं!! आप समझ गये होंगे विस्मय व हँसी की वजह – कि इतनी प्रेमिकाएँ थीं कि इन्हें याद भी नहीं – बतर्ज़ उस पैरोडी के – ‘हों इतनी बीवियाँ घर में कि हर बीवी पे दम निकले…’। और सुरेन्द्रजी का तो यह क़िस्सा उस अजीब दास्तान की तरह आया, जो ‘सुनाते-सुनाते बयां’ हो जाती है, जिसे सबने और मैने भी गाँठ बांध लिया और इसीलिए यह तथ्य ‘फ़्राम हॉर्सेज माउथ’ ही ठहरा!! और उसी प्रेमिका ने चाय पीते हुए उसी इलाक़े में घर लेने की चाहत जतायी थी…। फिर प्रेमिका तो ज़ाहिर है, आयी-गयी हो गयी; पर उसकी वह बात इन्हें याद रही – नरेंद्र शर्मा की कविता की तरह, जिसमें प्रेमिका का उपहार में दिया ‘ट्वीड का कोट’ तो कालांतर में जाने कब फट गया, उसमें लगायी कली भी जाने कब सूख गयी, पर उससे निकली गंध – याने ‘वहीं घर ख़रीदने की मासूम-सी इच्छा’ याद रही और ऐसी प्रेमल यादों-अनुभवों ने ही शायद ‘सूर्य की अंतिम किरन…’ की शीलवती व उसके पूर्व प्रेमी युवक, ‘मुझे चाँद चाहिए’ की वर्षा व हर्ष जैसे कट्टर-क्लासिक प्रेमी-युग्म रचवाये, वर्षा के कुँवारी मां व कुंवारे वैधव्य जैसे अद्भुत संयोग सिरजे, जिसमें प्रगतिशीलता ऐसी कि कार्डधारी प्रगतिशील झख मारें…!!    

अब सांगली-प्रवास की कुछ व्यावहारिक बातों पर आयें…। सुरेन्द्रजी की प्रकृति की बावत मुझसे सुनके डरे-सहमे, पर संजीदा आदर भाव से भरे वहाँ के हिंदी अध्यापक डॉक्टर लक्ष्मण राव पाटिल ने सांगली के सबसे अच्छे होटेल में एक ‘सूट’ ले रखा था। शहर व आस-पास के सौ-पचास किमी. दूर के क़स्बों में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने वाला हिंदी समाज उत्सुक व अचंभित था। इन्हें जानने वाले कुछ इतर लोग भी आ गये थे। और कहना होगा कि एक भी बार झल्लाये या ऊबे नहीं सुरेन्द्रजी। और सामने से कुछ न बोलने की अपनी आदत के साथ सबकी बातों-सवालों के उत्तर बड़ी शालीनता से देते रहे…। प्रायः हाँ-ना से ही काम चल जाता, क्योंकि वैसे विश्लेषणात्मक सवाल आये ही नहीं। फिर उस छोटे क़स्बे की उनकी ऊब भी सामने आयी, तो तीन दिनों के तय प्रवास में दूसरे दिन ही जाने को उद्यत हो गये – विमान का टिकिट कैंसिल हुआ, दूसरा बड़ी मुश्किल से मिला। नुक़सान काफ़ी हुआ कॉलेज का…, तो यह भी सिद्ध हुआ कि सुरेंद्र वर्मा जैसों से ‘इश्क़ करे वो, जिसकी जेब में माल बारे बलमू…!!

और अब इस प्रयोजन भरी सांगली-यात्रा की रौ में उनके साथ हुई कुछ अन्य यात्राओं पर चलें…

पर्यटन-यात्राओं में सुरेंद्र वर्मा – यूँ मिलते-जुलते रहने की परिणाम ही रहीं उनके साथ हुई कुछ पर्यटन-यात्राएँ…, जिनमे सबसे पहली और सबसे बड़ी (चार-पाँच दिनों की) यात्रा हुई सिंधुदुर्ग की इसकी शुरुआत यूँ हुई कि वर्माजी ने ही कहा – ‘मुझे कुछ ऐसा लिखना है, जिसके लिए शिवाजी का वो महल देखना होगा, जो पानी के बीच में बना है’। जलमहलों की क्या ख़ब्त रही होगी राजाओं-सुल्तानों को… ग़ज़ब के रूमानी-विलासी व महत्वाकांक्षी रहे होंगे…!! ख़ैर, इस पर मैं तुरत व सहर्ष सक्रिय हो उठा – सुरेंद्र वर्मा नामक शख़्स के प्रति अपनी फ़िदाई के ही चलते…। संयोग ऐसा कि उसी प्रांतर में स्थित सावंतवाड़ी में मेरे एक विद्यार्थी रहते हैं – डॉ रमाकान्त गावड़े, जिन्होंने मेरे निर्देशन में शंकर शेष के नाटकों पर पीएच.डी की है। उमर में मुझसे बड़े हैं, पर मुझे इस अदा से ‘सरजी’ कहते हैं कि हमने उनका नाम ही ‘सरजी’ रख दिया है। और वे ‘सरजी’ अपने शोध के दौरान कई बार मेरे घर आते…। वही एकमात्र छात्र हैं, जो ऐसे संधिकाल में मेरे साथ आये कि उन्होंने गोवा-पूना-मुम्बई के तीनो घर देखे। और इसी अवाई के चलते वे बार-बार हमें अपने यहाँ घूमने के लिए बुलाते…। पर हम कभी जा न सके – शायद जा पाते भी नहीं, लेकिन सुरेन्द्रजी के इस प्रस्ताव पर मुझे रमाकान्त याद आ गये और मैने उन्हें फ़ोन लगा दिया। मेरा नाम सुनते ही वे आह्लाद से चिहा उठे और जब हम वहाँ पहुँचे, तो उनकी हहास देख कर लगा – गोया रमाकान्तजी की ख़ुशी के लिए ही हम यहाँ आये हों…!!

