कहानी

चाचा टेरी विलियम का स्युसाइड

 

“फॉरगिव मी माय गॉड!”…’धाँय’…साहब के जोर से चिल्लाने और बन्दूक चलने की आवाज सुनकर बॉडीगार्ड गोरख सिंह के होश फाख्ता हो गये। वह पलभर में सबकुछ समझ गया। इसी हादसे को रोकने के लिए कलक्टर साहब ने उसे सुखदेव पासवान के साथ टेरी साहब के घर पर तैनात किया था। दोनों गार्डों को सख्त हिदायत थी कि उस बूढ़े अंग्रेज साहब को एक मिनट के लिए भी अकेला नहीं छोड़े। चौबीसों घंटे उसपर नजर रखनी थी बारी-बारी। अब बाथरूम में रखवाली कैसे की जा सकती है भला! विगत एक महीने से पूरी मुश्तैदी से दोनों गार्ड कलक्टर साहब के हुकुम का पालन कर रहे थे, नींद और चैन त्याग कर। केवल गुशलखाने में साहब नज़रों से ओझल होते थे। पर आज वही हो गया जिसका अंदेशा कलक्टर साहब को था।

गोरख सर्वेंट क्वार्टर की ओर मुखातिब होकर चिल्लाया, “हो सुखदेव भाई दौड़ो, हो, जुलुम हो गिया।”

सुखदेव लुंगी सँभालते कोठी की तरफ भागा। कुत्ते विचित्र किस्म से बेचैन होकर ‘भौं-भौं’ करने लगे। बन्दूक की आवाज और शोरगुल सुनकर लक्खी ड्राइवर, शिबू माली, इक़बाल खानसामा और सेवक धनेश सभी बाथरूम के आगे इकट्ठे हो गये। सबके चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। सभी को पूरा माजरा समझ में आ गया था। बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद था। रोशनदान से ट्यूबलाइट की रोशनी बरामदे की छत पर आ रही थी। अन्दर डरावना सन्नाटा था। गोरख सिंह ने दरवाजा तोड़ने को धक्का दिया। सखुआ का फाटक हिला भी नहीं। फिर सुखदेव, लक्खी, शिबू और गोरख ने एक साथ आवाज देकर धक्का मारा। दो-तीन धक्कों में फाटक की छिटकनी टूट गयी। अंदर टेरी साहब खून से लथपथ औंधे फर्श पर पड़े थे। गर्दन बायीं ओर घूमी हुई थी। उनकी पसंदीदा 9एमएम पिस्तौल सिर के पास पड़ी थी। दाहिना हाथ सिर की ओर और बायाँ कमर के पास मुड़ा हुआ था। तबतक गिरजाघर के पादरी फादर थॉमस मैथ्यू भी वहाँ पहुँच गये। उनके मुँह से निकला, “ओ माय गॉड! इट्स हॅारिबल!” उधर कुत्ते इतना शोर मचाये हुए थे कि किसी को किसी की फुसफुसाहट सुनाई नहीं दे रही थी। सभी मूर्तिवत खड़े थे; विस्फारित नेत्र और होठों में बुदबुदाहट। केवल एक कुतिया पुस्सी खुली थी जो टेरी साहब के चारों ओर बेचैनी से चक्कर काटती और उनका मुँह सूँघती ‘कूँ-कूँ’ किये जा रही थी।

पादरी ने टेरी साहब की नब्ज टटोली फिर नाक से उंगलियाँ सटाकर तसल्ली की। “थैंक गॉड, ही इज अलाइव! लक्खी गाड़ी निकालो। आओ सब मिलकर साहब को उठाओ। हॉस्पिटल ले चलो। क्विक-क्विक, जल्दी!”

डेढ़ क्विंटल भारी शरीर को सावधानी से पलटने और उठाकर मिनी ट्रक तक पहुँचाने में पाँचों लस्त-पस्त हो गये। पुस्सी उछलकर कमर भर ऊँचे ट्रक पर सवार हो जाना चाह रही थी। धनेश उसे गोद में उठाकर सहलाने-पुचकारने लगा। पादरी और धनेश के सिवा सभी ट्रक पर सवार हो गये, बूढ़ी मारिया भी लक्खी के बगल वाली सीट पर बैठ गयी। उसकी आँखों से आँसू की धारा फूट रही थी जिसे वह पोंछने का प्रयास भी नहीं कर रही थी… “ओ माय गॉड, शेव योर चाइल्ड लॉर्ड! लक्खी, गाड़ी तेज चलाओ ना, और…और तेज!”

