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वैश्विक महामारी में ‘शरणदाता’ कहानी के देविन्‍दरलाल जी

 

जब से कोरोना ने वैश्विक महामारी का रूप लिया है, तब से ही पूरे देश में इस बीमारी ने हड़कम्प मचा रखा है। इस बीमारी पर काबू पाने के लिए देश-दुनिया के कई हिस्‍सों में लॉकडाउन लागू किया गया। इस दौरान जिन देशों में लॉकडाउन लागू किया गया, वहाँ फंसे अन्‍य देशों के लोगों का जीवन पूरी तरह से बाधित और प्रभावित हो गया। लॉकडाउन के दौरान अधिकांश लोग कहीं-न-कहीं फंस गये और जिन स्‍थानों पर लोग फंसे, वहाँ उनका जीवनयापन विभिन्‍न समस्‍याओं से घिर गया। अधिकांश देशों ने लॉकडाउन के दौरान फंसे लोगों को शरण देकर अतिथि के तौर पर मान-सम्‍मान दिया, तो कुछ देशों ने दूसरे देशों से आये लोगों को वापस लौटने का फरमान जारी कर दिया। इस संकट काल में जिन प्रवासी लोगों को शरण नहीं मिल पाया, उन लोगों ने अपने मूल वतन, शहर, कस्‍बा, गाँव लौटने के लिए मजबूर होकर वे सारे प्रयास करने लगे, जिससे उनकी घर वापसी हो सके। इसके लिए विभिन्‍न माध्‍यमों का उपयोग कर लोगों ने सहयोग की अपील भी की।

सम्भवत: प्रत्‍येक देश और राज्‍य के सरकारों ने अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए हर सम्भव मदद भी की। भारतीय मूल के अधिकांश लोग पश्चिमी संस्‍कृति से जितने अधिक आकर्षित और प्रभावित रहे हैं, कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने इन लोगों को पश्चिमी संस्‍कृति की अपेक्षा अपने देश की मिट्टी के महक का वास्‍ताविक एहसास दिलाया। अपने मूल स्‍थान अथवा स्‍वदेश लौटने की ललक और शरण देने के बीच अज्ञेय की कहानी ‘शरणदाता’ भारतीय समाज के यथार्थ चरित्र को परिलक्षित करता है।

‘शरणदाता’ कहानी की शुरूआत देविन्‍दरलाल जी और रफ़ीकुद्दीन नामक पात्र से होती है। इन दोनों के बीच गहरी मित्रता थी। एक-दूसरे के प्रति आदर और सम्‍मान की भावना भी थी। देविन्‍दरलाल जी एक मुस्लिम मोहल्‍ले में सालों से भाईचारे के साथ, अपने घर में रहते आ रहे थे। परन्तु एक समय बाद इस मोहल्‍ले का माहौल बदल जाता है। देविन्‍दरलाल जी जिस मोहल्‍ले में रहते थे, वहाँ के सभी हिन्दू लोग इस मोहल्‍ले को छोड़कर जा चुके थे। इसलिए देविन्‍दरलाल जी भी अपने घर को छोड़कर जाना चाहते थे, किन्‍तु रफ़ीकुद्दीन की मित्रता, उनका विनती करना और सुरक्षा का आश्‍वासन देने के कारण वह वहीं रूक जाते हैं। किन्तु कुछ दिनों के पश्‍चात ही वहाँ का वातावरण और अधिक बिगड़ने लगता है। जिस सोच-विचार के साथ रफ़ीकुद्दीन ने देविन्‍दरलाल जी को रोका था, वह बिल्कुल उल्‍टा हो जाता है। खतरे की आशंका को देखते हुए आवश्‍यक समाग्री के साथ देविन्‍दरलाल जी को रफ़ीकुद्दीन अपने घर में शरण देते हुए कहते हैं कि कुछ ही दिनों की बात है, सब कुछ ठीक हो जायेगा और आप जल्‍द ही अपने घर कुशल मंगल के साथ लौट जायेंगे।

देखते ही देखते देविन्‍दरलाल जी के आँखों के सामने हुल्‍लड़ मोजंग आ पहुँचता है और इनके घर का ताला तोड़कर सारा सामान लूट लेता है। इस दृश्‍य को देखकर रफ़ीकुद्दीन ग्‍लानि भरे स्‍वर से कहते हैं- यह दिन भी था देखने को और वह भी आजादी के नाम पर। यह गरमा-गरम माहौल कई दिनों तक चलता रहता है। इस बीच देविन्‍दरलाल जी, रफ़ीकुद्दीन के घर के बाहर तो नहीं निकल सकते थे, इसलिए रफ़ीकुद्दीन शहर की रोजमर्रा की खबर घर आकर सुनाया करते थे। कुछ दिनों तक तो सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा। एक दिन देविन्‍दरलाल जी, रफ़ीकुद्दीन की बातों में मौजूद उदासी और विरक्ति को समझ लेते हैं। यों तो रफ़ीकुद्दीन अपनी ओर से अपने मित्र की मदद के लिए हर सम्भव प्रयास कर रहे थे। इसके बावजूद अपनी धार्मिक लाचारी को अपने मित्र को बताते हुए, उनके रहने के लिए दूसरा स्‍थान ठीक करने की बात कहते हैं। इस बात को सुनकर देविन्‍दरलाल जी के ‘पैरो तले से जमीन सरक जाती है’ और भारी स्‍वर से वह जाने की हामी भर देते हैं।

