समीक्षा

सदानन्‍द शाही का कवि-कर्म

सदानन्द शाही की कविताएँ हर उस जगह जाती हैं जहां उन्हें जाना चाहिए

कपिलदेव

सदानन्‍द शाही दिशाओं के नहीं, दशाओं के कवि हैं। उनके यहां न बायें चलने का अतिरेक है न दायें चलते जाने की अंधता। बायें और दायें का रहस्‍य उन्हें खूब पता है। एक कविता में कहते भी हैं – ‘’ वामपंथी एक अलग तरह के दंक्षिणपंथ के शिकार थे/ दक्षिणपंथी वामपंथ के फायदे उठा लेने के फिराक में थे’’(असीम कुछ भी नहीं:: सदी के अंत का राजनीतिक परिदृश्‍य )। ऐसा भी नहीं कि दायें और बांये की आलोचना करते हुए उन्‍होंने अपने लिए कोई ‘मध्‍य-मार्ग’ चुन लिया हो। उन्‍हें खूब पता है कि ‘मध्‍य-मार्ग’ का भ्रष्‍टाचार समाज को अलग ही तरह से बरबाद कर रहा है। उसी कविता में आगे लिखते हैं-‘’ मध्‍य-मार्गी भ्रष्‍टाचार के हिंडोले पर झूलते हुए/ धर्मनिरपेक्षता की कजरी गा रहे थे ’’। कबीर ने कभी ‘अरे इन दोउ न राह न पायी ‘ कह कर अपने समय को मतिभ्रम का शिकार बना रहे दो मार्गो की आलोचना की थी। कदाचित उनके समय में आज की तरह कोई ‘मध्‍य-मार्ग’ विकसित नहीं हुआ था और किसी तीसरे मार्ग की अवस्‍थापना उनका उद्देश्य भी नहीं था। सदानन्‍द शाही कम से कम इस अर्थ में तो कबीर की याद दिलाते ही हैं कि कबीर की तरह इन्‍हें भी किसी पूर्व-प्रदत्‍त मार्ग पर चलना स्‍वीकार नहीं है।

     सदानन्‍द शाही का यह अस्‍वीकार महज कोई काव्‍योक्ति नहीं, उनके अनुभव-प्रत्‍यक्ष से प्रसूत ठोस निष्‍कर्ष है। कम लोग जानते होंगे कि सदानन्‍द शाही की राजनीतिक-वैचारिक समझ के निर्माण में दक्षिणपंथी, धर्म-निरपेक्षपंथी और वामपंथी- तीनों तरह के अनुभव-प्रत्‍यक्षों का योगदान रहा है। वामपंथ उनकी राजनीतिक यात्रा का अंतिम पडाव रहा। लगभग पैंतीस साल पहले, उनसे जब परिचय हुआ, तब तक वे बरास्‍ते विद्यार्थी परिषद और मुलायम सिंह के ‘समाजवाद’, वाम दिशा में दाखिल हो चुके थे। गोरखपुर के बौद्धिक समाज में उनकी पहचान एक अवांगार्द क्रांतिकारी कामरेड के रूप में बननी शुरू हो चुकी थी। दूसरे सहयोगी युवा कामरेडों की तरह, वामधारा के एक छोटे से ग्रुप या गुट के ‘स्‍टडी क्‍लासों’ में पढ़ाये गये विचार, सिद्धान्त या दर्शन की रोशनी में अपना भविष्य तलाश रहे थे। उस दिन वे हमसे अपने उसी ‘वामांगी पहचान’ के साथ, साहित्यिक विषयों पर बातचीत करने आये थे।तब वे शोध छात्र थे और उनका कवि व्यक्तित्व समाज के सामने प्रत्यक्ष नहीं हुआ था। एक गुट-विशेष के ‘क्रांति नायकों’ द्वारा पढाये गये विचार-दर्शन और ‘दिशा’ के प्रति उनका विश्वास कितना अगाध रहा होगा , इसका अनुमान उनकी इस कविता से लगाया जा सकता है-‘’सागर यात्रा पर निकलते समय / तुम रस्सी या लंगर भूल सकते हो / भूल सकते हो डांड/ पालें भूल सकते हो / यहां तक कि तुम नाव भी भूल सकते हो / इसके बावजूद/एक न एक दिन / किसी न किसी तरह/ पहुंच ही जाओगे ऐन मंजिल तक-अगर भूले नहीं हो / दिलो दिमाग में जगमगाता / वह कुतुबनुमा / दिशा बोधक’’

    केवल विचारों का ‘कुतुबनुमा’ लेकर साम्‍यवादी क्रांति की सागर यात्रा में उतरने वाले किस ‘घाट’ लगे, आज यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। धन का ही नहीं विचारधारा का भी अपना मोह होता है, और मोह कैसा भी हो अपने आसक्‍त को केवल और केवल डुबाता है। मध्‍यकालीन भक्‍त कवियों नें माया और मोह को यों ही नहीं सभी दुखों का मूल माना है। क्‍या ही संयोग है कि सागर-यात्रा के ही रूपक में, एक जगह तुलसी कहते हैं, ’संकर चाप जहाज/ सागर रघुबर बाहु बल/ बूड सो सकल समाज, चढे जे प्रथमहि मोह बस’’। सदानन्‍द शाही जिस काल खण्‍ड में और जिन लोगों की संगत में अपना वैचारिक निर्माण कर रहे थे , वह भारतीय समाज के लिए सर्वाधिक नया और वैचारिकता के घोड़े पर सवार होकर हवा की गति से दौड़ रहा रोमांचक कालखण्‍ड था। ‘’वाम वाम वाम दिशा समय साम्‍यवादी ‘’ (शमशेर) की संगीत लहरी से युवावों का दिलो दिमाग हमेशा गुंजायमान रहता था। उस दौर में सदानन्‍द शाही ही नहीं, तमाम बौद्धिक युवा केवल दिशा बोधक कुतुबनुमा लेकर सागर पार करने के हौसले पर सवार थे।

