कथा संवेद

कथा संवेद – 10 

 

इस कहानी को आप कथाकार की आवाज में नीचे दिये गये वीडियो से सुन भी सकते हैं:

 

 

हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही भाषाओं में रचना करनेवाली उर्मिला शुक्ल का जन्म 20 सितम्बर 1964 को रायपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। वर्तमान साहित्य के नवम्बर 1995 अंक में प्रकाशित ‘बड़की अम्मा’ शीर्षक कहानी से अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाली उर्मिला शुक्ल के तीन कविता-संग्रह ’इक्कीसवीं सदी क द्वार पर’,’महभारत म दुरपति’ तथा ’छत्तीसगढ़ के अउरत’, एक कहानी-संग्रह’मैं फूलमती और हिजड़े’, एक उपन्यास ’बिन ड्योढ़ी का घर’ और एक यात्रा संस्मरण की पुस्तक’ यात्राएं उस धरा की जो धरोहर हैं हमारी’ प्रकाशित हैं।

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उर्मिला शुक्ल की कहानी ’जोहार’ एक साथ तीन स्तरों पर चलती है। यहाँ एक तरफ जंगल का जीवन है तो दूसरी तरफ हिड़मे और हिड़मा की प्रेम कहानी तो तीसरी तरफ एक स्त्री के रूप में हिड़मे का अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष। कहानी की लय में अंतर्निहित ये तीनों धाराएँ स्पष्ट रूप से पहचान लिए जाने के बावजूद इस अंतरंगता के साथ परस्पर आबद्ध हैं कि इन्हें पूरी तरह एक दूसरे से विलग कर किसी एक खांचे की कहानियों की सूची में नहीं डाला जा सकता। जंगल, प्रेम और स्त्री अस्मिता की परस्पर आबद्धता से विनिर्मित यह कहानी एक ऐसे कथालोक की रचना करती है जहां न सबकुछ परिचित है न सब कुछ नितांत नया। अपरिचय और घनिष्ठता का यह सहमेल इस कहानी के रेशे-रेशे में इस तरह रचा-बसा है कि हर पाठक किसी न किसी स्तर पर खुद को इससे जुड़ा महसूस करता है। मुर्गे की लड़ाई के जिस दृश्य के साथ यह कहानी शुरू और खत्म होती है, वह अपनी रोचकता और जटिलता के साथ जिस मेटाफर की रचना करता है, उसीमें इस कहानी का मर्म स्पंदित होता है।

राकेश बिहारी

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जोहार

उर्मिला शुक्ल

 

गाँव में मुर्गा लड़ाई हो रही थी; मगर यहाँ न तो कोई हाट भरा था और न ही मड़ई। खास बात यह कि लड़ने वाले मुर्गे और इन्हें लड़ाने वाले दोनों एक ही घर से थे, सगे भाई। एक जैसी कदकाठी। फर्क बस आँखों में उतर आये नशे का था। जिसका मुर्गा जीत रहा था, उसकी आँखों में सल्फी का नशा कुछ गहरा हो उठा था। उसकी मिचमिचाती आँखों में जीत की लहक नाच रही थी। यह हिड़मा है, इसका मुर्गा आज तक कभी हारा ही नहीं, सो इसकी आँखों में वही विश्वास लहक मार रहा था;मगर जीत का यह भाव वैसा नहीं, जैसा हाट या मड़ई में होता था। इसमें ममत्व की एक लकीर भी थी। इसीलिए आज इसकी वह लहकार सुनाई नहीं दे रही, जो इसकी खास पहचान थी और दूसरे की कोशिश थी कि कैसे भी करके आज की बाजी उसकी हो जाये, सो वह अपने मुर्गे को बार-बार टिहकार रहा था। उसे उकसा रहा था कि वह उछल कर और गहरा वार करे। ये भीसमा है, हिड़मा का छोटा भाई। हर मुर्गा लड़ाई में उसके साथ रहा; मगर आज..!

