लेख

अन्याय के स्रोत की पहचान कराता कहानीकार

बजरंग बिहारी तिवारी

छुआछूत विकृत मानसिकता है, एक दिमागी रोग है। इसका पसारा धर्म-विशेष के भीतर सीमित नहीं है। यह सर्वव्यापी विकृति है। ओमप्रकाश वाल्मीकि रचित ‘सलाम’ कहानी के अंत में एक दृश्य है। आठ-दस वर्ष का एक दलित बालक रोटी खाने से इसलिए मना करता है कि उसे शक है कि रसोइया कोई मुसलमान है। बालक अपने पिता के साथ एक बारात में आया हुआ है। बारात शहर से गाँव आई हुई है। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपने पात्रों को प्रायः अनाम नहीं रखते। किंतु, इस कहानी का बालक और उसका पिता नाम रहित हैं। कहानीकार मानो बताना चाहता हो कि यह समस्या पात्र-विशेष की न होकर पूरे समुदाय की है, सर्वव्यापी है। इतने छोटे बालक में छुआछूत की ऐसी जिद्दी भावना आई कहाँ से? रोटी खाने के लिए बालक को समझाते उसके पिता यह नहीं कहते कि रसोइए की जाति-धर्म नहीं देखी जानी चाहिए। वे बस इतना विश्वास दिलाना चाहते हैं कि बारात के लिए खाना बनाने वाला मुसलमान नहीं है। गोया, वह विधर्मी होता तो वे स्वयं भोजन नहीं करते। कहानीकार ने बड़ी निर्ममता से यह तथ्य रेखांकित किया है कि छुआछूत से पीड़ित लोग भी उस मानसिकता के वाहक हैं। तर्क दिया जाता है कि शहर के लोग ऐसी जड़ता, संकीर्णता से आगे निकल आए हैं। कहानी इस तर्क का खंडन करती है।

जाति-प्रथा से उपजे भेदभाव को कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने ढंग से पेश किया है। उनकी कहानी ‘अतिथि देवो भव’ भेदभाव के दोनों प्रमुख रूपों- धर्म और जाति को एक साथ प्रस्तुत करती है। कथानायक मुहम्मद सलमान अपने क़स्बे से बड़े शहर आए हैं। यहाँ उनका पढ़ाया प्रगतिशील विचारों का छात्र मिश्रीलाल गुप्ता प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहा है। बिना पूर्वसूचना के सलमान साहब स्टेशन के पास ही राधारमण मिश्र के मकान में बतौर किराएदार रहने वाले अपने इस छात्र से मिलने चले गए। मिश्रीलाल कमरे पर नहीं मिला। पड़ोसी किराएदार महिला ने वापस जाते सलमान साहब को रोक लिया। वे अतिथि थे। भारतीय परंपरा में अतिथि को देवता की तरह मानने की बात की जाती है। सलमान साहब यह देखकर गदगद थे कि उनके यहाँ जाति-धर्म पूछकर व्यवहार का निर्धारण किया जाता है लेकिन यहाँ वैसी कोई संकीर्णता नहीं है। यह क़स्बे और शहर का फ़र्क है।

प्राचीन बौद्ध कवि अश्वघोष वर्ण-जाति की काट के लिए प्रकृति से उदाहरण देते थे। गूलर और कटहल जैसे वृक्षों में ऊपर-नीचे हर जगह फल लगते हैं और इन फलों में तत्वतः कोई अंतर नहीं होता। प्रकृति का यही नियम मानव समाज पर भी लागू होना चाहिए। मुख से पैदा हुए लोग पैरों से पैदा हुए लोगों से भिन्न या श्रेष्ठ होंगे, यह मानना अप्राकृतिक है। ‘अतिथि देवो भव’ कहानी में इसी तरह के संकेत रखे गए हैं। गर्मी अपने शिखर पर है। इस गर्मी ने सबका हाल एक-जैसा कर रखा है। इसी तरह जय साबुन की गंध और जीरे की महक है। प्रकृति भेदभाव नहीं करती। भेदभाव वाली संरचना अप्राकृतिक है। अस्वास्थ्यकर है।

