फणीश्वर नाथ रेणु

नेपथ्य का अभिनेता ही नेपथ्य का भारत है

 

  • मृत्युंजय

 

कोई भी रचनाकार नेपथ्य का नायक होता है। रेणु को इसका अहसास था। स्थितियों ने उनके जीवन काल में ही यह अहसास और गहरा कर दिया था। यही वजह थी कि उन्होंने कहा था, लेखक को केवल कलम से नहीं, काया से भी लिखना चाहिए। यही रेणु को फ्रंटलाइनर बनाता है।

भुतलाई पीढ़ी का लौटना

ऐसे फणीश्वरनाथ रेणु के  जन्म का यह सौंवा वर्ष है। पहला जन्मदिन हो या जन्मशताब्दी साल, होता वह उत्सव का अवसर है। रेणु बिहार के थे। इसीलिए सम्भवतः बिहार जिनकी जन्मभूमि है, वे अपनी पहली जिम्मेदारी समझ कर रेणु को याद कर रहे हैं और करा भी रहे हैं। यह तब भी जबकि लेखकों कवियों को  भुलाने की आदत हमारी परम्परा और संस्कृति में बदल चुकी है। खासकर हिन्दी प्रदेशों में।

रेणु के बहाने याद करने की यह शुरुआत सिलसिला बनकर हमारे संस्कार का हिस्सा बन जाए काश ! हिन्दी प्रदेशों की शान कुछ बढ़ जाए। अस्तु!

रेणु हिन्दी कथा साहित्य के एक नायक हैं। इसी नाते हम उन्हें याद कर रहे हैं। जब हम रेणु को याद करते हैं तो इसी मैदान के दो और महारथियों की याद आती है। पहले हैं देवकीनन्दन खत्री और दूसरे हैं प्रेमचन्द। देवकीनन्दन खत्री बिहार के  थे। मुजफ्फरपुर से बनारस आ गये थे। रेणु भी तीन साल बनारस में रहे।वहाँ पढ़ाई की। यह दौर था सन् 1939 से 1941 का।

कथा साहित्य में देवकीनन्दन खत्री के महत्व से हम सब वाकिफ हैं । हम सब जानते हैं कि देवकीनन्दन खत्री ने ऐसी कथालिखी, कि खड़ी हिन्दी सीखने का एक अभियान चल पड़ा था। देवकीनन्दन खत्री ने हिन्दी समाजों में अपना ग्लोबल पाठक तैयार किया। इसके बाद आते हैं प्रेमचन्द। इन्होंने कंटेंट तो बदल दिया, लेकिन देवकी नन्दन खत्री ने जिस खड़ी हिन्दी का विपुल पाठक वर्ग तैयार किया था, उसे प्रेमचन्द ने कैटर किया। प्रेमचन्द को भी हिन्दी समाज का ग्लोबल पाठक मिला। प्रेमचन्द के बाद ऐसा कोई लेखक मैदान में नहीं आया कि वह हिन्दी समाज के ग्लोबल पाठक को कैटर करे। निश्चित ही आजाद भारत में रेणु ही ऐसे कथा लेखक हैं, जिन्हें पाठकों ने सबसे ज्यादा पढ़ा है। बार-बार पढ़ा है।

लेकिन कब तक और कितना पढ़े गये रेणु? पिछले चालीस साल में कितना पढ़े गये। पिछले चालीस साल में कथा साहित्य के पाठकों की तादाद और कथा पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। इनमें से रेणु के हिस्से कितने आये? पिछले चालीस साल में हिन्दी में बहुत सी कहानी पत्रिकाओं ने अपनी जगह बनाई है, किसने याद किया रेणु को? क्या हिन्दी पाठकों या हिन्दी लेखकों का कोई ऐसा समूह है, जो कह सके कि वह रेणु को पढ़ कर जवान हुआ है?  या रेणु की जुबान  बोलता है? शायद नहीं।