मुर्गे दोनों ही गुप्प कोर्र (जंगली मुर्गे) सुन्दर, कद्दावर, फुर्तीले और जाँबाज। मुगों में ये अलग से पहचाने जा सकते थे। एक का नाम कारू और दूसरे का भुर्रा। कारू! नाम के अनुरूप चमकदार काले पंख, लम्बी टाँगें और ऊॅंची लाल कलगी वाला, देखने में जितना खूबसूरत, दाँव मारने में भी उतना ही चतुर। आज की यह बाजी भी इसी के नाम होगी; मगर आज ये आक्रामक नहीं था। भुर्रा! गहरे तांबई रंग का मुर्गा, कदकाठी में कारू से कुछ उन्नीस। इस खेल में कुछ नौसिखिया भी। कारू का शिष्य था; मगर आज मुकाबला उसी से था। उसके साथ एक ही झाबे में रहता था। साथ -साथ चारा चुगता; मगर आज वह हैरान था। तभी तो बहुत देर तक वार ही नहीं कर पाया। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसे यूँ कारू से लड़ना ..? मगर क्या करे वह? जब इंसान ही ऐसा करने लगें, तो उसका बस कहाँ।

उधर कारू भी कम हैरान नहीं था। सुबह जब उसे तैयार किया गया, उसके पंजों में ब्लेड बाँधा गया, तो उसे लगा कि आज जरूर कोई हाट या मड़ई होगी; पर जब उसके सामने भुर्रा आया, तो उसे कुछ समझ ही नहीं आया इसीलिए वह देर तक यूँ ही खड़ा रहा, वरना मड़ई में पहला वार तो उसी का होता था;मगर आज.? सो वे दोनों देर तक चकित से खड़े रहे .फिर जब भीसमा ने भुर्रा को टिहकारा, तो वह वार करने लगा; मगर कारू वार बचा रहा था। भुर्रा भी इतना हल्का वार करता कि कारू को ज्यादा चोट न आये। हिड़मा भी सहज था, उसने कारू को एक भी टिहकार नहीं दी; मगर भीसमा भुर्रा को बार-बार टिहकार रहा था। यह टिहकार उसे गहरे वार के लिए उकसा रही थी। दोपहर चढ़ आयी थी। अब तक कोई फैसला नहीं हुआ था और भीसमा के लिए आज फैसला बहुत जरूरी था। उसके लिए यह मुर्गे की लड़ाई मात्र नहीं थी।’‘आज तो मुझे अपनी राह बनानी ही है।’‘ – सोचा और उसने कुछ देर के लिए लड़ाई रोक दी और भुर्रा को अपने हथेली में जकड़ लिया। फिर उसकी चोंच को हाँडी में डुबो दिया। ढलती दोपहर की तीखी दारू और घावों पर होती तेज चनचनाहट और ऊपर से भीसमा की लगातार टिहकार। फिर तो भुर्रा को कुछ भी याद न रहा कि उसके सामने कौन है। भुर्रा अपना आपा खो बैठा। अब वह उछल-उछल कर वार करने लगा, और कारू? वह तो अभी भी बस दाँव ही बचा रहा था। भुर्रा हर बार और-और जोर से उछलता, और उछलकर अपने पंजों से वार करता। वह वार पे वार किये जा रहा था और हर वार के साथ कारू के पॅंखों पर लाल निशान उभर रहे थे। हिड़मा हैरान था; मगर भीसमा खुशी से उफन रहा था। उसकी टिहकार और-और तेज होती जा रही थी।

“ये भीसमा ऽ! देख तो कारू को केतना लहू।’’ हिड़मा की बात पूरी हो पाती इससे पहले भुर्रा उछला और कारू की गरदन पर चढ़ गया। फिर खून की एक तेज धार छूटी। कारू फड़फड़ाया और शांत हो गया।

