फणीश्वर नाथ रेणु

नित्य लीला : पुरुष मन से स्त्री का प्रतिवाद

 

‘रेणु’ का नाम आते ही सिर्फ ‘रेणु’ याद नहीं आते बल्कि उनके साथ बिहार की लोक संस्कृति से जुड़ी वह सारी चीजें याद आती हैं जिसे हमने या तो भुला दिया है या बेच दिया है। लोक का बाजारीकरण रेणु की बरबस याद दिलाता है। ‘रेणु’ का साहित्य बिहार के मिथिला हिस्से के लोक की सबसे मजबूत दीवार है। अपने लोक के प्रति रेणु की आस्था उनके लेखन के एक–एक शब्द में झाँकती है। आज जब हमने अपने लोक को विस्मृत कर दिया है तब रेणु और प्रासंगिक हो जाते हैं। गंवई संस्कृति की तमाम चीजें अब केवल स्मृतियों में रह गई हैं। रेणु का होना मिथिला के लोक का होना महसूस होता है।

रेणु को पढ़ते पढ़ाते ‘मैला आंचल’ की याद आती है। ‘संवादिया’, ‘तीसरी कसम’, ‘लाल पान की बेगम’ और ‘पंचलाइट’ की याद आती है। रेणु को पढ़ते हुए उन किरदारों को समझती हूँ तो लगता है हीरामन ‘इस्स! करके पीछे खड़ा हो गया है। गोधन सनीमा का गाना गाते हुए मेरे पास से गुजर रहा है । यह सभी पात्र अपनी अलबेली भाषा, अनोखे खान-पान और भदेस रहन सहन में रचे बसे हैं। गोधन का गीत जब कानों में बजने लगता है तब लजाती शर्माती मुनरी का चेहरा बुलाने लगता है। प्रेम में डूबी हुई लेकिन व्यवस्था के हाथों बंधी हुई हीराबाई के चेहरे की उदासी को रेणु के अलावा और कौन व्यक्त कर सकता है। रेणु की कहानियों के पात्र अनपढ़ हैं, गंवार है, भदेस हैं, लंपट हैं लेकिन आलोचकों के लिए उनकी कहानियां चुनौती हैं। अत्यधिक आलोचनाएँ  नीरस होती है जबकि रेणु रस से भरे हुए हैं। रेणु की कहानियां तो नौ रसों से सराबोर हैं। बोली का रस, उदासी का रस, प्रेम का रस, ढोलक, तान, हारमोनियम और मजीरे की ताल का रस। यह सब हमारी थाती है। जो रेणु की कहानियों में सुरक्षित है।

‘नित्य लीला’ रेणु की आरंभिक कहानी है। इस कहानी में कृष्ण की लीलाओं को आधार बनाकर आम जन-जीवन की गतिविधियों को अभिव्यक्ति दी गई है। अपनी जटिलता के कारण यह कहानी कम चर्चित हुई लेकिन एक बात स्पष्ट है कि इसमें रेणु जो कहना चाहते हैं वह ठीक से कह नहीं पाए हैं। इसलिए कहानी की चर्चा बहुत कम हुई तो इसलिए कि इसकी चर्चा खुद रेणु ने बहुत कम की आलोचकों ने बिलकुल भी नहीं की ।

रेणु इस कहानी में किसन और उसके माता-पिता को एक साधारण परिवार के रूप में व्यक्त करते हुए लौकिक और अलौकिक भेद को मिटाने का प्रयास करते हैं। हिंदी ही नहीं विश्व साहित्य में कृष्ण की लीलाओं का कोई तोड़ नहीं है। इसलिए उन्हें लीलाधारी कहा जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी लीलाओं की भूमिका भी उनके द्वारा ही  बनाई जाती है। बाल लीला से लेकर युद्ध के मैदान तक लीला ही लीला है।  सूरदास ने जो कृष्ण के बारे में लिखा है उससे गुजरे बिना कृष्ण पर लिखा कुछ भी पूरा नहीं होता। रेणु ने भी कहानी का आधार वहीं से लिया है।