    प्रसंगत: यहां बिहारी का एक प्रसिद्ध दोहा‘ (‘इक भीजें चहलैं परैं….) ध्‍यान में आ रहा है। अपने आप में यह कम आश्‍चर्य जनक बात नहीं है कि जिस सागर यात्रा में, अपनी वय:संधि से गुजर रहे हजारों हजार किशोर-युवा कामरेड डूब गये , सदानन्‍द शाही ने खुद को डूबने से बचा लिया। उनके बच निकलने के कारणों का अनुमान लगाने के क्रम में जो बात पहले ध्‍यान में आती है , वह यह कि वे उस समय कामरेड बनने के साथ साथ ‘निर्गुण संत कविता में मनुष्‍य और समाज की अवधारणा ‘ विषय पर शोध भी कर रहे थे। तो कह सकते हैं कि भारतीय सामाजिक- सांस्‍कृतिक चेतना के भीतर से सहज रूप से पैदा हुए निर्गुण संतों के विद्रोही विचारों के अध्‍ययन के क्रम में ही उन्‍हें कहीं लगा होगा कि भारतीय चिंतन परम्‍परा में प्राचीन काल से चली आ रही प्रतिरोध-चेतना जिस आध्‍यात्मिक जीवन-विवेक से पैदा हुई है , वही जीवन-विवेक हमारा सच्‍चा पाथेय हो सकता है।  

    भारतीय चिंतन परम्‍परा में विचार-बहुलता को हमेशा से स्‍वीकृति मिलती आई है। बहुलता की अवधारणा ही वास्‍तव में सम्‍पूर्णत्‍व की अवधारणा है। अकारण नहीं कि यहां का हर बड़ा कवि-चिंतक दुनिया भर के वैचारिक विस्‍तारों से गुजर कर अंतत: अपने जीवन-विवेक पर भरोसा का मार्ग चुनता है। त्रिलोचन अपनी एक कविता में कहते हैं-‘’ जीवन को देखा है/ यहां कुछ और / वहां कुछ और/ इसी तरह यहां वहां / हरदम कुछ और/ कोई एक ढंग सदा काम नहीं करता’’(शब्‍दों से कभी काम नहीं चल सकता)। जिसे यह विश्‍वास हो जायेगा कि ‘कोई एक ढंग सदा काम नहीं करता ‘ वह कभी भी किसी विचारधारा या सिद्धात की पूंछ पकड कर जीवन की वैतरणी पार करने का निर्णय नहीं ले सकता। उसे किसी अंधकूप की तरफ ले जाने वाले मार्ग से अलग स्‍वविवेक का मार्ग चुनना ही होता है। त्रिलोचन ने भी आश्‍चर्य नहीं कि इसी कारण अपना मार्ग चुनने की जरूरत के क्रम में एक सानेट में कहा होगा – ‘’ मित्रो, मैने साथ तुम्‍हारा जब छोड़ा था/ तब मैं हारा थका नहीं था, लेकिन मेरा/तन भूखा था मन भूखा था। तुमने टेरा, / उत्‍तर मैंने नहीं दिया तुमको, घोड़ा था/ तेज तुम्‍हारा , तुम्‍हें ले उड़ा। मैं पैदल था, विश्‍वासी था ‘सौरज धीरज तेहि रथ चाका’………; / मुझमें जितना बल था/ अपनी राह चला। आंखों में रहे निराला / मानदण्‍ड मानव के तन के मन के/’’

    यह सब कहने का आशय सिर्फ यह बताना है कि सदानन्‍द शाही में जीवन- विवेक के प्रति भरोसा पैदा होने के पीछे गोरख , कबीर , रैदास और नानक जैसे संत कवियों की जीवन-दृष्टि का भारी योगदान रहा होगा जिससे उनकी कविता का अंतर्य निर्मित हुआ और वैचारिक अनुगामिता के मोह से मुक्‍त होकर उनकी कविता, संतों के निर्विकार जीवन की तरह अपने विवरण- वर्णन में क्रमश: अभिधात्‍मक किन्‍तु गहरी होती गयी।