चित्र : प्रवेश सोनी

हिड़मा की रुलाई छूट पड़ी; मगर न तो भुर्रा का वार रुका और न ही भीसमा की टिहकार। अब वह और जोर-जोर से टिहकार रहा था और उसकी इसी टिहकार के चलते भुर्रा एक बार और उछला, अबकी उसकी उछाल कुछ और ऊॅंची थी और देखते ही देखते वह हिड़मा की गर्दन से चिपट गया; मगर भीसमा की टिहकार अभी भी जारी थी। वह लगातार टिहकार रहा था और हिड़मा! अकचकाया सा उसे देखता रह गया! वह समझ ही नहीं पाया कि भीसमा ….. तभी भीसमा ने भुर्रा को धर दबोचा। उसके हाथ भुर्रा की पीठ पर थे और उसका दबाव बढ़ता चला गया। फिर खून का एक और फव्वारा छूटा, जिसने भुर्रा और भीसमा दोनो को रंग दिया।

हिड़मा भी कारू की तरह कुछ देर तड़फकर शांत हो गया; मगर उसकी आँखें खुली रह गयी थी। हिड़मा, भीसमा के उस रूप को देख कर चकित रह गया था और उसका यही आश्चर्य उसकी आँखों में टंक गया था। शायद उसे यकीन नहीं हुआ था कि भीसमा ऐसा भी ..! मगर भीसमा अब पहने वाला भीसमा नहीं था। पिछले कुछ दिनों से वह बदल गया था। वह बात-बात पर हिड़मा से उलझता और सल्फी के पेड़ों में अपना हिस्सा माँगता। उसे शादी करनी थी जोगिया से। जोगिया के बाबो ने दुल्हन मोल में सल्फी के पाँच पेड़ माँगे थे। हिड़मा भी चाहता था कि उसकी शादी जोगिया से ही हो, मगर दुल्हन का यह मोल कैसे देता वह? उसके यायो बाबो की ये ही तो निशानी ब थी उसके पास। कैसे दे दे उन्हें? वह भीसमा को समझाया करता; मगर वह लड़ता उससे। फिर लड़ झगड़ कर जाने कहाँ चला जाता। महीनों गायब रहता और अचानक लौट आता। पिछली बार जब वह लौटा तो उसके हाथ में भुर्रा था। पूछने पर बताया कोर्र हाट (मुर्गा बाजार) से खरीदा है।

“मय भी मुरगा लडायेगा।’’- कहते हुए भीसमा ने भाई को देखा।

’’अरे भीसमा! मुरगा लड़ाना था तो कारू तो था न। तू ही लड़ा लेता। एके घर म दू दू ठो मुरगा लड़ेगा रे?’’

“मय हाट में लड़ायेगा। तू मड़ई में लड़ाना।’’

’’अइसा त कब्बी नइ हुआ रे। एके गाँव से भी दू दू मुरगा, कब्बी नई लड़ा। फेर ये त एके घर से?’’ हिड़मा उसे समझाना चाहता था कि बिरादरी में इसका गलत संदेश जायेगा; मगर भीसमा कुछ समझने को तैयार नहीं था और तैयार भी कैसे होता। वह तो कुछ और ही सोच रहा था। बुझे मन से हिड़मा ने उसकी बात मान ली। दोनों मुरगे साथ-साथ रहने लगे।

अब कारू बड़े हाट और मड़ई जीतता और भुर्रा छोटे हाट। कभी-कभी वे भुर्रा और कारू की भी लड़ाई करवाते; मगर वह लड़ाई वैसी नहीं होती, जैसी मड़ई या हाट में होती थी। बल्कि इस लड़ाई में कारू की भूमिका सिखाने वाली होती, वह भुर्रा को अपने पैंतरे सिखाया करता, इसीलिए उनके पँजों में ब्लेड नहीं बाँधा जाती,तभी तो जब भीसमा ने मुर्गा लड़ाने की बात चलायी, तो वह हमेशा की तरह कारू को गोद में उठाकर चल पड़ा; मगर भीसमा ने उसे टोका –

’’भाऊ अइसे नइ। कारू को तैयार कर। जइसे मड़ई के लिए करता है।’’

’’मड़ई के जइसे काहे?’’ उसने आश्चर्य से देखा उसे। साथ ही उसकी नजर भुर्रा पर गईं, तो उसके पंजों में ब्लेड बॅंधी थी। उसने भीसमा से पूछा-’ये बलेड काय कू।’

’’ देखेगा के भुर्रा मड़ई के लाइक हुआ के नइ। वो आगे के महीना म तीन चार ठो मड़ई हय न।’’ कहते हुए भीसमा आँखें चुरा रहा था।

’’लड़ई तो अइसे भी हो सकता। फेर कारू को या के भुर्रा को बलेड लाग गया तो?’’

