कहानी

निर्वाण

  • जयश्री रॉय
    
आमफावा फ्लोटिंग मार्केट की सीढ़ियों पर उस दिन हम देर तक बैठे रहे थे। हम यानी मैं और माया- माया मोंत्री! बिना अधिक बात किए। दिसंबर की यह एक धूप नहायी सुबह थी, बेहद ताज़ा और ठंड, दिन चढ़ने के साथ धीरे-धीरे मीठी ऊष्मा से भरती हुई… हवा में अजीब-सी गंध थी- घाट की अनगिनत सीढ़ियों पर तितली के रंग-बिरंगे जत्थे-से मँडराते पूरी दुनिया से आए सैलानियों की देह गंध, नावों में पकते-बिकते थाई पकवानों की गंध और गंध नदी की, नावों में लदे मौसमी फूलों और फलों की…
गंध के इस मसृण संजाल में एक गंध माया की भी होगी… किसी अनचीन्हे जंगली फूल या नमकीन समंदर की तरह… माया के बालों पर उतर कर शहदिया पड़ गई धूप को तकते हुये जाने कितनी देर तक मैं चुप बैठा रहा था। माया भी, हमेशा की तरह, अपने में गुम! ना मालूम वह कौन-सा देश है जहां वह रहती है! उसकी देह के साथ मैं अक्सर अकेला रह जाता हूँ! जैसे किसी पोर्सलीन डॉल के सानिध्य में होऊँ! ऐसी डॉल जो बहुत सुंदर तो होती है मगर प्राणहीन भी! उसमें उसको ढूँढना आसान नहीं होगा, अब तक समझ चुका हूँ। बहुत विहड़ है वह, बहुत सघन भी! इस तरह बार-बार उसकी तरफ एक जुनून भरी यात्रा में निकलना और खाली हाथ लौट आना… ठीक जैसे आज भी! अब प्रतीत होता है, भीतर काई-सा कुछ जमने लगा है चुपचाप, थकने लगा हूँ मैं…
एक बार उसी ने कहा था, अनमनी-सी-सैलानी यहाँ आते हैं, कुछ बहत के बदले नदी पर तैरते बाज़ार की रंगीनी लूट कर लौट जाते है, रह जाती है अकेली नदी, अपने भीतर के अडोल सन्नाटे के साथ…
उसकी बातों में कविता होती थी, हर शब्द में एक बिम्ब खड़ा हो जाता था, जिंदा, चलता-फिरता-सा! मैं उसकी कुहरीली आँखों में एक बार फिर ढूँढने की कोशिश करता हूँ और निराश होता हूँ, जाने क्यों माया के होंठों की हंसी कभी उसकी आँखों तक नहीं पहुँचती! एक गुमसुम, सहमा-ठिठुरा मौसम- किसी मटमैले-से दिन की दहलीज पर सदियों से ठहरा हुआ! अब लगता है, वो नदी शायद माया ही है, प्रांजल देह और मौन भरे तल की उदास नदी… मैं उन सैलानियों में से नहीं, मुझे नदी के साथ मिल कर नदी हो जाना है, उसके साथ निकलना है समुद्र में समा कर असीम हो जाने की महायात्रा पर… मैं उसे विश्वास दिलाना चाहता हूँ मगर मेरी बात उस तक नहीं पहुँचती, कभी पहुंचेगी भी?… एक लंबे अर्से से मेरा अकेला दुख शायद यही है।
नदी की भाप उड़ती सतह पर नावों का मेला है, मधु मक्खी के गुंजार-सा उठता शोर, उसमें घुली पकवान, इत्र, पसीने की गंध, हंसी के टुकड़े, पानी की इस्पाती सतह पर झरती धूप की बेसुमार चमकीली पन्नियाँ… एक सिक्के-सा खनकता क्षण, सबके मन जेबों की तरह भरे हों जैसे… इस मंजर का कोई कोना खाली नहीं हो सकता शायद, बस माया की बात अलग है! वह रीती-सी दिखती है, हर भराव के बावजूद!
दोपहर का सूरज जब एकदम सर पर था, माया के कहने पर हम सीढ़ियों से उतर कर पास की छोटी-संकरी गलियों के संजाल में आ गए थे। इन तंग गलियों में लोग नदी की तरह अविरल बहते रहते हैं। हर समय, रंग और जीवन से भरे हुये। चमकते चेहरों का जुलूस… भीड़ ऐसी कि चलते हुये कंधे छिल जाय। छुट्टियों के दिन यहाँ की गलियां फूड मार्केट में तब्दील हो जाती हैं। हर तरफ खाने-पीने के स्टॉलस और चमचमाती दूकानों के विंडोज में सजी बाजार की रंगिनियाँ, उनके सम्मोहक इशारे…
नदी के क्रासिंग ब्रिज के पास कुछ रेस्तरा हैं जिनकी बाल्कनी नदी की तरफ खुलती हैं। दोपहर के इस समय इन रेस्तराओं में तिल धरने की जगह नहीं होती। बाल्कनी के दरवाजे पर खड़े हो कर हम कोई खाली जगह तलाश रहे थे जब अचानक से एक जोड़ा के उठने से हमें बैठने की जगह मिल गई थी। बिल्कुल बाल्कनी का कोने वाला टेबल। बैठते हुये माया मुस्कराई थी- हम बहुत लकी हैं आकाश! हमें यहाँ, इस वक्त बैठने की जगह मिल गई… मैंने मेनू से नजर उठाई थी- लकी? इतनी-सी बात पर!
मुझे इस जमीन की यही बात शायद सबसे अच्छी लगती है- जीवन के प्रति उद्दाम आशा, जिजीविषा… ये कहते भी हैं- सानुक यानी जीवन मौज है! बेमतलब, टूटे-बिखरे चीजों को सहेज कर उन्हें नए सिरे से सिरजना, जीने योग्य बनाना! एक बहुत व्यावहारिक जीवन पद्धति के समानान्तर चलता आस्था और संस्कार का प्राचीन,पारंपरिक जीवन! एक तरफ बाजार का मायावी संसार है, उसकी गलाकाट प्रतिस्पर्धा, कदम-कदम पर तीतरफांद, दूसरी तरफ मंदिरों, बौद्ध भिक्षुओं की दुनिया, हर गली-चौराहे में आत्माओं और पूर्वजों के नन्हें-सुंदर लकड़ी के बने खिलौना घर-से पूजा स्थल, उनमें जलती सुगंधित अगरबत्तियाँ, धार्मिक जुलूस, मनोरम भंगिमाओं में नृत्यरत पारंपरिक बेशभूषा चुट थाई में सुंदर स्त्रियाँ…
नदी की तरफ से आती उल्टी-पलटी हवा में बिखर गए बालों को सहेजती हुई माया मुस्कराती रही थी- तुम शायद नहीं समझो, हम जैसे आम लोगों के लिए जिंदगी की इन छोटी-छोटी बातों में कितनी बड़ी नेमत छुपी होती है… भीड़ भरी बस,रेस्तरां में एक विंडो सीट मिल जाना, किसी लंबी कतार में जल्दी अपनी बारी का आ जाना, रात की एक पूरी नींद, प्रार्थना के मौन, शांत क्षण…
मैंने माया से पूछ कर खाने का ऑर्डर दिया था, मेरे लिए एक कोल्ड कॉफी, बेज मोमो, माया के लिए हॉर्स शू क्रैब एग सलाद’, चिकन सैंडविच! माया कौतुक से भर कर पूछी थी, शायद यह लेकर चौथी बार- तुम बेजेटरियन हो? क्यों? “क्यों! मेरे लिए यह सवाल ही बेमानी है…” मैंने बात को हल्के में टालने की कोशिश की थी- “इस दुनिया में भूख मिटाने के लिए बहुत कुछ उपलब्ध है, फिर क्यों नाहक किसी की जान ली जाय! बिल्कुल तो संभव नहीं मगर हाँ, कोशिश करता हूँ अपनी तरफ से कम से कम दुनिया को हानि पहुंचाऊं… जिस दिन अपने सरवायबल का सवाल होगा, जान पर बन आएगी, सोचेंगे! 
