सपने जमीन पर

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो

 

अब तक आपने पढ़ा: मंडल जी के गांव में दो विद्यार्थी शोध के सिलसिले में आए थे। शोध ग्रंथ के पूरा हो जाने के बाद मंडल जी को यह जानकर दुख हुआ कि इस शोध ग्रंथ को अमल में नहीं लाया जाएगा। बस यह विश्वविद्यालय के किसी अलमीरा में पड़ा हुआ धूल फांकता रहेगा। फिर शोध करवाने का फायदा क्या हुआ? इस शोध ग्रंथ से उनकी बहुत सारी भविष्य की उम्मीदें भी जुड़ चुकी थी। अपने जेहन में उपजे कई सवालों के जवाब को तलाशते हुए विद्यार्थियों के साथ साथ वह भी भागलपुर विश्वविद्यालय के लिए रवाना हो जाते हैं। अब आगे-             

  एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो

 बिहार का शिल्क नगरी, “भागलपुर” मंडल जी के लिए नया नहीं था। इसके पहले अपने विद्यार्थी जीवन में यहाँ परवत्ती के हॉस्टल में रह भी चुके थे। भागलपुर से सुल्तानगंज के बीच प्रवासी पक्षियों का झुंड गंगा नदी में आता था, उसे देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी लोग अपने अपने दूरबीन एवं कैमरों के साथ आते थे। एक बार दोस्तों के साथ वह भी बर्ड्स वाचिंग के लिए मोटर बोट और गाइड के साथ घूम चुके थे। पर इस बार भागलपुर आने का उद्देश्य बिल्कुल ही अलग था।

जनकल्याणकारी सरकारी योजनाओं के बारे में कभी भी उन्होंने गंभीरता से आज तक नहीं सोचा था। पर इन दोनों विद्यार्थियों के गांव आने के बाद से वह इस विषय पर विचार मंथन कर रहे थे। “क्या उद्देश्य है सरकारी योजनाओं का? जितने पैसे में एक कप चाय मिलती है उतने में ही 1 किलो अनाज मिल जाता है तो भूखमरी तो अवश्य दूर होगी पर क्या लोग अकर्मण्य एवं आलसी नहीं हो जाएंगे? शायद इन विषयों पर भी भारती जी से बात हो।

विद्यार्थियों ने जो शोध कार्य किया था, जो तरीके सुझाए थे वह क्या अमल में नहीं लाये जा सकेंगे? उसे अमलीजामा पहनाने में भारती जी की क्या भूमिका हो सकती है?” विचारों की श्रृंखला तब टूटी जब टेंपो वाले ने कहा, “यूनिवर्सिटी कैंपस का लालबाग आ चुका है, उतरना कहाँ है?” राजेश ने फोन पर भारती जी को जानकारी दे दी थी कि शोध पत्र के साथ साथ वह मंडल जी को भी लेकर आ रहे हैं। अतः उन्होंने आवास पर ही बुला लिया था। लाल बाग के अंदर कई क्वार्टर थे। गेट पार करने के बाद पांचवे क्वार्टर के बाहर “जयप्रकाश भारती,प्राध्यापक, समाजशास्त्र, भागलपुर विश्वविद्यालय” का बोर्ड लगा हुआ था। तीनों उतर गये।

दरबान ने इन्हें ड्राइंग रूम में बैठा दिया। थोड़ी देर में भारती जी ने ड्राइंग रूम में प्रवेश किया। गौर वर्ण, आयु लगभग 65 वर्ष, लिबास धोती कुर्ता, सर के बाल सफेद, शालीन व्यक्तित्व। दोनों विद्यार्थियों ने पांव छूकर प्रणाम किया। मंडल जी ने भी हाथ जोड़ ली। प्रत्युत्तर में मुस्कुराते हुए उन्होंने भी हाथ जोड़ ली थी। लोगों को बैठने का इशारा कर मंडल जी से पूछा, “यात्रा में कोई परेशानी तो नहीं हुई? मेरे बच्चों का आपने विशेष ख्याल रखा और उनके शोध कार्यो में मदद भी की इसके लिए मैं हृदय से आपका आभारी हूं। पता चला कि आपकी कुछ जिज्ञासाऐं हैं।