उधर कोठी पर पादरी पुलिस को फोन मिला रहे थे… “हेलो पुलिस…हेलो … हम विलियम हाउस से बोल रहा हूँ…हाँ … यस मिस्टर विलियम हैज कमिटेड स्युसाइड… यस-यस राइट… जस्ट नाउ…हॉस्पिटल लेकर गया है…हाँ-हाँ ठीक सुना।”

फिर उन्होंने टेलीफोन एक्सचेंज को फोन लगाकर कुर्सेला इस्टेट के लिए ट्रंक कॉल बुक किया। बुदबुदाते हुए बोले “साहब के सभी फ्रेंड्स को खबर करना होगा, जल्दी।”

उधर सभी कुत्ते अपने कमरे में लगातार भौंके जा रहे थे। बाहर पाये से बंधा बुलडॉग बाबर चेन तोड़ डालने को उद्धत था। फादर थॉमस ने धनेश को पुकारा, “ओय धनेश, सँभालो कुत्तों को। बुलाओ ट्रेनर को। चुप कराओ सबको।”

कुर्सेला इस्टेट को ट्रंक कॉल कनेक्ट हो गया। फादर मैथ्यू लपके। “हाँ हेल्लो, अखिलेश साहब, हाँ हम विलियम हाउस से, फादर मैथ्यू …यस, यस। बहुत बैड न्यूज है इधर का। मिस्टर विलियम ने स्युसाइड कर लिया है। हॉस्पिटल में है। बाई द ग्रेस ऑफ़ गॉड, ही इज अलाइव। प्लीज आप सभी फ्रेंड्स को फोन कर दीजिए और जल्दी से इधर आ जाइए।”

अस्पताल में टेरी साहब की केवल साँसें चल रही थीं। उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया जा चुका था। शक्तिशाली 9एमएम की गोली निचले जबड़े के बीचोंबीच से खोपड़ी फाड़ते हुए छत में दो इंच अन्दर धँस गयी थी। बेड पर बेहोश पड़े टेरी साहब के एक हाथ में खून और दूसरे में स्लाइन चल रहा था। नाक-मुँह में ऑक्सिजन मास्क लगा था। आश्चर्यजनक रूप से दोनों आँखें खुली और जीवंत थीं। जैसे किसी ख़ास बिंदु को एकटक देख रही हों।आठ घंटे इसी हाल में साँसें चलती रहीं उनकी। इस बीच एक-एक करके सौ-पचास मील पर रहने वाले दर्जनों मित्र हॉस्पिटल पहुँच गये। कुर्सेला से अखिलेश बाबू के साथ मेरे बाबूजी भी आकर मिल लिये। जिगरी यारों ने उस हाल पर भी चुटकी ली थी बाद में, “स्साला मरकर भी बकर-बकर ताकता था कैसे! लगा कि मुझे घूर रहा है। जैसे मैंने ही उसे टैक्स लगवा दिया था…बापरे, वे गुर्राती आँखें!”

हाँ ठीक समझा। टैक्स के कारण टेरी साहब ने ख़ुदकुशी कर ली। साल भर पहले इनकम टैक्स की टीम ने उनकी सम्पत्ति का आकलन करके ढाई लाख रुपये सालाना का टैक्स थोप दिया था। टेरी अपनी 505 बोर गन की तरह गरज उठे थे। “नो-नो, नेवर। कौन बात का टैक्स? हाउ एंड ह्वाई?  प्रोपर्टी हमारे बाप का है। फैक्ट्रीज हमारा-खून-पसीना से चलते हैं, तब हमारे पास पैसा है। आई विल नॉट गिव एनी टैक्स टू एनी बॉडी। ब्लडी टैक्स लेना है तो निकम्मे लोगों से लो, जो बैठकर खाता है। जो मेहनत से पैसा और जॉब कल्टीवेट करता है, उसको इंसेंटिव दो। ब्लडी फूल! स्साला लॉ बनाने वाला। ये कंट्री के एनिमी हैं स्साले!”

