कहानी

पवन बहे उनचास

  • पवन कुमार सिंह

   कहते हैं कि बिपत कभी अकेले नहीं आता है। जब आता है तो सखा समेत! पिछले महीने कोरोना की दूसरी लहर शुरू होने पर लगातार लोगों पर दुखों का पहाड़ टूटा पड़ रहा है। घर-घर शोक की लहर! जैसे मौत का तांडव! खैरियत जानने के लिए किसी को फोन करते उँगलियाँ काँप जाती हैं। कोई कॉल आ जाए तो रिसीव करते देह सिहर जाती है।

“हेलो! कैसे हैं आपलोग?”

“ठीक नहीं हैं। सबलोग बीमार हैं!…नहीं, जाँच करवाने से क्या फायदा? रिपोर्ट आने में सप्ताह बीत जाता है।…तबतक घूम-घूमकर कोरोना का प्रसाद बाँटते रहिये।”

“ठीके बोले! बीमार हुए हैं तो मानकर चलिए कि पॉजेटिव हैं। इलाज शुरू कर दीजिए। लक्षण?…उसका क्या है। किसी में कुछ तो किसी और में कुछ और!”

“रिपोर्ट मिलने तक बहुत देर हो जाती है। कंडीशन बेसम्हार! सीटी स्कैन से पता चलता है, फेफड़ा डैमेज है! कितना परसेंट?… ऑक्सिजन लेबल डाउन!…समुचित इलाज के अभाव में दर्दनाक मौत!… ऑक्सिजन सिलेंडर की कालाबाजारी।… जरूरी दवाओं की नकली किल्लत बनाकर तीन की तीस वसूली! तिसपर किसी अस्पताल में जगह खाली नहीं। बेड के लिए मंत्री तक की पैरवी बेकार! जान पर आफत है।”

“छिः! आदमी को देखकर गिद्ध को शर्म आ रही है। कौन कहता है कि गिद्ध विलुप्त हो गये हैं? अलबत्ता उन्होंने मनुष्य की काया धारण कर ली है!”

“यानी कि सिस्टम फेल?”

“नहीं-नहीं,  यही है सिस्टम!”

“इतनी बड़ी वैश्विक विपत्ति है, इसमें कोई भी सिस्टम फेल हो जायेगा। और फिर अपने देश की एक सौ पैंतीस करोड़ की थेथर और बकलोल जनता की आबादी भी तो देखिये! तभी तो सरकार जनसंख्या नियंत्रण कानून लाना चाहती है।”

“ मदद भी कौन करे, सबके घर आफत बरस रही है।”

     पिछले कोरोनाकल में किसी अपने की मौत की खबर नहीं थी। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया से स्थिति की भयावहता समझ में आती थी। पूरा लॉकडाउन घर में बंद रहकर काट लिया था, मौत के खौफ से बेखबर। मगर इसबार मौत आसपास चारों ओर मंडरा रही है। कई नजदीकी रिश्तेदारों, हितैषियों, सहकर्मियों और परिचितों को कोरोना ने छीन लिया। इतनी बुरी ख़बरें सुन चुका हूँ कि जिन्दगी से विश्वास उठ गया है। कलेजा काठ का हो गया है। बाबा होते तो कहते– ‘कठकरेजी’। संवेदनाशून्य! सारी संवेदनाओं का केन्द्रीकरण भय में हो गया है। भय अपनी सम्पूर्ण विकरालता के साथ अस्तित्व को आच्छादित किये हुए है।  दहशत की पराकाष्ठा! अतिरिक्त सावधानी! घर में भी मास्क! 

            रोज किसी एक या दो-तीन प्रियजन की मृत्यु के समाचारों के बीच केवल एक प्रसंग है जो आक्लांत मन को स्नेह की थपकी देता है। अपनी बगिया में नवजीवन अंकुरित हो रहा है। एक महीने से अलग-अलग प्रजाति के तीन जोड़े पंछी अपनी अगली पीढ़ी आकाश को सौंपने के सरंजाम में जुटे हैं। अपनी चारदीवारी से बाहर गेट के सामने के कार शेड के पाये पर पंडुक के जोड़े ने घोंसला बनाकर तीन अंडे दे दिये। वहाँ घोंसले का बचाव केवल आंधी और पानी से ही हो सकता था। यह जोड़ा पिछले सालों की तरह एक हफ्ते से फुलवारी और घर के छज्जों में घोंसले के लिए अनुकूल जगह खोज रहा था।