”मंडल जी ने पूछा, “इस शोध कार्य से क्या हमारी गरीबी दूर हो सकेगी? क्या सरकार इन में वर्णित प्रस्तावों पर विचार करेगी?” भारती जी ने दृढ़ता से कहा, “आप जागरुक व्यक्ति हैं, जो आपके मन में यह सवाल आया। पर अफसोस की केवल शोध कार्य से ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होने जा रहा है।” मंडल जी ने थोड़ी मायूसी के साथ कहा, “तो फिर इस शोध ग्रंथ का क्या फायदा?” इसी बीच एक और व्यक्ति को लेकर दरबान आया। आने वाले व्यक्ति को देखते ही दोनों विद्यार्थी ने उठकर उनका भी चरण स्पर्श किया। मंडल जी ने भी हाथ जोड़ लिए। लंबा कद, आंखों पर चश्मा, शरीर का रंग थोड़ा सा साँवला, टी शर्ट और जींस पहने हुए, उम्र लगभग 56 वर्ष, मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, “तो आप हैं गणेश मंडल! क्या सही समझा मैंने?”

मंडल जी ने आश्चर्य मिश्रित मुस्कान के साथ कहा, “आश्चर्य है आपने मुझे पहचाना कैसे?” कुर्सी पर बैठते हुए उन्होंने कहा, “ मैं हूँ डॉ जितेन मजूमदार,अर्थशास्त्र का प्राध्यापक। भारती जी का समाजशास्त्र और मेरे अर्थशास्त्र का कॉमन विषय है “गरीबी”। जिसके पीछे सामाजिक और आर्थिक दोनों कारण हैं। तो हम लोगों ने सोचा कि आज के परिवेश में इस पर रिसर्च हो जाए। बच्चों ने रिसर्च के दौरान फोन पर आपके आने की बात बताई थी।” भारती जी ने कहा, “हाँ मंडल जी यही तो पूछ रहे थे कि इस रिसर्च वर्क से यदि गरीबी दूर नहीं हो सकती तो रिसर्च करने का फायदा ही क्या?”

मजूमदार जी, “तो आपने क्या जवाब दिया?” भारती जी, “मैं बता ही रहा था, अच्छा हुआ आप भी आ गये। मंडल जी, इस रिसर्च से वर्तमान पीढ़ी एवं आने वाली पीढ़ियों को नई दिशा नई सोच मिल सकेगी। पर जिन लोगों को अपनी गरीबी दूर करनी है उन्हें ही प्रयास करना होगा। उन्हें स्वयं ही जगना होगा। परावलंबन की जड़ता को तोड़कर स्वावलंबन की शुरुआत करनी होगी। हम तो बस रास्ता बता सकते हैं।  यह नया रास्ता क्या हो सकता है इस शोध ग्रंथ से उसकी जानकारी मात्र हो सकती है पर उन रास्तों पर चलना तो उन्हें खुद ही होगा।” मंडल जी, “सही बात कही आपने, जगना भी होगा और जो सोये हैं उन्हें जगाना भी होगा। पर यह बड़ी-बड़ी बातें हैं, मुझे तो एक मोटी बात समझ में आती है कि बस आर्थिक आधार पर आरक्षण मिले तो हमारी गरीबी दूर हो जाए और इसके बदले में अस्पताल में टिकाऊ डॉक्टर भी मिल जाएगा।”