लेकिन इससे रेणु का महत्व कम नहीं होता। कई बार हम अपनी दरकारी धरोहर हेरा देते हैं और खुद भुतला जाते है। रास्ते और मील के पत्थर अपनी जगह पर बने ही रहते हैं। क्या रेणु के जन्मशताब्दी वर्ष को भुतलाई पीढ़ी के लौटने के अभियान के रूप देख सकते हैं। देखा ही जाना चाहिए। लेकिन क्या पता जैसे ही शताब्दी साल समाप्त हुआ, सब तसला कड़ाही लेकर चल दिए अपने अपने रास्ते।

1977 में कलकत्ता से रविवार का प्रकाशन आरम्भ हुआ। पहला अंक निकला और कवर पर रेणु की अकेली तस्वीर थी। सम्पादक को ऐसा करना युक्तिसंगत क्यों लगा होगा? इसलिए लगा होगा कि रेणु राजनीति और साहित्य में बदलाव के ऑयकन थे। नायक थे। रविवार ने इन्हें आमुख पर रख कर अपने नजरिए का संकेत भी दे दिया था।

ऐसा किसी और ने नहीं किया, तो क्या यह मानना उचित रहेगा कि रेणु जिस तरह का हिन्दुस्तान बनाना चाहते थे, वैसा हिन्दुस्तान चाहने वाला कोई न रहा? क्या यह सच है ? अगर वाकई सच है तो शनि संकेत है। अगर शनि संकेत है तो संता – बंता क्या करे? गनपत तो अब है नहीं। उसे बेदखल किया। निकाल बाहर किया। वही गनपत जो आलू का भुर्ता और गरम भात खा कर अघा हो जाता था। खंझरी बजा बजा कर गाता था। उसके बारे में ज्यादा जानना है? आत्म साक्षी पहुँच जाइए। वहाँ उसकी कथा विस्तार से है। बेदखल किए जाने की पूरी कहानी।

एक दूसरी वजह भी रही होगी। तब बिहार वह राज्य था, जहाँ हिन्दी की किसी भी पत्रिका की सबसे अधिक प्रतियाँ बिकती थीं। जितनी बिकती थीं, निश्चित रूप से उससे अधिक पढ़ी जाती थीं। रविवार को भी पाठक चाहिए था। विशाल चाहिए था। वह बिहार में था। हुआ भी ऐसा ही, रविवार सबसे अधिक बिहार में ही पढ़ा जाता था। रेणु ने वह रास्ता आसान बना दिया था। ऐसा था बिहार के जनमानस से रेणु का रिश्ता।

रेणु हीरो थे। हीरो जयप्रकाश नारायण भी थे। दोनों में बयालीस से ही हीरो के गुण दिखने लग गये थे। साहित्य ने रेणु को और झकास हीरो बना दिया। रुकिए, झकास पर नाक भौं मत सिकोड़िए। रेणु की कहानी में आया है यह शब्द।  वे दोनों गौरव भी बने। बिहार के गौरव और भी कई हैं, मगर रेणु जैसा कोई नहीं।

कैसा हिन्दुस्तान रेणु का

रेणु को कैसा हिन्दुस्तान चाहिए था? अगर यह जानना हो तो अट्ठारह साल की फुलमतिया को देखिए, जो अपनी माँ को अगोर कर बैठी है। उसका तेवर देखिए। मिजाज देखिए। समझदारी देखिए। संकल्प देखिए। सब देखते ही बनता है। वाह ! क्या जज्बा है उसका ! नदी के बहाव को मोड़ने की कुव्वत रखती है फुलमतिया। मोड़ देती है। आज कहीं मिल जाए फुलमतिया तो उसके साथ एक सेल्फी बनती है।

उसके साथ सेल्फी लेने के लिए उसके ठिकाने पर जाना होगा। उसका ठिकाना है : भित्तिचित्र की मयूरी। भित्तिचित्र की मयूरी यानी फुलमतिया। कैसी मयूरी? ऐसी मयूरी जो न नाचती है न नचाई जा सकती है। क्या बिम्ब, क्या रूपक। एकदम टटका। ऐसा कि पहले नहीं पढ़ा ऐसा कि कुछ भी अलग से न कहना  पड़े।

अब फुलमतिया के तेवर का जलवा देखिए  :

कैसे निपटती है तोफा काका से?