माया के पल्ले शायद मेरी कोई बात नहीं पड़ी थी। चुपचाप मेरी तरफ देखती रही थी। मेरा मन किया था, उससे पूछूं, जिस बौद्ध धर्म में अहिंसा ही मूल मंत्र है, उसके अनुयायी जीवों के प्रति हिंसा का विरोध क्यों नहीं करते। मगर मैंने नहीं पूछा था, बात बदल कर दूसरे प्रसंग पर आ गया था- “तुम लोगों के लिए शायद हर सैलानी अमीर होता है मगर मैं कोई अमेरिकन या अरब नहीं, एक भारतीय हूँतुम्हारी तरह आम आदमी…” मेरी बात पर माया ने जाने किस नजर से मुझे देखा था- फिर तुम किसी थाई लड़की से शादी कर यहाँ किसी फारंग की हैसियत से बस नहीं पाओगे… किसी भी पर्यटक स्थल पर मेहमानों की हैसियत उनके पैसों से तय होती है, खास कर यहाँ- थायलैंड में! माया ने यह बात बहुत सहज ढंग से कही थी मगर मुझे कुछ चुभा था, बहुत गहरे कहीं। वतन से लाख दूर हो कर भी अपनी भारतीय भावुकता से मुक्त नहीं हो पाता… आहत हो उठता हूँ उन बातों से भी जिनसे माया के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं पड़ती। कई बार माया का बहुत व्यवहारिक होना मुझे खलता है जब अपने देश की रूमान भरी किस्से-कहानियों से निकल कर वह किसी वनिये की तरह बोलती है।  
दो दिन से माया लगभग सारा-सारा दिन मेरे साथ है। एक लंबे, यंत्रणादायक इंतज़ार के बाद।
पहली बार वह मुझे अपने गाँव फुयांग में लगभग तीन महीने पहले मिली थी। कोहरे के खेत के पास। शाम की उतरती धूप में नारंगी कोहरों की ढेर के बीच बैठी। हाथ-पैर में मिट्टी, बालों में धूल। लंबी स्कर्ट और कुर्ते में। जंगली बत्तखों के झुंड पर फिरते हुये मेरे कैमरे का लेंस उसके चेहरे पर जा टिका था और देर तक वही ठहरा रह गया था- दो छोटी मगर गहरी आँखें, घनी बरौनियों से ढँकी हुईं! गिरती शाम की म्लान धूप में दीये-सी झिलमिलाती हुईं…
एक समय बाद उसकी नजर मुझ पर पड़ी थी और वह चौंक कर उठ खड़ी हुई थी। मेरे पास जा कर माफी मांगने पर थाई रिवाज के मुताबिक थोड़ा सर झुका कर विनम्रता के साथ हाथ जोड़ कर वाई’- नमस्ते कहते हुये चल पड़ी थी- “माई पेन राई- कोई बात नहीं…” नए बने कनाल के बगल की कच्ची सड़क पर चलते हुये इसके बाद उसने मेरे किसी और बात का जवाब नहीं दिया था। एक थाई लड़की का इतना संकोची होना जहां मुझे आश्चर्यजनक लगा था वही कहीं से अच्छा भी लगा था। वर्ना यहाँ के देह बाज़ारों से गुजरते हुये कभी-कभी वितृष्णा–सी होती थी। लगता था, सारा देश बाजार में तब्दील हो गया है!  
उस रात मेरी नींद अजीब सरगोशियों से भरी हुई थी। जाने कौन गुनगुनाते हुये निरंतर बोल रहा था मेरे अंदर, किसी पहाड़ी नदी की कल-कल-सी आवाज, हल्की पदचाप… मैं चल रहा था, ना मालूम किस तरफ! दूर धूप में चमकते कुछ नारंगी धब्बे और दो दीये-सी आँखें… सुबह मेरी मकान मालकिन ने मुझे चेताया था, गिरती शाम यूं अंजान जगहों में ना फिरा करूँ, बुरी हवायें छू लेती हैं!
उस दिन के बाद मैं लगातार कई दिनों तक उसके गाँव के आसपास मँडराता रहा था। कभी उसे खेत से ताजी सब्जियाँ तोड़ कर ले जाते हुये देखता, कभी गाँव के बाहर पेड़ों के नीचे बने पूर्वजों और अशरीरी आत्माओं के मंदिर में अगरबत्ती जलाते या प्रसाद चढ़ाते। बहुत कोशिशों के बाद वह मुझसे कुछ सामान्य हुई थी, थोड़ा बहुत खुली थी।
धीरे-धीरे जाना था, हर थाई की तरह वह भी बहुत संस्कारी और अपनी परंपराओं में यकीन रखने वाली स्त्री थी। अपने इस मुबान यानी गाँव फुयांग में अधिकतर थाई परिवार की तरह उनका भी बहुत बड़ा कुनबा था। अनगिनत बच्चों और बूढ़े-बूढ़ियों से भरा हुआ। बड़े-से घर के आँगन में मुर्गी, सूअर, बकरियों के साथ ढेर से नंग-धड़ंग बच्चे दिन भर शोर मचाते रहते। लकड़ी के बेंचों पर बैठ कर प्राचीन शक्ल वाले बूढ़े ताश खेलते या सिगरेट पीते। इन सब के बीच बेहद खूबसूरत और आधुनिक दिखने वाली माया बहुत सहज और कम्फर्टेबल दिखती थी। अपने किसी रीति-रिवाज या पारिवारिक परिस्थिति को ले कर उसमें किसी तरह का संकोच या हीन ग्रंथि नहीं थी। उसकी यह बात मुझे अच्छी लगती थी।             
मंदिरों में बेहद सम्मान के साथ पैर मोड कर स्पर्श से बचते हुये बौद्ध भिक्षुओं के चरणों में चढ़ावा या दक्षिणा रखते हुये या आशीर्वाद के रूप में उनसे मोमबत्ती के दूसरे सिरे से माथे पर टीका लगवाते हुए वह जितनी सुशील, अनुशासित प्रतीत होती थी, अपनी बूढ़ी नानी को नहलाते-धुलाते और खाना खिलाते हुये उतनी ही सहृदय और जिम्मेदार! अपनी नब्बे साल की बूढ़ी नानी के साथ उसका व्यवहार किसी हम उम्र सहेलियों जैसा आंतरिक और सहज था। मुझे उसके हर रूप से प्यार हो गया था। संशय के किसी क्षण में सोचता था, मन उलझा भी तो किन धागों में… मोह की ये मसृण डोरियाँ अब कैसे टूट पाएंगी! कभी टूट पाएंगी भी!                                