मंडल जी के जेहन में रामू की तस्वीर घूम रही थी, “आज आर्थिक आरक्षण मिल गया होता तो मेरा बेटा मेरे गांव का डॉक्टर बन जाता और गांव की सेवा करता और यही रहता, कहीं नहीं जाता!” भारती जी, डॉक्टर वाली बात से थोड़े अचंभित हुए पूछा “टिकाऊ डॉक्टर वाली बात समझ में नहीं आई?” मंडल जी ने समझाया, “अमीर बाप के अमीर लड़के डॉक्टर बनकर, गांव तो आ जाते हैं पर उन्हें गांव रास नहीं आता और वह फौरन कोई न कोई तरकीब से ट्रांसफर करवा शहर चले जाते हैं। पर यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण मिले तो गरीब लड़के भी डॉक्टर इंजीनियर बन सकेंगे और गांव में टिक भी सकेंगे।” भारती जी, “हाँ आपकी डॉक्टर वाली बात सही है, पर आर्थिक आधार पर आरक्षण मिल जाने से गरीबों की गरीबी दूर हो जाएगी यह तो बस आकाश कुसुम कल्पना मात्र है। क्यों मजूमदार जी यह सवाल तो आपके अधिकार क्षेत्र का है। आपकी क्या राय है?”

मजूमदार जी ने गंभीरता पूर्वक कहा “मंडल जी शिक्षा, स्वरोजगार, लघु उद्योगों की स्थापना, स्किल डेवलपमेंट, जनसंख्या नियंत्रण जैसे कई जरूरी कदम उठाने होंगे तब कहीं गरीबी दूर हो पाएगी। हाँ आर्थिक आरक्षण का भी थोड़ा बहुत फायदा जरूर होगा बशर्ते की कट ऑफ लाइन को घटाया जाए और गलत प्रमाण प्रस्तुत करने वाले के ऊपर कड़ी कानूनी कार्यवाही का प्रावधान हो ताकि कोई भी व्यक्ति इसका गलत इस्तेमाल न कर सके। मंडल जी, “आर्थिक आरक्षण से थोड़ा बहुत ही फायदा क्यों होगा?” मजूमदार जी ने समझाया “क्योंकि सरकार ज्यादा तादाद में नौकरी दे ही नहीं सकती। प्रतिभा विकसित करनी होगी ताकि सरकार, पब्लिक सेक्टर हर जगह आपकी पूछ हो, इसके लिए मजबूत और ईमानदार शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता होगी।” मंडल जी के सवालों का सिलसिला जारी था, “अच्छा भारती जी जिन नए रास्तों पर चलने से गरीबी दूर हो सकती है उन रास्तों का निर्धारण कैसे होगा? और सबसे बड़ा सवाल उन रास्तों पर लोग क्यों कर भरोसा करेंगे?”

भारती जी, “बिल्कुल सही सवाल है आपका। शोध कार्य के ऊपर हम लोग कल फिर विस्तार से बात करेंगे। एक दिन आप हमारा आतिथ्य स्वीकार कीजिए क्योंकि विचार-विमर्श के दौरान आप की मौजूदगी उस विमर्श को सार्थक बनाएगी। अब रह गई बात उन रास्तों पर कोई क्यों भरोसा करेगा तो मजूमदार जी आप क्या कहते हैं?” मजूमदार जी ने बड़ी सहजता से कहा, “मंडल जी, विमर्श में आप हमारे साथ हैं, पहले एक आम ग्रामीण व्यक्ति के तौर पर आपके विचारों एवं सुझावों के बाद जो नए रास्ते बनेंगे, उस पर आप को जितना यकीन होगा उसी अनुपात में आप दूसरों को भी यकीन दिला सकेंगे। फिर इस विचारधारा से जुड़े लोगों का संगठन बनाकर उसे एक आन्दोलन का रूप देंगे। आन्दोलन के द्वारा यदि आप सरकार को मजबूर कर सके कि वह अपनी नीतियों में उन रास्तों के अनुकूल बदलाव लाए तो फिर आपके, मेरे, सबों के सपने साकार हो सकेंगे।”