कहानी शुरू होती है किसन के घर में गर्ग के आने से। यशोदा और नन्द के घर में गर्ग तभी प्रवेश करता है जब किसन वहां नहीं होता। गर्ग के प्रति कृष्ण के मन में क्रोध है, क्योंकि वह ज्योतिष के कर्म काण्ड का झांसा देकर उनके परिवार को ठगता है। कुछ न कुछ गृह-नक्षत्र का उल्टा सीधा पाठ पढ़ाकर सबके चेहरे पर उदासी भर जाता है। किसन सब झेल सकता है लेकिन माता-पिता के चेहरे पर विषाद और दुख नहीं। कहानी के शुरू में ही गर्ग के कर्म-काण्ड का विरोध कर रेणु अपनी प्रगतिशीलता का उदाहरण दे देते हैं। रेणु अपने साहित्य में सामाजिक विसंगतियों के विरोध के लिए जाने जाते हैं। उनका यह विरोध कहानी के पहले ही पृष्ठ पर दर्ज हो जाता है। इसका कारण यह है कि वह साहित्य लेखन के साथ कई सामाजिक सुधार आंदोलन से जुड़े हुए थे। किसन, नन्द, जसुमति और गायों के माध्यम से कहानी आगे बढ़ती है जिसमें किसन की चुहल कहानी का प्राण तत्व है।

साधारण सी कृष्ण लीलाओं से आगे बढ़ती कहानी में मोड़ तब आता है जब उसमें योगमाया(गोरी) का आगमन होता है। योगमाया के माध्यम से रेणु समाज में लड़की (स्त्री)  जीवन की तमाम विडंबनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। योगमाया का आगमन बड़े ही नाटकीय ढंग से होता है। वह खुद को कंस की भांजी बताती है। गली-गली घूमकर नन्द महर के घर का पता पूछ रही है- ““गोकुल की गलियों में, गैर भूल एक गोरी किशोरी भटक रही है और नन्द यशोदा का घर पूछ रही है-‘कोई बतइयो जरा ! नन्दमहर की हवेली को किस राह जाऊँ?”[1]जैसे ही लोगों को पता चलता है कि वह कंस की भांजी है लोग उसे राक्षसनी कहते हैं-““पड़ोस की कोई ग्वालिन चिल्ला चिल्ला कर लोगों सचेत कर रही थी- ‘कंस की भांजी आयी है। होशियार ! कंस की भेजी हुई है।”[2] उससे खौफ खाएं ग्रामवासी जब यशोदा को यह संदेश देते हैं तो खुद यशोदा भी उसे राक्षसनी कहती है। यह स्त्री जीवन की सबसे दुखद स्थिति है जब खुद मां अपनी बेटी को नहीं पहचान पा रही है और उसे राक्षसनी कहकर अपमानित करती है। योगमाया पहले तो खुद को उसकी बेटी बताते हुए उसका स्नेह पाना चाहती है। वाचाल योगमाया कहती है- ““ओ माँ ! तू दूसरे की बात को सच और अपनी बेटी को झूठ समझती है? कंस का भांजा घर में पलता है उसके लिए इतना दर्द?… न जाने कैसी घड़ी में मेरा जन्म हुआ कि सभी मुझे दुरदुराते हैं।”[3] योगमाया प्रतिवाद करती है कि आखिर वह छलिया, काला कलूटा किसन भी तो उसी कंस का भांजा है तो उसे घर से क्यों नहीं निकाला जाता है। रेणु स्त्री जीवन की इसी त्रासदी तक पहुंचना चाहते हैं। जो उस घर में पैदा हुई उसका वहां पर कोई अधिकार नहीं है। जो पराया है वह सबको प्यारा है क्योंकि वह पुरुष है।

कहानी का सबसे खूबसूरत पक्ष योगमाया ही है। रेणु की कहानियां स्त्री के अंतर्मन की यात्रा करने में सफल होती हैं। यहां भी हुई है। उन्होंने कहानी में दिखाया है कि यशोदा को बार-बार अपनी पुत्री की याद आती है। वही पुत्री जिसको वासुदेव अपने साथ लेकर चले गए थे। कृष्ण की जन्म कथा का यह अनूठा पक्ष है। उनके जन्म में जो चमत्कार होता है वह भी कृष्ण की लीलाओं का ही एक पक्ष है। प्रचलित कथा में यही है कि मथुरा में कृष्ण का जन्म होता है और गोकुल में योगमाया का । जिसे लेकर वासुदेव को रातों-रात वापस आना है। जो लड़की यशोदा के घर पैदा हुई है वह भी कृष्ण ही की लीला है क्योंकि अंततः उसे किसी का नहीं होना था। हम सभी जानते हैं कि कंस के हाथ से छूटती हुई माया आकाश की तरफ गई थी और यह घोषणा करते हुए गई थी कि- ‘तुम्हें मारने वाला गोकुल में पहुंच चुका है।‘