        बड़ा निरीह परिंदा होता है पंडुक। अपने इलाके में इसकी तीन प्रजातियाँ हैं। एक बड़ा है। अंग्रेजी नाम ‘डव’। रंग जैसे राख पर सिंदूर छिड़क दिया गया हो। गले में रिंग; नर का मोटा और मादा का महीन। आवाज—कु कु कू, कु,कु कू! दूसरा थोड़ा छोटा। रंग में लाली का प्राधान्य। पीठ और गले पर भूरे बूटे। आवाज—कुर्र- कुर्र, कुर्र- कुर्र ! ये दोनों प्रकार के पंडुक जीवन भर के लिए जोड़ा बनाते हैं। साल में एक बार वंशवृद्धि का सरंजाम करते हैं। तीसरे को हमेशा अपने शिकार काल में जंगल या पहाड़ियों में देखा है। मैना के आकार की छोटी ललौहीं चिड़िया। आवाज—महीन कु- कुर्र, कु- कुर्र , कु- कुर्र! आत्मरक्षा की दृष्टि से पंडुक अकिंचन जीव है। उसे  साँप, बिटगोंय, नेवला, बिल्ली सहित शिकारी पक्षियों से भी खतरा है। मौसम का कहर और…। एक साल पहली मंजिल की खिड़की तक चढ़ आयी पान की घनी लताओं में बिचली प्रजाति के  पंडुक जोड़े ने अपना वंश बढ़ाया था। खिड़की के वनवे व्यू वाले काँच से सटे बमुश्किल चार इंच की जगह में पान की मजबूत डंठलों के सपोर्ट से लगभग पंद्रह आना सुरक्षित घोंसला उस जोड़े ने बनाया था। एक आना खतरा उसे साँप का था जो पान की लताओं के रास्ते घोंसले तक पहुँच सकता था। अपनी फुलवारी में साँप, नेवला, बिल्ली, बिटगोंय सब का आना जाना है। उस बार घोंसला बनाने से लेकर बच्चों के उड़ने तक की सारी गतिविधि हमने काँच के इसपार सटकर नंगी आँखों से देखी थीं और डिजिटल कैमरे में सैकड़ों तस्वीरें कैद की थीं। छुट्टियों के कारण निक्की घर में थी। उसके लिए तो उत्सव हो गया था। काँच के उसपार बच्चों की चीं-ची के साथ वह सुर मिलाती—चीं…ची! पुचु… पुचु!

        तीन हफ्ते की उस प्राकृतिक कार्यशाला में हमने पंडुक की वंशवृद्धि की सभी बारीकियाँ जान ली थीं। तीन अण्डों में से दो बच्चे उड़ाए थे उस जोड़े ने। अंडा सेने से लेकर उड़ाने तक नर की भूमिका चवन्नी भर ही थी। क्या सभी प्राणियों में बच्चा पालने के मामले में यही सच है? इसी कारण माँ महान है?

            इस क्रम में एक हादसे से भी दो चार होना पड़ा था उस जोड़े को। एक दिन तीसरे पहर में आयी आंधी से शुरू हुई वर्षा रात भर चलती रह गयी थी। बच्चे के डैनों में पंख निकलने लगे थे। चोंच का गुलाबी रंग धूसर होता जा रहा था। माँ चुग्गा जुटाने में सूर्योदय से सूर्यास्त तक दर्जनों चक्कर लगाती। बाप भी दो-चार बार खिला जाता था। आंधी वाली शाम माँ –बाप में से कोई नहीं लौटा। बच्चे परेशान… चीं… चीं… चीं…ची! हमें भी चैन कहाँ! काँच के अन्दर हमने बत्ती जला दी थी। निक्की रातभर जगी रह गयी थी। सुबह हमारे नाश्ते के समय तक बच्चे भूख से बेहाल! चीं-चीं करते घिरनी जैसे चक्कर काट रहे थे। इस समय तक दो बार चुग्गा मिल जाया करता था बच्चों को। मैं मान चुका था कि आंधी में पंडुक का जोड़ा शहीद हो गया है। लम्बी खिड़की की काँच चार रोलिंग स्लाइडर में विभक्त है। बगल वाले स्लाइडर को खिसकाकार हमने घोंसले तक पहुँच बनाई और दोनों बच्चों को अन्दर ले लिया। पंडुक शाकाहारी पंछी है। सुधा चने के सत्तू का पतला घोल बना लायी और छोटे चम्मच से बच्चों को खिलाने का प्रयास किया। भूखे बच्चे पहले तो थोड़ा डरे-झिझके, पर स्वाद मिलने के बाद पूरा मुँह फाड़कर जैसे चम्मच को ही निगल जाने को उद्धत हो गये। फिर पेट भर जाने पर मुँह फेर लिये। उस दिन बच्चों को तीन बार खिलाया गया। उस शाम भी माँ-बाप में से कोई नहीं लौटा। हमने मान लिया कि दोनों नहीं रहे। अगले दिन भी तीन बार सत्तू का घोल खिलाया या कहें पिलाया गया, बिना सुई के सिरिंज से। हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब अगली शाम यानी अड़तालीस घंटे बाद माँ पंडुकी बच्चों के पास लौट आयी। अद्भुत! अनिर्वचनीय दृश्य था…बिछड़े माँ-बच्चों का मिलन! कितना लाड़! कितना छोह! ओह!

        बाप फिर कभी नहीं दिखा था। चार-पाँच दिन बाद दिनभर पंख तौलते-तौलते अगली सुबह दोनों बच्चे माँ के पीछे घोंसले को अलविदा कह उड़ गये थे। बाद में एक दिन फुलवारी साफ करते हुए नीचे से बासुकी ने आवाज लगाई थी, “सर, देखिये पान में साँप का केत्ता बड़ा केंचुआ है! बाप रे बाप! अजगुत बात! खाँटी गहुमन!” सचमुच! पंडुक के घोंसले के ठीक दो फुट नीचे पान के झुरमुट में करीब पाँच फुट लम्बा कोबरा का केंचुल! तो महाशय वहाँ तक पहुँच ही गये थे, पर देर हो चुकी थी।… तब से हरेक साल पंडुक के जोड़ों ने घर या फुलवारी में विभिन्न जगहों पर वंशवृद्धि के सफल या असफल प्रयास किये थे। निक्की के ब्याह में फुलवारी की साफ-सफाई में पान की लत्तर काट दी गयी जो अब तक पुरानी जगह तक नहीं पहुँच सकी है, पर कोशिश जारी है।

