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 मानस की चौपाई जैसे हैं अब्दुल बिस्मिल्लाह : रमेश सिंह   

संस्मरण

 

वर्णन करना बहुत कठिन होता है उस व्यक्ति का- हम जिसके बेहद करीब होते हैं। जो हमारेबहुत करीब होता है उसे हम कभी भी पूरा-पूरा ना तो देख पाते हैं और ना ही पूरी तरह से समझ  पाते हैं। जरूरत ही नहीं पड़ती। मेरा और अब्दुल्ल बिस्मिल्लाह जी (जिन्हें आगे चल कर सिर्फ बिस्मिल्लाह कहूॅंगा) का किस्सा भी कुछ कुछ ऐसा ही है। बात कहाँ से प्रारम्भ हो – सबसे बड़ी उलझन यही है। फिर भी….वर्ष 1968 का अन्तिम माह, के.बी. डिग्री कालेज, मिर्जापुर (उ.प्र.) में हम दोनों बी. ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी थे। हमारे हिन्दी शिक्षक श्री कन्हैया लाल पाण्डेय ने किसी सन्दर्भ में मुझसे कहा कि तुम बिस्मिल्लाह से मिल लो। दो-तीन दिन की तलाश के बाद हमारी मुलाक़ात हुई।  एक गौरवर्ण लम्बी, दुबली-पतली काया, साधारण वेशभूषा, आसमानी रंग की कमीज, चौड़ी मोहरी का धुला हुआ सफेद पाजामा, हवाई चप्पलें परन्तु जेब में दो तीन पेन, हाथ में कुछ नोटबुक, चेहरे पर स्वस्थ मुस्कान और बोलती हुई आँखें। जुल्फों का तो अलग ही जलवा था। हमारी मुलाक़ाते बढ़ने लगीं। वैचारिक समानताएं मिलीं । परिचय मैत्री में कब बदल गया, पता ही नहीं चला। मैं इनके आवास पर जाने लगा था। एक मस्जिद के ऊपर एक फ्री वाला छोटा सा कमरा था जिसके फर्श पर दरी बिछी होती थी यही तख्ते ताऊस था हमारा।

  आप कुछ घरों में बच्चों को पढ़ा दिया करते थे; तो वहीं पर  इनका लंच और डिनर हो जाता था। मुझे बहुत देर से पता चला कि आपके माता-पिता, भाई-बहन आदि दुनिया मे कोई भी नहीं है। कारण था इनका आत्मसन्तोषी स्वभाव जिसने अभावों को कभी भाव नहीं दिया। कहा जाता है कि जब जन्म-पत्री के ग्रहों के गुण मिलते हैं तो विवाह अच्छा बन जाता है, परन्तु मेरा अनुभव है कि जब अवगुण मिलते हैं तो मैत्री प्रगाढ़ होती जाती है। हमारे साथ भी यही हुआ। अवगुण मिल गये थे। अवगुण यह था कि पाठ्‌यक्रम से बाहर के ज्ञानार्जन में अधिक रुचि लेना। बी.ए.की पढ़ाई के दौरान ही हम लोगों ने मिर्जापुर के उक्त डिग्री  कॉलेज और एक अन्य पब्लिक लाइब्रेरी से पाठ्यक्रम के बाहर की पुस्तकें पढ़ डाली थीं। यही वह दौर था जब हमारे कुछ सवाल थे- कुछ जिज्ञासाऍं थीं और नामी गिरामी साहित्यकारों को हम पत्र लिखते, लेकिन उनके उत्तर नहीं मिलते थे। यह तय हुआ कि सत्यलेखा मानवी के नाम से पत्र भेजे जायें। प्रयोग सफल हुआ। महिला का पत्र पाकर लोगों ने जबाब भेजे। कुछ ने कभी घर आने का प्रस्ताव दिया तो किसी ने कहा कि हमारे ऊपर कुछ लिखकर भेजिये – प्रकाशित हम करा देंगे। कुछ ने एकतरफा पत्र व्यवहार भी कुछ दिन किया। यह भी एक शगल था।