रमाकान्त उर्फ़ ‘सरजी’ ने हमारे लिए वहाँ के रिसोर्ट में एक शूट आरक्षित कर लिया था, जिसमें ठाट से रहे हम…खूब घूमे…तस्वीरें भी काफ़ी लीं। बड़ा मज़ा आया..। सुरेन्द्रजी सबके लिए तैयार रहते…। थकते कदापि नहीं!! नदी में नौका-विहार से लेकर पहाड़ियों तक कहीं चढ़ते-उतरते शायद ही उन्हें पकड़ने की नौबत आयी हो – इतने स्वस्थ-सक्रिय भी रहे वे अस्सी के आसपास की उम्र में। देखने के हिसाब से चुपचाप हो लिये मंदिरों में भी। सबसे उल्लेख्य यह कि ‘हुई शाम उनका ख़्याल आ गया’ की तरह सुरेन्द्रजी बोतल खोल लेते…और मैं टीवी खोल लेता…। उन दिनों कोई क्रिकेट-मैच चल रहा था। सुरेन्द्रजी को मैच से अरुचि और सोमरस-पान से मेरी ख़ास यारी नहीं। क्या साहित्य के पंडित इसे भी कहेंगे – विरुद्धों का सामंजस्य? फिर इधर मेरा मैच पूरा होता, उधर उनका रसपान…। तब हम साथ जाते भोजनार्थ…और उस दौरान निछद्दम बातों का सच्चा लुत्फ़ आता – सुरूर में वे, मैच देखने या जीतने से आह्लादित मैं…। भोजन तो वे ‘चिड़िया का चारा’ ही करते हैं और कभी कोई ख़ास फ़रमाइश भी नहीं…जो रहे, उसी में से थोड़ा-सा कुछ खा लेने – आदतन। पर मस्ती मज़े की रहती…।

लेकिन कहना होगा कि सरजी ने बंदोबस्त भी वीवीआइपी कर रखा था – जहां-जहां दोपहर होनी थी, खाने के बाद के आरामार्थ भी हर जगह कमरा आरक्षित था। सुरेन्द्रजी की एक मुरीद भी वहाँ रिज़ॉर्ट में दिख गयीं, जिनसे आते-जाते रोज़ हेलो-हाय हो जाता, लेकिन इन्होंने उन्हें तवज्जो बिलकुल नहीं दी – बल्कि बचते-बचाते रहे, जिससे बात बढ़ी नहीं। एक दिन गावड़ेजी ने अपने घर चाय पर बुलाया, तो ये जनाब गये ही नहीं – ऐसे बिदकी व ग़ैर दुनियादार भी हैं – याने वही अव्यावहारिकता-असामाजिकता!! लेकिन मैं तो ठहरा नितांत संसारी जीव। सो, मुझे जाना ही था…और वहाँ पहुँच के समझ में आया कि न जाना कितना अमानवीय होता – रमाकान्त ने अपनी बेटी-दामाद को भी बुला रखा था – अपने मुझ ग़ुरु से मिलाने के लिए। तब लगा कि वह सामने वाला है, जो किसी को कुछ भी बना सकता है – मुझ जैसे मामूली आदमी व अदने अध्यापक (गुजराती में किंचित अवहेला से ‘पंतूजी’) को रमाकांतजी ने उस शाम नारियल-शॉल-पुष्पगुच्छ सहित सपत्नीक पाँवों में झुक के ‘गुरू’ बना दिया। हाँ, गावड़ेजी के सहकर्मी ने अपने कॉलेज के हिंदी विभाग की तरफ़ से एक आयोजन रखा – शायद पाठ्यक्रम में सुरेन्द्रजी की कोई रचना चल भी रही थी। बड़ी बात यह कि बिना किसी ना-नुकुर के सहज भाव से गये वर्माजी और बोले भी क़रीब 15-20 मिनट। और ज़ाहिर है कि सुरेन्द्रजी कोई वक्ता तो हैं नहीं, तो रोचकता का सवाल न था। बस, ‘राम ते बड़ो राम कर नामा’ की तरह – बोलना जो भी था – सुरेंद्र वर्मा का था…!! इतनी देर मंच से बोलते मैने उन्हें पहली और अंतिम बार सुना। जब सांगली में बोलने के लिए ही बुलाये गये थे, तब भी इतना व इतनी सहजता से न बोले थे। मैने अवश्य उनके साहित्य का संक्षिप्त-सा परिचय दिया, जो वहाँ मौजूद लोगों के लिए नया था, तो मेरी समझ से उन्हें अच्छा भी लगा।