’’नइ भाऊ। कुछु नइ होयगा। मय रोकेगा न भुर्रा को।’’

हिड़मा ने भीसमा को गौर से देखा। उसकी आखों में कुछ अलग सा तैरता दिखा भी; मगर …? वह बेमन से झोपड़ी भीतर गया, उसने कारू के पँजों में ब्लेड तो बॉध दी; मगर -”देख जियादा गहरा नइ मारना हाँ! छोटा भाऊ है तेरा। समझा?’’ वह कारू को ऐसे समझा रहा था जैसे वह सब समझ रहा हो। सो हिड़मा शुरू से सहज था। उसने इस लड़ाई को लड़ाई तरह लिया ही नहीं, तभी तो जब भीसमा ने भुर्रा को दबोचा और भुर्रा उसकी गर्दन से और-और सटता गया, तो उसे आश्चर्य हुआ। उसने उसी क्षण भीसमा की आँखों में देखा था और…! भीसमा! कुछ पल के लिए डरा ;मगर फिर आँखों में जोगिया उभरी और..

‘’अरे! साला ये का किया? तूने भाऊ को …?‘‘ कहकर उसने शराब की हाँडी उठाकर भुर्रा पर दे मारी। हाँडी फूटकर उसके शरीर में जा धॅंसी और भुर्रा वहीं ढह गया। अभी वह तड़फ ही रहा था कि भीसमा ने उसे गर्दन से पकड़ कर उठाया और उसकी गर्दन मरोड़ दी -’’साला तूने मेरा भाऊ को ..।’’ फिर गोहर पार कर रोने लगा।

रोना सुन लोग जुटे। सब चकित से भीसमा को देखते रहे। कुछ समझ ही नहीं पाये वे कि हुआ क्या? फिर भीसमा उन्हें एक गढ़ी हुई कहानी सुनाने लगा कि उसने तो भाई को भुर्रा से बचाने की बहुत कोशिश की, मगर भुर्रा ने उसे..। ऐसा कभी नहीं हुआ था कि एक मुर्गा आदमी को ..? और जैसे ही लोगों को भान हुआ हिड़मा मर चुका है।’ अब तो पोलिस आयेंगा।’ सब लोग खिसक गये। अब भीसमा वहाँ अकेला था। उसने भुर्रा को उठाकर हिड़मा की गर्दन के पास रखा और गौर से देखा। गाँव वालों ने तो मान लिया कि यह दुर्योग होगा; मगर हिड़मे? उसे चकमा देना आसान नहीं सो चौकस था। वह नहीं चाहता था कि सुई की नोक भर भी शक बचे।’क्या करूं? यहीं बैठा रहूँ? नहीं! यहाँ बैठे रहना ठीक नहीं। हिड़मे का कोई भरोसा नहीं। आते ही वार कर दिया तो? या पुलिस को…..। ‘पुलिस की याद आते ही झुरझुरी सी आयी और वह उठ कर जंगल की ओर चल पड़ा।