साल भर केस लड़कर हार गये थे साहब। कोर्ट ने जिला कलक्टर को टैक्स वसूलने का जिम्मा सौंपा था। कलक्टर एक महीना पहले कोठी पर आकर अंग्रेज साहब से मिले थे और टैक्स जमा करने का आदेश थमा दिया था। कसमसाकर रह गये थे टेरी विलियम। गुर्राकर कलक्टर को कहा था– “ आई विल शूट माइसेल्फ़… शैल नॉट गिव अ पेन्नी टू द गवर्नमेंट। मेरे स्युसाइड का जवाबदारी इस सिस्टम और कानून का बनेगा।”

कलक्टर ने उसी दिन दो बॉडीगार्ड्स को विलियम साहब की रखवाली में लगा दिया था, इस सख्त हिदायत के साथ कि उन्हें आत्महत्या का मौका न मिले। तबसे गोरख सिंह और सुखदेव पासवान चौबीसों घंटे मुस्तैदी से साहब की रखवाली कर रहे थे। साहब डाँटकर भगाना भी चाहते तो वे हँसकर टाल जाते थे। अपनी सेवा और आज्ञाकारिता से दोनों ने साहब के दिल में ख़ास जगह बना ली थी। इस एक महीने के दरम्यान टेरी विलियम के व्यवहार और दिनचर्या में नोटिस करने लायक कुछ भी असामान्य नहीं था। सिवा इसके कि कोठी के माहौल में हरदम एक डरावनी चुप्पी गूँजती थी, जो कभी-कभार कुत्तों के भौंकने से टूटती थी। एक बात जरूर कि साहब शहर से बाहर नहीं निकलने लगे थे, दोस्तों से मिलने भी नहीं। हाँ, इधर तीन-चार दिनों से अपने स्टडी टेबुल पर लगातार कुछ लिखा-पढ़ी कर रहे थे। आज भी सबकुछ नॉर्मल था। सुबह साहब ने रोज की तरह नाश्ता किया, फिर स्टडी टेबुल पर रखे कुछ कागजात व्यवस्थित करके पेपरवेट से दबा दिया और बाथरूम में घुस गये, फिर बन्दूक चलने की आवाज आयी।

कंठ से खोपड़ी तक आरपार छेद होने के बावजूद आठ घंटे साँस चलते रहने से डॉक्टर भी अचंभित थे। अंततः आधे दर्जन जिगरी यारों की मौजूदगी में उस यारबाज अंग्रेज साहब ने पचहत्तर साल की उम्र में अंतिम साँस ली। पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया। छत में धँसी गोली निकाली गयी। पुलिस ने उनके बेडरूम और स्टडी रूम की सघन छानबीन की। स्टडी टेबुल पर स्टाम्प पेपर में लिखा विस्तृत वसीयतनामा मिला; बिल्कुल ही ठंडे दिमाग से सोच-समझकर लिखी गयी वसीयत थी वह। तिनका-तिनका धन का अपने मनोनुकूल बँटवारा!

बिहार की दोनों पेपर मिलें इंग्लैण्ड जा बसी दो बहनों के नाम। गिरजाघर सहित कोठी और एक जीप पादरी फादर मैथ्यू के नाम। मर्सडीज कार और अपना पसंदीदा भान लक्खी ड्राइवर के नाम। फार्म हाउस की जमीन धाय माँ मारिया, खानसामा इक़बाल, माली शिबू और सेवक धनेश के नाम बराबर-बराबर। अपना लाखों का बैंक बैलेंस उन्होंने अपने नौ कुत्तों के लिए ट्रस्ट बनाकर सौंप दिया था। जबतक कुत्ते जीयें, उनका पालन-पोषण किया जाए। कुत्तों के ट्रेनर और केयर टेकर के वेतन का इंतजाम उसी पूंजी से होना था। कुत्तों की मौत के बाद बचे पैसों को वन्यजीवन संरक्षण के काम में लगाये जाने का निर्देश था वसीयत में।

टेरी विलियम एंग्लोइंडियन नहीं, निखालिस अंग्रेज थे। भारत की आजादी के बाद उन्होंने इंग्लैण्ड जाने से साफ मना कर दिया था। परिवार के सभी सदस्य अपने देश चले गये थे। किन्तु टेरी चाचा ने ग्रेट ब्रिटेन को अपना देश मानने से इन्कार कर दिया था। “नो, नो… एब्सोल्युटली नॉट! ब्रिटेन इज नॉट माई कंट्री। ह्वाई शुड आई गो देयर? इंडिया इज माई कंट्री। यहीं बर्थ हुआ, यहीं डेथ भी होगा। इसी गिरजा के पीछू दफ़न होना है हमको!”