सब उनका है - कविता | हिन्दवी

    सदानन्‍द शाही की अभिधात्‍मकता का अपना ही आस्‍वाद है। वस्‍तुओं या स्थितियों का विवरण-वर्णन ऊपर से तो अभिधात्मक दिखता है, लेकिन अंतस में प्रवेश करते ही जिस गहरी व्‍यंजकता से हमारा सामना होता है , उससे यह समझते देर नहीं लगती कि यह साधारणता दरअसल एक दुर्लभ किस्‍म का भाषिक शिल्‍प है। ऐसा वे अपने जीवन-बोध में पूरी तरह स्‍पष्‍ट और जमीनी होने के कारण कर पाते हैं। कठिन विम्‍बात्‍मक और प्रतीक बोझिल कविताएं पढ़ने के अभ्‍यस्‍त पाठकों को कई बार सदानन्‍द शाही की कविताएं पढ़ते समय एक विचित्र कठिनाई से दो चार होना पड़ता है। कविताओं की सहजता से तालमेल बिठाने के प्रयास में पाठक की काव्‍य रुचि नये सिरे से संस्कारित होने लगती है। उनकी कविताओं से गुजरते हुए सबसे पहले यह विचार ध्यान में आता है कि सहजता भी स्वयं में एक काव्यमूल्य हो सकता है और कविता के गुरूत्व से समझौता किये बगैर यह संभव है। उनके यहां शायद ही कोई ऐसी कविता होगी जो अपने कठिन प्रतीकों विम्बों फंतासियों या हेत्वाभाशो से पाठकों की समझ की परीक्षा लेती हों। ऐसी कविताएं जिनमें व्याख्या के लिए अवकाश न छोड़े गये हों, अर्थो और अभिप्रायों को भाषा के रचाव में गूंथ दिया गया हो , कथा और कथ्य का अंतर मिट गया हो और अर्थ की जगह एहसास ने ले लिया हो, आलोचकों के लिए हमेशा चुनौती साबित होती रही हैं।

    सदानन्‍द शाही केवल कवि नहीं हैं। न कविता उनका उपजीव्‍य है। उनका उपजीव्‍य जीवन के वे साक्षात अनुभव हैं जिसे उन्होंने स्‍वत: जी कर या कबीर और प्रेमचंद जैसे अनुभव- सिद्ध महान साहित्‍यकारों का गहरा अध्‍ययन करके प्राप्‍त किया है। वे स्‍वभाव से सर्वसमावेशी, आग्रह-मुक्‍त और अकुण्‍ठ भाव से अपने काव्‍यानुभव को निरंतर व्‍यापक और बहुआयामी बनाने के लिए प्रयत्‍नशील रहते हैं। केदारनाथ सिंह जैसे युग-श्रेष्‍ठ और ‘ट्रेंडसेटर – कवि’ का उन्‍हें सबसे ज्‍यादा स्‍नेह-सान्नध्‍य प्राप्‍त रहा। बहुत से युवा कवियों ने pकेदारनाथ सिंह से कविता के मुहावरे सीखे तो कुछ ने लगभग उनकी ‘रिप्लिका’ लिखने में खुद को बरबाद कर लिया। लेकिन यह देखना दिलचस्‍प है कि सदानन्द शाही की कविता केदारनाथ सिंह के प्रभाव से बचकर अपना रास्‍ता खुद बनाने में सफल रही है। यही नहीं, उनके पाठक यह आसानी से अनुभव कर सकते हैं कि समकालीन कविता के समूचे दृश्‍य में व्‍याप्‍त मुहावरों और वैचारिक विन्‍यासों का उनकी कविता पर शायद न्यूनतम प्रभाव भी नहीं पड़ा है। इन्‍ही अर्थो में वे खुद को कविता का अनागरिक कहते हैं, और यह सही भी है, क्‍योंकि कविता की दुनिया की नागरिकता हासिल करने के लिए समूहालाप में शामिल होने की शर्त शायद उन्‍हें मंजूर नहीं है। कविता में जीवित बचे रहने के लिए अनुकरण का रास्‍ता अपनाने की जगह फीनिक्‍स पक्षी की तरह जीवन की आग में जलकर राख होने में उन्‍हें सुकून मिलता है। इसी शीर्षक की एक कविता में कहते हैं- ‘कितना सुकून है / धीरे धीरे राख हो जाने में’ (फीनिक्‍स :: असीम कुछ भी नहीं )

    हर नये काल–खंड की अपनी कठिनाइयां होती हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों से अनभिज्ञ बहुत से कवि कठिनाइयों को ही युग-सत्‍य समझ लेते हैं। हिन्‍दी कविता में ‘कठिन समय’ अब ‘क्लिशे’ बन गया है। इसके कारण कविता समरूपात्‍मक होती गयी है और पाठकों में नैराश्‍य भरी ऊब भी पैदा हुई है। समयगत चिंताओं का विस्‍तार सदानन्‍द के यहां भी है, मगर वहां चिंता का महिमामण्‍डन नहीं बल्कि उसके परिप्रेक्ष्‍यों को उजागर करने की एक व्‍यंग्‍यपूर्ण तार्किकता- सच और झूठ में भेद करने की अंर्तदृष्टि है। एक कविता की पंक्तियां हैं- ‘’ वह सच और झूठ के दोनों ध्रुवांतों के बीच/ किसी भी सुविधाजनक स्‍थान पर / खड़ा होकर घोषित करता है/ यही है यही है –सच’’(एक पौराणिक का बयान , असीम कुछ भी नहीं ‘’