          इस बार कोरोनाकाल में पंडुक ने अपेक्षाकृत बिल्कुल असुरक्षित जगह चुनकर अंडे दे दिये थे। तीन अंडे… सुपाड़ी के रंग और आकार के। सुरक्षा को लेकर मैं बेहद चिंतातुर हो गया। वहाँ साँप और बिल्ली से तो खतरा था ही, चारदीवारी से बाहर खुले में होने के कारण बेमतलब ढेलाबाजी करने वाले रेणु जी के ‘आजाद परिंदों’ का निशाना बन जाने का अंदेशा अधिक था। मैंने कॉलेज जाने के लिए कार निकालने के समय फाटक के सहारे उझककर देखा तो तीन अंडे छोड़कर पंडुक दाना-पानी के जुगाड़ में निकला हुआ था। बासुकी को बुलाकर समझाया कि साँप और बिल्ली से बचाने को घोंसले के नीचे पाये में बारबेट वायर लपेट दे और गत्ते से घोंसले को सड़क की तरफ से छुपा दे। पाँच घंटे बाद कॉलेज से लौटा तो ‘मेरे तरवा का लहर कपार पर’! भारी बकलोल है यह बासुकी! अपने बाप से भी बड़ा! वह गाँव में मेरे बचपन के शागिर्द भगीरथ पासवान का बेटा है। बाप तो बचपन में दर्जनों बार मेरे हाथों पिट चुका था, पर इसका क्या करूँ? बेटे जैसा बन गया है। उसमें मुझे अपने परदेशी बेटे नंदू की छवि दिखती है। बड़े अधिकार के साथ भगीरथ ने बेटे को सौंपा था, “अपने त परोफेसर होय गेल्हो भिया। हम्मे त हरजोत्ता होय क रहि गेलीऐ। है छौंड़ा सनी गाँवें में बौखतै? क्राइम करे लागतै त अच्छा लागथों कि?” 

          जुगाड़ लगाकर बड़े बेटे को मैंने एनटीपीसी में स्थाई प्रकृति की ठेका मजदूरी में काम लगाकर अपने घर के निचले तले के ‘होम फॉर होमलेस’ में एक कमरा दे दिया है। तरक्की करके अब वह स्किल्ड लेबरर बन चुका है, पर है अभी तक ‘डोल्ट’ ही। मेरे निर्देश में बेसी ‘माथा’ लगा दिया था उसने। घोंसले के चारों ओर से पाये में गत्ता लपेटकर उसने अपने हिसाब से एक ही साथ सभी खतरों से बचाने का उपाय कर लिया था, जिसमें सुधा की भी सहमति थी। मैंने देखा, घोंसला केवल ऊपर से खुला था। उसपर भी कार शेड की छत! पशु-पक्षी इस दुटंगा जानवर की चालाकियों से खूब वाकिफ हैं, इसीलिए खूब सतर्क रहते हैं। पंडुक जोड़े ने समझा होगा कि उन्हें फँसाने के लिए पिंजरा लगाया गया है। सो आत्मरक्षा में उन्होंने अण्डों का मोह त्याग दिया और दुबारा घोंसले में नहीं लौटे। भूल-सुधार की कोशिश बेकार गयी। बाद में शिकारी पक्षियों में से किसी ने अण्डों पर हाथ साफ कर लिया। इस एपिसोड का त्रासद अंत हो गया…!

               कोरोना की यह दूसरी लहर शुरू होने तक नवजीवन का दूसरा खेल चालू हो चुका था मेरी फुलवारी में। कचबचिया का एक कुनबा दिनभर फुलवारी में विचरण करता है सालों भर। लगभग एक दर्जन सदस्यों का घनिष्ठ परिवार। इतना निर्भीक कि हम बैठे हैं तो चार फीट निकट तक फुदकती चली आये। हाँ, अपरिचितों से बहुत परहेज। दिनभर झुण्ड मेरी बगिया में या नहर वाले बांध पर फुदकता फिरता और रात में हमारे घर के बगल में हाल में बनी जजों की कॉलोनी के बड़े आम के पेड़ पर बसेरा करता है। खंजन-सी चंचल। मुँह से ‘कचबच- कचबच’ का कोरस गाती कचबचिया। हर साल एक जोड़ा वंशवृद्धि जरूर करता है। इसका घोंसला अधिक सुरक्षित होता है। पंद्रह-बीस फीट की ऊँचाई पर सीधे खड़े वृक्षों के संकरे कोटर में इसे घोंसला बनाना पसंद है, ‘जहाँ पमन को गमन नहीं’…! हर खतरे से महफूज। मौसम की मार से भी। यह अकिंचन लगभग हरेक प्रयास में सफल होता है। जोखिम केवल बच्चों की पहली उड़ान के दिन रहता है, यदि आसपास घनी टहनियों वाला कोई वृक्ष न मिले तब। मेरी फुलवारी में इसके लिए सबकुछ अनुकूल है।