एक और यादगार ‘यात्रा अलीबाग की’ हुई, जिसमें मेरी तीन छात्राएँ भी शामिल हुईं, जो सांगली गये हुए बैच की ही थीं – बल्कि उन्हीं की अगुवाई में यह यात्रा बनी ही। हुआ था यूँ कि हम मालाड (मुम्बई) में किसी साहित्यिक आयोजन के बाद चाय पर बैठे थे और वहीं बैठे-बैठे झटके में कार्यक्रम बन गया। किसलय तो अपने नवजात शिशु को छोड़कर आयी थी और नीतू तो है ही सदाबहार इकली। सुप्रिया के पति की पहचान से तुरत-फुरत में दो कॉटेज भी सुलभ हो गये थे, जो ‘सीजन’ होने के कारण नितांत दुर्लभ होते हैं और इतने कम समय की ज़रूरत पर तो असम्भव ही। यह यात्रा तीन दिनों की थी। और कहना होगा कि बालिकाओं के चलते यह ज्यादा गुलज़ार भी रही…और सुरेन्द्रजी ज्यादा खिले-खिले भी रहे…। इसी यात्रा के लिए अपनी प्रिय मदिरा के साथ उन्होंने सायंकाल के रसपान पर ‘चखने’ स्वरूप मेवे ख़रीदे थे और उसे घर पे अपने ख़ास ढंग से तलवाने के लिए मुझे दिया था। ऐसे गहन रसिया हैं रसपान के…। भोजन तो नाम मात्र के लिए रस्मन कर लेते हैं।

इस यात्रा की तैयारी में मेरे लिए एक और यादगार बात हुई। उन्होंने एक सफ़ेद शर्ट लेने के लिए अपने मित्र-आवास के पास की सरनाम बाज़ार (सांताक्रुज़ पश्चिम) में चलने की पेशकश की। मैं अच्छी रुचियों वाले बड़े लेखक के मुताबिक़ बड़े-से नामचीन स्टोर में ले चला, लेकिन उन्होंने फुटपाथ पर लगे सघन बाज़ार की ओर मोड़ दिया, तो मुझे लगा – ये भी अपने वाले ही हैं। थोड़ा-सा टोह लेने के बाद एक शर्ट लिया भी। तभी उनका एक और रूप सामने आया – मेरे लिए भी सफ़ेद शर्ट लेने लगे। और मेरे ‘ना ना’ करते रहने के बावजूद जब गाड़ी वाले ने दोनो की माप समान ही बता दी, तो लेके ज़बरदस्ती दे ही दिया। इस तरह उस शाम मुझे उनकी दुनियादारी (या मेरे प्रति उनकी प्रियता) भी समझ में आयी, वरना तो बेहद ग़ैर दुनियादार ही लगते हैं। यह भी लक्ष्य हुआ कि सफ़ेद शर्ट का शौक़ीन मैं भी हूँ, यह उन्हें पता था। इस सूक्ष्म निरीक्षण की भी दाद देनी पड़ेगी…। इस तरह वर्माजी के उस मुम्बई-प्रवास के दौरान ऐसे कई भ्रम टूटे…कई सच उजागर हुए…। यात्रा में वे पूरी मस्ती में रहे…नीतू से उनकी ख़ास जमी… दोनो ठहरे सींकिया पहलवान। लेकिन 85 साल के आसपास की उमर में उनकी ऊर्जा देखने लायक़ रही – कहीं भी थकने का नाम नहीं लिया…!! 

सुरेन्द्रजी के किसी मुम्बई-निवास के दौरान ही मुम्बई में स्थित ‘मड आइलैंड’ की एकदिनी यात्रा हुई। हुआ यूँ कि उसी बीच एक-दो बार स्थानीय आयोजनों में जाना हुआ, जिसमें वे यूँ ही मौज-मौज में आ गये…उन्हीं में एक था – ‘भगवद्गीता जयंती’ वाला सालाना आयोजन, जिसे हर साल करते हैं मेरे अनुजवत हो गये समकालीन हिंदी गीतों के एक सुपरिचित हस्ताक्षर डॉक्टर रासबिहारी पांडेय। मैने यूँ ही बात-बात में कह दिया और जाने किस मूड में थे या उस दिन उनका दैव सीधा था…कि वे सहज ही आ गये। कार्यक्रम में कुछ उनके मुताबिक़ ख़ास रोचक न था, तो वहाँ उनका होना मुझे ही अतिचार-सा लगने लगा…। सो, अपना वक्तव्य देकर मैं आयोजन से इजाज़त लेकर निकल आया, जिसमें मेरी छात्रा-मित्र डॉक्टर मधुबाला शुक्ल एवं पुत्रीवत अभिनेत्री शाइस्ता खान भी निकल आये। फिर कहीं चाय पीने की बात पर वहीं पास रहने वाली शाइस्ता ने अपने घर आमंत्रित कर लिया…। और उसके घर में मौजूद आसव के चलते चाय का कार्यक्रम रसपान में बदल गया। फिर जाने कैसे उसी मौज में सुरेन्द्रजी को दिखाने की गरज़ से अगली सुबह मड-यात्रा का कार्यक्रम बन गया। लिहाज़ा अलीबाग़ के ‘हम दो और तीन कन्याएँ’ के बदले यहाँ ‘हम दो और दो बालिकाएँ’। और ये दोनो ही कार्यक्रम सिर्फ़ सुरेंद्रजी के लिए हुए – ‘इदम् सुरेंद्राय, इदन्नमम’। चूँकि उनके मित्र वाला आवास-स्थल मेरे घर की दिशा में है, अतः सुबह ही मैं उन्हें ऑटो में लेकर वरसोवा पहुँचा…जहां मधु-शाइस्ता मिले। फिर इंजन वाली नौका (फेरी बोट) से उस पार और वहाँ से ऑटो। मड का ‘बीच’ तो बड़ा और रमणीय है ही…। इस तरह  सिंधुदुर्ग के बाद अलीबाग़ व मड की तीनो यात्राओं में सिद्ध हुआ कि पर्यटन…आदि में वे अपनी उम्र को धता बताकर साथी हो जाते हैं। घूमने में तो कहीं थकन का नाम नहीं, दोनो जगहों पर स्नान के अवसर बने। अलीबाग़ में तो तरण-सरोवर था ही और मड में तो लहरें लेता समुद्र। सरोवर में कूद ही पड़े थे…लेकिन तैरने आता नहीं, तो गिर से पड़े थे। मैने सिखाना चाहा, पर अब इस उम्र में सीखना सम्भव नहीं। उसी तरह यहाँ समुद्र में भी हेल गये…और इसकी तैयारी से अतिरिक्त वस्त्र लेके आये था – बल्कि मैं ही भोहर सिद्ध हुआ – मुझे उनका लाया अतिरिक्त पैंट पहन के आना पड़ा। कुल मिलाकर इतने साथ व यात्राओं के दौरान सिद्ध हुआ कि ये क्लासिक लेखक महोदय ग़ैर दुनियादार बिलकुल नहीं हैं – जैसा कि दिखते हैं – बतर्ज़ ‘ये वैसे हैं नहीं, जैसे कि तुम्हें दिखते हैं’।