मंडल जी, “बिल्कुल दिल को छू लेने वाली बात कही है आपने, गरीबी उन्मूलन का वर्तमान रास्ता भुखमरी से भले ही बचा ले पर लगभग मुफ्त के अनाज पर आश्रित व्यक्तियों को स्वावलंबन और विकास के रास्ते पर कभी नहीं चला सकेगा। यहाँ आते वक्त मैं खुद भी यह सोच रहा था। और सच में गरीबी उन्मूलन के नए रास्तों की तलाश जरूरी है। इस वैचारिक मुहिम में मैं भी आपके साथ हूं।” ऐसा कहते कहते मंडल जी का गला भर आया, उन्होंने दोनों व्यक्तियों को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा, “मुझ जैसे सामान्य से ग्रामीण को आपने विचार विमर्श के लायक समझा, हमारे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है।”

मंडल जी के आने से भारती जी को असुविधा न हो जाये ये सोचकर राजेश ने कहा, “मंडल जी को हम अपने साथ हॉस्टल में भी ठहरा सकते हैं।” भारती जी मुस्कुराए, “नहीं मंडल जी आज हमारे साथ ही रहेंगे। विचार-विमर्श की प्रक्रिया आज और अभी से शुरु हो जाएगी। सच तो यह है इस शोध कार्य को लेकर हमारी गंभीरता मंडल जी के आने से काफी बढ़ गई है नहीं तो सच में यह शोध कार्य बस किसी अलमीरा की शोभा बनकर रह जाता। तुम लोग अपने सारे पेपर यहीं छोड़ दो। कल रविवार है, तो 10:00 बजे आकर इस विमर्श में शामिल हो जाना। मजूमदार जी भी हमारे साथ होंगे।”

दूसरे दिन 10:00 बजते बजते राजेश औऱ सत्यार्थी भारती जी के घर पहुंच गये। मंडल जी, भारती जी और मजूमदार जी वहाँ पहले से बैठे थे। भारती जी ने इनका स्वागत करते हुए कहा, “आप दोनों ने बेहद अच्छा काम किया है। घटनाओं के तह में जाकर उसकी वजहों को ढूंढा है और समाधान के लिए विमर्श की पूरी गुंजाइश भी छोड़ी है। संपूर्ण रिसर्च में कई समस्याएं उभर कर सामने आई है। बारी-बारी से हम उनकी चर्चा करेंगे। पहली समस्या है शिक्षा के स्तर में भयानक कमी इसके लिए क्या करना चाहिए?

राजेश ने उत्साह से बताया, “शिक्षक की बहाली के पहले उनके लिए प्रतियोगी परीक्षा तो हो ही पर एक ऐसा सिस्टम भी होना चाहिए कि शक होने पर किसी भी शिक्षक की पात्रता परीक्षा फिर से ली जा सके।” सत्यार्थी, “और साइकिल, पोशाक, मिड डे मील की जिम्मेदारी आउटसोर्सिंग को दें ताकि शिक्षक केवल पढ़ने और पढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर सकें। ”मंडल जी ने जिझकते हुए कहा, “इजाजत हो तो हम भी एक सलाह दें।” भारती जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ हाँ क्यों नहीं, ये शोध कार्य आप लोगों के लिए ही तो हम कर रहे हैं। आपकी सलाह बेहद मायने रखेगी। ”मंडल जी, “सारे सरकारी अफसर के बच्चों को अनिवार्य रुप से सरकारी स्कूल में जो पढ़ाया जाए तो शिक्षा के स्तर में जरूर से सुधार आ जाएगा, क्योंकि जब BDO और  SDO का बेटा सरकारी स्कूल में पढेगा तो मास्टर साहब की गुणवत्ता में अवश्य सुधार आ जायेगी।”

मजूमदार जी ने जोड़ा, “सरकारी शिक्षण संस्थान को इतना बेहतरीन बना दिया जाना चाहिए कि हर बेहतरीन शिक्षक पहले सरकारी संस्थानों में नियुक्ति की कोशिश करने लगे और हर गार्जियन अपने बच्चे को सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाना चाहे, जगह न मिलने पर ही वह प्राइवेट संस्थानों में पढ़ाएं। जिस दिन ऐसा हो जाएगा शिक्षा व्यवस्था आप ही आप पटरी पर आ जायेगी।” भारती जी, “दूसरी महत्वपूर्ण बात है स्वरोजगार के कमी की समस्या। मजूमदार जी मैं आपकी राय जानना चाहूंगा। मजूमदार जी, “स्वरोजगार के लिए तीन कार्य साथ-साथ करने होंगे।