थायलैंड के सांस्कृतिक जीवन पर एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाने के सिलसिले में मैं यहाँ तीन महीने पहले आया था। फिल्म पूरी होने के बाद फिल्म के दूसरे टीम मेम्बर लौट गए थे मगर मैं चाह कर भी लौट नहीं पाया था। बक़ौल मेरे असिस्टंट डाइरेक्टर नवीन के, थायलैंड की हजारों प्राचीन आत्माओं ने मुझे दबोच लिया है। अब मैं उनसे कभी मुक्त नहीं हो पाऊँगा। समय के बीतने के साथ-साथ मुझे भी लगने लगा था, मैं इस जमीन के दुर्वार आकर्षण से कभी मुक्त नहीं हो पाऊँगा, ना होना चाहूँगा…
कितने सारे देशों की संस्कृतियों के समन्वय से रची-बनी है यहाँ की संस्कृति- इंडिया, चीन, कंबोडिया, दक्षिण-पूर्व एशिया… ठीक हमारे देश की तरह- उतनी ही वैविध्यपूर्ण और प्राचीन। धर्म भी कई- हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम… वर्तमान में यहाँ बौद्ध धर्म ही प्रधान धर्म है। पढ़ते, सुनते, देखते मैं अपने ही अंजाने इस तिलस्मी संसार में आकंठ डूबता चला गया था। तय कर लिया था, इस देश पर एक उपन्यास लिखना है। इस उपक्रम में गत दो महीनों से ना जाने कहाँ-कहाँ भटका था।
थायलैंड मंदिरों और बौद्ध स्तूपों का देश है। केवल बैंकॉक में ही लगभग चार सौ वाट्स यानी मंदिर हैं। इनमें से तीन बहुत ही खास- वाट प्रा केव, वाट अरुन, वाट फो। एक मंदिर वह भी जिसमें मनुष्यों की बलि दी जाती थी। वहाँ के ऊंचे कंगूरों और मंडपों में जैसे आज भी मृत आत्माओं के करुण क्रंदन और विलाप भरे हुये हैं… दोपहर की उदास हवा दीर्घ उच्छवास-सी प्रतीत होती है! अकेले वहाँ देर तक ठहरा नहीं जाता। दूसरा विशाल और प्राचीन पेड़ की घनी जटाओं से घिरे कुख्यात डेविड बेकखम मंदिर! उसी उजाड़ मंदिर के प्रांगण में मैं फुयांग गाँव से निकलने के बाद पहली बार उस युवा बौद्ध भिक्षु नकुल बोधिसत्व से मिला था।
एक महीने के आत्मीय संबंध के बाद माया के अचानक से खुद को पूरी तरह समेट कर अजनबी बन जाने से जो भावनात्मक आघात मुझे पहुंचा था, उसी से उबरने की कोशिश में था मैं उन दिनों। विरक्त मन अक्सर अध्यात्म की ओर ही मुड़ता है।  
गौरांग-सा दिव्य रूप था नकूल बोधिसत्व का! उनके चेहरे पर हमेशा बनी रहने वाली स्मित मुस्कान से लगा था, वह जीवन के अनंत दुखों के पार कहीं स्थायी ठिकाना पा गये हैं। कितनी अद्भुत, कितनी विरल होगी वह अवस्था… अपने अबुझ दुखों, अनचीन्ही कामनाओं की गठरी उठाए मैं उनके पीछे-पीछे अनायास चल पड़ा था, जाने किस प्रत्याशा में! उन्होंने भी मना नहीं किया था, आने दिया था मुझे अपने साथ, एक रूहानी सफर पर! मगर उस वक्त मुझे पता नहीं था, शरीर का दाय अभी पूरी तरह चुका नहीं है! देह की मिट्टी उर्बर भी है और प्यासी भी! उसके बाद कितने स्तूप, कितनी मोनस्ट्रीज, कितने मंदिरों की यात्राएं…
टालिंग चांग, था खा, डामनोएन सादुआक फ्लोटिंग मार्केट के बाद    बांग कु वीयांग मार्केट पहली बार उन्हीं के साथ गया था एक दिन,  अल्लसुबह! थायलैंड में पानी पर तैरते बाज़ारों की एक अनोखी दुनिया है ये। बहती नदी, कनालों पर ठहरी हुई रंग-बिरंगी दुनिया! देश-विदेश से आए सैलानी यहाँ हर समय मधु मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहते हैं।   
इस बाजार में युवा और समर्थ भिक्षुओं को सहज टाक बात यानी भीख मांगते हुये देख कुछ अजीब-सा लगा था। मेरे प्रश्न पर नकुल बोधिसत्व आसपास से गुजरती हुई औरतों के स्पर्श से बच कर चलते हुये हमेशा की तरह मुस्कराइए थे- हमें हर मोह-माया से दूर रहना होता है, न कुछ जोड़ना न साथ ले जाना! हर अर्थ में अकिंचन!