आहार-व्यवहार के चंद वाक़यों की जानिब से – उक्त यात्रा के बाद की ही बात है, जब ‘राष्ट्रीय नाटय विद्यालय’ ने मेरी किताब ‘अवसाद का आनंद’ पर चर्चा आयोजित की और मुझे दिल्ली बुलाया। सुरेन्द्रजी की रुचियों के मद्दे नज़र अपनी पुस्तक-चर्चा में तो मैने उन्हें आमंत्रित ही नहीं किया, लेकिन उस दफे पहली बार ऐसा हुआ कि मुझे दिल्ली में आया सुनकर उन्होंने एक दोपहर खाने का आमंत्रण दिया और खुद यात्रा करके ‘प्रेस क्लब’ आये…। उस दिन मैने पहली बार बिना पिये या बिना पेग के इन्हें खाते देखा – शायद दोपहर थी, इसलिए भी। ज़ाहिर है कि उनकी मेज़बानी से मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा था, लेकिन मुझसे एक चूक हो गयी। मैने भोजन (लंच) भर का समय निकाला था और उसके बाद उसी दिन शुरू हो रहे पुस्तकमेले में शाम बिताके और वहीं भतीजे ब्रजेश से मिलके रात को दिल्ली छोड़ देनी थी – वापसी का टिकिट ही ऐसा था…। ऐसा ही हुआ भी…और इस बीच ‘दोपहर का भोजन’ व गप्पें दोनो मज़ेदार रहीं…हम ख़ुशी-ख़ुशी विदा हुए – वे मेट्रो से वापस और मैं ऑटो से आज़ाद मैदान। यात्राओं में चाक-चौबंद कार्यक्रम बनाने की मेरी आदत है, ताकि समय बर्बाद न हो। लेकिन मेरे इस ‘कट टु कट’ कार्यक्रम पर उनका ताना कभी बाद में आया – ‘मैं उतनी दूर से लंच के बाद साथ रहते हुए शाम बिताने आया था और आप ‘बिजी बी’ बन गये’…!! यह भाव और मंशा मुझे भा भी गये और अपनी करनी पर शर्मसार भी कर गये…। लेकिन बाद में विचार आया कि वे पहले तो बोल के आये नहीं कि शाम साथ बिताएँगे…तो मैं दोषी क्यों महसूस करूँ…फिर तभी साथ हो लेते, तो पुस्तक-मेले में भी साथ रह सकते…और जब चाहते, निकल भी लेते…!! लेकिन सुरेन्द्रजी न बम्बइया हैं, न इतने दुनियादार कि कार्यक्रम उस तरह पूर्व या उत्तर-नियोजित कर सकें!! ऐसा होने के लिए सांसारिकता में पगा गृहस्थ होना पड़ता है – उन जैसे ग़ैर दुनियादार से ऐसी उम्मीद करना बाबा तुलसी के शब्दों में ‘ऊसर बीज बएँ फल जथा’ ही है…। सो, दोनो के चलते ऐसा हो गया।