   उन दिनों आप गीत लिखा करते थे। प्रेम और विरह के गीत। हमारे पाठ्यक्रम में प्रसाद जी का ‘ऑंसू’ लगा हुआ था, जिसे श्री कन्हैया लाल पाण्डेय इस  प्रकार पढ़ाते थे कि हम सब भावविभोर हो जाते  थे। सम्भवतः उसी का प्रभाव था कि आपने उसी भावभूमि में लगभग ‘ऑंसू’  जैसे ही अनेक छन्द रच डाले थे। हम जब भी मिलते, वे उन छन्दों को पूरी लयात्मकता के साथ सुनाया करते थे। उन छन्दों का क्या हुआ, पता नहीं।  उन्हीं छन्दों से एक छन्द देखिए–

   “राधे वृन्दावन सूना है, करुणा के कोर घुमाओ

    अपने इस शून्य हृदय की हालत तो देखे जाओ। ।”

फिर आप कुछ अन्य प्रकार के प्रेमगीत लिखने लगे। आपके गीतों में वही वेदना थी, जो जयशंकर प्रसाद के ‘ऑंसू’ में है। वह वेदना, वह पीड़ा कहाँ से जन्मी थी, इसका उत्तर तो रचयिता ही दे सकता है। फिर भी, बिस्मिल्लाह जी को देखने से यह तो साफ़ पता चलता था कि उनके भीतर कोई ऐसा दर्द रेंग-फिर रहा था जो अलक्षित था। लक्षित बस इतना ही था कि उनके पास पर्याप्त कपड़े नहीं थे। आप सदैव  प्राय: एक ही वेश में दिखाई पड़ते थे।

हम लोग चूँकि पाठ्‌यक्रम से इतर भी बहुत कुछ पढ़ते थे, इसलिए कभी-कभी हमारे बीच शास्त्रार्थ भी होता था। विशेष रूप से धर्म के बारे में। किसी एक धर्म नहीं, अपितु विभिन्न धर्मों के बारे में। साहित्यिक बहसें भी होती थीं। पाठ्‌यक्रम में हिन्दी के अतिरिक्त मेरा विषय अंग्रेज़ी और आपका संस्कृत था, इसलिए जब मैं शेक्सपीयर के बारे में कुछ बोलता तो आप कालिदास पर उतर आते और अभिज्ञानशाकुन्तलम् के किसी श्लोक पर बात करने लगते। फिर बात किसी और तरफ़ मुड़ जाती।

  आपने उर्दू और अंग्रेजी में भी कविताएँ लिखी हैं। दोनों की एक-एक बानगी देखिए–

गुहर का रेत भी है अश्के-लहर के नीचे

 ज़वाल भी तो छुपा चढ़ती उमर के नीचे

तुम्हें मज़ाक़ जो करना था तो क्या मैं ही था

 बहुत ग़रीब पड़े शम्सो-क़मर के नीचे

अपना झण्डा लिये तहजीब के ज़माने में

क़दीम अब भी  खड़ा अक्लो-हुनर के नीचे

आपका बहुत ही विचलित कर देने वाला एक शे’र है, जो कभी आपने मुझे सुनाया था-

 ये पहली रात है औ’ चन्द लम्हे बस हुये लेटे

सॅंभलकर पॉंव रख ऐ शहरे-ख़ूबॉं  देखने वाले

अब अंग्रेजी कविता–

” O! My Love

        As you have plundered my favorites

Thus also

plunder you

My evils of the heart

  1970 में मैं एम ए. के लिये कानपुर चला आया और बिस्मिल्लाह जी इलाहाबाद। ये संस्कृत से एम.ए. करना चाहते थे परन्तु वहीं के एक प्राध्यापक के कोप से इन्हें संस्कृत में प्रवेश नहीं मिला। हिन्दी से एम.ए. करना पड़ा। उसके बाद उन्होंने डी.फिल यानी कि पीएच-डी.भी की। इनका इलाहाबाद प्रवास अत्यन्त दुखद रहा। शारीरिक, आर्थिक सभी तरह की तकलीफें मिलीं। माह मई, वर्ष 1971-इलाहाबाद के एक अस्पताल में लगभग मरणासन्न अवस्था में भी आपने  कविता लिखी थी जो द्रष्टव्य है-