                 इस बार एक जोड़े ने फुलवारी के किनारे घर से पच्चीस फीट की दूरी पर फॉक्स टेल पाम के कोटर में घोंसला बनाया, जमीन से लगभग बीस फीट ऊपर। माँ-बाप की तीन सप्ताह की अहर्निश व्यस्तता के बाद एक दिन घोंसले से दो बच्चे उड़कर आम की टहनियों पर डेरा जमाए दिखे। अब भी पंख फड़फड़ाकर खाना माँग रहे थे और माँ-बाप उन्हें बारी-बारी से खिला रहे थे।  इन बच्चों को एक-दो दिन केवल शिकारी पक्षियों से खतरा था। सो हम दिनभर उनकी रखवाली करते रहे। उस रात बाकी सब तो बड़े आम पर चले गये, पर दोनों नवजातों सहित पूरा परिवार फुलवारी वाले छोटे आम पर रह गये थे। अगली सुबह बच्चे स्टोर की टिनवाली छत पर फुदकते दिखे। वहाँ उन्हें बिल्ली का ग्रास बन जाने का डर था, इसलिए उस दिन भी हमने उनपर नजर बनाये रखी। रात में सभी अपने पुराने स्थाई बसेरे पर चले गये थे। बच्चों ने लगभग पचास फीट लम्बी उड़ान भर ली थी। हम आश्वस्त हो गये थे। एक हफ्ते तक अपने छोटे आकार के कारण दोनों अलग पहचाने जा सके थे। अब सभी एकमएक हो गये हैं।

       बच्चों को पालने के मामले में मैना और गौरैया की सफलता का प्रतिशत काफी अच्छा रहता है। मैना अपने छोटे आकार के अनुपात में काफी आक्रामक होती है। अण्डों-बच्चों पर खतरा महसूस होने पर वह जान की बाजी लगाकर बिल्ली, नेवला, साँप, चील, कौआ तक पर हमला कर देती है। सामान्य अवसरों पर भी वह चें-चें-चें-चें का शोर मचाकर परभक्षियों की उपस्थिति की मुनादी करती हैं। यह वृक्षों के कोटर या मकानों के रोशनदानों में घोंसला बनाती है। गौरैया घर के भीतरी भाग में मनुष्य के बहुत निकट घोंसले बनाती है; इसलिए उसे केवल बिल्ली और बिजली पंखे से खतरा रहता है। मेरी फुलवारी में मैना और गौरैया दोनों आती हैं, पर कभी घोंसला नहीं बनाती। शायद इनके घोसलों के अनुकूल नहीं है हमारा घर।

          कचबचिया के नवजातों के उड़ने के एक सप्ताह पहले घर के पश्चिमी छज्जे से लटकते सजावटी लता के गमले में एक और नवजीवन अंकुरित होने लगा था। बुलबुल के जोड़े ने इस बार वहाँ घोंसला बनाकर अंडे दे दिये थे। तीन भूरे चितकबरे अंडे, पूजा वाली छोटी सुपाड़ी के बराबर! देखकर आश्चर्य होता है कि इतनी छोटी काया में तीन-तीन अंडे कैसे सम्भाल लेती है! हर साल फुलवारी में एक या दो जोड़ी बुलबुल घोंसला बनाती है। कभी गुड़हल या बड़े साईकस के झुरमुट में तो कभी ऊपर चढ़ने के रास्ते के दोनों ओर लगे आदमकद हेज के अन्दर, जहाँ साँप को पहुँचने में भी मशक्कत हो। कई वर्षों से देखा है, हमारी रखवालियों के बावजूद बुलबुल के बच्चों का मृत्युदर पचास प्रतिशत से ज्यादा है। वे प्रायः महोखा या महालत/टकाचोर नामक शिकारी पक्षियों का निवाला बन जाते हैं। बच्चों के चीं-चीं-चीं  करना शुरू करते ही इन दुष्टों को भनक लग जाती है। मौके की तलाश में आसपास मंडराते रहते हैं। दाँव मिलते ही बेरहमी से एक-एक को उठाकर ले जाते हैं। बुलबुल की ग़रीब जोड़ी हवा में चक्कर काटती जोर-जोर से चीं-चीं-चीं-चीं का कातर शोर मचाती रह जाती है। शोकाकुल माँ-बाप दो-तीन दिनों तक घोंसले के आसपास बच्चों को पुकारकर तलाशते हैं, फिर कलेजे पर पत्थर रखकर संतोष कर लेते हैं। कमजोर होना कितना पीड़ादायक है …! पिछले दस सालों में यह दर्दनाक हादसा हमने तीन बार देखा है और दो बार अचानक बच्चों को ‘गायब’ होते भी देखा है। दो-तीन दिनों तक हमारे परिवार में मातम छाया रहा है, हर बार।