महामहिम सुरेन्द्रजी जिससे नाराज़ व ग़ुस्सा होते हैं, उसे बात बताने के दौरान आवेश में ‘बास्टर्ड’ कहते हैं, जो उस प्रवाह में उनका प्रिय तो क्या, कुछ ‘ज़ुबान पर चढ़ा’-सा शब्द है। इतने दिनों के दौरान परिवार में सिर्फ़ किसी भतीजी से वत्सल-स्नेह-सम्बंध की अनगूंज बस एक बार सुनायी पड़ी है। एक बार इनके लेखक भाई का क़िस्सा यूँ निकला कि अपने इन सुरेन्द्रजी को कोई सम्मान मिला और प्रेस क्लब में या कहीं मिलने पर गिरिधर राठी साहब ने इनसे कह दिया – ‘यह खबर मैंने आपके भाई रवींद्रजी को दे दी है’…और इस पर छूटते ही इनका वाक्य फूटा – ‘उसका तो घटश्राद्ध मैंने 40 साल पहले कर दिया’। इसके बाद मैने कभी किसी की बात इस डर से निकाली ही नहीं कि ‘कहीं ऐसा न हो, याँ भी वही काफिर सनम निकले’। हाँ, इनकी इस वृत्ति को लेकर घर-परिवार-समाज में ख़ासा लिप्त व इसके प्रति विश्वासी-दुनियादार मैं सामाजिकता-व्यावहारिकता-संस्कृति…आदि की जानिब से काफ़ी कुछ इनसे कहने की सोचता-चाहता रहता हूँ, पर कह पाता नहीं – बल्कि कहता नहीं, क्योंकि वे बदलने तो क्या, सुनने वाले भी कहाँ हैं!! क्योंकि कोई भोहर तो हैं नहीं। यदि उन्होंने अपने को ऐसा बनाया है, तो इसके पीछे जीवन के उनके अपने अपार अनुभव व अकूत अहसास होंगे – या महज़ फक्कड़ाना ही हो!! उन्हें जानकर ही इसकी बावत सेत-असेत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन वह सब जान पाना तो तभी हो पायेगा (या तब भी शायद ही हो पाये) जब उनके साथ साल-छह महीने मुतवातिर रहा जा सके, जो मेरे लिए प्रायः असम्भव है!! फिर यह सब कुछ देखकर इसका सुफल भी समझ में आता है कि शायद ऐसा वोहेमियन शख़्स ही ‘मुझे चाँद चाहिए’ में नायिका वर्षा वशिष्ठ व उसके प्रेमी (बल्कि मंगेतर ज्यादा सही होगा) हर्ष के साथ हर्ष का ऐसा पिता भी पैदा कर सकता है, जो बेटी की शादी के लिए उसकी मर्ज़ी से मीलों आगे जाकर एक के बदले अनेक एवं विविधरूपी सामान ख़रीदता है, जिसे देखकर मध्यवर्ग से आयी वर्षा सोचती है – ‘हाय राम, ऐसे पिता भी होते हैं इस दुनिया में’!! और शराब पीती स्टार बेटी वर्षा को उसके संस्कृत के अध्यापक पिता जब अचानक देख लेते हैं, तो शराब पीने, न पीने को लेकर दोनो के बीच जो संक्षिप्त, पर रोचक व मारक शास्त्रार्थ होता है, उसे पढ़कर पिता-पुत्री के सच्चे व सही अर्थों में आधुनिक रिश्ते या रिश्ते की आधुनिकता की पुष्ट खुराक भी मिलती है और परम-आनंद भी आता है…!!  

मैं कभी सोचता हूँ कि अपने ग़ैर दुनियादार स्वभाव व मयकशी के लिए सुरेंद्र वर्मा भी क्या कभी ग़ालिब-फ़िराक़…आदि जैसे लीजेंड बन पाएँगे…कि ‘क्या अजब कि तेरे चंद तर-दामन, सबके दागे गुनाह धो जायें’ !! याने इनके नाम पर भी शराब के क़सीदे पढ़े जायेंगे…!!

क्या बात हो, जब ऐसी ‘पारम्परिक नैतिकताओँ से स्खलन’ भी ख्याति के सबब बन जायें – ‘रवि-पावक-सुरसरि की नाईं, वंदनीय हो जायें…!! ईश्वर…आदि पर विश्वास के कोई आसार तो इनमें भी दिखते क़तई नहीं – हालाँकि इस पर बात कभी हुई नहीं!!\

रचने-जीने के बीच भेद से रू-ब-रू – अब अंतिम पड़ाव पर सुरेंद्र वर्मा के रचनाकार एवं निजी व्यक्तित्व को लेकर पीछे संकेतित एक कटु यथार्थ की चर्चा…!! आम तौर पर इनकी सभी रचनाओं  और ख़ास तौर पर ‘मुझे चाँद चाहिए’, ‘काटना शमी का वृक्ष…’, ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’…जैसी कृतियों में तमाम अन्य बातों के साथ ‘घोर भौतिक सम्पन्नता के समक्ष सीधे-सादे-सच्चे प्रेम’ की स्थापना हुई है, जिसे भौतिकता बनाम संवेदन में ‘भौतिक समृद्धियों पर संवेदना की विजय’ कह सकते हैं…। रिश्तों की स्पृहणीय मसृणता सुरेंद्र वर्मा के लगभग समस्त साहित्य का सबसे प्रमुख स्वर भले न हो, अर्गला की तरह गुँथा हुआ अवश्य है…। लेकिन उसी सिंधुदुर्ग-यात्रा के दौरान एक ऐसा वाक़या हुआ, जिसमें ऐसे ज़हीन रचनाकार का वास्तविक जीवन में ज़बर्दस्त भौतिक मोह सामने आया…। यह ज़िक्र पहले भी आ चुका है कि इनकी सारी किताबें कभी ‘वाणी’ से छपती थीं, लेकिन एक समय में इन्होंने सब ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ को दे दिया था। फिर ‘ज्ञानपीठ’ को ‘वाणी’ ने ख़रीद लिया और तब इन्हें अपनी किताबें ‘वाणी’ को देनी न थीं। सिंधूदुर्ग-पर्यटन के दौरान रात-दिन साथ रहने के बीच उन्होंने यह बात मुझे बतायी और बातों-बातों में किसी प्रकाशन का सुझाव माँग दिया। फिर तो अपने प्रियतों-आदरणीयों के लिए तत्पर हो जाने वाले अपने उदकी (सोच-विचार विहीन उत्साह वाले) स्वभाव के चलते मैं फ़ौरन सक्रिय हो गया…। पता न था कि इसका परिणाम इतना बेतुका होगा…। मैने ‘सेतु’ प्रकाशन का नाम सुझा दिया, जहां से ‘रज़ा फ़ाउंडेशन’ ने अपनी योजना के तहत मेरी लिखी किताब ‘अवसाद का आनंद’ (जयशंकर प्रसाद की जीवनी) थोड़े ही दिनों पहले छपायी थी और फिर उसी के चलते ‘सेतु’ के साथ बने अपने वास्तों से मेरी दूसरी किताब ‘रंगयात्रियों के राहे गुजर’ भी तब ‘सेतु’ से ही प्रकाशनाधीन थी। महामहिम वर्माजी इस सुझाव को तुरत मान गये और मैने ‘सेतु’ को फ़ोन लगा दिया। सुनते ही उसके मालिक अमिताभजी उछल पड़े। आनन-फ़ानन में सब तय हो गया कि सुरेंद्र वर्मा का समूचा साहित्य ‘सेतु’ छापेगा…उनके लेन-देन की सारी शर्तें तय हो गयीं और जब तक हम भ्रमण से लौटकर मुम्बई पहुँचें, ‘सेतु’ का अनुबंध-पत्र भी मेरे पते पर पहुँच गया था।