ढलती शाम हिड़मे हाट से लौटी, तो देखा झोपड़ी में कोई नहीं था। उसने आवाज दी हिड़मा को, फिर भीसमा को; मगर कोई सुगबुग नहीं। बाहर आयी, उसने देखा गाँव में सन्नाटा था। सारा गाँव खाली। वह सोच नहीं पा रही थी कि सब लोग कहाँ गये होंगे?’क्या कोई इतना बड़ा शिकार मिल गया कि सारे लोग चले गये; मगर बूढ़े? वे तो शिकार पर नहीं जाते! तो क्या आज इस गाँव में भी पुलिस आयी थी? अब तो आये दिन हर गाँव को यही मार झेलनी पड़ती है। एक ओर वे हैं, जो हमारे जंगल वापस चाहते हैं और दूसरी ओर ये पुलिस। हम तो चक्की का दाना बन गये हैं।’ सोचती हुई हिड़मे झोपड़ी के पिछोत की ओर गयी।उसने देखा पेड़ के झुरमुट में हिड़मा पड़ा था। उसे लगा कि सल्फी पीकर झाड़ी में लुड़का पड़ा है।’कैसे बिहोस पड़ा है। कोई जानवर आ जाये तो?’ सोचती हिड़में गुस्से से आगे बढ़ी। हिड़मा की आँखें खुली थीं। सो उसे लगा वह उसे शरारत से देख रहा है, मगर पास पहुँचते ही, उसकी आँखें हिड़मा की आँखों से टकराई और…! फिर उसने देखा, कारू और भुर्रा के बीच में पड़े हिड़मा को! उसकी गर्दन से बहते लहू को! लहू बह-बह कर जम गया था! हिड़मा की आँखें आश्चर्य से खुली हुई थीं! मानों उसे अपने मरने पर घोर आश्चर्य हुआ हो! हिड़में कठुवाई सी खड़ी रही। न तो उसके मुँह से आवाज निकली और न ही आँखों से आँसू। वह बारी-बारी से कारू, भुर्रा और हिड़मा को देखे जा रही थी, तभी एक गिद्ध मड़राता हुआ आया और हिड़मा की आँखों पर झपट पड़ा और “ नाय’’ हिडमे का स्वर उभरा और गाँव में धॅंसता चला गया। अब वह हिड़मा पर औंधी पड़ी थी और गोहार पार कर रो रही थी।

चित्र : प्रवेश सोनी

“मेयो हिड़मा! ये क्या होया रे? “कहती वह विलाप कर रही थी, मगर कौन था वहाँ,जो उसकी सुनता और उसे बताता कि क्या हुआ? आज तो हिड़मा भी शांत था। वही हिड़मा जो उसका रोना सह नहीं पाता था; मगर आज वह रो रही थी और हिड़मा खामोश था। वह देर तक रोती रही। फिर उसने हिड़मा की खुली आँखों को बंद कर दिया। अब हिड़मा के चेहरे पर शांति उतर आई थी। गर्दन पर खून की रेखा न होती, तो लगता कि वह नशे में मत्त सो रहा है। हिड़मे गर्दन की रेखा को देख रही थी, जो खून जमने से काली हो चुकी थी। उसे एक मोटी लकीर सा गहरा घाव नजर आया, जैसे किसी ने गले की नस को ताक कर ब्लेड घॅंसायी हो। ब्लेड का ध्यान आते ही उसने कारू और भुर्रा को देखा। उनके पैरों में ब्लेड बंधी थी। वैसी ही जैसे मुर्गा लड़ाई के समय बाँधी जाती थी। तो क्या आज ….? मगर ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि गाँव में….? क्या आज यहाँ बिल्कुल वैसी ही लड़ाई हुई है, जैसी दो गाँवों के बीच होती है। तो क्या भीसमा ने …..?’ सोचते हुए उसकी आँखों में कुछ दृश्य उभरे। कुछ दिनों से उसे भीसमा की आँखों में एक अलग तरह की ललक दिखने लगी थी। वह हिड़मा के साथ जब भी जंगल जाती, भीसमा को आस पास ही पाती। जबकि उसे मालूम था,जब वे जोड़े से जंगल जाते हैं, तब वहाँ सिर्फ शिकार नहीं होता, जंगल उनकी केलि के अंग हो जाते हैं, घने जंगलों के बीच उन्मुक्त केलि ही तो उनके प्रेम की विशेषता थी, इसीलिए बाकी लोग उस ओर नहीं जाते; मगर भीसमा छिप कर उनके आसपास ही बना रहता। उसने हिड़मा को बताया भी ; मगर वह टाल जाता – “ पिल्ला है रे। कबी अकेल्ला रहा नइ।’’ वह उसे समझाता; मगर हिड़मे? उसे उसकी आँखों में बचपना नहीं, कुछ और ही दीखता था। तो क्या भीसमा ने ही ..।’ वह सोच ही रही थी कि हूँ s हूँ s की गुंजार से घाटी भर उठी। वह चौंक उठी, पुलिस की गाड़ी?!’पुलुस आयेगा, तो पूरा गाँव को परे सान करेगा।’ सोचकर उसकी आँखों में बीते दृश्य उभरे और वह सजग हो उठी।

