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हिन्दी आलोचना के शीर्ष पुरुष नन्दकिशोर नवल

 

हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक और मूर्धन्य डॉ. नन्दकिशोर नवल का  मंगलवार, 12 मई की रात निधन हो गया। 30 अप्रैल को वे अपने घर पर ही गिर गये थे। उन्हें काफी गंभीर चोट आयी थी। थोड़ी तबीयत सम्हली और इस बीच उन्हें निमोनिया हो गया। पिछले कई दिनों से वेंटिलेटर पर थे। 82 वर्षीय डॉ. नन्दकिशोर नवल जी पटना विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक रह चुके थे। उनका जन्म 2 सितम्बर, 1937 को वैशाली जिले के चांदपुरा में हुआ था। हिन्दी साहित्य के एक अप्रतिम शोधार्थी, व्याख्याकार, आलोचक और बेहद आत्मीय व्यक्तित्व का आकस्मिक तरीक़े से व्यतीत हो जाना, साहित्य की बड़ी क्षति है।
इस दुनिया में हम किसी के भरोसे और प्रेम पाने के लिए जीते है लेकिन उसके जाने के बाद जीवन में जिस तरह शून्य पैदा हो जाता है उसकी भरपाई सम्भव नही है।

बिहार में प्रगतिशील लेखक संघ को मजबूत आधार देने में डॉ. नन्दकिशोर नवल का बड़ा योगदान था। उन्होंने आलोचना, उत्तरशती जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन किया था। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और प्रखर आलोचक व चिन्तक अपूर्वानन्द उनके दामाद हैं। डॉ. नन्दकिशोर नवल के निधन की सूचना मिलते ही साहित्य जगत में शोक व्याप्त हो गया।

दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली जावेद ने लिखा:-
अभी अभी ख़बर मिली है कि हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक नन्द किशोर नवल जी का थोड़ी देर पहले पटना में निधन हो गया। वह सिर्फ बिहार नहीं बल्कि पूरे हिन्दी जगत के एक महत्वपूर्ण साहित्यकार के रूप में जाने जाते थे। अपनी 83 साल की पूरी ज़िंदगी उन्होंने एक प्रतिबद्ध सामाजिक चिंतक के रूप में गुजा़री और अपने आदर्शों पर कभी समझौता नहीं किया। उनका जाना उनकी बेटी पूर्वा भारद्वाज और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक अपूर्वानन्द के लिए एक भारी आघात के अलावा प्रगतिशील लेखक आन्दोलन के लिए एक बड़ी क्षति है।

दिल्ली युनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने लिखा:-
‘नवल जी ने हमारी पीढ़ी के अनेक युवाओं को मार्क्सवाद और साहित्य के जनपक्षधर सौंदर्यशास्त्र में दीक्षित किया। उनकी दर्जनों पुस्तकों ने हिन्दी आलोचना में महत्त्वपूर्ण आयाम जोड़े हैं। जैसे-समकालीन काव्य-यात्रा, मुक्तिबोध: ज्ञान और संवेदना, निराला और मुक्तिबोध: चार लंबी कविताएँ, दृश्यालेख, मुक्तिबोध और निराला: कृति से साक्षात्कार।

प्रसिद्द कलाविद और आलोचक ज्योतिष जोशी ने लिखा:-
‘प्रसिद्ध आलोचक और हिन्दी विभाग, पटना विश्वविद्यालय के आचार्य और अध्यक्ष रहे डॉ. नन्दकिशोर नवल के देहांत की सूचना से मन व्यथित हो गया। उन्होंने जीवन पर्यंत हिन्दी आलोचना में महत्वपूर्ण काम किया और अनेक स्तरों पर उसे समृद्ध किया। आलोचना और कसौटी जैसी पत्रिकाओं के सम्पादन के साथ साथ आपने निराला रचनावली का भी सम्पादन किया। उमकी अनेक पुस्तकें हैं जिनमें कुछ के नाम जो स्मृति में आ रहे हैं- कविता की मुक्ति, हिन्दी आलोचना का विकास, प्रेमचंद का सौंदर्यशास्त्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना, कविता के आर पार, कविता : पहचान का संकट, तुलसीदास आदि हैं।

बिहार इप्टा के महासचिव तनवीर अख्तर ने लिखा:-
‘पटना इप्टा से गहरे रूप से जुड़े और मेरे निराशा के समय मेरे किये गए कामों को आलोचय दृष्टि से समझाने वाले हिन्दी के प्रख्यात विद्वान जनाब नन्दकिशोर नवल का अभी थोड़ी देर पहले निधन हो गया है। नवलजी प्रगतिशेल लेखक संघ बिहार और इप्टा से शुरियाती दौर से जुड़े रहे। हिन्दी साहित्य में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। पटना इप्टा के साथी अपूर्वानन्द और पूरब (पूर्वा भारद्वाज) की यह निजी क्षति भी है। इस दुःख की घड़ी में हम इप्टा के सभी साथी पूरी संवेदना के साथ उनके साथ खड़े है।
नवल जी ने हमारी पीढ़ी के अनेक युवाओं को मार्क्सवाद और साहित्य के जनपक्षधर सौंदर्यशास्त्र में दीक्षित किया। उनकी दर्जनों पुस्तकों ने हिन्दी आलोचना में महत्त्वपूर्ण आयाम जोड़े हैं। वो सच्चे अर्थों में विद्वान और अनुशासित लेखक-प्रोफेसर रहे हैं।
नन्दकिशोर नवल, उनकी पत्नी और पुत्री पूर्वा
नन्दकिशोर नवल, उनकी पत्नी और पुत्री पूर्वा