           क्या मन में है नियति के भला कौन यह बताये

            सकता समझ न कोई जब तकदीर भुनभुनाये।।

            कल रात का हर घण्टा दो दो सौ मिनट का था

            बहुत नाम मुॅंह में आये जब मेरे घाव कुनमुनाये ।।

            मालुम नहीं कहाँ हो पर कल्पना में तो यही है

            जब तुम झलक आए नयन का हर बूंद गुनगुनाये।।

  अनेक छोटी- नौकरियाँ मिलीं लेकिन ईमानदारी के कारण लोगों ने टिकने नहीं दिया। इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में एक छोटे से कमरे में कई साल गुज़ारे। सामने एक छोटा सा कब्रिस्तान था। मैं सहपाठी और सहखाटी दोनों रहा हूँ। इस कब्रिस्तान में मैंने भी अनेक रातें गुजारी हैं। एक बार हम दोनों लेटे हुए गपशप कर रहे थे कि गली से जा रहे किसी ने आवाज़ दी- बिस्मिल्लाह साहब क्या हो रहा है ? उत्तर में बिस्मिल्लाह जी ने कहा- “कब्रिस्तान में सोने का अभ्यास कर रहा हूँ।”

  यह वह‌ दौर था (1970–1975) जब इनकी कहानियाँ प्रकाशित होने लगी थीं और कुछ “पाॅकेट मनी” आ जाती थी। कविताएँ छपती तो थीं परन्तु वे उर्वर नहीं थीं। अर्थात उनसे कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता था। इलाहाबाद के इसी प्रवास के समय आपके बारे में लिखा जाने लगा था कवि-कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह। पहचान बन गयी थी । इलाहाबाद की पढ़ाई पूरी हुई तो इन्हें बनारस के नेशनल इण्टर कालेज मे हिन्दी शिक्षक की नौकरी मिल गयी। रोजी-रोटी का संकट खत्म हुआ। उन्हीं दिनों शिक्षक आन्दोलन चला और इन्हें जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। बनारस में लगभग दस वर्ष बिताने के बाद आपको नई दिल्ली की जामिया मिल्लिया में यूनीवर्सिटी में शिक्षक के रूप में नियुक्ति मिली। दिल्ली आने के बाद ही ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसे सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यद्यपि  इस उपन्यास ने इनके प्राणों के लिए संकट पैदा कर दिए। बड़ी मुश्किल से जान बची। लेखनी बड़ी तेजी से पिकप ले रही थी। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास अनुवाद, लिप्यन्तरण, समीक्षा – सब कुछ लिखा गया। अच्छे शिक्षक के रूप मे भी विख्यात हुए।

   हाँ, व्यक्तिगत जीवन मे हमारे विवाह हो चुके थे। मेरी पत्नी इन्हें हमेशा “भइया” ही कहती थीं। प्रत्येक रक्षाबंधन के त्योहार पर इन्हें राखी भेजती थीं। हमारा रिश्ता निरन्तर  प्रगाढ़ होता रहा। मेरा दिल्ली जाना और इनका मेरे गाँव आना – बैसवारा में घूमना-फिरना तब से आज तक चल रहा है। और हाँ, जब ये पहली बार मेरे गाँव आये तो दो अविस्मरणीय घटनाएँ घटीं। पहली घटना, जब इन्हें पता चला कि यह क्षेत्र बैसवारा कहलाता है और यहाँ की बोली-भाषा भी बैसवारी है तो ये कुछ पल मौन रहे, फिर बोले: मुझे प्रतीत होता है कि मलिक मुहम्मद जायसी की और विशेषत: पद्मावत की भाषा बैसवारी ही है। हम सब दंग! क्योंकि हमें तो उनकी भाषा अवधी बताई गई थी।