उसने पेड़ की पतली टहनियाँ तोड़कर झाड़ू बनायी और जल्दी-जल्दी पत्ते बटोरे। सायरन की आवाज और करीब आ चुकी थी; मगर वह जानती थी कि पुलिस अभी दूर है। यह तो इस घाटी का करिश्मा है कि यहाँ आवाज बहुत पहले पहुँच जाती है। पत्ते इकट्ठे हो चुके,तो उसने हिड़मा को उठाना चाहा, मगर उठा न सकी। फिर उसने उसे पैरों से पकड़ कर खींचा, बड़ी मुश्किल से उसे उस पेड़ के पीछे ले जा पायी,जहाँ एक गड्ढा था। गड्ढा बहुत बड़ा नहीं था। सो उसके हाथ – पैर मोड़कर मुश्किल से उसे लिटाया और ऊपर से सारे पत्ते डाल दिये। ऐसा करते समय कई बार मन किया कि पुलिस को सब बता दे और भीसमा को ..; मगर? सजा भी तो इतनी आसान नहीं। गाँव से कोई गवाह तो मिलेगा नहीं, लोगों को पुलिस और कचहरी से डर लगता है, फिर अगर मामला पुलिस में गया, तो पूरा गाँव पुलिस की लपेटे में आ जायेगा और वही कहानी यहाँ भी शुरू हो जायेगी।’ सोचते हुए उसकी आँखों में आस पास के गाँवों में घटी कई घटनायें घूम गयीं और मुड़पार की घटना याद आते ही वह सिहर उठी।’ नहीं मैं पुलिस को कुछ नहीं बतायेगी। ‘ सोचती वह अपने को तैयार कर रही थी। उसका कलेजा तो जार-जार रो रहा था,फिर भी अपने मन पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी। उधर हूँ s हूँ s हूँ s हूँ s की ध्वनि लगातार नजदीक आती जा रही थी। यह संकट का समय था और संकट से जूझना सीख रही थी वह।

“ऐ! ये क्या है? पुलिस अफसर का इशारा तो नुंचे पॅंखों की ओर था; मगर उसकी नजरें उसकी देह को छेद रही थीं।

“कुछु नइ साब’’- कहकर उसकी आँखों ने उस इशारे का पीछा किया और उसका जी धक से हो गया। कारू और भुर्रा के पॅंख तो समेटना भूल ही गयी थी और हवा ने पँखों को दूर-दूर तक बिखेर दिया था।

“कुछ नइ। तो ये सब क्या है?’’- उसने मुर्गे के बिखरे पँखों की ओर फिर इशारा किया।

“ये? सायद मुरगा लोग लड़ गया होगा। जानवर हय साब लड़ता रहता है।’’कहते हुए बहुत तकलीफ हुई उसे और उसकी आँखों में भीसमा उभर आया; मगर उसने उसे पीछे ठेल दिया।

“हमने तो कुछ और ही सुना है?’’ कहते हुए पुलिसिया आँखें उसे भीतर तक खँगालने लगीं। हिड़मे को लगा जैसे कि उसका लुगरा, पोलका सब उतार दिया उसने। फिर भी वह चुप रही। कुछ भी बोलकर कोई मौका नहीं देना चाहती थी।

“जनाब पूरा गाँव खाली है।” एक जवान ने सूचना दी।

’’ये गाँव वाले कहाँ गये?’’ अफसर ने सीधे उसकी आँखों में देखा।

“नइ मालूम साब। मय तो हाट गया था। अभीच लौटा हूँ। सायद सिकार को गया होगा।’’

“और तेरा मरद?’’ पूछती नजरें लगातार उसका चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।

“नइ मालूम। वो भी गया होगा साब। आप तो जानता कि सिकार को पूरा गाँव एक साथ जाता। सिकार तो पूरा गाँव का होता न साब।’’