पहला, जनकल्याणकारी योजनाओं में खर्च हो रही राशि के एक बड़े अंश से गृह एवं लघु उद्योग की स्थापना हो। दूसरा, आठवीं कक्षा पास करने के बाद विद्यार्थियों के लिए रोजगार परक शिक्षा का रास्ता खुला हो। तीसरा, रोजगार परक शिक्षा को स्थानीय लघु उद्योगों से जोड़ दिया जाए। उसके प्रशिक्षक विद्यार्थियों को व्यवहारिक एवं सैद्धांतिक शिक्षा दें। इससे उत्पादन का लागत मूल्य भी कम हो जाएगा और उनका स्किल डेवलपमेंट भी हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था चीन में अभी भी मौजूद है। तभी तो उसके उत्पाद के मूल्य इतने कम होते हैं कि पूरे विश्व के बाजारों में उसकी मांग बनी रहती है।” मंडल जी, “वाह फिर तो विद्यार्थी को उसी कुटीर उद्योग में नौकरी भी मिल सकती है।

मजूमदारजी, “हाँ हाँ क्यों नहीं, बल्कि कल वह स्वयं लघु उद्योग भी शुरू कर सकता है। ”मंडल जी, “वाह फिर तो गरीब भी अपने बच्चों को जरूर पढ़ाएगा। अभी तो बस साइकिल के लिए स्कूल में नाम लिखवाता है और मिड डे मील के लिए स्कूल भेजता है। ”भारतीजी, “एक बात यह भी उभर कर सामने आ रही है कि खाद्य सुरक्षा योजना और मनरेगा योजना पर फिर से बहस की जरूरत है कि इसके फायदे क्या हैं और नुकसान क्या है? मंडल जी, “इजाजत हो तो मैं भी बोलूं। भारतीजी, “क्यों नहीं आप की राय जमीन से जुड़ी होगी और इसलिए वह ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।

मंडल जी, “मेरे गांव में ही दो भाई है, एक है काम चोर। मनरेगा के लिए बुलाओ तो पेट दर्द का बहाना कर के घर पर रह जाता है। अब चुकि साल में सौ दिन का पैसा तो फिर भी मिलता है तो बैठकर ताश खेलता है। दूसरा भाई शहर जाकर दो साल से जूता बेच कर इतना कमाया कि गांव के गुमटी पर अपने बेटे का दुकान तो लगा ही दिया है और 2 कट्ठा जमीन भी खरीद ली। जो वो भी मनरेगा और खाद्य सुरक्षा योजना के भरोसे रहता तो क्या वह जमीन और दुकान खरीद पाता?” मजूमदार जी, “दरअसल खाद्य सुरक्षा योजना और मनरेगा जैसी योजनाओं की शुरुआत इस सोच के साथ हुई थी कि कोई गरीब भूख और लाचारी से न मरे। पर यह भी सच है कि मुफ्त में भोजन की व्यवस्था हो जाए तो व्यक्ति अकर्मण्य और आलसी हो जाएगा। फिर उसका विकास नहीं हो पाएगा।”

मंडल जी, “साहब जी चिड़िया भी अपने बच्चे को उड़ाने खातिर घोंसला से धकेल देती है, तब कहीं बच्चा उड़ना सीखता है, पर जो उड़ ना सकेगा तो मरेगा | ये तो प्रकृति का नियम है। ” भारती जी, “जो लघु उद्योग शुरु हो जाए और हर व्यक्ति को काम मिलना शुरु हो जाए तो वैसे भी इन योजनाओं की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। पर जब तक सरकार ऐसा कोई उपक्रम शुरू नहीं करती तब तक के लिए यह योजनाएं सरकार की मजबूरी है। सत्यार्थी, “पर जो थोड़ा सा भी इन योजनाओं के फंड पर कटौती होती है तो विपक्ष और मीडिया सरकार के ऊपर हमला बोल देती है कि यह सरकार गरीबों के दुश्मन है।