सुरेन्द्रजी से ज़्यादा उत्साह में अमिताभजी थे – ‘धइलै लेहना’ (सारा कुछ एकत्र बांध के धरा-धराया) जो मिल रहा था। अनुबंध पे सुरेन्द्रजी के हस्ताक्षर कराके तथा गवाही में अपने दस्तख़त करके मैने भेज दिया…। दिल्ली पहुँचने पर सुरेन्द्रजी ‘सेतु’ के दफ़्तर भी हो आये…अमिताभजी के कथनानुसार एकाधिक किताबें छपनी शुरू हो गयी थीं…सबकुछ सहजता से चल रहा था…।

लेकिन थोड़े ही दिनों बाद विस्फोट हुआ – सुरेंद्र वर्मा ने बिना ‘सेतु’ से ज़िक्र किये ही अपने समूचे साहित्य के प्रकाशन के अधिकार ‘वाणी’ को दे दिये…। पूछने पर नि:संकोच बताया कि ‘वाणी’ ने बहुत फ़ायदे की शर्तें (जो सब मुझे अब ठीक से याद नहीं) मान लीं। बाद में मैने एक दो बार बतौर हालचाल पूछा भी, तो संतुष्ट दिखायी दिये। लेकिन शर्तों में शुमार विदेश यात्रा व इलेक्ट्रानिक कार…आदि की जो बातें पहले मुझसे कही थीं, वो तो दिखीं नहीं!! इस पर कभी मुझे यह भी लगता है कि वो सब मुझ जैसे दुनियादार मध्यवर्गीय को चिढ़ाने का महीन मज़ाक़ ही न रहा हो – ‘ये’ तवस्सुम, ‘ये’ तक़ल्लुम तेरी आदत ही न हो’...। हाँ, तब अनुबंध के आधार पर अमिताभजी ने मुक़दमा करने की बात मुझसे कही थी, जो मेरे लेखे जायज़ ही थी। मैं होता, तो ज़रूर करता। लेकिन इसे अमिताभ की दुनियादारी वाली समझदारी ही कहेंगे कि वे इस झंझट में नहीं पड़े – ‘सेतु’ की तरफ़ से ऐसा कुछ न हुआ!!

अब तो मेरे अपने अनुभव, जिसमें ‘सेतु’ भी शामिल है, भी बता रहे कि प्रकाशक नाम के प्राणी के साथ कुछ भी करना बेज़ा नहीं (वैसे कुछेक अपवाद भी हों शायद), तो सुरेन्द्रजी के ‘अनभै साँचा’ की दाद देनी पड़ेगी…। कुल मिलाकर इस पूरे प्रकरण में वे दोनो तो अपनी-अपनी तरह निहायत पेशेवर निकले – भगवती चरण वर्मा के ‘दो बाँके’…। बस, मैं ही सिद्ध हुआ – ‘भुजइनी के तीसर’। (मुहावरा बहुत गँवईं हो गया – मतलब कि काठ का उल्लू जैसा)। अब तो समय के साथ प्रकाशकों के जैसे अनुभव और दुनिया के सलूक सामने आ रहे हैं, तो ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ याने ‘शराफ़त छोड़ दी मैने’ की मानिंद सुरेंद्रजी अधिक-ब-अधिक सही लगते जा रहे हैं…!! प्रकाशकों की बावत तो उनका ‘जैसे को तैसा’ वाला बर्ताव बिलकुल जायज़ ठहरता है। वरना इनकी दोस्तियाँ व संबंध तो एक से एक हैं। मुम्बई में लिंकिंग रोड, खार वाले जिस घर में इनके रहने का ज़िक्र पीछे हुआ, उस परिवार के साथ इनके व्यवहार वर्षों-वर्षों से बिलकुल घर जैसे, बल्कि उससे भी बढ़कर हैं। दो-चार बार थोड़े-थोड़े समय के लिए ही जब मेरे घर भी आये हैं, एकदम घुले-मिले सहज रहे…!! बात-बात में कभी महीन-मीठी मुस्कान के साथ उनकी बारीक टिप्पणी पर मन मान भी जाता है, मात भी जाता है!!