एक जातिवादी संरचना में पहचान का आरंभिक बिंदु पूर्वज्ञात रहता है और लोग उसके लिए तैयार रहते हैं। अचरज तब होता है जब अपरिचित की जाति जानने की कोशिश नहीं होती। सलमान साहब को ऐसा ही सुखद अनुभव होता है जब वह अनाम महिला उनकी जाति, उनका धर्म जाने बग़ैर उन्हें अपने यहाँ रोक लेती है और उनके लिए चाय-पानी, रात्रिभोज का इंतज़ाम करती है। देर शाम उस महिला का पति असिस्टेंट टेलिफोन ऑपरेटर राम मनोहर पांडे घर लौटते हैं। वे पूजापाठी हैं। उनके लौटने से जाति-धर्म का बोध भी लौट आता है। आगन्तुक की सामाजिक पहचान उजागर होती है। बिना कुछ कहे अतिथि को उसकी जगह दिखा दी जाती है। अतिथि तभी देव-स्वरूप है जब वह कुछ शर्तें पूरी करता हो। कहानी के अंतिम दृश्य में वातावरण असहज है, तनावग्रस्त है। सलमान साहब अपना बर्तन धोते दिखाई देते हैं।

अब्दुल बिस्मिल्लाह की उक्त कहानी के दो दशक बाद जयप्रकाश कर्दम की लिखी ‘नो बार’ कहानी ‘अतिथि देवो भव’ से मिलती-जुलती है। महानगर में रहने वाला एक उच्च शिक्षित प्रगतिशील परिवार अपनी बेटी के लिए अंग्रेजी अखबार में वैवाहिक विज्ञापन प्रकाशित कराता है। इस विज्ञापन में जाति की कोई शर्त नहीं रखी गई है- ‘कास्ट नो बार’। राजेश को यह रिश्ता माकूल लगा तो उसने प्रस्ताव भेजा। मुलाक़ातें शुरू हुईं। शादी की तारीख़ तय होती इससे पहले लड़की के पिता को शक हुआ। ‘जाति बंधन नहीं’ का अर्थ खुला। जो अपनी जाति के आसपास है उसी पर यह लागू होता है। अनुसूचित जाति इससे बाहर है।

इस कहानी का एक पक्ष और भी है। इसके कथावस्तु पर देश विभाजन की छाया दिखती है। किराएदार स्त्रियों की बातचीत तथा स्कूल विवाद इसकी पुष्टि करते हैं। जैकी साहब शिवचरण हलवाई के यहाँ से मिठाई न लेकर मुसलमान हलवाई के यहाँ से मंगवाते हैं। देश को आज़ाद हुए तीन दशक हो रहे हैं लेकिन निरंतर प्रयासों के बावज़ूद धार्मिक कटुता अभी ज़्यादा कम नहीं हुई है। धर्मनिरपेक्ष संविधान बेशक नागरिकों को बराबरी की गारंटी दे चुका है लेकिन असमानता कमोबेश बरकरार है। पिछली पीढ़ी के गिरिधारीलाल गुप्ता सिर्फ उर्दू पढ़ सके थे। मुहम्मद सलमान भी उर्दू पढ़ना चाहते थे लेकिन उनके कस्बे के स्कूल में मात्र संस्कृत का विकल्प था। सलमान ने संस्कृत पढ़ी। इस विषय में एम.ए. किया। उन्हें उम्मीद थी कि वे संस्कृत के लेक्चरर नियुक्त हो जाएँगे। ऐसा न हुआ। उन्हें संभवतः देश का माहौल और अपनी स्थिति समझ में आ गई होगी। वे अपने क़स्बे में खुले इस्लामिया मिडिल स्कूल में इतिहास पढ़ाने लगे। उन्होंने अपने मित्र के बेटे मिश्रीलाल को संस्कृत पढ़ाई थी।