  दूसरी घटना निराला जी के गाँव की है। जब मैं इन्हें गढ़ाकोला ले गया, निराला का पुराना कच्चा घर दिखाया और पत्थर की वह  चक्की दिखाई जिस पर निराला जी स्वयं गेहूँ पीसते थे और रोटियाँ बनाकर अपने भतीजों की भूख शांत करते थे; तब ये बहुत भावुक हो उठे। मानो निराला जी की पीड़ा में अपनी पीड़ा देख रहे हों।

  एक दिन पोस्टमैन एक पार्सल लाया। इनका कहानी संग्रह था “जीनिया के फूल”। कई दिनों बाद जब “जीनिया के फूल” को दुबारा खोला तो आलम कुछ अजीब सा था। यह पुस्तक “रमेश सिंह” को समर्पित थी। ऐसे उपहार की तो मैंने कभी कल्पना ही नहीं की थी- पता नहीं कैसे बहुत देर तक आँसू-प्रेमाश्रु नहीं रुके। इनके अन्तरंग दोस्त आज भी “जीनिया के फूल” वाले रमेश के रूप मे मुझे जानते हैं।

  आगे चलकर इन‌की विदेश यात्राएं आरम्भ हुईं। ट्यूनीसिया, दुशान्बे, रूस, पोलैण्ड, फ्रान्स, जर्मनी, लन्दन, ताशकन्द, जोहानसबर्ग आदि आदि। उनके संस्मरण सुन‌ना ही उपलब्धि है। किस्सागोई तो कोई इनसे सीखे। देश-दुनिया के तमाम साहित्यकारों के बहुमूल्य संस्मरण इनके पास हैं जिन्हें लिपिबद्ध किया जाना चाहिए। इनकी व्याख्यानमाला भी प्रकाशित हो सके तो वह विद्यार्थिकों के लिए एक निधि होगी। व्यक्तिगत जीवन में वे अत्यंत सरल हैं। वे मान, अपमान, अभिमान और सम्मान से परे एक विमान व्यक्तित्व हैं। उनका चरित्र अत्यन्त उदात्त है और प्रतिष्ठा तो इस चरित्र की छाया मात्र है। उनके  द्वारा प्रयोग किये जाने से शब्दों की अभिव्यंजना-शक्ति बढ़ जाती है। पाण्डित्य-प्रदर्शन से उन्हें परहेज है। वे तो अक्षर-सिद्ध हैं। महाकवि मतिराम जी की नायिका की यह विशेषता उनमें भी सर्वत्र दिखायी पड़ती है कि-” ज्यों ज्यों निहारिये नेरे हवै नैननि, त्यों त्यों खरी निकरै सी निकाई।” उन्हें रामचरित मानस की चौपाई कहूँ तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी-आप चाहे जितने अर्थ निकाल लीजिये फिर भी कुछ शेष रह जाता है। मैं तो बस यही कहूँगा कि -“सलामत रहे दोस्ताना हमारा ।”

रमेश सिंह : जन्म – वर्ष 1952, सराय-मंगली, उन्नाव, उत्तर प्रदेश। शिक्षा: एम.ए., बी.एड।

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित। साहित्यिक गतिविधियों में भागीदारी। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारण।  2010 में राष्ट्रीय वस्त्रविभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर की निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार। 2014 में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार। प्रदेश एवं जनपदीय संस्थाओं द्वारा निरन्तर अभिनन्दित एवं पुरस्कृत। भगवन्त नगर, इण्टरमीडिएट कालेज में 40 वर्षों तक शिक्षण।

सम्प्रति: स्वाध्याय एवं साहित्यिक- सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय।

संपर्क : 9621817843

samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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