        सो इसबार लटकने वाले गमले में घोंसला देखकर हम बुलबुल परिवार की सलामती को लेकर चिंतित हो गये थे। वैसे भी इस लॉकडाउन में लगभग घर में कैद होकर रह गया हूँ। मृत्यु के हाहाकारी समाचारों के बीच किताबें पढ़कर भी समय नहीं काटा जा सकता। पढ़ने-लिखने में मन ही नहीं जमता। टीवी में न्यूज़ चैनल आप देख ही नहीं सकते, जो इन्होंने गंध मचा रखी है। ले-देकर जानवरों वाले चैनल और नेटफ्लिक्स पर खोजकर कोई एक फिल्म रोज। हम दोनों अकेले हैं। बच्चे दूर हैं। एक जोड़ा बैंगलोर और दूसरा नोएडा। पूरी फुर्सत में हैं इसलिए बुलबुल की वंशवृद्धि के पूरे आयोजन को देख सकने का अवसर और मनोदशा भी है। अबतक के मेरे तजुर्बे के हिसाब से सबसे अधिक असुरक्षित जगह का चुनाव किया था बुलबुल के इस  जोड़े ने। वहाँ उसे केवल बिल्ली, नेवला और बिटगोंय से सुरक्षा थी। साँप भी पाये के सहारे घोंसले तक पहुँच सकता था। घर के भंडार कोण में खुले छज्जे की वह जगह आंधी-तूफान के सीधे चोट पर थी। सबसे बड़ा खतरा वहाँ शिकारी पक्षियों से था। बारह फीट की गली के उस पार जजों के अहाते वाला एकलौता आम का विशाल पेड़ है। एकलौता इसलिए कि इसी साल सिंचाई विभाग के आम बागन को उजाड़कर लगभग दो एकड़ भूखंड पर जज कॉलोनी बनाई गयी है। पाँच मंजिल का भव्य भवन! भवन के रकबे से छह-आठ गुना बड़े भूखंड में लगे दर्जनों आम के पेड़ बेमतलब के काट डाले गये हैं।  उस बचे पेड़ के गली के ऊपर तक फ़ैल जाने के कारण उसकी डालियाँ घोंसले से बमुश्किल पाँच फीट दूर हैं। सो मेरे हिसाब से इस बार बुलबुल की अगली पीढ़ी पर नब्बे फीसदी मौत का खतरा था।…और इधर मानव समाज पर भी कोरोना की दूसरी लहर का कहर बरस रहा है। हरेक फोन कॉल मौत की खबर की संभावना से लैस! कितने तो अपने छोड़ गये अप्रैल के पहले हफ्ते  से अभी मई की शुरुआत तक। देश के शीर्ष महात्माओं से लेकर परिजन-पुरजन सहित और न जाने कौन-कौन अजीज…। जा रे कोरोना! हमारी जान बख्स दे!

 ‘गो कोरोना गो!’

पर क्या जाएगा कोरोना?… जाएगा?

 कोरोना के मरीजों को घर-घर घूमकर सेवा देने वाले तथाकथित झोला छाप डॉक्टर धनंजय कहते हैं—“देख लिये न बड़का साइनबोर्ड वाले डॉक्टरों को! साल भर लूटते हैं और जब आफत आई है तब बिलों में घुस गये हैं। हुँह, ‘झोलाछाप डॉक्टर’ माई फुट!”

आज इन झोला छाप चिकित्सकों ने ही पूरे देश के साधनहीन रोगियों को सम्भाल रखा है। ऑक्सिजन के बिना तो लोग मर ही रहे हैं, ये देवदूत न होते तो मौत का आँकड़ा करोड़ में पहुँच गया होता। डॉ. धनंजय के अनुसार— “कोरोना…कुदरती होता तो चला जाता, जैसे  प्लेग, चेचक और पोलियो नहीं रहा!  यह तो बेहद क्रूर और विनाशकारी मंसूबे से मानव द्वारा ईजाद किया गया वायरस है! मनुष्य जैसा ही छल-छद्म कर सकता है। पहचान होने से पहले रूप बदलकर तैयार!… वाह रे छलिया!… मानव द्वारा निर्मित अबतक का सबसे विनाशकारी हथियार! जिसका नियंत्रण निर्माता के हाथों में नहीं रह गया है। अब बात समझ में आ गयी है कि मानव समुदाय को इस वायरस से मुक्ति नहीं है। इसके साथ ही जीने की आदत डालनी होगी। एक-एक करके सबको चपेटेगा तब ही ठंडा होगा ससुरा!”

          इधर शहर में लोगों को जीवन से भरोसा उठ गया है। हर कोई सोच रहा है कि वह जीएगा या खप जाएगा? तीसरी लहर की आशंकाएँ माहौल में तैर रही हैं;… और उधर गाँव में लोग अगले सालभर के लिये आम, कटहल और मिर्ची के अचार डाल रहे हैं। जीवन पर भरोसा कायम है। अलबत्ता पढ़े-लिखे लोगों में वहाँ धीरे-धीरे डर बढ़ने लगा है। हमारे टोले का युवक विक्रम घूम-घूमकर लोगों को सचेत रहने और कोरोना गाइड लाइन का पालन करने को चेता रहा है। वह वार्ड सदस्य है गाँव का। राजनीतिक रूप से सजग और सक्रिय। पार्टी-पौआ से कोई मतलब नहीं। कहता है, “जरूरी है कि बाएँ या दाएँ ही चले आदमी! बीचेबीच चलने में कौन मनाही है?” आमचुनाव में भाजपा के लिए वोट माँग रहा था और विधानसभा में राजद का झंडा उठा लिया। गाँव के विकास के लिए तत्पर रहता है।  सभी टोलों के लोग पूछते हैं उसे। आमचुनाव में मेहरमियां टोले के दर्जनों घरों पर उसने भाजपा का झंडा लगवा लिया था। दिनभर मास्क, सोशल डीस्टेंसिग, सेनेटाईजर और टीकाकरण के विषय में समझाते-सिखाते  विक्रम खिझला उठता है …”साला, इसी सब थेथर सबके कारण कोरोना लौटा है। साला पुलिस का डंडा खाए बिना लोग नहीं समझता है। सालभर से सदी के महानायक कान में घुसकर कहते रहे—‘दो गज दूरी, मास्क है जरूरी!… जबतक दवाई नहीं, तबतक ढिलाई नहीं!’ बेहूदा सब नहीं समझा! अभियो भोजभात और नागिन डांस चालू है गाँव में! कान खोलकर सुन लो सब! अभी यदि वार्ड में कोई भोज या जुटान हुआ तो हम थाना में भूखहड़ताल करेंगे! …और …वैक्सीन के बारे में अफवाह फ़ैलाने वालों के मुँह में कीड़े पड़ें! हराम के जने साले!”