देश के सेकुलर ढाँचे को और मज़बूत होना था। सलमान जैसे योग्य लोगों को योग्यता के अनुरूप नियुक्तियाँ मिलनी थीं। भाषा को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना था। क्या यह अपेक्षा पूरी हो पायी? वर्ष 2019 की एक वास्तविक घटना इस प्रश्न का अधूरा उत्तर देती है। जयपुर के नज़दीक गाँव के एक संस्कृतज्ञ पिता के पुत्र फ़िरोज़ खान ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में उच्च शिक्षा हासिल की। पाँच नवंबर को उनकी नियुक्ति बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म-विज्ञान में हो गई। विशेषज्ञ समिति का चयन संदेह से परे था। इसे विवाद का विषय नहीं बनाया जाना था। लेकिन, एक विद्यार्थी संगठन के नेतृत्व में इस नियुक्ति का विरोध किया गया। विरोध बहुत तीखा रहा। महीने भर बाद फ़िरोज़ को त्यागपत्र देना पड़ा। विश्वविद्यालय ने उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते हुए फ़िरोज़ को एक अन्य विभाग में संस्कृत भाषा शिक्षक के रूप में रख लिया। मशहूर शायर फ़िराक साहब का एक शे’र है- “बीत गए हैं लाख जुग सूए वतन चले हुए। पहुँची है आदमी की जात चार क़दम कशां – कशां।

दलित जीवन पर केन्द्रित अब्दुल बिस्मिल्लाह की एक उल्लेखनीय कहानी है – ‘खाल खींचने वाले’। यह शोषण को बाहर से देखने के बजाए उसके मूल तक जाती है और शोषकों की बहुस्तरीयता से पहचान कराती है। ‘खाल खींचने वाले’ कहानी तब लिखी गई थी जब हिंदी में विमर्शमूलक कहानियाँ लिखे जाने का दौर ठीक से शुरू नहीं हुआ था। वर्ष 1986 में हापुड़ के शीर्षक प्रकाशन से छपे संग्रह ‘अब्दुल बिस्मिल्लाह की विशिष्ट कहानियाँ’ में यह शामिल है। यह ‘स्वानुभव’ की कहानी नहीं है लेकिन इसमें चित्रित दलित जीवन की विश्वसनीयता ‘प्रामाणिक अनुभव’ की कोटि में आने वाली कहानियाँ पढ़ते हुए पुष्ट होती चलती है। कहानी का केन्द्रीय पात्र भुनेसर मरे जानवरों की खाल उतारने का काम करता है। वह तमाम अभावों, तक़लीफ़ों और संत्रासों से घिरा हुआ है। उसका ख़ुदमुख्तार, स्वाभिमानी किंतु संकोची स्वभाव उसके चरित्र को विशिष्ट बनाता है लेकिन यही उसके दुःख में बढ़ोत्तरी भी करता है। राँपी उसकी भरोसेमंद साथी है। दोनों मिलकर “खाल उतारने का धंधा करते हैं।” परिवार में कुल चार लोग हैं- पति-पत्नी, बेटा-बेटी। बेटे की रुचि इस पुश्तैनी काम में नहीं है। उसकी रुचि दरअसल किसी काम में नहीं है। ससुराल वालों से बेटी (बसन्ती) को निकाल दिया है। वह गर्भवती है और प्रसव का आसन्न खर्च मुँह बाए खड़ा है। पत्नी बीमार है, काम करने में अशक्त है। कच्ची दीवारों वाला खपरैल घर तत्काल मरम्मत चाहता है। वर्षा अभी शुरू ही हुई है। पहले वह इस काम में अकेले था। अब पट्टीदारों के साथ कई और आ गए हैं। जजमानी बँट गई है। पिछला मवेशी मरा था तो वह गनेसी के हिस्से में आया था। उसे तीस रुपए मिले थे। इस बार रघुनाथ तिवारी का बैल मरा है। इस पर भुनेसर का हक़ है। रघुनाथ ने जब भुनेसर को ख़बर भिजवाई तो यह शर्त भी लगा दी खाल बिकने पर पाँच रुपये उन्हें देने होंगे। सभी भुनेसर की मजबूरी का फ़ायदा उठाना चाहते हैं।