         इंग्लैण्ड जाते हुए परिजनों को उन्होंने आश्वस्त किया था कि दोस्तों के साथ वे मजे से जी लेंगे। केवल माँ और उनकी सेविका अंग्रेज सहेली उनके साथ रह गयी थीं। ममा आजादी के दस साल बाद तक ज़िन्दा रहीं। डैडी बच्चों के जवान होने से पहले कार दुर्घटना में मारे गये थे। दो छोटी बहनें थीं। दोनों ने बाद में अपनी पसंद के अंग्रेज लड़के से शादी की थी।

इन माँ-बेटे का रिश्ता अनोखा था। ऐसी मातृभक्ति का कोई अन्य उदाहरण इतिहास और पुराणों में भी नहीं है। डैडी की असामयिक मौत के बाद ममा भयंकर अवसाद की गिरफ्त में चली गयी थीं। उसी दौर में उनके कजिन फैमिली में एक विधवा वृद्धा को ओल्डएज होम में जाने की नौबत आन पड़ी थी। इस घटना का बहुत गहरा असर उनके दिलोदिमाग पर हुआ था। उनके मन में यह डर पत्थर की लकीर जैसा बैठ गया कि बुढ़ापे अथवा लाचारी में उनके बच्चे भी उन्हें त्याग देंगे। किशोर वय की उनकी तीनों संतानें जी जान से उनकी देखभाल करतीं; उनकी भावनाएँ आहत न हों, इसका भरपूर ख्याल रखा जाता, पर उनका डर पीछा नहीं छोड़ता था। आपसी बातचीत में वे गाहे-बगाहे आशंका प्रकट करके अपने बच्चों की जैसे परीक्षा लेती रहतीं कि वे उन्हें कितना प्यार करते हैं? विशेष अग्निपरीक्षा बेटे विलियम की होती थी। ममा खुद ही तर्क देतीं कि बेटियाँ तो अपने-अपने घर चली जाएँगी। उनकी जिम्मेदारी उनके अपने परिवार की होगी। किन्तु उन्हें तो अपने बेटे के साथ रहना होगा। वह प्यार तो खूब करता है। पर कबतक? जबतक बैचलर है तबतक। मैरेज के बाद वाइफ की बात सुनेगा और मानेगा। यह तो बट नेचुरल है। टेरी के डैडी भी तो उनकी सभी बातें मानते थे। अपने दाम्पत्य का अतीत उनकी आशंकाओं को मजबूत करता था। वे बेटे को बार-बार बोल जातीं कि ब्याह के बाद वह ममा को प्यार नहीं करेगा। एक बार बोलतीं तो तीन-चार दिनों तक बेटा गुमशुम और उदास रहता। बहनें सांत्वना देतीं तो विलियम की आवाज तल्ख़ व व्यवहार सख्त हो जाता। धीरे-धीरे गाँठ बड़ी होती जा रही थी।

माँ की देखभाल के कारण तीनों बच्चों की पढ़ाई अधूरी रह गयी थी। हायर सेकेंडरी के बाद वे यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं ले सके थे। विलियम के दोस्त तो बहुत थे, पर गर्लफ्रेंड कोई नहीं थी। दोस्तों में से अधिकांश उनके डैडी के दोस्तों के बच्चे थे जो राजा-जमींदारों के परिवार से थे। कुछ दोस्त स्कूल में भी बने थे।इस तरह युवावस्था में ही विलियम मित्रधन से सम्पन्न हो गये थे।

अनन्य मातृभक्त विलियम भावुक भी बहुत थे। भावनाओं के उफान में एक दिन उन्होंने जीसस को छूकर भीष्म प्रतिज्ञा कर ली। अपनी जान ममा को आश्वस्त करते हुए उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का वचन दे दिया। इससे भी मन नहीं भरा तो ब्रह्मचर्य का प्रण ले लिया। “टिल द लास्ट ब्रेथ, नो फिजिकल रिलेशन विथ एनी पर्सन।” इस मार्मिक घटना के बाद ममा खुश और निश्चिन्त हो गयी थीं। उनके अन्दर का असुरक्षाबोध विलुप्तप्राय हो गया था। अब ममा वैसे जीने लगी थीं, जैसा विलियम को भाता था। बेटे के शौक उन्हें भी अच्छे लगते थे। यारबाजी, शिकार और देशाटन में विलियम का मन रमता था। ममा उन्हें अपनी हॉबी इंजॉय करने को प्रेरित करती थीं। यहाँ तक कि फार्महाउस और पेपर मिलों की देखरेख से भी उन्होंने बेटेको मुक्त कर दिया था।

         कुर्सेला इस्टेट के बड़े, मँझले और छोटे कुँवर, मेरे बाबूजी और शमी खाँ उनकी स्थाई मित्रमंडली में शामिल थे। दरभंगा रियासत के कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह, बनैली इस्टेट के कुमार श्यामानंद सिंह, पूर्णिया के जमींदार राजा पीसी लाल, बिशनपुर इस्टेट के मोल चंद बाबू, डुमरिया इस्टेट के शत्रुमर्दन शाही, भागलपुर के स्नेहेश सिन्हा आदि उनके गहरे दोस्त थे।