“बेफालतू के गारी-गल्लम मत करो! पहले भेक्सिनेशन सेंटर का व्यवस्था ठीक करो! जानवर के अरगाड़ा लेखा टेस्टिंग और भेक्सिंग दुन्नो झुण्ड को ठूँस देता है  एक्के शामियाना में। सब घट्टमघट्ट! लोग सुई लेने जाएगा कि कोरोना लेने?”—गोबिन विक्रमवा का स्थाई विपक्ष है गाँव में। वार्ड सदस्य का चुनाव लड़ता है उसके खिलाफ।

        मेरे बचपन का यार बिन्देश्वरी मंडल मौसमी पागल है। बाबूजी कहते– ‘चतुर पागल’! पगलाता है तो राग में गाता है…”बिंदा पागल, घर से भागल…घर बाघमारा, बसे गोन्वारा…ओनामासी धंग, गुरूजी चितंग!”

          पता लगा कि पहले वह कर्जों का तकादा बढ़ने पर पगलाता था। डेढ़-दो बीघा जमीन है पुस्तैनी। मैट्रिक पास करने के बाद ही बाप ने ब्याह दिया था। बाप के मरने के बाद से उसपर पागलपन का दौरा शुरू हुआ था। शुरू में महीने-दो महीने का दौरा आता, जो हर साल बढ़ता गया। पगलायेगा तो एक पर एक दर्जनों कपड़े पहनकर गले में सभी धर्मों के धार्मिक चिह्नों वाली मालाओं के साथ दो-ढाई किलो अन्य मालाएँ! एक पर एक तीन-चार टोपियाँ! कानों में बेजोड़े कुंडल। अपने गाँव और बाजार में बेवजह विचरण करता है। दाना-पानी की कोई फिकर नहीं। सारा इलाका-जवार के लोग पहचानते हैं उसे। जिसके दरवाजे पर खाने के टाइम पहुँच गया वहीं भोजन मिल जाता है। कभी तो इतना मिल जाता है कि पोटरी लेकर घर आ जाता है। उस दिन घरवाली उसे नहीं दुरदुराती है। अन्यथा ‘गेटौट’!

        कहीं दो-चार लोग बैठे मिले कि कैसेट चालू, “बिंदा पागल घर से भागल …” और फिर ‘विविध भारती’, जिसमें सामयिक समाचारों के विश्लेषण और कड़वी राजनीतिक टिप्पणियों से लेकर फ़िल्मी गानों के बोल तक शामिल होते हैं। पिछले साल लॉकडाउन के बाद से बिन्दो लगातार पगलाया हुआ है। आज हो गयी है भिड़ंत विक्रमवा से!

“की हो बिन्दो चाचा, मास्क काहे नहीं लगाते हैं, हो?”

“खामोश, बालक! गाँव में जा के मुरखहवा सबको उल्लू बनाओ! हमको टोकाटाकी नहीं…। मास्क पहनने से क्या होगा मरदे? कोरोनमा को मन हो जाएगा तो केनहूँ से घुस जाएगा। हवा में है, हवा में! डोलडालके लिए बैठोगे त पिछवाड़े से घुस जाएगा रे बुड़बक! कन्ने-कन्ने मास्क लगाओगे? मास्क न हुआ, गाय-भैंस के लेरू का ‘मुखजाबी’ या पहलमान का लंगोट हो गया। एही हाल रहा तो दस बरस बाद का बच्चा लोग समझेगा जे मुँहों-नाक एगो गुप्तांगे है मरदे! हा-हा-हा!”

“अरे बिन्दो चा…कोरोना हो जाएगा त मर न जाइएगा! आप गाँव के धरोहर हैं न! गाँव को केतना बड़ा लौस हो जाएगा!”

“धुर, कुच्छो नहीं होगा मरदे! देखिओ गाँव में कौनो मरबे नहीं करेगा ई फुसुकवा सरदी-खोंखी से। मोटहन अनाज खाके थकान से नकबजनी नींद सोने वालों और रौदा में पसेना बहाने वालों का ई कोरोनमा कुच्छो नहीं उखाड़ सकेगा? मरेगा बजरुआ सब। निकम्मा अमीर। पैदल चलना तो दूर, जेकरा एसी में बैठल पसेना आता है,…खाना पचाने और नींद लेने खातिर गोली खाना पड़ता है! बुझे…?” और न जाने क्या-क्या फदकता हुआ बाजार की ओर लगभग दौड़ पड़ा बिंदा पागल। यह ले वह ले… निपत्ता!