    सदानन्‍द शाही का जीवन-बोध किसी अमूर्त सैद्धान्तिक ज्ञान के अध्‍ययन से नहीं, अपितु जीवंत समाज में सक्रिय व्‍यक्तियों की मनोभौतिक गतियों को जानने और समझने की जटिल प्रक्रिया से गुजर कर बना होता है। ‘जानना’ उनके लिए एक सतत और सुदीर्घ मानवीय प्रक्रिया है जो किसी वस्‍तु या व्‍यक्ति को जानने की तमाम कोशिशों के बाजवजूद अंतत: अपूर्ण रह जाने के लिए अभिशप्‍त होती है।‘उसे कितना जानता हूं’शीर्षक कविता में कवि अपने आप से सवाल करता है– ‘मैं जिससे सालों साल प्‍यार करता रहा हूं, उसे कितना जानता हूं।‘ (सुख एक बासी चीज है)।किसी चीज को पूरी तरह से न जान पाना मनुष्‍य की सीमा है और सदानन्‍द शाही को इस मानवीय सीमा का एहसास इतना गहरा है कि अपने पहले संग्रह की शीर्षक- कविता में कहते भी हैं कि ‘’ मुझे सब कुछ सीमा में चाहिए/ प्‍यास भर पानी/ भूख भर अन्‍न/ देह भर धरती/ आंख भर आकाश/ सांस भर हवा/ आंचल भर धूप/अंजुरी भर रूप/ और जीवन भर तुम्‍हारा प्‍यार चाहिए‘’(असीम कुछ भी नहीं)।अपनी सीमा का स्‍वीकार एक रूप में कमतर में खुश और सुखी अनुभव करने की आवश्‍यकता की तरफ भी इशारा है। पूंजी के प्रभाव में बेलगाम होती लालसाएं हमारे समय को अनेक रूपों में संकटग्रस्‍त बना रही हैं। जीवन को सुखमय बनाने के लिए सबसे आवश्‍यक तत्‍व है प्‍यार। प्‍यार ही हमारी मानवीयता का मूल और प्रकृति का सार है। लेकिन बिडम्‍बना यह है कि आज के समय में यही सबसे ज्‍यादा उपेक्षित है। इस कविता की अंतिम पंक्ति में प्‍यार की अधिकतम और निरंतर आवश्‍यकता की ओर संकेत करके कवि ने एक तरह से अपने समय के केन्द्रीय संकट पर ऊँगली रख दी है।

    जाहिर सी बात है कि जानने की इस कठिनाई का बोध और अपनी सीमा का एहसास जितना गहरा होगा उसका जीवन-बोध भी उतना ही गहरा और अधिकतम स्‍तर तक भरोसे के लायक होगा। सदानन्‍द शाही ने इस कठिन प्रकिया से गुजर कर अपना जीवन-बोध अर्जित किया है। प्रवाह में न बहकर अपने मौलिक व्‍यक्तित्‍व की रक्षा करने की जद्दोजहद में ही उनके कवि व्‍यक्तित्‍व का निर्माण हुआ है। उनकी कविता में सत्‍य को एक से अधिक पहलू से देखने का दुस्‍साध्‍य प्रयत्‍न दिखता है जो उन्‍हें एक ऐसे कवि के रूप में पहचान देता है जिसे किसी सांचे में बांध कर देख पाना संभव नहीं हो पाता।

    सदानन्‍द की काव्‍य-चिन्ता के व्‍यापक दायरे में केवल अपने समय का राजनीतिक संदर्भ ही नहीं, समय के प्रभाव में जी रहे बच्‍चों, बूढों, सीधी सादी जिंदगी जी रहे लोगेां और स्त्रियों का जीवन –सत्‍य भी शामिल है। ‘बाढ में फंसे हुए लोग’, ‘संगम से नहा कर लौट रहे लोग’, ‘बच्‍चा और ‘क’ (असीम कुछ भी नहीं ), ’ चालीस पार करती हुई कुंवारी लड़कियां ‘, ‘वह बिगड़ैल लड़की ‘, ‘करती रही इंतजार’, (सुख एक बासी चीज है ) ‘एक स्‍त्री को जानना’ , ‘पत्‍नी होने की अनिवार्य शर्त’ , ‘क्‍या तुम्‍हारे भीतर की स्‍त्री जाग गयी थी’ , ‘विजय लक्ष्‍मी भाटिया के लिए ‘(माटी पानी) आदि कविताओं में मानवीय जीवन के अनेक आयामों, खास कर महिलाओं का अंतर्लोक बहुत संवेदनशीलता के साथ व्‍यक्‍त हुआ है-

बहुत दिनों बाद मिलीं देविका
तुम्‍हारे चेहरे से मधुबाला की हंसी
कहां गायब हो गयी ?
यह मीना कुमारी की उदासी कहां से ले आयीं देविका ?
तुम्‍हारे होठों का रंग उतना ही लाल हैबाल उतने ही काले
तुम्‍हारे सपनों का रंग क्‍यों उड़ने लगा देविका ?’’(असीम कुछ भी नहीं, देविका के लिए 5 )।