वाट फ्रा केव मंदिर में बुद्ध के छयासठ सेंटी मीटर लंबी पन्ने की मूर्ति को देखते हुये मैं सुन नहीं पाया था नकूल बोधिसत्व की बातें, मेरी आँखें उस ठंडी हरीतिमा में शांति ढूंढती फिर रही थी।
भीतर एक आग थी और साथ ही शांति की चाह! इसी में दूर तक भटकता रहा था। 178 म्युरल पेंटिंग के जरिये दो किलोमीटर लंबी गैलरी में रामायण कथा का विस्तृत विवरण देख लगा था, खुद से दूर नहीं गया हूँ। अजीब-सी अनुभूति थी वह। चन्दन के लेप-सी! प्राचीन संस्कृति की जड़ें जाने कहाँ-कहाँ से निकलती है और कहाँ तक जा कर फैलती है! एक अजनबी धरती पर गरुड़, इंद्र, विष्णु, हनुमान, उर्वसी जैसे भारतीय धार्मिक चरित्रों को मंदिरों के भित्ति चित्रों में,मूर्तियों में देख कर अपनी जमीन के करीब होने का अहसास होता रहा था। 400 बहत का टिकट काट कर मंदिर में प्रबेश करना तो जरूर अखरा था, मगर नंगे पाँव जाना नहीं। कहीं-कहीं हमारे देश की तरह ही यहाँ के मंदिरों में बांह कटे कपड़े या हाफ पैंटस में जाना निषिद्ध है। हर जगह दूसरी संस्कृतियों के साथ हिन्दू संस्कृति की झलक दिखाई देती है। इन अनुभवों से गुजरते हुये हर पल लगता रहा था, एक प्राचीन और भव्य  सभ्यता का अभिभाज्य अंग हूँ मैं।
वाट फोमंदिर में लेटे हुये बुद्ध की सोने के पत्तों से ढँकी प्रतिमा के मोतियों से जड़े पैरों को देख कर अद्भुत प्रतीत हुआ था। इस दुनिया के इंसान चाहे कितने भी गरीब हों, वह अपने भगवान को कभी गरीबी में रहने नहीं देते! साधारण ग्वाले के घर पलते कन्हैया, गरीब मरियम, साई- आज सभी सोने-जवाहरात से लदे दिखते हैं। भूखे-नंगों के अमीर भगवान! हर जगह, हर देश में! मेरी बात सुन कर नकुल बोधिसत्व सहज मुस्कराए थे- यहाँ के भगवान ही नहीं, कई भिक्षु भी बहुत अमीर हैं! अब मत पूछना कैसे। जहां मनुष्य है, वहाँ मलीनता है!
इस मंदिर में बुद्ध की हज़ार तस्वीर, 91 स्तूप देखते हुये दिन ढल गया था। लौटते हुये नकूल बोधिसत्व ने कहा था, फिलहाल तुम लौट जाओ, जीवन से तुम्हारा मोह नहीं टूटा अभी! जब तक दुख-सुख नहीं जानोगे, उनसे मुक्ति की कामना कैसे जगेगी! जवाब में मैं कुछ कह नहीं पाया था, बस रोया था उनके पैरों से लिपट कर! जाने मेरी कौन-सी चोरी पकड़ी गई थी। उन्होंने भी आगे कुछ और नहीं कहा था, मुझे रोने दिया था चुपचाप।      
उनसे विदा ले एक महीने बाद मैं दुबारा माया के गाँव फुयांग लौट आया था। मगर माया से मुलाक़ात नहीं हो पाई थी। उसके परिवार वालों ने बताया था, माया बैंकॉक लौट गई है। अपनी जिस बूढ़ी नानी की बीमारी में उनकी देखभाल करने के लिए वह अपनी नौकरी छोड़ कर बैंकॉक से आई थी, दो हफ्ते पहले उनकी मृत्यु हो जाने से वह फिर बैंकॉक लौट गई थी। उसका नया पता मुझे नहीं मिल पाया था। फोन भी लगातार बंद आ रहा था। निराश हो कर मैं भी दूसरे ही दिन बैंकॉक चला आया था। माया की अनुपस्थिति में अब फुयांग में मेरे लिए कुछ रह भी नहीं गया था।   
बैंकॉक में मैं अपने उपन्यास के काम में एक बार फिर बेमन से जुट गया था। खुद को अपने इस अनाम-से अवसाद से उबारना जरूरी महसूस हो रहा था। लगता था, चलते हुये एकदम से दुनिया के आखिरी सिरे पर पहुँच गया हूँ। इसके बाद कहीं कोई जमीन नहीं, बस शून्य है- हरहराता हुआ नीला, धूसर… जितनी दूर नजर जाय! माया में अचानक से आई तब्दीलियाँ, उदासीनता मुझे यातना से भरे हुये थी। उससे दूर जा कर भी जा नहीं पाया था, परास्त-सा लौटा था उसके गाँव मगर उसका इस तरह वहाँ से भी चला जाना मुझे भीतर तक मथ गया था। ऐसा क्या किया था मैंने, आखिर किस बात से नाराज थी वह मुझसे! मैं अक्सर सोचता रहता था।     
मन की अबुझ और यंत्रनादायक संवेदनाओं से छुट जाने की कोशिश में मैं इस जमीन की आस्था और किस्से-कहानियों में जीवित आत्माओं और भूत-प्रेतों की दुनिया में अपने अजाने ही ना जाने कब जा बसा था। मनुष्यों की दुनिया के समानान्तर चलती अशरीरी शक्तियों की एक और अद्भुत,लोमहर्षक दुनिया! थाई संस्कृति में गृह देवता, पूर्वज और प्राकृतिक आत्माओं के साथ-साथ भूत-प्रेतों की भी खूब महत्ता है। चारों तरफ इन आत्माओं और भूतों के छोटे-छोटे लकड़ी के बने मंदिर देखे जा सकते हैं- घरों के बाहर, गलियों में, पेड़ों के नीचे। सभी इन आत्माओ और भूतों को प्रसन्न रखने की कोशिश में इनकी पूजा-अर्चना करते रहते हैं। थायलैंड के अलावा यहाँ के पड़ोसी देशों- कंबोडिया, लाओ और मलेशिया में भी इनमें से कुछ भूत समान रूप से प्रसिद्ध हैं। इन से जुड़ी एक से एक कहानियाँ सुन कर दंग रह जाना पड़ता है।