हिंदी के अस्मितामूलक कहानी लेखन में 1990 के बाद गति आती है। कथावस्तु इस तरह रखी जाती है कि दलित पात्र, ख़ासकर कथानायक मज़बूत बने रहें, जीवन-संघर्ष में परास्त न हों। गंदे समझे जाने वाले पुश्तैनी कार्य छोड़ने का विचार इस समय प्रबल है। सामाजिक स्तर और आत्मछवि में बेहतरी का रास्ता यहीं से होकर गुज़रता है। मैला उठाना, डांगर की ख़ाल उतारना, चमड़ा कमाना, हरवाही करना आदि काम इसी दौरान बंद होते हैं। इस समय दलित जीवन में प्रबोधन की अंतर्धारा वेगवती है। दलितों पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं। उन पर गहरा दबाव है कि वे अपने परंपरागत पेशे न छोड़ें। दलित यथाशक्ति इस दबाव का सामना कर रहे हैं। कथा साहित्य में वे मज़बूती से डटे हैं। समझौते नहीं कर रहे हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानी तक यह भावधारा ठीक से उभरी नहीं है। उनका नायक भुनेसर कभी अपना पुश्तैनी धंधा छोड़कर शहर जाने, मजदूरी करने, दूसरा काम तलाशने की नहीं सोचता। उसे अपने काम से लगाव है। अपने हुनर पर भरोसा है। कहानीकार की नज़र में यह उसकी स्वाधीन वृत्ति का प्रमाण है। उसे किसी की ग़ुलामी नहीं करनी है। भुनेसर के बाद वाली पीढ़ी अवश्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे काम त्यागेगी। भुनेसर के बेटे ने यह काम करने से मना कर दिया है। कथानायक की निगाह में वह ‘लफंगा निकल गया’ है। कहानीकार को भी भनक नहीं है कि यह युगांतर की आहट है। वह भी बेटे के प्रति भुनेसर की भावना से एकमेक है। बेटे की लफंगई पर कहानी मौन है।

रघुनाथ तिवारी का बैल भारी है। इस डांगर को उन्होंने किसी नाले के पास रखवा दिया है। भुनेसर को यहीं पहुँचना है। घिरे हुए बादल उसकी चिंता बढ़ा रहे हैं। डर है कि अगर पहुँचने में देरी हुई तो गिद्ध कब्ज़ा कर लेंगे और खाल खोटी हो जाएगी। अकेले खाल उतारना भी बहुत कठिन है। किसी की सहायता लेने पर उसका हिस्सा देना पड़ेगा। भुनेसर एक-एक पैसे का हिसाब लगा रहा है। यह हिसाब उसकी थकान पर, भूख पर, चिलचिलाती गर्मी पर, बीड़ी की भयंकर तलब पर भारी है। आज बाज़ार है और वाज़िब दाम पाने के लिए उसे समय से वहाँ पहुँचना भी है।

जाति व्यवस्था बाज़ार व्यवस्था में इस तरह घुलमिल जाती है कि दोनों का अंतर करना मुश्किल हो जाए। कहानी जाति आधारित शोषण को वर्गीय शोषण से जोड़कर देखने का प्रस्ताव करती है। कमाई और खर्च का हिसाब लगाता भुनेसर ‘गोदान’ के होरी जैसा लगता है, “पचीस से कम तो नहीं मिलना चाहिए, उसने मन ही मन सोचा और अपने हिसाब में व्यस्त हो गया। पाँच रुपया तो मालिक का हक हो जाएगा, बीस रुपिया में बसन्ती के लिए सोठ-गुड़ और घर के लिए आटा-दाल। खपड़े का इंतज़ाम फिर बाद में होगा।”

बाज़ार में ख़रीदारों, दलालों से घिरा हुआ भुनेसर कुछ समझ नहीं पाता, किसी निर्णय तक नहीं पहुँच पाता। वह अपने गाँव के व्यापारी मुस्तफ़ा मियाँ को खाल बेच सकता था। अब तक वही उसका माल ख़रीदते रहे हैं। दिक्कत यह है कि वे दस रुपये का मार्जिन रखते हैं और भुनेसर को इस बार अपने माल का पूरा दाम चाहिए। बाज़ार में एक व्यापारी भुनेसर को बीस रुपया तक देने को तैयार है। वह राज़ी नहीं होता। व्यापारियों, दलालों की हिकारत भरी देहभाषा, बोली-बानी से भुनेसर हलकान है। वह सही ख़रीदार का इंतज़ार कर रहा है कि व्यापारियों के व्यापारी बड़े मियाँ उसे बुला लेते हैं। बड़े मियाँ के पास क्या नहीं है, बड़ा-सा बंगला, कार, मोटरसाइकिल …। भुनेसर से खाल रखवाकर वे उसे अपने गोदाम में पड़ी खालों पर नमक लगाने के काम में लगा देते हैं। इस काम का कोई मेहनताना नहीं। यह बेगार है। दिन भर का भूखा-प्यासा भुनेसर बेगार करते कसमसा रहा है। वह यहाँ से जल्दी छूटकर घर जाना चाहता है। देर शाम को उसे बेगार से छुट्टी मिलती है। इस समय तक बड़े मियाँ लोगों से घिर चुके हैं। कहानी के अंतिम हिस्से में आए संवादों से शोषण का यथार्थ सामने आ जाता है-