         लेकिन शहरों की हालत तो बहुत डरावनी है। जितना बड़ा शहर उतना ही बड़ा डर! टीवी चैनलों पर ख़बरें देखने से दिल की धड़कन बेतहाशा बढ़ जाती है। हमने दूसरी लहर शुरू होने के एक सप्ताह बाद से ही न्यूज चैनल देखना छोड़ दिया है। दिनभर में दस-बीस फोन कॉल करके अपनों की खैरियत पूछ लेना। पर वहाँ भी खैरियत कहाँ है! लगभग हरेक परिवार में लोग बीमार हैं। घुमा-फिराकर सबमें कोविड के वही लक्षण। पॉजिटिव-नेगेटिव का अब कोई मतलब नहीं रहा। सब मानकर चल रहे हैं कि यह छोड़ेगा किसी को भी नहीं। जिसको मरना है, मरेगा; जिसको जीना है, जी जाएगा। संसाधन और विज्ञान निरर्थक प्रतीत हो रहे हैं। विचारधारा पर भाग्यवाद हावी हो रहा है।

        ऐसे माहौल और मानसिक दशा में बाल-बच्चों से अलग हम दोनों। न किसी का आना और न कहीं जाना। जब आदमी को आदमी से डर लगे तो क्या आना और क्या जाना! इन परिस्थितियों में बुलबुल परिवार में वंशवृद्धि की हलचल हमें रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसा सकून दे रही थी। बुलबुल घोंसले के मामले में कुशल कारीगर होती है। आर्किटेक्ट कहें? हाँ, क्यों नहीं? लम्बे तिनकों से महीन बुनावट करते बुलबुल को देखना कितना सुखद है! थोड़ी गहरी कटोरी की तरह मजबूत घोंसला। मजबूती और ठोस आधार देने के लिए दो-तीन टहनियों को लपेटकर घोंसला बनाती है। तूफानी हवाओं को झेल लेने में सक्षम। पूरा खेल कुल चार हफ्ते का होता है, घोंसला बनाने से लेकर बच्चों को उड़ा देने तक। इसबार जाना कि अपने यहाँ बुलबुल की दो प्रजातियाँ हैं। एक लम्बी चुटिया वाली, थोड़े बड़े आकार की। छाती और पेट पूरा सफ़ेद, पीठ और पूँछ गहरी काली, पाँवों के पीछे पूँछ के नीचे सुर्ख लाल। दूसरी अपेक्षाकृत अधिक काली थोड़ा भूरापन लिये हुए। आकार छोटा, चुटिया छोटी। पीछे की लाली मद्धम।

           इसबार दूसरी वाली प्रजाति के जोड़े ने बसेरा बनाया था। अप्रैल की चार तारीख तक तीन अंडे देकर सेने बैठ गयी थी। हम पास की खिड़की के फाँक से बहुत निकट से उसकी हरेक गतिविधि देख सकते थे। अंडे सेते हुए बैठने पर उसका सिर और पूँछ अंग्रेजी के ‘व्ही’ अक्षर का आकार बनाती घोंसले से बाहर झाँकती थी।  उसकी एक आँख लगातार हमारे क्रियाकलापों पर टिकी होती। बालकनी से होकर गमलों में पानी डालने जाता तो दस फीट दूर से ही उड़ जाती और बगल के आम पर बेचैन होकर फुदकती रहती थी। घोंसले वाले गमले में पानी डालने का उपक्रम करता तो किर्र-किर्र, चीं-चीं करती आक्रामक अंदाज में मेरे सिर के आसपास चक्कर काटती थी। एक दिन वहाँ थोड़ा रुककर अण्डों का जायजा लेने लगा तो उसने सिर के पीछे चोंच मार दी। संतान की रक्षा में कोई भी माँ आक्रामक हो उठती है।

         तीसरे सप्ताह सुबह देखा कि बुलबुल अंडे पर नहीं है। उझककर झाँका तो तीन बच्चे दिखे। मांस के छोटे लोथड़े-से शिथिल और गुलाबी। पूरे शरीर में सिर का आकार सबसे बड़ा। नंदू और निक्की भी जन्म के समय  ऐसे ही गुलाबी और कोमल थे। उन बच्चों को देखकर अपने दोनों बच्चे याद आ गये। उस दिन से रोज सबसे पहले बच्चों की एक तस्वीर लेने लगा। गुलाबी रंग पर हर दिन चढ़ती जाती कालिमा! कालिमा में से कोंपलों की तरह फूटते पंख! अद्भुत! अनोखा दृश्य! काश, मैं चित्रकार या कि कवि होता!…

         अंडे से बाहर आने के छठे-सातवें दिन ऐसा लगा कि तीन-चार दिनों में बच्चे उड़ जाएँगे। बढ़ते बच्चों का पेट भरने को माँ दिनभर अथक परिश्रम कर रही थी। मैं जानता था कि बुलबुल पूर्णतः शाकाहारी चिड़िया है। पहली बार फुलवारी में उड़ते कीड़ों का शिकार करके बच्चों को खिलाते देखा। शायद बच्चों की तेज बढ़वार के लिये जरूरी अतिरिक्त प्रोटीन के लिए कीड़ा खिलाने की मज़बूरी होगी। अथवा बुलबुल की यह प्रजाति, फल, फूल आदि के आलावा कीड़े-मकोड़े भी खाती है?… बाप यहाँ भी कामचोरी कर रहा था। क्या कोई अपवाद नहीं है इस नियम का? घोंसला बनाने, अंडे सेने और अब खिलाने तक बाप को कटा-कटा ही देखा, जैसे महज औपचारिकता निभाई जा रही हो। उन्हें देखना और उनपर विमर्श करना हमारे टाइमपास का साधन हो गया था इस दूसरी लहर के लॉकडाउन में। सुधा कहतीं, “देखते हैं? दुनिया के सारे मर्द एक जैसे ही होते हैं!” मैं निःशब्द!…