साहित्यकार वही बड़ा होता है जो हाशिए पर खड़ी अस्मिताओं को स्वर देता है। वह अपनी कहानी का परिवेश चाहे ऐतिहासिक ले या पौराणिक, उसमें कुछ नया करना चाहता है जो आधुनिक भावबोध को जन्म दे सके। रेणु भी इसमें नया करना चाहते थे। ज़ाहिर है आज तक किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वो लड़की जो यशोदा की कोख से पैदा हुई उसका क्या हुआ होगा? कोई सोचे या ना सोचे लेकिन मां तो जरूर सोचती होगी। मां कैसे अपने किसी बच्चे को भूल सकती है। कृष्ण के माध्यम से रेणु मां के मन में अपनी बेटी के लिए जो स्नेह और प्रेम है, वहां तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। कहानी में एक स्थान पर रेणु लिखते हैं- “किसन अपनी माँ के कलेजे की धड़कन को स्पष्ट सुनता है। साँसों के उतार चढ़ाव को परखता है।… दर्द बहुत गहरे बज रहा है। कोख की संतान के लिए किस माँ का मन न तरसेगा। न रोएगा!”[4]यहां रेणु स्त्री पक्ष से एक नई स्थापना करना चाहते हैं और इस स्थापना का माध्यम कृष्ण की लीला है।  कहानी में जब तक योगमाया है कहानी यथार्थवादी लगती है। योगमाया यानी गोरी का लड़ना, झगड़ना और अपना हक जताना सबकुछ स्त्री विमर्श के हवाले से नोटिस किया जा सकता है। रेणु ने लगभग रिस्क लेते हुए योगमाया को यहां प्रवेश दिया है जबकि वह केवल कृष्ण की माया थी।

कहानी का एक पक्ष और भी देखने लायक है। जैसे ही गोकुल में योगमाया का प्रवेश होता है वैसे ही विलाप शुरू होता है  कि कृष्ण कहीं गायब हो गए हैं। अब कहानी यहां से दो हिस्से में चल रही है। एक तरफ योगमाया कृष्ण के खो जाने पर बिना कोई दुख और व्यथा व्यक्त किए अपने लिए भोजन मांगती है। वहीं पूरे गोकुल में कृष्ण को खोजने के लिए पूरा गांव व्याकुल हो उठा है। लोग जंगल की तरफ निकल चुके हैं। उनका कृष्ण के प्रति प्रेम साफ साफ देखने को मिल रहा है। इधर योगमाया अपने लिए खिचड़ी बनाती है। यशोदा जिस योगमाया को कुछ देर पहले अभी अपनी पुत्री मान चुकी है उसका मन एक बार फिर से कृष्ण के लिए व्याकुल है। वह रो रही है। यहां योगमाया का प्रतिवाद है कि उसका कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा है। योगमाया अंततः अपने घर जाने को तैयार होती है। जैसे ही कहानी में उसकी भूमिका खत्म होती है कृष्ण अपनी मधुर मुस्कान के साथ उपस्थित हो जाते हैं। कहानी खुलती है तो पता चलता है वह कोई योगमाया नहीं थी बल्कि यही कृष्ण थे। सब हंसते हैं। खुश होते हैं। किसी को जरा भी एहसास नहीं हुआ है कि यह छलिया इतनी बड़ी लीला कर सकता है। पौराणिक कथाओं में कृष्ण का जो वर्णन मिलता है वहीं यहां भी हैं। रेणु ने कृष्ण के जीवन और उनकी लीला से कोई खिलवाड़ या परिवर्तन नहीं किया है बल्कि योगमाया को उपस्थित कर समाज और परिवार में स्त्री की उपेक्षा पर एक टिप्पणी की है।

नित्य लीला पढ़ते हुए पहले तो लगा कि यह कृष्ण लीला को कहानी में परिवर्तन करके लिखा गया है जिसका वही अंत होना है जो कृष्ण से जुड़ा हुआ है। लेकिन रेणु का उद्देश्य कहानी के बीच में खुलता है। जब योगमाया का प्रवेश होता है।  कहानी कृष्ण की लीला से उपजी तमाम घटनाओं से जुड़ी हुई है। कृष्ण अपनी मां के हृदय में बसी उस बच्ची की तस्वीर देख रहे हैं जो उनकी खुद की बेटी है। घटना को इस तरह से तैयार किया गया है कि नंद और यशोदा को यह स्वीकार करना पड़ता है कि वह उन्हीं की पुत्री है। कुछ क्षणों में ही वह सबको मोहित कर लेती है। नंद की  गोद में बैठकर उनकी दाढ़ी खींचती है। आंख नचाते, हाथ घुमाते कृष्ण को भला बुरा कहते लगभग नाटकीय ढंग से उसका प्रवेश होता है। जितनी देर योगमाया कहानी में है कहानी में रवानी है। प्रेम है, क्रोध है, स्नेह है, ममता है, अधिकार है, प्रतिवाद है, विद्रोह है, समर्पण है। इससे हटकर स्त्री मन की अंतर्व्यथा है। स्त्री अधिकार की चेतना है। अपने परिवारिक और सामाजिक अधिकार के लिए खड़ी हुई स्त्री का मजबूत स्वर है।