“मालिक देरी होत अहै।”

“इसे पंद्रह रुपये दे दीजिए, मुनीम साहब!”

और भुनेसर को लगा कि वह अभी धड़ाम से यही गिर पड़ेगा। उसकी जबान थरथराने लगी।

“मालिक बहुत कम है, ग़रीब मनई है है मालिक।”

भुनेसर के होंठ फड़फड़ाये लेकिन बड़े मियाँ अपना बैग उठाकर चल पड़े थे। उनके पीछे इतनी लंबी भीड़ थी कि वे भुनेसर की बात सुन नहीं सकते थे।”

बड़े मियाँ की जगह कोई सवर्ण हिंदू व्यापारी होता तब संभवतः यह जाति-शोषण की कहानी मान ली जाती लेकिन इस विन्यास में यह वर्गीय शोषण की कथा है। ऐसा वर्गीय शोषण जो जाति की बुनियाद पर भी टिका हुआ है। बड़े मियाँ के ‘बड़े’ होने राज़ इसमें है, यह उनकी कोठी-कार जैसी दृश्य-अदृश्य संपदा की अंतर्कथा है। शोषण का दूसरा छोर रघुनाथ तिवारी से जुड़ा है, “सुन, पाँच रुपिया ओहमे से हमका बरे मिलय चाही।” इस बाज़ार में भुनेसर अकेला है, निहायत अकेला। उसका गुस्सा और बेबसी वहाँ उपस्थित भीड़ में किसी और को छू नहीं पाती। उसकी मुट्ठी कसी हुई है और उसमें पड़े पंद्रह रुपये पिस रहे हैं। भुनेसर का सवाल है जो तब से अब तक रक्तपायी व्यवस्था के सामने फड़फड़ा रहा है- “जिंदा आदमियों की खाल कौन उतारता है।”

बजरंग बिहारी तिवारी : जन्म: मार्च, 1977, नियावाँ, गोंडा (जिला), पूर्वी उत्तर प्रदेश। शिक्षा: एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी.। ‘हिंसा की जाति’, ‘दलित कविता : प्रश्न और परिप्रेक्ष्य’, ‘केरल में सामाजिक आन्दोलन और दलित साहित्य’, ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा’ सहित कई पुस्तकों का प्रकाशन। ‘विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख और समीक्षाएं प्रकाशित। दिल्ली से प्रकाशित ‘कथादेश’ पत्रिका में वर्ष 2004 से ‘दलित प्रश्न’ शीर्षक स्तम्भ लेखन। कई आलोचनात्मक लेखों का ‘विभिन्न भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित।  पुरस्कार व सम्मान:  ‘डॉ. शिव कुमार मिश्र स्मृति आलोचना सम्मान–2016’, ‘जे.सी. जोशी स्मृति शब्द साधक आलोचना सम्मान–2017’,‘महाकवि भवभूति अलंकरण–2018’, ‘ओम प्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ पुरस्कार 2019-20’, ‘किस्सा कोताह कथेतर साहित्य पुरस्कार–2020’ , ‘डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान– 2020’, ‘स्वतंत्रता सेनानी रामचंद्र नंदवाना सम्मान-2021′, साहित्य श्री’ सम्मान- 2022 और ‘सत्राची सम्मान – 2024’। ‘व्यक्ति सत्ता, समुदाय और दलित कथा साहित्य’ पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य ।

सम्प्रति: प्रोफेसर, हिंदी विभाग, देशबंधु कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय),  दिल्ली।

सम्पर्क: bajrangbihari@gmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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