– तुम क्यों आ टपके बीच में? हंसनाहा मर्द पदनाहाँ घोड़ा। भागो यहाँ से।

सरपंच आया बीच में। सरपंच हैं ताहा मियाँ। सरकारी आदमी की तरह डांटा था फुलमतिया को। देखिए कैसे किनार किया उसको  :

– आज हमसे जो भी लगेगा उसको नहीं छोड़ेंगे चाहे सरपंच हो या खरपंच।

सर को खर बनाने का हौसला…

एक दम दो टूक फुलमतिया। कहीं कोई लाग लपेट नहीं।

किसी ने उसे खबर दी , निसपेकटर आया है उसकी माँ को रेस्ट करने, तब उसका फुंफकार :

– जान निकल जाए या लहाश निकल जाए

हिन्दी कहानी में शायद ही मिले फुलमतिया का जोड़ीदार। एकदम फरहर। माशाअल्लाह ! क्या नूर टपकता है फुलमतिया की झाड़ में, ऐसा कि झाड़ा निकाल दे।

आगे उसकी मुलाकात है सनातन बाबू से। देसवाली जेंटलमैन। उसकी कोशिश है, गाँव के हुनर और प्रतिभा को शहर ले जाना। विकास का रास्ता खोलना। लेकिन विकास का यह रास्ता नहीं मंजूर था रेणु को। रेणु की कामना थी हुनर और प्रतिभा अपनी माटी के साथ रहे। विस्थापित न हो।

फुलमतिया एकदम साफ है, अपना डीह छोड़कर नहीं जाएगी। एकदम नहीं । गौर करिए, जिस माँ को जेहल न जाने देने के लिए जान देने और लहाश देने की बात कहती है, उसी माँ के लिए फुलमतिया कहती है, माँ जाना चाहती हैं शहर चली जाएँ, हम तो गाँव में रहेंगे। फुलमतिया के सामने कोई लोभ लालच काम नहीं करता। ऐसी संकल्पी है फुलमतिया। रेणु जिसे कहते हैं जिद्दी।

फुलमतिया अपनी जिद और सोच से सनातन का रास्ता मोड़ देती है। जो सनातन गाँव से शहर की ओर सड़क बना रहा था, उसे उसने पलट दिया। अब जो नया रास्ता बना, फुलमतिया के मनमाफिक, वह था शहर से गाँव की ओर आने का। इसी रास्ते से शहर से पैसा आयेगा, जब लोग अलग अलग शहरों से गाँव में हुनर सीखने आएँगे।

गाँव की स्वायत्तता भी बनी रहेगी। गाँव की माली हालत भी ठीक होगी। अर्थव्यवस्था भी गाँव की ठीक होगी। गाँव बचा रहेगा। हुनर और हुनरी भी विस्थापित नहीं होंगे। ऐसे ही हिन्दुस्तान की थी रेणु की चाह। कोई शक? इसी चाह की राह बनाती है फुलमतिया। रेणु की यह कहानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्राम स्वराज का माँगपत्र है।

लेकिन हिन्दुस्तान बना कैसा?

कैसा बना, एक ओर शर्ट के भीतर से निकलती तोंद, अगल बगल से झूलती चर्बी और दूसरी ओर बनियान के भीतर खाली पेट, हड्डिय ढाँचा। जगजाहिर। पत्ता पत्ता बूटा बूटा गवाह। पत्ता और बूटा भी तबाह। बेशर्म भारत।

गाँव की प्रतिभा शहर में, संपदा शहर में, गाँव के कारीगर और मजदूर शहर में। गाँव खाली ऐसा कि बदहाली। बदहाली ऐसी कि कंगाली। क्या किसान क्या कलाकार! सब भूखे। कई कई दिनों तक का फाका।

– साहेब एक्सक्यूज मी, फॉर लास्ट टू डेज आय एम हंगरी। माँगने की हिम्मत नहीं होती किसी से।

यह हाले बयान है एक कलाकार का, जो ‘ नेपथ्य का अभिनेता’ में है।  अपनी बदहाली से परेशान फारबिसगंज पहुँच कर चाय की दुकान पर अपना हुनर अपना अभिनय दिखा कर पेट पालने की कोशिश करता है।

ऐसी हो गयी एक कलाकार की दयनीय स्थिति। जिसे वह सबकी नजर से बचा कर दो वक्त की रोटी माँग रहा है। यह कलाकार कौन था?   यह कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा नहीं था। पहुँचा हुआ अभिनेता था। जो पार्ट खेल देता था, वह भुलाए नहीं भुलाया जाता था । याद में धंस कर बैठ जाता था। असली कलाकार है। पन्द्रह नाटक कम्पनी में काम कर चुका है। लेकिन हाल  यह है :

– साहब, अब कहाँ की कम्पनी और कहाँ का थियेटर ,सबको फिलम खा गयी ..

