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‘एक अरसे बाद’ की कविताओं में स्त्री-जीवन और प्रतिरोध

कविताओं का संसार इतना व्यापक है कि उसका ओर-छोर पकड़ना सम्भव नहीं। कविताएँ स्वतः बहते झरने की तरह झरती हैं। हम उसमें से केवल एक बूँद अपनी अंजुली में भर पाते हैं। कविताओं के इसी संसार से एक अंजुलि भर कविताएँ लेकर कवयित्री अनामिका चक्रवर्ती आयी हैं अपने काव्य-संग्रह ‘एक अरसे बाद’ के साथ, जो भावना प्रकाशन से प्रकाशित है।

अनामिका की कविताओं में जीवन है, उसकी उलझनें हैं, समाज की संकीर्णताएँ हैं। प्रेम है तो उसके विविध स्वरूप भी हैं, जिनमें स्त्री के मन और उसकी चाहतों का दर्शन होता है। स्त्री-विमर्श है, जहाँ फटकार भी है और चिन्ताएँ भी, प्रश्न भी हैं और रोष भी। अनामिका की कविताएँ मिट्टी की कच्ची, सौंधी महक की तरह हैं, जो अपनी सरलता से मोहित करती हैं। अनगढ़ता ही इन कविताओं की खूबसूरती है।

प्रेम और कविता का सम्बन्ध बहुत पुराना है। दोनों को परिभाषित करना बेहद मुश्किल काम है, लेकिन प्रेम और कविताएँ कभी-कभी मनःस्थिति को रेखांकित करने के माध्यम बन जाते हैं, क्योंकि दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। स्त्री को जो नहीं मिलता, वह भी उसे जीना जानती है—कैसे? इसके लिए यह कविता पढ़नी होगी, जिसमें वह कहती है—

“तुम्हारे प्रेम में मुझे लिखनी हैं कविताएँ
ताकि, कविताओं में तुमसे प्रेम कर सकूँ।”

गहन बोध लिये हुए यह कविता स्त्री की मनःस्थिति का दर्शन कराती है।

कभी-कभी मोहब्बत को पाकर भी इंसान उसे पूरी तरह पाना नहीं चाहता, स्वीकारना नहीं चाहता। वह एक निश्चित दूरी बनाकर उसे घूँट-घूँट पीना चाहता है, जैसे सिगरेट के हर कश के साथ कोई जीता है। वही उसका आनन्द होता है। कहते हैं न, मोहब्बत पूर्णता को स्पर्श कर ले तो पूर्णविराम लग जाता है। इसलिए अधूरापन अपनी कसक के साथ अधिक भाता है। इसी भाव को रेखांकित करती है कविता ‘सिगरेट संवाद’।

माहवारी की पीड़ा के माध्यम से पुरुष समाज को दृष्टि देती कविता ‘माहवारी’ आज के समय का मुखर स्वर है। पुरुष को समझना होगा कि स्त्री भी उसी की भाँति मनुष्य है।

“रंग-बिरंगे हाथों वाली ऐसी औरत
मैंने अक्सर, घर-घर में देखी।”

हर गृहिणी के जीवन का दर्शन कराती यह कविता एक यथार्थ को उकेरती है, जिसे पढ़कर ही समझा जा सकता है।

‘खाली स्थान भरो’ ज़िन्दगी का फलसफा प्रस्तुत करती हुई एक नयी दृष्टि देती है। बेशक, दुनिया की हकीकत आना और जाना है, लेकिन इन दोनों सिरों के मध्य विचरण करता जीवन क्या है, इसका बोध कराती है यह कविता। इसका दर्शन इन पंक्तियों में होता है—

“और इन आने और जाने के बीच
बाकी ज़िन्दगी केवल
खाली स्थान भरो भर है
परन्तु किसी को ये नहीं पता।
खाली स्थान भरने की जगह
किसकी कितनी बड़ी
और किसकी कितनी छोटी है
कितनी सरल और कितनी कठिन है।”

विकास की अन्धी दौड़ ने कैसे जंगल खत्म कर दिये और वहाँ रहने वाले जानवरों का घर छीन लिया, इसका चित्रण करते हुए कविता एक प्रश्न खड़ा करती है—आखिर इस अन्धी दौड़ का हश्र क्या होगा, क्या मनुष्य ने कभी सोचा है? ये पंक्तियाँ न केवल जंगल की व्यथा, अपितु मनुष्य के भविष्य का भी दर्शन कराती हैं—

“जंगल खुद को जलता हुआ
देख रहा है शहर में बदलते हुए
और उसकी आँखें
एक चिड़िया को ढूँढ़ रही हैं।”