मंडल जी, “तो यह काम हम पर छोड़ दीजिए। हम जनता को संगठित करेंगे कि वे खुद ही बढ़कर इन योजनाओं को ना कर दें और लघुउद्योग, रोजगार परक शिक्षा और आर्थिक आरक्षण के लिए हम धरना प्रदर्शन और जन एकता रैली शुरू करेंगे।” भारती जी : एक और बात उभर कर सामने आ रही है। जनप्रतिनिधि सरकारी नुमाइंदे के साथ मिलकर जन विकास निधि को जनता तक सही ढंग से पहुंचने नहीं देते और उस फंड से स्वयं का विकास कर इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि कोई उनके विरुद्ध चुनाव में खड़े होने की हिम्मत न कर सके। और उनका एकछत्र राज्य चलता रहे।

”मंडल जी, “बिल्कुल सही कहा आपने। इसीलिए तो पैसे वाले को हराने के लिए पैसे वाले ही चुनाव के मैदान में उतरते हैं और बाहुबली को हराने के लिए बाहुबली। बस जनता का हित चाहने वाले पार्टी कार्यकर्ता के स्तर से ऊपर नही जा पाते। ”राजेश : इसके लिए भ्रष्टाचार विरोधी कानून को सख्ती से लागू करना चाहिए। भ्रष्टाचार पर सही ढंग से अंकुश लग सके तो व्यक्तिगत संपत्ति कम और राष्ट्रीय संपत्ति ज्यादा होने लगेगी और इस प्रकार देश का विकास हो सकेगा। ”मजुमदार जी, “कानून ऐसा बने कि संपत्ति का स्रोत बताना तो जरूरी हो ही, दूसरा, यदि एक करोड़ का संपत्ति घोषित हुआ हो और वास्तविक संपत्ति एक करोड़ से ज्यादा हो तो बाकी का सारा संपत्ति जब्त कर लिया जाय और जिस क्षेत्र से संपत्ति जब्त की गई उस इलाके के विकाश पर इस जब्त की गई संपत्ति को खर्च कर दिया जाय।”

मंडल जी सारी बातें सुन रहे थे और एक पेपर पर कुछ लिखते भी जा रहे थे। मजूमदार जी ने पूछा, “मंडल जी, कोई प्लान लिख रहे हैं शायद।” मंडल जी, “इन सारे कार्यों को एक नारा का रूप देने की सोच रहा था। नारा होगा, “गरीबी दूर भगाना है, आर्थिक आरक्षण, लघु उद्योग, रोजगार परक शिक्षा और भ्रष्टाचार उन्मूलन को इसका हथियार बनाना है। नारे का संक्षिप्त रूप भी सोच लिया है मैंने, आ, ल, रो, भी “आ” मतलब आर्थिक आरक्षण “ल” मतलब लघु उद्योग, “रो” मतलब रोजगार परक शिक्षा, “भी” मतलब भ्रष्टाचार उन्मूलन। भारती जी ने सोचते हुए कहा-, “बहुत अच्छा। आपने तो कार्यक्रम की रूपरेखा की निमोनिक्स बना दी। इस निमोनिक्स में एक बात और जोड़ी जाय। भी मतलब भ्रष्टाचार तो होगा ही, भी का एक और मतलब भी होगा “भागीदारी”। जनता की भागीदारी।