युवासाक, एक टुरिस्ट गाइड जो वर्षों किसी मोनास्ट्री में रह कर एक दिन वहाँ से भाग आया था, उसके पास इन तरह-तरह के भूतों की अनगिनत कहानियाँ थीं। कहता था, भूतों के साथ उसका रोज का उठना बैठना है। जिस कब्रिस्तान के पास एक छोटे-से लकड़ी के केबिन में वह रहता था उसके चौकीदार मैत्रैय का कहना था कि उसे पूरा शक है कि युवसाक खुद एक चलता-फिरता प्रेत यानी फी का ताइहोंग है और उसे इस बात का इल्म नहीं है। दरअसल थायलैंड में फी का ताइहोंग एक ऐसे भूत को कहते हैं जो कब मर गया है, उसे खुद पता नहीं होता। युवासाक के जर्द चेहरे, पीली रंगत और लंबे-सूखे डील-डौल को देख कर मुझे भी कई बार इस बात का अंदेशा होने लगता था। फिर दूसरे ही क्षण अपनी ही सोच पर हंसी भी आती थी- क्या मुझे सचमुच थायलैंड के प्राचीन भूतों ने अपने गिरफ्त में ले लिया है!                                                
युवासाक हफ्ते के दो-चार दिन गाइड के काम पर निकलता, बाकि के समय शराब पी कर अपनी खाट पर पसरा-पसरा पॉर्न फिल्में देखता रहता। कहता था, इन सुंदरियों को देख कर ही भूतों के आतंक को भुलाये रहता हूँ वर्ना तो ये जिन्न, चुड़ैले रात भर सोने ना दे। शोर मचाते रहते हैं। कुछ ही दिनों में मेरी उससे अच्छी दोस्ती हो गई थी। दोस्ती का कारण यही भूत-प्रेतों की कहानियाँ और उसकी टुरिस्ट गाइड की हैसियत से थायलैंड की विभिन्न जगहों के विषय में अच्छी जानकारी था।
एक दिन सप्ताहंत में मैं उसके पास एक अच्छी शराब की बोतल ले कर गया था। उसने मुझसे कहानी सुनाने का वादा किया था। उस दिन सुबह से मौसम बदलाया हुआ था। शाम होते-होते बिजली की कडक और तेज गरज के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी। शहर के उस बाहरी ईलाके में तूफान के साथ बिजली भी गुल हो गई थी। ऊपर से कड़ाके की ठंड! देर रात तक हम मोमबत्ती जला कर बैठे रहे थे। युवासाक ने उस रात गरम टॉम याम सूप पीते हुये लोक कथाओं में प्रचलित भूतों की ढेर सारी कहानियाँ सुनाई थी।
यहाँ के लोग मानते हैं, भूतों के डेरे कुछ खास जगहों में होते हैं जैसे कुछ विशेष तरह के पेड़, बौद्ध मंदिरों से लगे कब्रिस्तान, पुराने खाली मकान… युवासाक ये बातें इतनी संजीदगी से कर रहा था कि मैं खुल कर मुस्करा भी नहीं पा रहा था। ठीक हमारे देश की कहानियों की तरह जिन्हें हमारी नानी-दादियाँ आज भी बच्चों को सुनाया करती हैं। वही मंदिर के पास पीपल पर रहने वाले भूत, खाली मकानों और पुराने कुओं में बसने वाली प्रेतात्माएँ…    
भूतों के उपद्रव से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं, कहीं पूजा-अर्चना तो कहीं पशुओं की बलि! कई बार मैंने खुद लोगों को सूअर की बलि दे कर उसके सर को पका कर बतौर प्रसाद खाते देखा है।
भोर होने से कुछ पहले नोक्खाओफीका भूत की कहानी सुनाते-सुनाते युवासाक शराब के नशे में आखिर एक तरफ ढुलक कर खर्राटे भरने लगा था। ठीक उसी समय केबिन में जलती आखिरी मोमबत्ती बुझ गई थी और उसके साथ ही कब्रिस्तान के बीचोबीच खड़े विशाल जटाओं वाले प्राचीन पेड़ पर एक साथ कई उल्लू बोल उठे थे। सुन कर मेरे शरीर पर कांटे उग आए थे। अभी-अभी युवासाक ने बताया था, ‘नोक्खाओफीका भूत के आसपास होने से कई उल्लू एक साथ बोलने लगते हैं! कुछ इसी तरह…   
थायलैंड के देह व्यापार के विषय में जाने बगैर थायलैंड की कहानी अधूरी ही रहेगी- युवासक ने ही कहा था मुझसे। मोनास्ट्री से भाग आने के बाद कई साल उसके इन्हीं बदनाम गलियों में बीते थे। वैसे भी टुरिस्ट गाइडों से इनका साबका पड़ता ही रहता है। तो अशरीरियों की दुनिया से निकल कर देह की मशहूर मंडियों में पहुंचा था उसके साथ- औरत, मर्द, बच्चों से सजे गोगो बार, ब्रोथेल्स, होटेल्स, मसाज पार्लर, रेस्तरां, सौना, होसटेस बार, बीयर बार… हर तरफ देह, देह के उन्मुक्त निमंत्रण! एक कराओके बार में बैठ कर गीत सुनते हुये एक सुंदर कॉल गर्ल से बात हुई थी। उसके उठ कर जाने के बाद युवासाक ने मुझे बताया था कि वह एक लेडी बॉय अर्थात स्त्री के भेष में पुरुष था। सुन कर मैं दंग रह गया था। इनके बारे में मैंने सुना तो था, मगर कभी इस तरह मिला नहीं था।
वियतनाम युद्ध के बाद थायलैंड में देह का व्यापार बढ़ा है। को समुई आईलैंड, बैंकॉक का पाटपोंग, नाना प्लाज़ा, पट्टाया, फुकेट- ये सभी जगह देह व्यापार के बड़े केंद्र हैं। इसके साथ हाट याई जैसे बार्डर इलाके के मलेशियन शहरों में भी देह की बड़ी मंडियाँ लगती हैं। लुंफिनि पार्क, सेंट्रल बैंकॉक के देह बाजार बहुत मशहूर हैं। अब ऑब में जापान के सोपलैंड की तरह मसाज, स्नान के साथ दूसरी तरह की सेवाएँ भी मुहैया कराई जाती है। प्रीटी स्पा आदि जगहों में देह का धंधा खुल कर होता है। 
कम्युनिस्म के खत्म होने के बाद दूसरे देशों की तरह यहाँ भी रशियन लड़कियों की भरमार लग गई है! यहाँ के बीयर बारों में तितली के रंगीन जत्थों की तरह इन्हें उड़ते-फिरते देख मुझे गोवा के समुद्र तट और मांडवी नदी पर तैरते कसीनोज की याद हो आती है। गोरे रंग के दीवाने भारतीय पुरुषों में ये गोरी मेमें बहुत लोकप्रिय है इन दिनों… भूख इंसान को कैसी-कैसी यात्राओं पर ले चलती है!… और इस सनातन यात्रा का कोई अंत भी नहीं!