उनका कुर्सेला आगमन साल में चार छः बार जरूर हो जाता था। हरबार वे हमारे घर आते थे। हम उन्हें टेरी चाचा बुलाते थे। एक दिन गरम दूध पीते हुए मेरे मुँह से ‘सुर्र-सुर्र’ की आवाज सुनकर उन्होंने मुझे चाय की सिप लेना सिखाया था।

ममा की मृत्यु के बाद विलियम को कुत्ता पालने का शगल लगा था, खूब धूमधाम से। इसके पहले भी एकाध शिकारी कुत्ता पालते रहे थे, पर बाद में यह शौक नशा बन गया। उनके पास गोद में फुदकने वाली कुतिया से लेकर मेनगेट के ग्रिल के ऊपर थूथन रखकर सुस्ताने वाले भीमकाय कुत्तों तक की नौ प्रजातियाँ थीं। उन कुत्तों के लिए ट्रेनर और नौकर अलग से नियुक्त थे। सभी कुत्तों की पसन्द का खाना खानसामा इक़बाल के सहयोग से बनता था। गोद वाली पुस्सी और एक देसी सफ़ेद कुत्ता चौबीसों घंटे विलियम के साथ रहता था। इन दोनों के अलावा बुलडॉग, लेब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, गोल्डन रिट्रीवर, रॉटविलर, ब्लडहाउंड और माउन्टेनडॉग था। टेरी चाचा को अपना देसी ‘ब्रावो’ सबसे अधिक पसंद था। वे कहते, “इससे इंटेलिजेंट, ब्रेव, वफ़ादार और हार्डी कोई और कुत्ता नहीं होता।”

मँझले साहब चुटकी लेते, “स्साले को देसी कुत्ते से मुहब्बत है, तभी तो यहीं बस गया।” टेरी चाचा ‘हा-हा-हा’ करके भभाकर हँस देते।

         वे जाड़े के दिनों में प्रवासी पक्षियों के शिकार के मौसम में कुर्सेला अधिक आते थे। मेरे बाबूजी साढ़े छः फुट लम्बे थे और वे उनसे भी लम्बे। जवानी में दोहरे वदन के स्मार्ट फिगर के थे, किन्तुबुढ़ापे में डेढ़ क्विंटल से भी ज्यादा वजन हो गया था उनका। दुधिया गोरा भीमकाय शरीर। बाघ जैसे बड़े जबड़े के नीचे लटकता मांस मेंढक के समान हिलता रहता था। कमर के पास की गोलाई इतनी अधिक कि कारों और जीपों का स्टीयरिंग व्हील पेट में एक बित्ता अंदर धँस जाता था। उन्होंने स्वयं चलाने के लिए एक बड़ा भान इंग्लैंड से मंगवाया था, जिसका स्टीयरिंग सीधा खड़ा था। अन्य गाड़ियों में चलते तो लक्खी थापा ड्राइव करता था। वे हाफ पैंट और हाफ शर्ट पहनना अधिक पसंद करते थे। पैंट घुटनों तक, जिसके नीचे से उनका ओवरसाइज सफ़ेद अंडरवेयर ताक-झाँक करता रहता। पेटी भर-भरकर कारतूस लाते थे और अंधाधुंध फायर करके धुआँ-धुआँ कर डालते थे। हम जूनियर शिकारी यदि माँग लेते तो अंजुरी भर-भर शॉटगन के कारतूस दे देते थे, सारे विदेशी कारतूस होते थे। वे इंडियन कारतूस से नफरत करते थे। “नॉट रिलायबल एटऑल।”

टेरी चाचा के शिकारी जीवन से जुड़े दो रोमांचक किस्से बाबूजी लोगों की जुबानी सुनी थीं हमने। दोनों बार वे अकेले शिकार पर गये थे। आजादी के पहले अपनी युवावस्था में एक दिन मोरंग के जंगल में तीतर, बनमुर्गा या खरहा के शिकार के फ़िराक में भटक रहे थे। उनकी कमर की पेटी में चेन से बंधा जर्मन एस पॉइंटर नस्ल का मजबूत शिकारी कुत्ता ‘टाइगर’ साथ चल रहा था। उनके हाथ में शॉटगन और होलस्टर में पिस्तौल थी। घने जंगल के अन्दर कुछ साफ स्थान पर सामने से एक भालू का बच्चा भागता दिख गया। टाइगर ने आक्रामक मुद्रा में उद्धत होकर आदेश मिलने की प्रत्याशा में मालिक की ओर देखा। जल्दबाजी में मालिक से बेसिक चूक हो गयी। बिना चेन खोले उन्होंने कुत्ते को ऑर्डर दे दिया। टाइगर जोरदार झपाटे के साथ भालू के बच्चे की ओर दौड़ गया। मास्टर जबतक चेतते तबतक झटका खाकर धड़ाम से गिर पड़े। उनके मुँह से चीख निकल गयी। रुकने का आदेश देने से पहले कुत्ते ने उन्हें कुछ कदमों तक घसीट लिया। टेरी चाचा को पीठ और कमर में खासी चोट आयी थी। लगभग एक महीने बिछावन पर रहना पड़ गया था।