जनता की भागीदारी के बगैर कभी भी प्रजातन्त्र सफल नहीं हो सकता।” मंडल जी ने थोड़ा जी झिझकते हुए कहा-, “जनता की भागीदारी का मतलब वोट देना। वह तो हो ही रहा है। भारती जी मुस्कुराते हुए बोले-, “एक बार सत्ता मिल जाता है तो 5 साल तक वह क्या करते हैं आपको पता भी चलता है। सचिवालय में एक फाइल पर दस्तखत करने में कितने लाखों रुपए का खेल होता है क्या जनता को पता चलता है। नीतियों को निर्धारित करने की पूरी जिम्मेदारी प्रशासनिक पदाधिकारी और नेताओं की होती है और दोनों मिलकर भ्रष्टाचार की ऐसी फसल उगाते हैं कि सालों साल लाखों की कमाई दोनों मिलकर करते हैं।

क्या जनता को पता चलता है? इसलिए, सारे महत्वपूर्ण निर्णयों में जनता की भागीदारी होनी चाहिए। लोकपाल का गठन होना चाहिए। राइट टू रिकॉल की सुविधा भी होनी चाहिए, ताकि सत्ता के नशे में चूर होने की सुविधा समाप्त हो, वे जगे रहें और जनहित में कार्य करते रहें।” मंडल जी ने कहा-, “मेरा यहाँ आना सार्थक हो गया। जो दृष्टि, जो विचार यहाँ आकर मुझे मिला है उसे खुद तक सीमित नहीं रखूंगा। इस विचार को मैं क्रांति का रूप दूंगा। इन चारों को लागू करने के लिए मैं खुद भी सड़क पर उतरूँगा और अपने समर्थकों को भी उतारूंगा।” भारती जी, “अच्छी बात है। इसी आन्दोलन की तो आवश्यकता है। आप अपना राजनीतिक दल बनाइए और उसका एक खूबसूरत सा नाम दीजिए।”

मजूमदार जी ने जोड़ा, “नाम ऐसा हो कि नाम से ही पार्टी के उद्देश्य का पता चल जाए।” मंडल जी थोड़ी देर तक कागज कलम के साथ एक पेपर पर कुछ लिखते रहे फिर खिले हुए चेहरे के साथ कहा, “मेरी पार्टी का नाम होगा बीएपीएल अर्थात “बिलो टू एबोभ पोभेर्टी लाइन।” भारती जी ने प्रफुल्लित होते हुए कहा, “वाह, क्या सटीक नाम रखा है आपने। यदि आप इस उद्देश्य में सफल होते हैं तो मेरी पूरी जिंदगी को एक बहुत बड़ा मुकाम मिल जाएगा। अपने संरक्षण में मैंने कई शोध कार्य करवाए हैं पर इस शोध कार्य के रूप में आप जैसा हीरा इस समाज को मिल जाएगा यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। ईश्वर से अभी से आपके राजनीतिक सफर के सफलता की कामना करता हूं।”

  राजेश और सत्यार्थी मंडल जी को स्टेशन छोड़ने गए।  मंडल जी बेहद खुश और उत्साहित नजर आ रहे थे, कहा “कॉलेज के जमाने में पढ़ा था “कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों” फिर से दिल में वही जोश और जज्बात हिलोरे ले रहा है। आप लोगों का मेरे गांव आना मेरी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा।” राजेश ने कहा, “हमें भी बेहद खुशी है। ईश्वर करें बीएपीएल पार्टी की अवधारणा हकीकत का रूप ले सके।” सत्यार्थी, “मैं तो अभी से कहता हूं “बीएपीएल” पार्टी जिंदाबाद। अब ट्रेन सीटी दे चुकी थी। मंडल जी जल्दी से ट्रेन में चढ़ गए थे। सत्यार्थी थोड़ी देर तक ट्रेन के साथ ही चलता रहा और चलते चलते मंडल जी से कहा, “जब भी जरूरत हो हमें जरूर याद करिएगा। सब काम छोड़ कर भी हम अवश्य हाजिर हो जाएंगे

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डॉक्टर प्रभाकर भूषण मिश्रा

जन्म स्थान : जमालपुर (मुंगेर), बिहार, शिक्षा: एमबीबीएस, एमडी (मेडिसिन) रुचियां: पेंटिंग एवं लेखन
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