इसी तरह ‘सुख एक बासी चीज है’ संग्रह की, ‘करती रही इंतजार’ शीर्षक कविता में भारतीय नारी-जीवन की अनन्‍त त्रासदियों का चित्रण है। कविता के अंत में स्‍त्री, पुरुष-समाज से पूछती है-
‘’मैं इस स्‍त्री शरीर का क्‍या करूं/ जिसको लिये दिये / देवताओं/ महारथियों/ आचार्यो के कल, बल, छल का / शिकार होती रही/ पत्‍थर बनती रही/ मुक्ति के लिए/ किसी पुरूष के पैरों की ठोकर का/ करती रही / इंतजार’’

सदानन्द शाही जिस वर्ग और समाज में जीते हैं, उनकी संवेदना का स्रोत भी वही है और उनकी कविताओं के आयाम भी उन्‍हीं अनुभव-स्रोतों से निर्मित हैं। उनके यहां मजदूर किसान जीवन का किताबी जीवन-चित्र अगर नहीं है तो यह उनके कवि स्‍वभाव के बिलकुल अनुरूप है। उनकी कविताओं के संदर्भ में महत्‍वपूर्ण यह है कि कविताओं में उनके अपने मध्‍यवर्गीय समा अपने ८६ज का हाहाकार बड़ी मार्मिकता से चित्रित हुआ है- ‘’आग का दरिया हाहाकार करते हुए बहता है/ बेचैनियों का पहाड़ लिए भागता हूं/ डूब कर जाना चाहता हूं/ उस पार/ पर यह क्‍या/ लहकते हुए शोले में बदल जाता हूं/ और एकबार फिर कुंदन होकर निकलता हूं।‘’ (एक बार फिर कुंदन होकर निकलता हूं , सुख एक बासी चीज है संग्रह से )
    उनकी कविताओं में अपने समय, समाज और शासन-सत्ता के बाजारीकरण और अपसंस्कृतिकरण आदि के विरुद्ध समारोह पूर्वक हमला करने का कोई वातावरण नहीं रचा गया है। हालांकि ध्यान से देखने पर दिखेगा कि अपने समय की सामाजिक सांस्कृतिक ओैर राजनीतिक गतिविधियों के निगूढ़ आशय उनकी कई एक कविताओं में संघनित रूप से न्यस्त हैं। माटी पानी संग्रह की ‘महाभियान‘, ‘मंथराएं‘, ‘गाय पर निबंध‘, ‘मैंऔर वह‘ ‘संस्कृति क्या है‘ व्याकरण से बाहर‘ ‘झूठ जी से हालचाल‘ और ‘राजनीति हम करेंगे‘ आदि कविताओें में , हमारे समय पर सवार झूठ और प्रपंच के त्रासद दबावों की अनुगूंजे सुनी जा सकती हैं।

‘संस्कृति क्या है‘, शीर्षक कविता में, यह ‘सीन‘ देखने लायक है- ‘‘निरे जाहिल हो क्या?/इतना भी नहीं जानते?/ संस्कृति प्राचीन होती है/ भारत एक प्राचीन देश है/इसलिए जो भारतीय है/ वही संस्कृति है/…..लेकिन../ लेकिन किन्तु परन्तु की कोई बात नहीं/जो हम कह रहे हैं/वही संस्कृति है/इसे चुपचाप मान लो/इसी में भलाई है‘‘(माटी पानी)।
  कविता का यह छोटा सा टुकड़ा हमारे आज के समय में बढ़ते जा रहे सांस्कृतिक डरावनेपन को पूरी शिद्दत से उजागर कर देता है। एक दूसरी कविता -‘‘मैं और वह” में भी इसी बात को एक भिन्न तरीके से कहा गया है-‘‘गाय पर निबंध प्रतियोगिता थी/मैने लिखा-/जीवन में गाय/गाय का अमृत जैसा दूध/दही और घी भी/मैने लिखा वेदों से/कालिदास की कविता तक/विचरती हुई गाय के बारे में/मैंने लिखा-/दिलीप की गोसेवा / कृष्ण का गोचारण/और फेल हो गया/……..’’उसने लिखा/गाय हमारी माता है/हमको कुछ नहीं आता है/ और अव्वल दर्जे में पास हुआ‘‘।
  संस्कृति, जो कभी गहन विचारणा और धारणा का विषय थी, आज एक धौंस है। समय एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां ज्ञान का स्थान श्रद्धा ने और तर्क की जगह भावुकता ने ले लिया है। संस्कृति, परम्परा और अतीत के अध्यायों में अनुसंधित्सु भाव से प्रवेश करके उसकी गहनता को आत्मसात करना अब बिलकुल जरूरी नहीं रह गया है। अब अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा और विनय भाव का प्रदर्शन करते रहना ही पर्याप्त है।

समय की आलोचना का काम सदानन्द शाही व्‍यंग्‍य से लेते हैं। वे आलोचना को ही काव्यरस का मूल समझ लेने की भूल नहीं करते। वस्तुतः तो वे प्रकृति से अनुराग, मनुष्‍यता में यकीन और शांति के बारे में सोचने वाले कवि हैं। जागतिक समस्याओं की अतिशयता से आक्रांत कविताओं को लेकर उनके मन में गहरा क्षोभ है। माटी पानी संग्रह की कविता में कहते हैं- ‘‘इस तरह/दुनिया भर की समस्यायें/देश के भीतर की उठापटक/यहां तक कि दफ़्तर की फंसाहटें/गांव जवार की झंझटें/सब तुम्हें सौंप कर/ निश्चिंत हो जाता हूं/जब देखो तब/तुम्हीं से करने लगता हूं/समय का रोना गाना/ हे मेरी कविता/मुझे माफ कर देना।”(‘‘कविता से माफी”)