मंच-मीडिया और सुरेंद्र वर्मा – 1960 के बाद वाले विकासशील व सुनहरे दौर में दिल्ली के नाटय-जगत के साथ सुरेन्द्रजी की सक्रिय साझेदारी रंगकर्मियों की अगली पंक्ति में शुमार रही है, जो ख़ास तौर पर रामगोपाल बजाजजी के साथ दस्तावेज़ी रही है – बात-व्यवहार में भी और कार्य में भी। कभी सुरेन्द्रजी के मुख से ही सुना था कि नाटक लिखने के बाद पढ़ने के लिए बजाजजी को भेजते रहे हैं। उनके द्वारा निर्देशित सुरेन्द्रजी के नाटक ‘क़ैद-ए-हयात’ की जानदार व उत्तमतर प्रस्तुति देखना नयनाभिराम ही नहीं, हृदयाभिराम भी रहा…। मेरे देखे में सर्वाधिक शोभनीय तो इस नाटक में ही लगी थीं सीमाजी विश्वास। इनका वैसा अभिनय अन्यत्र न दिखा मुझे – उस ‘बैंडिट क्वीन’ में भी नहीं, जिससे सरनाम हुई सीमाजी। ‘क़ैद-ए-हयात’ में स्व. श्रीवल्लभ व्यास ने भी अद्भुत अभिनय किया था। काश, उसके पूरे देश में और-और शोज़ भी हुए होते…। लेकिन कुछेक अपवादों के सिवा हिंदी में मराठी रंगमंच की तरह अधिकाधिक शोज़ करने की वैसी रवायत ही नहीं…फिर रानावि वालों में तो और भी कम!!    

राजेंद्र गुप्त-नीना गुप्ता व अमित बहल अभिनीत ‘सूर्य की अंतिम किरण…’ नाटक तथा इसी पर बनी अमोल पालेकर की मराठी फ़िल्म ‘अनाहत’ पहले ही देख व उस पर लिख चुका था। और अपने ‘एसएनडीटी महिला विद्यापीठ’ में जब सांस्कृतिक गतिविधियों का समन्वयक (को-ऑर्डिनेटर) था, तो इसकी बोल्ड थीम के चलते तत्कालीन कुलगुरु प्रो. वसुधा कामत की किंचित अनिच्छा के बावजूद ‘विद्यार्थिनी सम्मेलन’ के दौरान अमोल पालेकर की मौजूदगी में ‘अनाहत’ का शो भी कराया था…और इस पर उनके साथ मंच से खुली बातचीत भी की थी, जिसमें दर्शकों की अच्छी भागीदारी भी हुई थी। बहुभाषी लोगों के बीच आयोजन ख़ासा सराहा भी गया था।

‘मुझे चाँद चाहिए’ पर तो सीरियल ही बना। राजा बुंदेला ने बनाया था। तेजस्विनी कोल्हापुरे के वर्षा बनने की याद आ रही…, पर सीरियल बीच में ही बंद हो गया। जितना आया, वह भी उतना चला नहीं। अच्छा तो क़तई न बना था, लेकिन एकदम बुरा भी न था। हमारी समझ से जैसा शुरू हुआ था, वैसा ही चल रहा था…फिर बंद क्यों हुआ – पता नहीं। और उसके बंद होने ने निर्देशक व कलाकारों का जितना भी नुक़सान किया हो, सुरेंद्र वर्मा का नुक़सान सर्वाधिक किया। यह चलन है मीडिया का – कि वहाँ काम से अधिक नाम देखा जाता है। जिसका एक चल गया, उस लेखक-निर्देशक के कामों की झड़ी लग गयी और जिसका एक नहीं चला, उसके लिए सिमसिम का दर बंद। लिहाज़ा, सुरेन्द्रजी की कृतियों पर मीडिया में विराम-सा लग गया है, जिसका ख़ामियाज़ा वर्माजी की अन्य कृतियों को भुगतना पड़ रहा – ऐसा मेरा कयास है। मेरे हिसाब से सर्वाधिक भुगतना पड़ रहा है – ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ को, जिसके लिए साहित्य जगत की कूढ़मगजता पर तो अफ़सोस होता ही है, मीडिया की बेरुख़ी पर ज्यादा ‘सर पीटना’ होता है, क्योंकि यह तो फ़िल्म-सीरियल-रंगमंच का धरा-धराया माल है। यूँ अचरज इस बात का भी होता है कि सुरेन्द्रजी ने इस थीम पर नाटक क्यों नहीं लिखा – या इसी का रूपांतर क्यों नहीं कर रहे…!! शायद किया भी हो, लेकिन मेरी जानकारी में तो अब तक नहीं आया है…।           

सुरेंद्रीय जीवन का सार – पीछे का लिखा आपको याद होगा कि अपने जीवन की बावत बात करने, बताने के नाम पर कैसे चुप हो गये थे। लेकिन अब कहने की स्थिति बन गयी है कि किसी प्रकाशक की ज़रूरत व लेखक के आंके हुए फ़ायदे का संयोग बनेगा, तो ‘धर्मयुग’ के लिए हुई बातचीत की तरह वह काम भी हो जायेगा…। लेन-देन के व्यवहार व व्यापार के लिए तो हमारी मनीषा में अध्यात्म को भी नहीं बख्शा गया – ‘अजब है यह दुनिया बाज़ार। जीव जहां पे ख़रीददार है ईश्वर साहूकार’! तो फिर सुरेन्द्रजी, उनके लेखक व प्रकाशक की बात ही क्या!! और इसीलिए ऐसे व्यवहार-व्यापार की यह परम्परा बड़ी धनी-मानी है। फिर सुरेन्द्रजी के लिए अपने जीवन में दुनियादारी का कोई वैसा नियम नहीं, रवायत नही – ऐसे हर इक भाव व तत्त्व से बग़ावत न सही, इनकी परवाह न करके ही बनता है इनका जीवन, उसी से उपजा है उनका ज़हीन-क्लासिक लेखन!! और जीवन का तो वही है कि मुम्बई में रहते ही गिर गये बाथ रूम में, तो इतना ही बता के चुप लगा गये – यह तक न बताया कि कितना लगा, कहाँ लगा…। उस पूरे दौरान संवाद ही बंद कर दिया…!! मेसेज कर दिया कि ठीक हो जाने पर बात करेंगे…!! लेकिन यह बर्ताव फ़िल्म ‘आनंद’ का वह भाव तो निश्चित ही नहीं – कि ख़ुशियाँ सबके लिए, दुःख तो सिर्फ़ अपने लिए ही होगा…!! पर कुछ है, जो नितांत इसी का सजातीय होते हुए भी इससे भिन्न है – नितांत वैयक्तिक है – सुरेंद्रीय है।