रफ़ीकुद्दीन ने अपने मित्र के रहने की व्‍यवस्‍था शेख साहब के बगल की कोठरी में कर देते हैं। जिस जगह पर रहने की व्‍यवस्‍था की जाती है, वह किसी कबूतर खाने से कम नहीं था। लेकिन ‘मरता क्‍या नहीं करता’? देविन्‍दरलाल जी बड़े मुश्किल से एक बिलार के साथ दिन और रात बिताते रहे। प्रतिदिन रफ़ीकुद्दीन के पहचान वाले दिन ढलने के वक्‍त दोनों समय का भोजन एक ही बार में दे जाते थे। जिस कोठरी में देविन्‍दरलाल जी रूके थे, उसी के बगल में सटा वही घर था, जहाँ से भोजन आता था। घर सटा होने के कारण उस घर में हो रही बातचीत की आवाज भी सुनाई पड़ती थी। इन आवाजों से देविन्‍दरलाल जी भली-भाँति परिचित हो चुके थे। एक दिन इन लोगों की बातों को सुनकर वे समझ गये कि ये लोग भी मुझसे छुटकारा पाना चाहते हैं। परन्‍तु कैसे? इस संदर्भ में शेख साहब के परिवार में चर्चा हो रही थी। ये लोग सोच रहे थे, क्‍यों न खाने में ही कुछ मिलाकर दे दिया जाए। देविन्‍दरलाल जी इस बात को ठीक ढंग से नहीं सुन पाते हैं।

शेख साहब के घर से एक दिन टिफिन के खाने में जहर मिलाकर भेज देते हैं। किन्‍तु घर की एक सदस्‍य संवेदनशील थी, इसलिए इस खाने के टिफिन में कुछ लिखकर एक पुडि़या डाल देती है। टिफिन खोलने के पश्‍चात् देविन्‍दरलाल जी की नजर उस पुडि़या पर पड़ती है, जिसे वह गोल करके फेंकने ही वाले थे कि हाथ ठिठक जाता है। फिर उन्‍होंने कोठरी के किसी छोटे से उजाले में उस पुडि़या को ध्‍यान से देखा, जिसमें लिखा हुआ था कि खाना कुत्‍ते को खिलाकर खाइएगा।

देविन्‍दरलाल जी जिस कोठरी में रहते थे, वहाँ कोई कुत्‍ता तो नहीं था, हाँ एक बिलार (बिल्‍ली) जरूर थी। जब से इस कोठरी में आये थे, इस बिलार से दोस्‍ती हो गयी थी। टिफिन में रखे संदेश को पढ़ने के बाद उस बिलार को पुचकारते हुए टिफिन का खाना खिला देते हैं और उसे सहलाने लगते हैं। सहसा बिलार कुछ देर तक इधर-उधर कूदने के बाद दुर्बल चीख के साथ मर जाती है। इस घटना के बाद देविन्‍दरलाल जी को यह साफ दिखने लगा कि भाईचारे के नाम पर धोखा किया जा रहा है। पहले रफ़ीकुद्दीन ने की और अब शेख साहब शरण देने के नाम पर विश्‍वासघात कर रहे हैं। उससे देविन्‍दरलाल जी को आघात पहुँचता है- और कहते हैं कि दुनिया में खतरा बुरे के ताकत के कारण नहीं, अच्‍छे की दुर्बलता के कारण है। भलाई की साहसहीनता ही बड़ी बुराई है। देविन्‍दरलाल जी यह कहते हुए टिफिन का खाना नहीं खाते हैं और खाना वहीं आँगन में रख कर, अपने साथ कुछ आवश्‍यक समाग्री लेकर उस स्‍थान को अलविदा कहते हुए, भगवान भरोसे निकल जाते हैं।

वे सोचते हैं, ऐसे लोगों से आश्रय लेने से बेहतर है कि संघर्ष करके मरना अच्‍छा होगा। विभिन्‍न समस्‍याओं का सामना करते हुए, किसी तरह बचते हुए एक रेडियो कार्यालय तक पहुँच जाते हैं। वे यहाँ अपना पता देकर अपील करते हैं और अपने वतन पहुँच जाते हैं। एक दिन शेख साहब के घर से जिसने टिफिन में पुर्जा रखकर खाने में जहर होने की सूचना देविन्‍दरलाल जी को दी थी, उनकी चिठ्ठी आती है। इसमें लिखा रहता है कि आप सही सलामत घर पहुँच गये लाख-लाख शुक्र है। यदि आपके मुल्‍क में कोई मजलूस हो तो याद कर लिजिएगा। इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है। इसलिए कि आप अच्‍छे इंसान हैं। इसी चिठ्ठी वाली के कारण देविन्‍दरलाल जी की जान बच पाई थी।