नित्य लीला में दो विरोधी भावों को एक साथ उपस्थित किया गया है। इस कहानी में वह अलौकिक आधार लेकर लौकिक जीवन के सुख, दुख, हताशा,निराशा और हर्ष उल्लास को स्वर देते हैं। इस कहानी में प्रकृति के विभिन्न रूप भी देखने को मिलते हैं ।

इस कहानी में स्त्री पक्ष से जिन मुद्दों को उठाया गया उसमें अधिकार, प्रतिवाद, विद्रोह के साथ स्त्री मन के शॉफ्ट कॉर्नर वाला  हिस्सा महत्वपूर्ण है। योगमाया जिस अधिकार से नन्द महर के घर में घुसती है उसी अधिकार से अपने माता पिता से स्नेह भी करती है। किसन के वियोग में खोई मां यशोदा के  वह पैर दबाती है। उसे जबरन अपने हाथों से खाना खिलाने का यत्न करती है। वह कहती है कि बिना देवकी को खिलाए और पैर दबाए नहीं सोती है। स्त्री के जीवन में ममता चरम पर हो सकती है लेकिन नफरत या घृणा नहीं। यहाँ एक पुत्री के संस्कार के अलावा परिवार के साथ जो उसका लगाव होगा है उसे भी रेणु ने  व्यक्त किया है। लड़की घर के प्रति जितनी जिम्मेदार होती है उतना लड़का नहीं होता। दीवारों को घर बना देने की कला केवल स्त्रियों में होती है। यशोदा अचानक से घर में घुस आयी योगमाया के प्रेम को देखकर चकित है। रेणु लिखते भी हैं-” माँ के पैर टीपे बिना उसे नींद ही नहीं आएगी। जो भी कहो, देवकी माँ इतनी सी भली शिक्षा जरूर दी है। बेटी के बिना घर की हालत कैसी होती है, यह वह पहली बार आँखों से देख रही है। अब वह अपनी माँ को हाथ पैर नहीं डुलाने देगी। बेटी ही माँ की सेवा कर सकती है, सच्चे मन से। बिना बेटी की माँ की दुर्दशा, वह देख रही है। सचमुच, योगमाया ने उसे टीप- टापकर ऐसा सुला दिया कि दो पहर रात के नींद खुली है।“[5] यहाँ पर रेणु भारतीय समाज में बेटियों के महत्व को बहुत रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हैं जो पढ़ते समय भावविभोर कर देता है।

वर्णनात्मक शैली रेणु की विशेषता है। सहज और सरल विषय लेने के बाद भी कभी-कभी उनके पात्र मनोवैज्ञानिक हो जाते हैं। किसन का चरित्र इस कहानी में ऐसा ही है। रेणु की कहानियों में आंचलिक जीवन की उपलब्धि और विसंगति दोनों ही यथार्थ रूप में चित्रित हैं। मूल कथा के साथ जहाँ-जहाँ संभव होता है वह लोकगीतों का भी प्रयोग करते हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य को जिस यथार्थ के मुहाने पर लाकर छोड़ा था रेणु वहाँ से आगे बढ़ते हैं। रेणु और प्रेमचंद की कोई तुलना नहीं है लेकिन हिंदी साहित्य में जब यथार्थ की अभिव्यक्ति की बात की जाएगी तब प्रेमचंद और रेणु को एक साथ रखा जाएगा।

रमा

शिक्षा: एम.ए., एम.फिल, पी.एचडी. और डी.लिट.।

हिन्दी साहित्य, सिनेमा, शिक्षा, पत्रकारिता और भाषा पर तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन व सम्पादन। देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पुस्तकों और समाचार पत्रों में सौ से अधिक लेखों का प्रकाशन। रेडियो, टेलीविजन के लिए500 से अधिक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, महोत्सवों आदि का संयोजन।
राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा सौ से अधिक सम्मानों से सम्मानित।
त्रैमासिक पत्रिका ‘समसामयिक सृजन’ व पाक्षिक समाचार पत्र ‘कैम्पस कॉर्नर’ की संरक्षक।
महाकवि जयशंकर प्रसाद फाउंडेशन व श्रेष्ठ कला संगम फाउंडेशन की अध्यक्ष।

सम्प्रति :प्राचार्या, हंसराज कॉलेेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

सम्पर्क: hrcdrrama@gmail.com +919891172389

[1] नित्य लीला, रेणु रचनावली-1

[2] नित्य लीला, रेणु रचनावली-1

[3] नित्य लीला, रेणु रचनावली-1

[4] नित्य लीला, रेणु रचनावली-1

[5] नित्य लीला, रेणु रचनावली-1

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samved

साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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