उसी दौर में एक बार गर्मी के मौसम में वे अपनी जीप से अकेले कलिम्पोंग जा रहे थे। शाम होने वाली थी। सिलीगुड़ी से कुछ दूर आगे पहाड़ी रास्ते में गाड़ी ख़राब हो गयी। बोनट उठाकर उन्होंने कुछ ठोक-पीट की, पर कुछ फायदा नहीं हुआ। अँधेरा और सुनसान होने के कारण सहायता मिलने की कोई सम्भावना नहीं थी।मन मारकर उन्होंने वहीं रात काटने का फैसला किया। थर्मस में चाय तथा बास्केट में ब्रांडी की एक बोतल, टोस्ट और कुछ फल थे। साथ में .22 बोर की राइफल और पिस्तौल थी। शिकार में इस्तेमाल होने वाली इस  जीप के बोनट पर स्टैंड के साथ बैटरी चालित सर्चलाइट फिट था। चाय-सिगरेट पीते कुछ रात बीती तो उन्होंने जिज्ञासावश सर्चलाइट जलाकर चारों दिशाओं का मुआयना शुरू किया। दाहिनी ओर सड़क के पार लगभग सौ मीटर पर एक छोटा झरना बह रहा था। झरने के इर्दगिर्द रोशनी फोकस करके उन्होंने सघन पड़ताल शुरू की तो आशानुरूप परिणाम मिल गया। शिकारी होने के नाते उन्हें वन्य जीवन की गहरी जानकारी थी। मांसाहारी जानवरों की आँखों पर अँधेरे में रोशनी पड़ने से तेज प्रत्यावर्तन होता है; ऑंखें जलती हुई-सी प्रतीत होती हैं। झरने के पास उन्हें एक जोड़ी आँखें बल्ब जैसी जलती दिखीं। उनका शिकारी मन सजग, सतर्क और सक्रिय हो गया। उन्होंने स्पॉटलाइट फिक्स करके राइफल उठा ली। जीप के बोनट पर बैरेल टिकाकर दोनों जलती आँखों के बीचोंबीच निशाना साधा और फायर कर दिया—‘चटाक’।  .22 का कारतूस दवाई की बड़ी केप्सूल के समान छोटा होता है, सो फायर होने पर अन्य बंदूकों की तरह धमाका नहीं होता, बल्कि थपड़ी जैसी आवाज निकलती है, किन्तु 500 गज का कारगर रेंज होता है उसका। फायर होने पर दोनों जलती आँखें बुझ गयीं और शांति छा गयी। कुछ मिनटों के बाद उन्होंने फिर सर्चलाइट ऑन की। इधर-उधर घुमाने की जरूरत नहीं थी। उसी जगह फिर दो ऑंखें चमकीं; पुनः ‘चटाक’। फिर ऑंखें गायब। अब उन्हें कौतुक के साथ रात काटने का अच्छा साधन मिल गया था। नींद आने का तो सवाल ही नहीं था। इसी प्रकार कुछ-कुछ अंतराल पर उन्होंने इक्कीस प्रयास करके फायर किये थे। दो-ढाई बजे रात के बाद आँखों का जलना बंद हो गया तब उन्होंने गाड़ी के अन्दर लेटकर एक झपकी ली। उजाला फूटने और चिड़ियों के चहचहाने पर वे उठे और अविलम्ब अपने दोनों हथियार सँभाले झरने की ओर झपटे। थोड़ा ही आगे जाने पर स्थिति स्पष्ट हो गयी। झरने के किनारे लगभग बीसेक फुट की गोलाई में मांसाहारी प्रजाति के कई जानवरों की लाशें बिखरी पड़ी थीं। चार बाघ, तीन तेंदुए, एक जैगुआर, पाँच लकड़बग्घे, दो बनबिलाव और तीन गीदड़ वहाँ मरे पाये गये। इक्कीस में से अठारह निशाने सटीक बैठे थे। सभी जानवरों के माथे या गर्दन में गोली लगी थी। उन्हें छटपटाने का भी मौका नहीं मिला था। घायल अथवा दूर जाकर मरे जानवर की खोज की गयी, किन्तु खून की कुछ बूंदों के सिवा कुछ नहीं मिला। उस दिन टेरी विलियम ट्रक पर सभी जानवरों की लाशें लदवाकर पूर्णिया लौटे थे। अगले दिन सभी शिकारी दोस्तों को बुलाकर बड़ी पार्टी दी थी।