Information2media: नायक विहीन समय में प्रेमचंद

‘‘मैं कविता का स्थायी नागरिक नहीं हूं” सदानन्‍द शाही की सबसे चर्चित कविता है। इस कविता में वे सारे गुणसूत्र मौजूद हैं जिससे हमारी समकालीन कविता का निर्मम क्रिटीक रचा जा सकता है। कवि अपने समय की कविता के साथ हो रही क्रूरता से इतना दुखी है कि वह कविता का नागरिक ही नहीं बनना चाहता। इस कविता का महत्व यह है कि इसमें अपने समय की कविता में मचे हुए घमासानों का संक्षिप्त व्यौरा और स्वयं कवि द्वारा अभिलषित कविता की रूपरेखा की तरफ संकेत किया गया है-
‘‘कविता की दुनिया/ बस पर्यटन है मेरे लिए/ न कोई चुनौती / न कोई मोर्चा/न ही कोई किला/जहां जीतने की बेचैनी हो।” (मैं कविता की दुनिया का स्थायी नागरिक नहीं हूं)
   हिन्दी कविता का यह दुर्भाग्य है कि उसे भी ‘असल दुनिया‘ जैसी ही दुश्वारियों चुनौतियों, मोर्चाबंदियों और किला जीतने की बेचैनियों से भर दिया गया है। कविता की ऐसी क्रूर दुनिया का नागरिक बनने से कवि का इनकार दरअसल साहित्य संबंधी उस कथित प्रतिज्ञा से इनकार है, जिसे प्रेमचंद के प्रसिद्ध कथन ‘‘साहित्य जीवन की आलोचना है।‘‘ के नाम पर साहित्य पर लागू करने का अंधा प्रयास पिछले पचास वर्षो से चल रहा है। प्रेमचंद को यह अंदेशा कतई न रहा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब इस सूत्रकथन की आड़ लेकर साहित्य को ‘प्राक्सी वार‘ का केन्द्र बना दिया जाएगा। पूर्वापर संदर्भो से काटकर प्रेमचंद के इस कथन को साहित्य में शब्दश: चरितार्थ करने की जो मुहिम चलाई गयी, उस मुहिम के कारण ही कविता आज इस अंधे मुकाम तक जा पहुंची है।प्रेमचंद ने यह भी कहा था कि ‘‘साहित्यकार का काम साधारण वकीलों की तरह, अपने मुवक्किल की ओर से उचित अनुचित सभी तरह के दावे पेश करना, अतिरंजना से काम लेना और अपनी ओेर से बातें गढना नहीं है।‘‘ कहते हुए दुख होता है कि तरह तरह के धड़ों में विभाजित समकालीन कविता आज यही सब कर रही है।

   प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य का काम पाठक के दिल में सौंदर्य की अनुभूति और प्रेम की उष्‍णता पैदा करना है। और यह काम वही लेखक कर सकता है जिसकी आत्मा प्रकृति के मुक्त वायुमण्डल में पालित पोषित हुई हो। सौंदर्य-प्रेम उसका साधन है। साहित्य मनुष्‍य में इसी प्रेम-सौंदर्य को जगाने का काम करता है और यह सब प्रकृति के निरीक्षण से प्राप्त होता है। कदाचित यह प्रेमचंद के विचारों का ही बल है कि सदानन्‍द शाही हिन्दी कविता के दर्द को सार्वजनिक कर देने का जोखिम उठाते हैं और चीख चिल्लाहट से कराहती हुई समकालीन कविता की दुनिया के समानांतर (विरुद्ध नहीं) कविता की एक ऐसी नयी दुनिया की कल्पना करने का साहस

 करते है, जहां न कोई चुनौती होगी/ न मोर्चा/न किलेबंदी/ न किसी तरह की बेचैनी। वह ऐसी कविता होगी, जहां खुल कर सांस लेने के लिए भरपूर हवा होगी, जिंदगी को खुशहाली से भर देने लायक प्यार और भावुकता होगी-
‘‘छुटिटयों में आता हूं/बेपरवाह घूमता हूं/ थोड़ी सी हवा/थोड़ा सा प्यार/थोड़ी सी भावुकता/बटोर कर रख लेता हूं/जैसे ऊँट भर लेता है अपने गुप्त थैले में/ढेर सारा पानी‘‘।(वही )

  इन उद्धरणों में, कविता को लेकर कवि के मन में  पल रही चिंताओं को महसूस किया जा सकता है। कवि सम्भवतः कहना चाहता है कि व्यर्थ के दुनियावी मलहलों का भार ढोते ढोते कविता के कोमल कंधे अब बेहद कमजोर हो गये हैं। कविता को इस यंत्रणा से यदि बचाना है तो कविता को कोमल कल्पनाएं करने का अवकाश देना होगा –
काश! कि एक दिन/दुनिया भर के टैंक/सीमाओं से हटा दिये जाते/पहुंचा दिये जाते संग्रहालयों में…..सीमाओं पर होने लगती/फूलों की खेती‘‘(काश!)