ना जाने क्यों चमचमाते बाज़ारों में खिलौनों की तरह सजी इन औरतों को देख कर भीतर एक अंधेरा-सा घिर आता है। यहाँ औरत का बस एक ही रूप है, एक ही परिचय। घर से निकलते हुये ये अपने दूसरे सारे नाम, परिचय घर में ही छोड़ आती है और शायद रात के अंत में साँप के केंचुल की तरह अपना जूठा, रंगा-पूता शरीर बाज़ार में उतार जाती है।
सालों पहले मुंबई के कामाथिपुरा रेड लाइट इलाके में एक डॉक्युमेंटरी फिल्म बनाने के सिलसिले में गया था। तब मैं असिस्टेंट डिरेक्टर हुआ करता था। मुर्गी के दड़बों की तरह छोटे-छोटे घरों से झाँकते असंख्य गोरे-काले चेहरे, हर तरफ खुली नालियाँ, बदबू के भभाके और मांस के लोभी ख़रीदारों की भीड़… लगा था, वहाँ कुछ देर और ठहरूँगा तो मेरा दम घुट जाएगा। वहाँ सिर्फ देह नहीं, भूख, बेबसी, इंसानियत भी बिकती है। बचपन, सपने और जाने क्या-क्या…। मेरे कानों में आज भी उस बच्चे की आवाज गूँजती है जो “साहब औरत चाहिए? मेरी माँ है…” कह कर मेरा रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था। उसकी आँखों को देख कर लगा था, उसे पता तक नहीं वह क्या बोल रहा है। वह तो बस रोटी की जुगाड़ में भूख की जुबान बोल रहा था।
मेरा अनुभव सुन कर हमारी फिल्म के स्क्रीप्ट राइटर डॉ॰ कबीर ने कहा था- “ये जुबान तो दुनिया के हर कोने में बोली-समझी जाती है। इस पर कोई झगड़ा नहीं है अरिंदम! धरती का प्राचीनतम व्यवसाय वेश्यावृत्ति ही है! हर बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज स्त्री की देह है। अपने देश में देवदासियाँ हैं तो विश्व के दूसरे प्राचीन देश- ग्रीस, रोम आदि में पवित्र सेक्स या धार्मिक कर्मकांड के नाम पर औरतों का दैहिक शोषण हमेशा से होता रहा है। उस दिन डॉ॰ कबीर से सुनी दुनिया भर में तरह-तरह के नामों से प्रचलित वेश्यावृत्ति की कहानियाँ किसी चलचित्र की तरह मेरे दिमाग में दिनों तक चलती रही थी-
भगवान अफरोदित के प्राचीन मंदिर के गलियारे में यूलिया अपने सर पर तारों का मुकुट पहने सालों से बैठी है मगर अब तक उसे किसी पुरुष ने पैसे दे कर नहीं खरीदा है क्योंकि वह अन्य अभिजात महिलाओं की तरह गौर वर्ण और सुंदर नहीं है। संभ्रांत महिलाए अपने दास-दासियों के साथ रथ में सवार हो सुंदर परिधानों में आती हैं, आते ही उनके आसपास देह लोलुप पुरुषों की भीड़ लग जाती है। कोई बढ़ कर “मैं तुम्हें देवी मयलिटा के नाम से सहवास का निमंत्रण देता हूँ” कह कर उसकी गोद में कुछ सिक्के रख देता है और वह उठ कर ऊसके साथ किसी निर्जन स्थान की तरफ चल देती है। मूल्य चाहे कितना भी कम दिया गया हो, मूल्य चुकाने वाला पुरुष चाहे जो कोई भी हो, कुत्सित, बीमार, अधेड़- वह मना नहीं कर सकती। ऐसा करना अपने ईश्वर का अपमान करना होगा। बेबीलोनिया की हर स्त्री को अपने जीवन काल में एक बार वेश्या बन कर अपनी देह बेच कर भगवान के लिए पैसा कमाना पड़ता है। यह उनका धार्मिक कर्तव्य है। 
यूलिया अपने घर लौटना चाहती है। उसे अपनी बेटी मेहान की याद आती है जिसे उसकी छोटी-सी उम्र में एक दिन छोड़ कर आना पड़ा था। और उसका पति… उसे तो शायद अब उसकी याद भी ना आती होगी। आत्मा की मुक्ति तो शायद मुमकिन हो, मगर इस स्त्री देह से मुक्ति कभी नहीं! बाजार में तो बिक ही रही है वह, अपने भगवान के मंदिर में भी युगों से गिरवी पड़ी है। रिवाजों के नाम पर।             
मंदिर के लंबे गलियारे में हजारों औरतों के बीच बैठ चंद सिक्कों के बदले खुद को किसी के भी हाथों बेचने का इंतज़ार करती हुई यूलिया    आँसू बहाती है मगर उसके निष्ठूर भगवान का हृदय नहीं पसीजता! उसके बगल में बैठी प्रौढ़ इभान उसकी दयनीयता पर निर्ममता से हँसती है- गुलामी से छुटना है तो अपनी स्त्री देह से मुक्त हो पहले… फिर अनायास रो पड़ती है- मृत्यु के सिवा और कोई दूसरी मुक्ति नहीं हमारे लिए लड़की…
इस दुनिया में आने के बाद वह हमेशा से अपनी देह, अपनी मिट्टी की कैद में है। अब जान गई है, जब तक इससे सांस बंधी है, दासता की साँकलों से भी बंधी है। नाम, रुतबा, देश कोई भी हो, यथार्थ में वह हमेशा से गुलाम है- सायप्रस की प्राचीन मंडियों में कभी थोक के भाव बेची गई तो कभी इराक के धर्मान्धों ने पिंजरे में  जानवर की तरह कैद किया। प्राचीन सुमेर में देवी इश्तर के पवित्र मंदिर में अकितु त्योहार के दौरान प्रधान पुजारिन की हैसियत से प्रेम की देवी इनन्ना को प्रसन्न करने के लिए राजा की अंकशायिनी बनना पड़ा। हिब्रू बाइबल में वेश्या की जगह ज़ोनाह, केदेशाह के नाम से जानी गई, भारत में देवदासी, नगर वधू! रोम, ग्रीस, चीन… हर देश, हर युग में… कहीं दुत्कार और जिल्लत मिली तो कहीं खूब सम्मान, दौलत! मगर रही वह वही- भोग्या, वेश्या, दासी… क्या घरबाजार, क्या देवालय-दरबार!                
इन दिनों बैंकॉक के देह बाज़ारों में घूमते हुये मुझे अक्सर भगवान अफरोदित के मंदिर में युगों से बैठी यूलिया की याद आती है। जाने उसकी देह का ऋण कब चुक पाएगा, जाने उसकी प्रतीक्षा कब खत्म होगी… युद्ध, गरीबी और पर्यटन का सीधा प्रभाव देह व्यापार पर ही पड़ता है तभी तो पूरी दुनिया एक बाज़ार में तब्दील होती जा रही है!