कॉल गर्ल और रेड लाइट एरिया में रहने वाली धन्धे वाली औरतों के बीच भी कितना अन्तर किया जाता है, उस फाँक को कविता ‘धन्धे वाली औरतें’ स्पष्ट रूप से उजागर करती है। एक सुविधाभोगी है, दूसरी समाज का कलंक। एक स्वीकार्य है, दूसरी अस्वीकार्य। समाज की दोगली दृष्टि को बखूबी उजागर करती यह कविता कहती है—

“इन्हें नहीं होती जरूरत
किसी खास रेड लाइट टाइप जगह की
इनके ग्रीन सिग्नल आसानी से मिल जाते हैं
रिप्यूटेड पार्लरों में, पबों में, क्लबों में
और ऑर्गनाइज की हुई पार्टियों में
फिर भी बाइज्जत बड़ी रहती हैं ये समाज की कचहरी में
जबकि ताउम्र बदनाम रहती हैं
पेट के लिए रेड लाइट पर अभागी
धन्धे वाली औरतें।”

औरतों के अस्तित्व की अस्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी होती है कविता ‘औरतें तुम जाकर कहीं मर क्यों नहीं जातीं’। आखिर कब तक औरत अपने आपको नहीं पहचानेगी? जब तक वह स्वयं को ममता और प्रेम के हाथों बेचती रहेगी, तब तक क्या वह अपने अस्तित्व को पहचान पाएगी? क्यों बार-बार मरकर जी उठती हो, जबकि तुम्हारा होना समाज को स्वीकार्य नहीं है? ऐसे प्रश्न कविता उठाती है।

कविता में कवयित्री का रोष नजर आता है, तो स्त्री के भीतर बार-बार मरकर जी उठने का साहस क्यों उत्पन्न होता है, इसका कारण भी दिखाई देता है। शायद स्त्री ही है, जिसके दम पर यह सभ्यता टिकी हुई है और मानव संसार बना हुआ है। क्या हो, अगर स्त्री विद्रोह कर दे और नयी कोंपलों को जन्म देना बन्द कर दे? क्या यह सभ्यता नष्ट नहीं हो जाएगी? शायद यही कारण है कि स्त्री के भीतर की करुणा उसे मर-मरकर जी उठने को विवश कर देती है। लेकिन कवयित्री के भीतर की आग इन पंक्तियों के माध्यम से स्त्री को जागृत करने का प्रयास करती है—

“औरतें तुम जाकर कहीं
मर क्यों नहीं जाती हो
बार-बार तुम
कभी चारे की तरह
कभी दूब की तरह
कहीं भी उग क्यों जाती हो
औरतें तुम बड़ी बवाल हो
अजीब सवाल हो
जी का जंजाल हो
तुम किसी भी आग में जलकर
कभी लोहा कभी सोना क्यों बन जाती हो।”

समाज और देश में हो रहे अत्याचारों पर तंज करती है कविता ‘हम बहुत दुखी हैं’। आज के दौर का कड़वा यथार्थ यही है कि हम कविताओं में ही हल्ला मचा सकते हैं, विद्रोह दर्ज कर सकते हैं, जमीन पर खड़े होकर नहीं। बदलते समय के तेवर का कच्चा चिट्ठा खोलती यह कविता आज की राजनीति के नकली चेहरे से भी नकाब उतारती है। यह इंगित करती है कि आज दुखी होना भी महज शब्द भर रह गया है।

एक स्त्री अपने ममत्व और प्रेम से त्यागपत्र नहीं दे पाती। यही कारण है कि वह उम्रभर अनेक पीड़ाएँ सहकर भी उफ तक नहीं करती। इसी भाव को कविता ‘त्यागपत्र’ दर्शाती है। इसकी पंक्तियाँ स्त्री की उस विवशता को सामने लाती हैं, जहाँ वह अपने जीवन में उत्पन्न अनेक समस्याओं और विकृतियों के कारण विद्रोह करना चाहकर भी नहीं कर पाती—

“मैं दे देना चाहती थी जीवन से त्यागपत्र मगर
अपनी कोख के जनों के सर से हटा न सकी अपना आँचल
तब कर दिया मैंने
अपने लिखे त्यागपत्रों को अस्वीकार।”

यह कविता स्त्री-जीवन और उसके संघर्षों को बिना विस्तार से कहे ही व्याख्यायित कर देती है। एक स्त्री अपने बच्चों और अपनी ममता की खातिर जीवन भर दुख के सागर में गोते लगाती रहती है और उफ तक नहीं करती। ये कैसी बेड़ियाँ हैं, जो समाज ने उसके पैरों में डाल दी हैं और जिनसे वह मुक्त नहीं हो पाती?

 

 

वंदना गुप्ता

लेखिका कथाकार, कवयित्री और समीक्षक हैं। उनके चार उपन्यास, दो कहानी-संग्रह और आठ कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। rosered8flower1@gmail.com +919868077896
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