नवल जी आलोचना में हमेशा पाठ की केन्द्रीयता पर जोर देने वाले आलोचक रहे। पाठ से विच्छिन्न सिद्धांत चर्चा उनके लेखे आलोचना को अप्रासंगिक बनाने के सिवा कुछ और नहीं कर सकती। निराला पर उनका काम निराला की पाठ परम्परा को अनेक स्तरों पर समृद्ध करने वाला काम है।

वरिष्ठ कवि और कथाकार ध्रुव गुप्त कहते हैं   ‘नंद किशोर नवल को पढ़ना या सामने बैठकर उन्हें सुनना मेरे लिए हमेशा एक असाधारण अनुभव रहा है। स्व. नामवर सिंह के अलावा मुझे उनसे ज्यादा
पढ़ा और समझा हुआ आलोचक कोई और नहीं मिला। आश्चर्य यह कि इतना सारा पढ़ लेने और लगभग सत्तर पुस्तकों की रचना के बाद भी कविता की संवेदना और मर्म के भीतर पैठकर उसमें से कुछ बारीक, कुछ मुलायम, कुछ अद्भुत चुनकर सामने लाने की उनकी संवेदना जीवन के अंतिम दिनों तक कम नहीं हुई। वे ऐसे सूक्ष्मदर्शी और प्रखर आलोचक थे जिनके भीतर एक मुलायम-सा कवि बसता था। उनकी आलोचना की भाषा में इतना प्रवाह, इतनी सरसता शायद उनके भीतर बैठे उसी कवि से आती थी। उनके जाने से हिंदी आलोचना का एक बहुत बड़ा स्तंभ ढह गया है।

डॉ. नन्दकिशोर नवल की प्रमुख कृतियाँ
प्रमुख पुस्तकें: तुलसीदास, आधुनिक हिन्दी कविता का इतिहास, सूरदास, पुनर्मूल्यांकन, दिनकर: अर्धनारीश्वर कवि, रीति काव्य।
मुख्य सम्पादित कृतियाँ: निराला रचनावली (आठ खंड), दिनकर रचनावली (पाँच काव्य-खंड), स्वतन्त्रता पुकारती, हिन्दी साहित्यशास्त्र, मैथिलीशरण संचयिता, नामवर संचयिता, संधि-वेला, पदचिद्द, हिन्दी साहित्य: बीसवीं शती, हिन्दी की कालजयी कहानियाँ।
आलोचना- कविता की मुक्ति, हिन्दी आलोचना का विकास, प्रेमचंद का सौदर्य शास्त्र, महावीरप्रसाद द्विवेदी, शब्द जहाँ सक्रिय हैं, यथाप्रसंग, समकालीन काव्य-यात्रा, मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना, निराला और मुक्तिबोध: चार लंबी कविताएँ, दृश्यालेख, मुक्तिबोध, निराला : कृति से साक्षात्कार : शताब्दी की कविता, निराला : काव्य की छवियाँ, कविता के आर-पार, कविता: पहचान का संकट, मुक्तिबोध की कविताऍं: बिम्ब-प्रतिबिम्ब, क्रमभंग, निकष, उत्तर-छायावाद और रामगोपाल शर्मा ‘रूद्र’

नन्दकिशोर नवल, उनकी पत्नी और दामाद अपूर्वानन्द

कुछ खास बातें
* आलोचक डॉ. नामवर सिंह के सहयोगी श्री नवल ने उनके साथ ‘आलोचना’ पत्रिका का सम्पादन किया था।
* उन्होंने ‘निराला रचनावली’, ‘रुद्र रचनावली’ और ‘दिनकर रचनावली’ का भी सम्पादन किया तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी के ‘मुक्तिबोध’ पर महत्वपूर्ण किताबें लिखी थी।
* पटना विश्व विद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष से सेवानिवृत्त होकर वे स्वतन्त्र लेखन कर रहे थे।
* उन्होंने 1980 के आरंभ में ‘धरातल’ नामक पत्रिका निकाली थी। बाद में ‘कसौटी’ भी।
* उन्हें रामचन्द्र शुक्ल सम्मान और दिनकर सम्मान भी मिला था।
* उनकी 20 किताबें आलोचना संसार की ख़ास किताबें मानी जाती रही हैं।
* ‘धरातल’ में सबसे पहली बार उन्होंने उन पाँच युवा कवियों को प्रभावी तरीक़े से प्रस्तुत किया, जिससे 1980 का ‘कविता की वापसी’ का ‘नव-प्रगतिशील काव्यांदोलन’ संभव हो सका।

आलोचक नवल जी को  ‘संवेद’ की विनम्र श्रद्धांजलि, उनकी लिखी एक बहुत आरम्भिक कविता के साथ!
मेरे प्राणों के शिखर ज्योतिर्मय हो रहे हैं,
मेरे मन के आम्रवन में मलयपवन का संचार हो रहा है,
मेरे अन्तर के शालिक्षेत्र पर चन्दा का अमृत बरस रहा है,
मेरे हृदय की डाली में कोंपलें फूट रही हैं,
मेरी चेतना का क्षितिज परिधान बदल रहा है,
मेरे मानसलोक में एक अपर लोक से किरणें आ रही हैं
क्या भीतर की पपड़ियाँ तोड़कर
तुम निकल रहे हो, प्रेम?

प्रस्तुति: संवेद डेस्क
आभार: अमरनाथ,जयप्रकाश मानस, आशुतोष कुमार, विनीत कुमार,स्वप्निल श्रीवास्तव

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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