युवासक के साथ घूमते हुये बैंकॉक के रेड लाइट डिस्ट्रिक कोई समोई के एक गो-गो बार में एक दिन मुझे अचानक से माया मिल गई थी। उसी दिन जाना था, वह देह का धंधा करती है। सीधी-सादी-सी माया को तंग, छोटे कपड़ों और गहरे रंग-रोगन से पुते देख कर अजीब लगा था। भीतर कुछ अनायास दरक-सा गया था। जिसे मैं जाने किस-किस जगह ढूँढता फिर रहा था, वह मुझे बीच बाजार मिल गई गई थी। मेरा दुर्लभ आकाश-कुसुम दरअसल देह-मंडी में चंद बहत के बदले रोज-रोज बिकने वाला एक सामान मात्र था! बहुत तकलीफ हुई थी, उस सारी रात जाने कैसी-कैसी अनुभूतियों से गुजरा था, कभी तपती रेत, कभी नागफनी का जंगल, कभी खारा पानी का दरिया… लगा था, किसी ने जान की नस काट कर छोड़ दिया है। गले से भल-भल बहता रक्त और सांस की खिंचती-टूटती डोर… जाने किससे बेहद नाराज था, जाने किसने छला था मुझे! मगर आखिर तक बची रह गई थी मेरे भीतर दो उदास, खूबसूरत आँखें- माया की आँखें! उस दिन जाना था, प्रेम धुर मरुभूमि के आकाश का कोई उजला सितारा जैसा होता है, रेत की अंधी करती सूखी, भूरी बारिश में हाथ पकड़ कर घर तक ले आता है! खोने नहीं देता उसके  तिलस्मी ढूहों के घने जंगल में…
मुझे माया को-खुद को-अपने प्रेम को एक अवसर देना ही था! जुर्म जाने बिना कोई सजा ना मैं माया के लिए तय कर सकता था, ना खुद के लिए! तो गया था उसके पास, बेहद बोझिल कदमों से, इस उम्मीद और प्रार्थना के साथ कि बैरंग लौटना ना पड़े।    
उस दिन माया की आँखें नम हो आई थी कहते हुये- मुझे तुम्हारी आँखों में प्रेम दिखा था आकाश, मेरे भीतर दाने बांधते किसी वर्जित फल की तरह ही! इसलिए डर गई थी… हमारे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं हो सकता था! मन की अमूर्त यातनाओं के घनीभूत होने से पहले ही भाग छुटी थी, शायद खुद से ही! मगर दूर तक दौड़ते चले जाने के बाद समझ आया, खुद से रिहाई संभव नहीं! उस दिन हम साथ रोये थे, पराजित-से होकर। लगा था, इस हार में ही हमारी जीत छिपी है कहीं…
माया ने बताया था, यहाँ की अधिकतर वेश्याओं की तरह उस पर भी उसके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी। यह सब करने के लिए वह विवश थी।
आगे चल कर माया की विवशता मेरे भी जीवन की सबसे बड़ी विवशता बन गई थी। तकलीफ भी। वह मेरे सामने अपने ग्राहकों के साथ जाती, मैं दूर से देखता रहता। अपने परिवार की देख-भाल के लिए उसे जितने पैसों की जरूरत थी, उसे देने के लिए मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। उसने कहा था, अगर मैं उसकी आर्थिक मदद करूँ, वह यह काम खुशी-खुशी छोड़ देगी। मैंने घर से कुछ पैसे मंगाए थे, अपने उपन्यास के लिए मिली पेशगी भी उसे दे दिया था। मगर उसकी जरूरतें बहुत ज्यादा थी। दस मुंह खाने के लिए उसके सामने दिन-रात खुले रहते थे। पहली बार जाना था, पैसा इतना जरूरी होता है! सिक्के खुशी पर भारी पड़ते हैं।
उन क्षणों की यंत्रणा शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकती जब आप जानते होते हैं कि जिससे आप प्यार करते हैं, वह किसी के साथ आपकी आँखों के सामने कमरे में बंद है! प्रेम कितना विवश, कितना बलनरेबल कर देता है इंसान को! किस तरह के सौदे-समझौते करवा लेता है उससे… सिर्फ बल ही नहीं देता, इसके ठीक उलट बलहीन भी कर देता है।
बहुत अपमानजनक था यह सब। मैं माया से दूर नहीं जा सकता था मगर यहाँ एक-एक पल काटना मेरे लिए कठिन हो गया था। अक्सर यह होता कि सारी रात ग्राहकों के साथ बीता कर माया निढाल-सी बिस्तर पर पड़ी रहती और मैं उसके बाल सहलाते हुये उसके सरहाने निःशब्द बैठा रहता। मैं चाहता था, माया को ले कर इस बाजार की गंदी दुनिया से कहीं दूर चला जाऊँ, उसे हर तकलीफ, आघात से बचाऊँ। मगर मैं उसके साथ इस नरक में जीने के लिए अभिशप्त था। मेरी एकमात्र हासिल माया की वो दो आँखें थीं जिनमें मेरे लिए ढेर-सा प्यार और यकीन हुआ करता था। उसने कहा था एक बार मुझे, मैं उस दिन भीतर से औरत बनूँगी जिस दिन तुम मुझे अपनाओगे… तुम्हारे स्पर्श से एकदम नई-कोरी हो जाऊँगी! मुझे  भी उस दिन का इंतज़ार था जब मैं उसे यहाँ से ले जा सकूँगा, सिर्फ अपनी बना कर!
एक कॉल गर्ल हो कर भी उसका मेरे साथ बेहद संकोची होना अब कुछ-कुछ समझ आने लगा था मुझे। कई बार कहा भी था, अपने भगवान को बासी फूल नहीं चढ़ाता कोई। एकदम जूठी, गंदी हूँ मैं! मैं इस तरह से नहीं सोच सकता था उसके लिए। मगर देह के इस बाजार में मेरा भी मन देह से विरक्त रहता था। किसी दिन इन सब से परे उसे ले जाने के इंतजार में था मैं।         
मगर फिर एक दिन अचानक मैं ही माया को छोड़ देश लौट आया था। उसके आंसू, मिन्नतों का कोई असर नहीं हुआ था मुझ पर। मैं जैसे अपने आप में नहीं था। घटनाओं की आक्सिमिकता ने सोचने-समझने की शक्ति एकदम शून्य-सा कर दिया था।
क्रिस्मस के अवसर पर दो दिन की छुट्टी ले कर हम मेकोंग नदी से होते हुये सामुई समुद्र तट गए थे। वहाँ भीड़ भरे बाजार और शोर-गुल से दूर प्रकृति की गोद में निश्चिंतता का कुछ समय हमें एक-दूसरे के बहुत करीब ले आया था और उन्हीं आंतरिक पलों में मुझे पता चला था, माया दरअसल एक लेडी बॉय अर्थात स्त्री के भेष में पुरुष है! यह शॉक मेरे लिए असहनीय थी। माया रोती रही थी कि वह मन से स्त्री है और मुझसे सच्चे हृदय से प्यार करती है मगर यह सब सुनने-समझने की स्थिति में मैं नहीं था। दूसरे ही दिन प्लेन पकड़ कर भारत लौट आया था। मगर लौटने से ही क्या लौटना होता है!
खुद को माया के पास हमेशा के लिए रख कर मैं अपना शरीर एक सामान की तरह यहाँ ढोता फिरा था एक लंबे अरसे तक। कुछ जैविक क्रियाओं के सिवा अब जैसे मुझ में और कुछ नहीं रह गया था। मैं भी नहीं! मेरे दुख, हताशा, माया के प्रति एक प्रछन्न गुस्सा मेरे प्रेम को हर क्षण जीलाए हुये था, उस में ईधन का काम कर रहा था। मेरा उसे भुलाना दरअसल उसे याद करना ही था, बहुत जल्द मैं इस बात को समझ गया था।
मुंबई में कुछ महीने इधर-उधर निरुद्देश्य भटकने के बाद मैं बौद्ध गया चला गया था। मुझे शांति चाहिए थी। अपने भीतर रात-दिन जलने वाली आग के भीषण ताप को सहन करना अब मेरे वश में नहीं रह गया था। लगता था, एक धू-धू जलती चिता हूँ!  