हमारे गाँव के पास कोसी के कोल-ढाबों, बंडाल या गाइडबाँध में शिकार होता तो हमें भी तमाशा देखने का मौका मिल जाता था। उनके पास सात-आठ विभिन्न बोर की बंदूकें थीं। चिड़ियों के शिकार के लिए पाँच गोलियाँ लोड होने वाली एकनाली मेड इन ग्रेट ब्रिटेन ऑटोमेटिक 12 बोर शॉटगन थी। प्रायः उड़ती चिड़ियों का शिकार करते। लगातार धाँय-धाँय, जबतक शिकार गिर न जाय। यदि शिकार पानी में गिर जाता तो ब्रावो पलक झपकते कूद जाता और तैरकर पकड़ लाता। शिकार के दौरान पुस्सी गाड़ी में बैठी रहती और अधिक देर होने पर हॉर्न बजाकर बुलाती थी।

टेरी चाचा अपने दोस्तों के साथ बैठकर चाय-कॉफी पी रहे होते तो ब्रावो उनकी कुर्सी के बगल में बैठा उनकी ओर एकटक देखता रहता। हम बच्चों के कौतुक के लिए वे ब्रावो की नाक पर बिस्कुट रख देते और वह स्टेच्यु बना मालिक के आदेश का इंतजार करता। कुछ देर बाद चाचा अंग्रेजी में कुछ बुदबुदाते कि बिजली की गति से ब्रावो बिस्कुट को हवा में उछाल देता और मुँह में लपक लेता। हम बच्चे खुश होकर तालियाँ बजाते और चाचा हमें आनंदित होते देख प्रफुल्लित हो जाते।

पूर्णिया के रंगभूमि मैदान के पास चाचा टेरी विलियम की भव्य कोठी थी। ऊँची मजबूत चारदीवारी से घिरी एक एकड़ से अधिक जमीन के बीचोंबीच आवास, जिसके चारों ओर विस्तृत कोरिडोर की दीवारों और खम्भों में उनके शिकार किये हुए विभिन्न जंगली जानवरों के सिर और सींग कतार में सजे थे। पश्चिमोत्तर कोने में गिरजाघर सहित पादरी का फ़्लैट, दक्षिण-पश्चिम कोने में सर्वेंट क्वार्टर और पूर्वोत्तर कोने में मोटर गैराज था। गैराज के पार्श्व में एक छोटा तालाब था। सामने की खाली जमीन में फुलवारी थी और पीछे मौसमी सब्जियाँ उगायी जाती थीं। उनकी फुलवारी में गुलाबों की प्रमुखता थी। जाड़े के मौसम में मौसमी फूल लगवाते, जिसमें गेंदे की प्रधानता होती थी। पादरी थॉमस मैथ्यू उनके वेतनभोगी निजी मुलाजिम की तरह थे और गिरजाघर भी निजी खर्च से संचालित था। कैथोलिक सम्प्रदाय के उस चर्च में आम ईसाइयों को प्रार्थना में शामिल होने की सुविधा नहीं थी। केवल रिश्तेदार और मित्रवर्ग के ईसाई लोग टेरी विलियम के साथ प्रेयर कर सकते थे। सहरसा में उनकी दो पेपर फैक्ट्रियाँ थी। पूर्णियाशहर से पाँच मील दूर एनएच के पास उनका पच्चीस एकड़ का फार्म हाउस था, जहाँ तालाब, बत्तख, मुर्गी, सुअर, बकरी, गाय सहित आम बागान भी था। वहाँ भी एक छोटा-सा फ़्लैट था। खेती और पशुपालन बटाईदारी पर होता था। दोस्तों के साथ जब भी वहाँ एक-दो सप्ताह का कैम्प लगता तो नौकर-खानसामा कोठी से लेकर जाते थे।

यारबाजी में शाहखर्च होते हुए भी टेरी चाचा कुछ मामलों में बहुत मितव्ययी थे। उन्हें कभी-कभी कंजूसी की सनक चढ़ जाती थी। मसलन खाने के टेबुल पर बैठने के समय इक़बाल से पूछ दिया, “इक़बाल दही है?”