घर-परिवार उनके साथ जीवन में है नहीं। उनके साहित्य में है, तो रचनात्मकता में इस कदर संगुफ़ित कि आप उसे विलगा नहीं सकते, उसमें निजता का संधान कर नहीं सकते। लेकिन इसकी सर्जक है – दुनिया के सामने सुरेंद्र वर्मा की नितांत गहन वैयक्तिकता ही, जो अपने स्व में दुनिया के ‘पर’ को घुलाकर जब सृजित करती है, तो वह पूरे समाज के लिए क्या, अखिल कायनात के लिए होता है…। जिस भाव को जीवन में रखा नहीं, उसे रचनाओं के ज़रिए पूरी दुनिया में प्रसरित कर दिया। तभी तो इनके यहाँ ‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ में प्रेम, रिश्तों-भावनाओं और धंधे के उसूलों का ऐसा जटिल, पर निराबानी संकुल वाला आसव तैयार होता है, जिसमें एक रंडा याने ‘जिगालो’ (यौन कर्मी – सेक्स वर्कर) भी अपने दिली रिश्तों के लिए जान तक दे देने की गहरी अनुरक्ति में पगा है…, तो उसी का जिगरी दोस्त एक गुंडा अपने धंधे की प्रतिबद्धता को निभाते हुए मौक़ा आने पर इसी दोस्त की जान लेने की सुपारी को इनकार करते-करते भी ले ही नहीं लेता, उसे अंजाम तक पहुँचा भी देता है। और वह प्रेमिका का अमीर बाप ही है, जो अपनी बेटी को अपने वर्गीय स्तर का सुखी जीवन मुहय्या कराने एवं अपने स्तर के मुताबिक़ शादी कर पाने के लिए उस जिगालो प्रेमी की हत्या करा देता है…। यह सब कुछ बेहद क्रूर है। पर उच्च वर्गीय एवं पितृत्व के जैविक भाव के यथार्थ से संवलित होकर सर उठाये, सीना ताने खड़ा है। ऐसे में बेटी व प्रेमिका से कौन सा बाप पूछता है या उसकी सुनता भी है, जो सुरेन्द्रजी पूछवाते या सुनवाते…??

पढ़ने के बाद सवाल आया मन में कि मरता तो है – सिर्फ़ यही एक रंडा। फिर यह गुलदस्ता दो मुर्दों के लिए क्यों? दूसरा मुर्दा कौन है? क्या उसके गुंडे दोस्त के अंदर के मनुष्य का मरना? (क्योंकि ऐसे में बेटी के हितों के लिए बापों के अंतस् में निहित मनुष्य का मरना तो सनातन है।) फिर इस कृत्य के बाद प्रेमिका का क्या होता है, वह क्या करती है…, पर भी उपन्यास चुप है। पूँजीपति बाप की पढ़ी-लिखी बेटी से कुछ कराना भी भरसक आवश्यक था, जिसमें लेखकीय दृष्टि का एक आयाम बनता…। इस पर चुप्पी लेखक की स्वतंत्रता हो सकती है, पर यह लेखकीय दायित्व निभाने से अलग जाने या उसका मौक़ा चूकने जैसा भी है!! ऐसा करने से उस शिक्षित युवती का व्यक्तित्व भी बनता, वरना इस लेखकीय सलूक (ट्रीटमेंट) से वह एक निरीह पारम्परिक लड़की और बेजान पात्र बन कर रह जाती है। हाँ, कोई यह ज़रूर कह सकता है कि यह कृतिकार का वर्ण्य न था…। किंतु क्यों नहीं था? यही तो वर्ण्य बनता, जिसके बिना इसमें आयी एकांगिता से बचा नहीं जा सकता। और युवती का किरदार बस एक पढ़ी-लिखी, सजी-धजी गुड़िया भर बन कर रह जाता है – मुख्य धारा से कटा – एक तटीय पात्र!!

‘दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता’ के बाद ‘ये नाज़ी साये’…जैसे नाम से कृति की चर्चा काफ़ी पहले से उन्हीं के मुख से सुनता आ रहा हूँ, लेकिन अभी (यह लिखने) तक कुछ सामने आया नहीं है। सो, सुरेंद्र वर्मा के एक बड़े पाठक वर्ग के साथ मेरी मुरीद पाठकीयता भी उनके सुदीर्घ जीवन एवं नित समृद्धतर होते सृजन-संसार की आगामी यात्रा के लिए शुभकामनाओं के साथ यह जीवन-यात्रा इससे आगे किस तरह के मोड़ लेती है… और किन मंज़िलों की ओर प्रयाण करती है…, की मुंतज़िर रहेगी…। आमीन!!

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सत्यदेव त्रिपाठी

लेखक प्रसिद्ध कला समीक्षक एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। सम्पर्क +919422077006, satyadevtripathi@gmail.com
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