  कवियों को, चराचर सृष्टि में पल प्रतिपल लिखी जा रही कविताओं को ध्यान से पढ़ना चाहिए। समूची कायनात अपने आप में कविता है। इस निरंतर घटते हुए सृष्टि-काव्य को अनुभव में उतारने की दृष्टि और संवेदना से जो सम्पन्न है, वही कवि है। कवि का काम सौंदर्य की सृष्टि करना तो है ही, प्रकृति में विखरे सौंदर्य की खोज करना भी है। सदानन्द का कवि बार बार प्रकृति की गतिविधियों में कविता को घटते हुए अनुभव करता है-
‘‘दूब की नोक पर/ ओस की तरह/ पसर रही है/ कविताएं‘‘ ‘‘यहां वहां फेकी गयीं/आम की गुठली से/अमोले की तरह /अंखुआ रही हैं/कविताएं‘‘(माटी पा

नी संग्रह, आसमान से उतर रही हैं कविताएं)। सदानन्द की कविताएँ हर उस जगह जाती हैं जहां उन्हें जाना चाहिए।

  सदानन्द किसी विमर्श के लिए ख्यात कवि नहीं है। वैसी ख्याति उनका प्रेय भी नहीं है। उनके यहां व्यक्ति केन्द्रित कविताएं भी है और स्त्रियाँ  भी बहुत हैं। विराग की मनोभूमि की कविताएं भी हैं।
    इन सब विशेषताओं के अतिरिक्‍त सदानन्‍द शाही के कवि का असल वैशिष्‍टय तो उनकी भाषा की सुचारुता ही है। कविताओं के शब्द-दर-श्‍ब्द में कवि के व्यक्तित्व की सजीव उपस्थिति महसूस की जा सकती है। भाषा में कवि की स्वभावगत निजता अलग से इतनी स्पष्ट है कि किसी के लिए भी उसका अनुकरण कठिन हो सकता है।

आलोचक और अनुवादक कपिलदेव गोरखपुर में रहते हैं। अंतर्वस्तु का सौंदर्य इनकी चर्चित किताब है।

सम्पर्क k.devtripathi@gmail.com +919651170768 

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आत्म वक्तव्य

मेरे लिए कविता एक लाठी की तरह है
सदानंद शाही

भाषा में होना मनुष्य होना है। भाषा मनुष्य होने की पहचान है और कविता भाषा में ही संभव होती है। कविता क्या है? कविता सबसे पहले भाषा की विशेष भंगिमा है। इसलिए कविता में होना सामान्यत: भाषा और विशेष रूप से अपने भीतर की मनुष्यता का उत्खनन है। भाषा की यह भंगिमा एक ओर स्मृतियों के सघन बीहड़ों की यात्रा कराती है तो दूसरी ओर कल्पना की वैकल्पिक दुनिया रचती है। स्मृतियों के बीहड़ में यात्रा करते हुए हम प्रकृति और जीवन के सघन वन में विचरते हुए राग-विराग, सौन्दर्य-उल्लास के अन्यान्य अनुभवों को पुनर्नवा करते रहते हैं। कविता में संभव होने वाली कल्पना की वैकल्पिक दुनिया यथार्थ जीवन की सीमाओं का रेखांकन करती है। इसके साथ – साथ वह हमारे सामने बेहतर दुनिया का नक्शा भी गढ़ती है-जिसे धूमिल ने कहा –जो है उससे बेहतर चाहिए। कविता इस वैकल्पिक दुनिया को गढ़ने का हौसला देती है। ऐसी वैकल्पिक दुनिया जिसका सपना बुद्ध , गोरख, कबीर, रैदास, नानक और गांधी जैसे संतों ने देखा था। मेरी कविता प्राय: इन्हीं दो विंदुओं के इर्द गिर्द आकार लेती है।

मेरे लिए कविता एक लाठी की तरह है। ऐसी लाठी जो टिक कर खड़े होने का सहारा भी दे और जीवन की रपटीली राह पर चलते समय हमसफर की तरह साथ रहे। मुझे कभी-कभी कविता एक ऐसे कंधे की तरह मिलती है, जिस पर सिर टिका कर खूब रोया जा सके।हमारी दुनिया में ऐसी जगहें बहुत कम हैं जहां खुल कर रोया जा सके। कविता यह जगह मुहैया कराती है। कविता हमें हमारी विफलताओं , कमजोरियों और पराजयों के बीच जीवन के सौंदर्य का प्रकाशन करती है। इतिहास और कविता दोनों स्मृतिगर्भी होते हैं। दोनों में फर्क यह है कि इतिहास विजय गाथाओं को दर्ज करता है जबकि कवितायें पराजयों को दर्ज करती है। ‘सत्यमेव जयते’ हम पढ़ते-सुनते रहते हैं लेकिन जीवन में सत्य पराजित भी होता है। कविता ऐसे ही पराजित सत्य की पीठ थपथपाती, ढाढ़स बढ़ाती आती है।