किसी भी मजबूर और असहाय व्‍यक्ति की सहायता करना ईश्‍वर की सच्‍ची साधना और भक्ति है। किन्‍तु धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद की आड़ में किसी भी तरह का दोषारोपण करना और विश्‍वासघात करना घातक सिद्ध होता है। लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में जिस तरह से तबलीगी जमात के लोगों को कोरोना वाहक के रूप में मीडिया ट्रॉयल और राजनीतिकरण हुआ, वह अमानवीयता का परिचायक प्रतीत होता है। जबकि विदेशों से आये इस कोरोना महामारी का खमियाजा भारत के सभी वर्ग को भुगतना पड़ा, खासतौर पर भारत के मजदूर वर्ग के लिए यह सबसे बड़ी समस्‍या बनकर उभरी। किन्तु विदेशों से वापस लौटने वाले अन्‍य समुदाय के लोगों को कोरोना वाहक के रूप में शायद ही कहीं दिखाया गया।

अपने ही मुल्‍क में एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर काम करने गये मजदूरों ने कोरोना कालखण्‍ड में जब घर वापसी करना चाहा तो, उन्‍हें निरन्तर संघर्ष करना पड़ा। ये लोग अपने ही देश में रहने के बावजूद प्रवासी मजदूर कहलाने लगे। प्रवासी मजदूर कहना कहाँ तक तर्कसंगत है, यह विचारणीय है। बहरहाल इस संकट काल में कई मजदूरों की जान भुखमरी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में चली गयी, क्‍योंकि इस संकट काल में इन मजदूरों को शरणदाता के रूप में रफ़ीकुद्दीन और शेख साहब जैसे लोग मिले थे, जो अपने शरणार्थी के प्रति विश्‍वासघात करते रहे। जब कोई व्‍यक्ति किसी के शरण में होता है, तब वह उनका अतिथि होता है, जिनका मान-सम्‍मान के साथ स्‍वागत होना चाहिए। किन्‍तु स्‍वागत की जगह अधिकांश प्रवासी मजदूरों को भुखमरी और विभिन्‍न संकटों का सामना करना पड़ा। शायद इसी का परिणाम है कि बड़ी संख्‍या में लाकडॉउन के दौरान प्रवासी मजदूरों को पैदल ही पलायन करना पड़ा। बिना मंजिल को हासिल किए न रूकने वाले मजदूरों के छालेपूर्ण कदम हर किसी के दिल को दहला देने वाला था।

इस तरह की घटनाएँ सिर्फ सरकारी तन्त्र को ही शर्मशार करने वाला नहीं है, बल्कि सभ्‍य समाज में रहने वाले उन लोगों के लिए भी उतना ही निंदनीय है, जिनकी नैतिकता और मानवीयता मर चुकी है। खासतौर पर सभ्‍य समाज के ऐसे लोग जो सम्‍पन्‍न और सामर्थ्‍य हैं और ये लोग, गरीबों और मजबूरों की मदद कर सकते हैं, किन्तु करना नहीं चाहते। समाज में ऐसे लोगों की संख्‍या बहुत ही तेजी से बढ़ रही है। यदि यही आलम रहा तो मजदूरों और मजबूरों को आश्रय देने वाले लोग निरन्तर विश्‍वासघात करते रहेंगे और देविन्‍दरलाल जी जैसे लोगों का जान बचना मुश्किल हो जायेगा। जिस सभ्‍य समाज की बात हम कर रहे हैं, उस सभ्‍य समाज के अधिकांश लोगों का जीवन सामाजिक होने के बजाय एकांकी होता जा रहा है। इसलिए शरणदाताओं की कमी के कारण न जाने कितने प्रवासी मजदूरों को अपनी जान गवानी पड़ी?

इस प्रकार हम देखते हैं कि अधिकांश विपदाओं, युद्धों या फिर अन्‍य त्रासदियों के दौरान समय-समय पर साहित्‍य की रचना की जाती रही है। ऐसी साहित्यिक रचनायें उस समय के दस्‍तावेजीकरण के साथ-साथ सामाजिक साक्ष्‍य के समान होता है, जो कालजयी बनकर समय-समय पर यथार्थ बनकर हमारे मनस पटल पर उभरने लगता है तथा प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।

  संतोष कुमार बघेल

लेखक शिक्षक एवं स्‍वतन्त्र लेखक हैं।

सम्पर्क- +919479273685, santosh.baghel@gmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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