वह कलाकार पारसी थियेटर का शेषांक है, जिस हाल में वह पहुँचा है, उसमें विकास का हाथ है। विकास का हाथ खून से रंगा हुआ है। रेणु विकास को रंगे हाथ पकड़ते हैं। समझते हैं।

समझ बूझ कर ही रेणु फुलमतिया को आगे लाए थे, सनातन बाबू का रास्ता काटा था कि फिर कोई कलाकार गाँव गाँव घूम कर भीख माँगने को मजबूर न हो। लेकिन ऐसा कहाँ हो पाया। आज भी लोगबाग की अंतड़ी पतड़ी भूख से ऐंठी रहती है। कितने अभागे हैं रेणु कि साठ साल पहले का दर्द आज भी भारत का नासूर है। रेणु ने कितनी पीड़ा से कहा था : भारत की आजादी अधूरी है आज भी जनता  भूखी है।

आजादी अधूरी है कहने वाले बहुतेरे हुए मगर जनता भूखी है, कहने वाला? जब रेणु भूखी जनता का पाठ लिख रहे थे, हिन्दी साहित्य में राहों का अन्वेषण और आत्म अन्वेषण का दौर चल रहा था (संदर्भ तार सप्तक और दूसरा सप्तक)। कविता में नयी कविता – कहानी में नयी कहानी।  पंजा लड़ा रहे थे रेणु इनसे अपनी कथा कहानियों के माध्यम से । यह सोच कर निर्मल वर्मा का माथा ठनक जाता था कि उनका लिखा रेणु भी पढ़ेंगे। अज्ञेय और निर्मल वर्मा रेणु के महत्व को समझते थे। दोनों सर्जकों ने रेणु पर आलेख लिखा था।

यह  हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के जड़ जमाने का जमाना था। आधुनिकता का एक अर्थ शहर, मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग के लिए जगह खाली करवाना था। यह महज संयोग नहीं है कि पिछले साठ साल से हिन्दी कहानी के पूरे क्षेत्रफल पर मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग का कब्जा है। लेखक भी, पात्र भी और परिवेश भी।

शहर कैसे हैं? वहाँ के लोग कैसे हैं? जैसे हैं, वे रेणु को पसन्द नहीं। कस्बे की लड़की शहर आ गयी है। सरोज देहात से आई है। उसे शहर में जाने के लिए एक पुरुष का साथ अनिवार्य रूप से चाहिए। रेणु जिसे कहते हैं सशस्त्र गार्ड।  क्योंकि शहर में जगह जगह बैठे हैं हिंस्र पशु। शहर का एक चाल चलन ऐसा है। शहरी सोच की दूसरी झलक तब मिलती है जब कालाजाम जैसी काली रंग की सरोज को देखकर नेशनल पार्क में कलकत्ता से गये मुखर्जी बाबू की परिवार की लड़कियों की चीख निकल पड़ती है। रेणु की कहानी कस्बे की लड़की की पंच लाइन है :

– नेशनल पार्क में आकर कोई भी जानवर हिंस्र नहीं रहता, लेकिन आदमी जानवर बन जाता है …

क्या शहर के  चरित्र के इन्हीं पक्षों को खुलासा करने के लिए रेणु ने यह कहानी नहीं लिखी? नेशनल पार्क और कुछ नहीं शहर का रूपक है।