         चार दिन हुए, सुबह बरामदे में योग करने बैठा तो सामने फुलवारी में एक महोखा दिख गया। खतरे का आभास होते ही मैं उठ गया और उस दुष्ट पक्षी को हड़काया। हरामखोर!… दिनभर मेंढक, छिपकली, गोजर, बिच्छा खोजकर खाने वाला यह पक्षी निरीह परिंदों के बच्चों को क्यों खा जाता है! योग करके उठा तो दूसरे पापी की आवाज फुलवारी से आयी। महालत या टकाचोर! पता नहीं, इसका नाम टकाचोर क्यों पड़ा? ‘बच्चाचोर’ होना चाहिए था। मेरा माथा ठनका! जाकर घोंसले में देखा। यह क्या…दो ही बच्चे?… महोखा ले गया या यह बच्चाचोर? बहुत गुस्सा आया। बाबूजी की निशानी ऐतिहासिक लाइसेंसी शॉटगन मेरे पास है। बारह बोर की दुनाली,बत्तीस इंच बैरेल, मेड इन बेल्जियम।  है तो मेरे पास, पर खानदानी अमानत की तरह। पूरा परिवार उसे ‘बाबूजी की बन्दूक’ कहता है। बाबूजी ने इससे बाघ, भैंसा, हिरन, सुअर, मगरमच्छ, घड़ियाल सब का शिकार किया था। दसेक साल पहले तक शिकार करके खूब पाप कमाया है मैंने भी।… खानदानी शौक! हजारों दुर्लभ प्रजाति के जानवरों और परिंदों का हत्यारा हमारा खानदान!… निरीह बुलबुल के बच्चों के हत्यारे को मार डालने का मन हुआ। वह घोंसले के पास वाले आम की फुनगी पर बैठा इधर ही देख रहा था। एक शॉट… ‘ट्रठांय’…और खेला ख़त्म! मैं बन्दूक निकालने गया। सुधा ने टोक दिया, “किसे मारने जा रहे हैं? पक्का कैसे करेंगे कि यही है हत्यारा? और एक-दो ही हो तब न! कितनों को मारेंगे? गलती हमारी है। इससे बेहतर है कि हम दिनभर इनकी रखवाली करें। तीन-चार दिनों की तो बात है; उड़ जाएँगे।” यही निश्चय हुआ। हम रखवाली करेंगे। नीचे आवाज लगाकर बासुकी और मनोज को हिदायत दी कि चौकन्ना रहकर बच्चों की हिफाजत करें। पर हाय रे दिन में सोने की हमारी लत! आज बहुत महँगी पड़ गयी! नीचे दोनों लड़के और ऊपरी तल्ले में हम दोनों खाना खाकर थोड़ी देर के लिए सो गये। संकल्प पर नींद भारी पड़ गयी! एक घंटे बाद नींद खुली तो आशंकित होकर घोंसले की ओर दौड़ा। देखकर सन्न रह गया! घोंसला खाली था! जान नहीं सका कि बच्चे उन दोनों में से किसके शिकार हो गये या फिर उन्हें बाज ले गया अथवा चील? सामने आम की टहनियों पर बच्चों की  माँ शोर मचाती चक्कर लगा रही थी जो इस बात की सूचना थी कि बस अभी… थोड़ी देर पहले ही… बुलबुल के इस परिवार पर कहर बरपा है!…’जीवं जीवस्य भोजनम्’!

         लॉकडाउन के इस बिपत काल में आशा का संचार करने वाला हमारा जीवंत खिलौना खो गया!  आग लगती है तो चारों ओर से हवाएँ चलने लगती हैं। लंका में हनुमान द्वारा लगाई गयी आग के प्रसंग में तुलसी बाबा ने सच ही लिखा है, ‘पवन बहे उनचास!’

           हम फिर मौत के खौफ में डूब गये हैं इस पछतावे के साथ कि यदि दो-चार रोज दिन में नहीं ही सोते तो क्या बिगड़ जाता? यह नींद जरूरत की नींद नहीं, ऐयाशी थी!… पर ‘थेथर मन’ तसल्ली देता है कि बच्चे यदि परभक्षियों से बच भी जाते तो ठीक उसी शाम को आये प्रलयंकारी तूफान की भेंट अवश्य चढ़ जाते, अपनी माँ के साथ! माँ-बाप जिन्दा हैं। फिर नवजीवन का उत्सव होगा! मौत के बीच भी जिंदगी सलामत रहेगी!…

पवन कुमार सिंह

जन्मदिन 1:2:1957
कुर्सेला(कटिहार) मध्यवित्त किसान परिवार
स्कूली शिक्षा–ए पी हायर सेकेंडरी स्कूल, कुर्सेला।
ग्रेजुएशन-टीएनबी कॉलेज भागलपुर
एमए+पीएचडी-भागलपुर विवि भागलपुर
सम्प्रति–एसोसिएट प्रोफेसर,
हिन्दी विभाग, एसएसवी कॉलेज, कहलगाँव, भागलपुर
813203
मोबाइल नंबर–9431250382
khdrpawanks@rediffmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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GIRIJESH KUMAR SINGH
GIRIJESH KUMAR SINGH
3 years ago

Lajwab

डॉ आशुतोष कुमार दत्ता
डॉ आशुतोष कुमार दत्ता
3 years ago

हमेशा की तरह बेहतरीन रचना … हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं । कहानी का प्रत्येक पात्र और घटना की एक अलग पहचान थी जो बिल्कुल मेल नहीं खाता ।प्रत्येक छोर खुले के खुले रह गए और हर घटना का संबंध जोड़ने में चिंतनशील हूं । आपकी लेखनी को पढ़कर अपनापन महसूस करता हूं। और सहजता पूर्वक एक ही सांस में पूरे आलेख को पढ़ जाता हूं।

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