सदानन्द शाही

कुशीनगर जिले के छोटे से गाँव सिंगहा में 7 अगस्त 1958 को जन्म। हाईस्कूल तक की पढ़ाई गाँव के ही विद्यालय में। इंटरमीडिएट निकट के कस्बे रामकोला से। उदित नारायण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पडरौना से 1981 में बी. ए.।वहीं छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे।इसी महाविद्यालय में केदारनाथ सिंह प्राचार्य रहकर जे एन यू जा चुके थे। पडरौना शहर और महाविद्यालय में केदारनाथ सिंह की अनुगूँज बनी और बची हुई थी।कविता लिखने की प्रेरणा इन्हीं अनुगूंजों से मिली। एम.ए, और पी-एच. डी. गोरखपुर विश्वविद्यालय से। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग में प्रोफेसर। भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के संस्थापक – समन्वयक रहे। प्रेमचंद साहित्य संस्थान के संस्थापक एवं निदेशक। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला के एसोसिएट (2002), जर्मनी की डाड फेलोशिप के तहत साउथ एशिया इंस्टीट्यूट हाइडेलबर्ग, जर्मनी में विजिटिंग फेलो (2003)। हम्बोल्ट, विश्वविद्यालय बर्लिन, जर्मनी, Ecole Partique des Haustokn Etudes, पेरिस, फ्रांस तथा इटली के तीनो विश्वविद्यालय में कबीर विषयक व्याख्या एवं काव्य पाठ।

विश्व भोजपुरी सम्मेलन, मॉरीशस (2000, 2009, 2014) में शिरकत। न्यूयार्क अमेरिका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन (2007) में भारत सरकार के प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य। भोजपुरी एसोसिएशन, सिंगापुर के निमंत्रण पर सिंगापुर यात्रा (2017)। मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा भोजपुरी सेवा के लिए ‘विश्व भोजपुरी सम्मान’ (2014) से सम्मानित। हिन्दी और भोजपुरी की सेवा के लिए शब्दम् सम्मान (2017) प्रकाशन : अपभ्रंश के धार्मिक मुक्तक और हिन्दी सन्त काव्य (लोकभारती प्रकाशन, 1991), हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचर का हिन्दी अनुवाद (लोकायत प्रकाशन, 1998), असीम कुछ भी नहीं (कविता संग्रह, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 1999), दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचंद (प्रेमचंद साहित्य संस्थान, 2000), स्वयंभू (साहित्य अकादमी, 2002), हरिऔध रचनावली (दस खण्डों में, वाणी प्रकाशन, 2010), परम्परा और प्रतिरोध (हिन्दी अकादमी, 2010), सुख एक बासी चीज़ है (कविता संग्रह, प्रतिश्रुति प्रकाशन, 2015 ) जनपदीय अध्ययन की भूमिका (सम्पादन, भोजपुरी अध्ययन केंद्र, बी॰ एच॰ यू॰ 2017 ), माटी पानी(कविता संग्रह, लोकायत प्रकाशन, 2018) मुक्तिबोध :आत्मा के शिल्पी (सम्पादन, लोकायत प्रकाशन 2020) , गोदान को फिर से पढ़ते हुए (सम्पादन , 2020, ई संस्करण ), मदन मोहन मालवीय :शिक्षा और स्वाधीनता(ई संस्करण , 2021) मेरे राम का रंग मजीठ है(काव्यांतरण, 2021 , लोकायत प्रकाशन )। बांग्ला और अंग्रेजी से हिन्दी में कुछ अनुवाद प्रकाशित कबीर, रैदास, पलटूदास और प्रेमचंद पर किताबें प्रकाश्य साहित्यिक पत्रिका ‘साखी’ और ‘कर्मभूमि’ का सम्पादन। ‘मातृभाषा की नागरिकता'(प्रकाश्य)।

सम्पर्क : साखी, एच 1/2, वी. डी.ए. फ्लैट, नरिया, बी.एच.यू. वाराणसी-221005 मो. : 09450091420, 9616393771 : sadanandshahil@gmail.com

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samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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Sadanand Shahi
Sadanand Shahi
3 years ago

आभार बंधुवर कपिल देव और श्री किशन कालजयी को,यह टिप्पणी लिखने और प्रकाशित करने के लिए।

Samrita Yadav
Samrita Yadav
3 years ago

प्रोफेसर सदानंद शाही जी की कविताओं पर बहुत ही सुंदर टिप्पणी। शाही जी की कविताएं जिस तरह व्यक्ति मन को बांधती हैं उसका हूबहू वैसा ही चित्रण आपके आलेख में है। मुझे भी माटी-पानी कविता संग्रह पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, जिस संग्रह की कुछेक कविताओं का जिक्र यहाँ हुआ है। असीम कुछ भी नही और सुख एक बासी चीज़ है अब तक नही पढ़ पाए , कुछ कविताओं की पंक्तियां यहां उद्धृत हैं जिन्हें पढ़ कर इन दोनों काव्यसंग्रहों को पढ़ने की इच्छा हो रही। बहुत बहुत धन्यवाद सर बेहतरीन लेख के लिए

समीर कुमार पाठक
समीर कुमार पाठक
3 years ago

वाह, वाकई बहुत बढ़िया लिखा आपने।बेहतरीन। उत्साहधर्मी संवाद की तरह इस टिप्पणी को पढ़ने का भी अलग सुख है। पूरा पढ़ गया। बहुत रचनात्मक ढंग कवि-कर्म और काव्य-मर्म की एक संतुलित समीक्षा । बधाई।

Last edited 3 years ago by समीर कुमार पाठक
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