“सॉरी सर। नहीं जमाया है आज।”

“नो प्रॉब्लम। लक्खी, गाड़ी निकालो। दही खरीदने चलो।” तमाम सेवकों के मौजूद रहते भोजन मुल्तवी करके खुद दही लाने मार्केट चल देते।

एक पहलू यह था कि परोपकार और चैरिटी के मामलों में वे उतने ही उदार थे। अपनी नजर में जिसे जरूरतमंद समझते, उसे पैसे से मदद करते थे। हाँ, मांगने वालों से उन्हें चिढ़ थी। डाँट देते, बहुत जोर से—“ब्लडी फूल, निकम्मा! काम क्यों नहीं करता है? भीख मांगता है। बेशरम!”

राजनीतिक पार्टियों से वे घोर नफ़रत करते थे। राजनेताओं को एक पाई चंदा नहीं देते। स्कूल, पुस्तकालय, साहित्यिक या सांस्कृतिक संस्थाओं को खुले हाथों दान देते थे। दर्जनों गरीब मेधावी बच्चों को पढ़ाने के लिए वजीफा देते थे।

फिर दूसरी ओर पैसे के प्रति मोह ऐसा था कि ख़ुदकुशी करने के एक सप्ताह पहले उन्होंने अपने सभी बकायेदारों से पाई-पाई वसूल लिया था। दोस्तों और मुलाजिमों को भी नहीं बख्सा था। बाजार और मित्रों के प्रति अपनी देनदारी भी उन्होंने चुका दी थी। वसीयत में भी कुछ विवादित सम्पत्ति नहीं छोड़ी थी उन्होंने। कितना ठन्डे दिमाग और योजनाबद्ध ढंग से उन्होंने आत्महत्या की थी! कलक्टर को धमकी देने के बाद एक माह बीत जाने पर सबने मान लिया था कि वह कोरी धमकी ही थी। तभी तो उस दिन बॉडीगार्ड तक चकमा खा गये थे।

क़ानूनी औपचारिकताएँ पूरी होने के पश्चात डेड बॉडी पादरी और मुलाजिमों को सौंप दिया गया। रिश्तेदार तो यहाँ कोई था नहीं; अतः कुछ दोस्तों, मुलाजिमों और उनके प्यारे कुत्तों की मौजूदगी में उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक उन्हें ‘विलियम हाउस’ के अन्दर ही चर्च के पीछे दफना दिया गया। मरिया पादरी के साथ कोठी में रुक गयी थी। धनेश, शिबू और इक़बाल फार्म हाउस में बस गये। लक्खी थापा मर्सडीज लेकर कुर्सेला इस्टेट पहुँच गये। रायबहादुर से कहा—“सरकार इस हाथी को हम कैसे पाल सकेंगे? यह तो राजा-रजवाड़ों की सवारी है। इसके बदले एक एम्बेसेडर कार और कुछ बखसीस मिल जाये तो गरीब अपने दार्जिलिंग में टैक्सी चलाकर बच्चों को पोस लेगा।” रायबहादुर ने उसे एक नयी एम्बेसेडर कार और कुछ हजार रुपये देकर मर्सडीज रख ली थी। लक्खी दार्जिलिंग जाकर टैक्सी चलाने लगा था।

अपनी मौत होने तक पुस्सी और ब्रावो मालिक की कब्र की रखवाली करते रहे। बाकी के सातों कुत्ते भी उदास और शिथिल रहने लगे। वे जैसे भौंकना भी भूल गये थे। हमेशा कोठी में मरघटी सन्नाटा पसरा रहता था। एक साल के अन्दर सभी कुत्ते एक-एक करके बीमार होकर अपने मालिक के पास चले गये। पादरी ने सभी को साहब की कब्र के चारों और दफना दिया। फिर पाँच साल बाद, पहले मरिया और बाद में पादरी थॉमस मैथ्यू की कब्र वहीं खोदी गयी

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पवन कुमार सिंह

मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे लेखक जयप्रकाश आन्दोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और हिन्दी के प्राध्यापक हैं। सम्पर्क +919431250382, khdrpawanks@gmail.com
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Binay saurabh
Binay saurabh
8 months ago

आप चुप कैसे रहे इतने दिन ? कहानी कला वह भी इतनी सधी हुई…. जब वह आपके पास है ? बधाई। विलियम साब याद रहेंगे।

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