मगर वहाँ जा कर कुछ दिन भटकने के बाद लगा था, शांति अगर अपने भीतर नहीं है तो कहीं नहीं है। यह भागते फिरना दरअसल एक कस्तूरी मृग के भटकाव की विडंवना-सी है।
और फिर एक दिन बौद्ध गया के महाबोधि मंदिर में घूमते हुये मेरी मुलाक़ात नकूल बोधिसत्व से हो गई थी! लगा था, यह कोई ईश्वरीय वरदान है। जीवन के दुखों और अपने भीतर के अंतहीन द्वंद्व और दुविधाओं से जब मैं त्रस्त भटकता फिर रहा था, बोध गया के इस पावन धरती पर जैसे किसी ईश्वरीय आदेश से ही नकूल बोधिसत्व मेरे सारे प्रश्न और शंकाओं के समाधान के लिए इस तरह आ खड़े हुये थे।  
मार्च का वह एक बेहद गर्म, चमकीला दिन था। दोपहर की उष्ण हवा में सेमल के रेशमी फाहे उड़ते फिर रहे थे। जमीन झडे हुये पलाश से दूर-दूर तक लाल…  
टहलते हुये हम महाबोधि मंदिर के पीछे 116 वर्ष पुराने 80 फीट ऊंचे विशाल बोधि वृक्ष के पास चले गए थे। पेड़ की फैली जटाओं की ओर देखते हुये नकूल बोधिसत्व बोलते रहे थे- राजकुमारी संघ मित्रा पुराने वृक्ष, जिसके तले 528 ईसा पूर्व बुद्ध को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी, से एक पौधा निकाल कर श्री लंका ले गई थी। मौलिक वृक्ष के मर जाने के बाद फिर उसी पौधे से बने वृक्ष की एक डाल ला कर यहाँ लगाया गया जो आज इतना बड़ा, इतना सघन वृक्ष बन गया है- चेतना का अमर वृक्ष!
पेड़ की शाखाओं पर बंधी अनगिनत प्रार्थनाओं की पट्टियों की ओर देखते हुये मेरे भीतर भी जैसे अनायास एक छोटा-सा पौधा निकल आया था। जाने कैसी अनाम, अनचीन्ही उम्मीद से भरने लगा था मैं… नकूल बोधिसत्व बोलते रहे थे- यही, इसी पेड़ की छांव में उस जीवन से विरक्त राजकुमार को हजारों साल पहले माया से उनचास दिनों तक अथक लड़ाई लड़नी पड़ी थी, साथ ही कठोर तप, नौ वर्षों के लंबे उपवास के बाद…       
सुनते हुये मेरी सांसें रुक-सी आई थीं। माया से मुक्ति! क्या मेरे भीतर का सारा संताप, सारे पलायन का अर्थ यही है- माया से मुक्ति… भीतर प्रतीकार में एक चीख उठ कर देर तक मंडराती रही थी। इस झूठ को उतार फेंकना है अपनी आत्मा से, और ढोया नहीं जाता!
मेरी सोच को सुनते हुये-से नकूल बोधिसत्व ने बहुत ठहरी आवाज में अचानक कहा था- तुम्हारी लड़ाई बहुत अलग है आकाश! माया तुम्हारा बंधन नहीं, तुम्हारी मुक्ति है! प्रेम से भागा नहीं जाता… मैं उस क्षण की अलौकिकता का बयान शब्दों में नहीं कर सकता। उनकी कही ये बात मेरा निर्वाण था, मेरा बोधिसत्व! भीतर तक थरथराते हुये मैं बस इतना ही कह पाया था- मगर वह… मेरी बात को काटते हुये वे उठ खड़े हुये थे- वह तुम्हारा प्रेम है बस इतना ही याद रखो! बाकी किसी बात का कोई अर्थ नहीं! झूठ हम दूसरों से बोलते हैं, खुद से नहीं!  
528 ईसा पूर्व इस बोधि वृक्ष के नीचे निर्वाण प्राप्त कर गौतम बुद्ध को कैसा अनुभव हुआ होगा आज शायद मैं महसूस कर सकता था! वर्जनाओं की सारी सांकले एक झटके से टूट गई थीं जैसे। अब मैं माया को देख पा रहा हूँ, विशुद्ध प्रेम के रूप में! अब कोई शंका नहीं, दुविधा नहीं! मुझे उसके पास जाना है, अपनी मुक्ति, अपने गंतव्य के पास, हर रेखा, हर दीवार, सरहद को लांघ कर…
मैं भी एक झटके से उठ खड़ा हुआ था- मुंबई से बैंकॉक की फ्लाइट कितनी जल्दी मिल सकेगी, आज ही पता करना होगा मुझे!
 जुलाई 2017 में प्रकाशित |
जयश्री रॉय : जन्म 18 मई, हजारीबाग, (झारखण्ड । शिक्षा) एम. . हिंदी गोवा विश्वविद्यालय । प्रकाशन अनकही‘, ‘तुम्हें छू लूं जरा‘, ‘खारा पानी‘ (कहानी संग्रह), ‘औरत जो नदी है , साथ चलते हुएउपन्यास, ‘तुम्हारे लिएकविता संग्रह, सम्पर्क  Jaishreeroykathakar@rediffmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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बिखरे पन्ने
7 years ago

जीवन बहुआयामी है, और प्रेम एक जटिल विषय…कहानी यह पक्ष बार-बार सामने रखती है।

घटनाओं की कमी के बावजूद कथा की लेखन शैली पाठक को बाँधे रखने में सक्षम रही। अपने अर्न्तद्वंद्वों से जूझते हुए नायक बार-बार प्रेम की परतों को उघाड़ता है किंतु उसके लिए यह मायावी तृष्णा ही बना रहता है।

कहानी के अंत में अंततः प्रेम को स्थापित किया तो गया है किंतु यह थोड़ा अलग नज़रिया है और इससे सहमत हो पाना जरा कठिन है…क्योंकि यहाँ लैंगिक भेद से ऊपर जाकर संवेदनाओं के सहारे पार पाने का प्रयास किया गया है।

कहानी थाईलैंड के जन-जीवन और कुख्यात देह मंडियों में औरत की तार-तार होती अस्मिता के बारे में अच्छी जानकारी देने के साथ संसार भर में स्त्रियों के शोषण पर भी आईना दिखाती है

भाषा-शिल्प वही है..सम्मोहित करता-सा जो लेखिका की नैसर्गिक प्रतिभा है। कथ्य को आगे बढ़ाते हुए प्रकृति को उद्दाम, शांत और मानसिक बिंबों में कब और कैसे बाँधा जाना है, इसका बखूबी प्रयोग लेखिका को बेहद अच्दे से आता है।

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