रेणु का पूरा परिवार

आधुनिकता की पहली मार गाँव, लोक संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर। आधुनिकता का आखिरी मकसद इन्हें – गाँव, लोक संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था –  मुख्य मंच से ढकेल कर नेपथ्य में ले जाना। रेणु  नेपथ्य के अभिनेता की झलक भर नहीं दिखलाते, उन्हें फ्रेम में ले आते हैं, फोकस करते हैं। इतना भर ही नहीं, वे नेपथ्य के प्रवक्ता भी बनते हैं।  हिरावल दस्ता भी।

आधुनिकता और प्रगतिशीलता में लेनदेन का ताल्लुक है। दोनों एक ही परात में सजने वाले जरूरी व्यंजन हैं।  रेणु प्रगतिशीलों की खबर अपनी कहानियों में लेते हैं।’अग्नि संचारक ‘, ‘अगिन खोर ‘ और भी कई ऐसी कहानियाँ खबर लेती तोप कहानियाँ हैं। दंगल के लिए ललकारती कहानियाँ हैं। तभी तो प्रगतिशीलों ने उन्हें रिंग से बाहर रखने की शर्तें लिखीं। उनके एलिजबल होने पर ही सवाल खड़े करते रहे।

यहाँ यह गौर करना है कि रेणु ने नेपथ्य का अभिनेता में 1929 को बहुत बल देकर याद किया है। क्यों? ऐसी क्या गरज पड़ी? क्या महत्व है 1929 का?  1929 दो कारणों से उल्लेखनीय है।1929 में दुनिया की सबसे बड़ी मन्दी आई थी। हालाँकि इस मन्दी का भारत में कोई गहरा असर नहीं पड़ा था। लेकिन यह सच है कि अर्थव्यवस्था भारतीयों की चिन्ता का विषय बन गयी होगी। रेणु की ये दोनों कहानियाँ ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ और ‘नेपथ्य का अभिनेता’ आर्थिक चिन्ता से उपजी कहानियाँ है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तलाश करती कहानियाँ हैं। प्रेमचन्द की एक बहुत पढ़ी गयी कहानी है : ईदगाह। ईदगाह भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की माँग करती कहानी है। इस कहानी में प्रेमचन्द की माँग है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था ऐसी हो जिसमें आवश्यकता और मनोरंजन, दोनों की व्यवस्था करने की क्षमता हो। कमलेश्वर की भी एक कहानी है,  ‘राजा निरबंसिया’। यह कहानी भी आर्थिक चिन्ता से उपजी कहानी है।सम्भव है भारत की किसी भाषा में फॉरेन इंवेस्टमेंट को केंद्र में रखकर लिखी पहली कहानी हो।

1929 की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लाहौर में इसी वर्ष काँग्रेस का अधिवेशन हुआ था, जिसमें सम्पूर्ण आजादी का प्रस्ताव पास हुआ था। आर्थिक आजादी के बिना सम्पूर्ण आजादी कैसी होती है, इसका नजारा हमने कोरोना की अफरा तफरी में देखा है। जो आर्थिक व्यवस्था है उसमें गाँव नेपथ्य में है। गाँव में आर्थिक इम्यूनिटी न के बराबर है। वाट लगा रखी है गाँव की, किसान की, जमीन से जुड़े कलाकारों की।

रेणु इसी चिन्ता में साहित्य से सड़क तक सक्रिय रहे। मगर अफसोस, उनकी उपेक्षा साहित्य और राजनीति दोनों जगहों पर हुई। रेणु ऐसी एक्स रे मशीन हैं, जिससे चादर के भीतर की सारी हरकतें फिल्म पर उतर आती हैं। मगर रेणु को कोना करना आसान नहीं था। मुख्तारों के किए भी न किए जा सके। हालाँकि नामवर सिंह ने मैला आंचल पर अपने सम्पादन में आलोचना में लेख छापा था। वह लेख मैला आंचल के महत्व का रेखांकन था, परन्तु उसी लेख का आश्रय लेकर रामविलास शर्मा ने शिकार किया। मगर शिकार किया न जा सका। कलम के बोल विस्फोट करते ही हैं। रेणु खलास न किए जा सके।

mrityunjoy

लेखक प्रबुद्ध साहित्यकार, अनुवादक एवं रंगकर्मी हैं।

सम्पर्क- +919433076174, mrityunjoy.kolkata@gmail.com

samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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