“ये सच बोल रही है। यहाँ कुछ भी वैसा नहीं। लगता है हमें झूठी खबर दी गयी थी।’’ पूछताछ कर रहे अधिकारी ने जवान से कहा।

’’जी जनाब! मुझे भी ऐसा ही लगता है।’’ जवान ने अफसर का समर्थन किया।

‘फालतू आये इतनी दूर। अब रात में लौटना भी खतरे से खाली नहीं है। इन दिनों इधर वारदातें भी तो ….। खासकर घाट पर।’ सोचते हुए उसके माथे पर लकीरें उभर आयीं।

उसे चिन्तित देख हिड़मे को अच्छा लगा। ‘ सचमुच कुछ तो बदल रहा है। अब हमीं नहीं, ये भी डरने लगे हैं।’ सोचकर उसके मन में सुकून की एक लहर उठी थी कि….

’’ऐ सुन। सल्फी (नशीला पेय) लाना जरा और हाँ एकदम कड़क वाली, बिल्कुल तेरी तरह।’’ कहते हुए उस जवान के मुँह और आँख लरियाने लगे।

“साब सल्फी त नइ हय! इत्ता समय तक सल्फी तो जहर हो जाता है न।’’

“अच्छा तो लाँडा (बस्तर की शराब) ले आ।’’ – यह वही जवान था जिसे हिड़मे की बोली समझ में आ रही थी। इसीलिए वह अब उसकी में बोल रहा था, ताकि साहब को भनक न लगे।

’’नइ हय साब। केतना दिन से लाँडा चुरोने का सम्मेच नई मिला।’’ उसे टालने की कोशिश की।

“साली हमसे चालकी चलती है। घर के भीतर चल बताता हूँ।’’ वह हिड़मे की ओर बढ़ा ही था कि जीप स्टार्ट होने की आवाज आयी और वह लपककर जीप की ओर बढ़ा; मगर जाते-जाते हिड़मे को ऐसे देखा मानो कह रहा हो कि मुझसे बचकर कहाँ जायेगी। फिर सायरन बजती गाड़ी लौट चली थी।

उनके जाते ही वह दौड़कर उस गड्ढे के पास गयी और कटे पेड़ सी ढह गयी। अब तक अपने को बाँधे रखने वाली हिड़मे अब हिलक-हिलक कर रो रही थी। वह रोती रही। आकाश में पूर्णमासी का चाँद उतरा,पर वह अॅंधेरों में ही घिरी रही। उस चाँद रात में उसके भीतर अमावस से भी ज्यादा घना अॅंधेरा घिर आया था। रोते-रोते उसने पत्ते हटाये। हिड़मा चुरू-मुरू लेटा था। उसने उसे बाहर निकलकर सीधे लिटाया। अब चाँदनी के कुछ चकते उसके चेहरे पर पड़ रहे थे। लगा जैसे वह शांति से सो रहा हो।’ मेरा हिड़मा तो शांत ही था हमेशा से, फिर भी ये सब? क्यों?’ पूछना चाह रही थी; मगर किससे पूछती? कौन बताता उसे, गाँव तो अभी भी खाली था। ऐसे में बस वह थी और उसकी पीड़ा। रात और भी गहरा गयी। अब तक कोई नहीं लौटा था। हिड़मे का शक अब विश्वास में बदल चला था।’ शिकार पर गये लोग जंगल में रात नहीं रहते। वे जंगल में रात तभी बिताते हैं, जब गाँव में कोई खतरा हो।’ सोचती हिड़मे लगातार जंगल का पथ निहार रही थी। कोई तो लौटे, जिससे वह …।

उतरती रात में एक साया नजर आया; मगर अचानक उसने राह बदल ली और पेड़ों के झुरमुट में गायब हो गया। फिर कुछ देर बाद कुछ और लोग नजर आये, उसने उन्हें आवाज दी; मगर वे दौड़कर अपने-अपने झोपड़ों में जा छुपे। ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि वो आवाज दे और कोई सुने न! फिर और भी लोग लौटे; मगर हिड़में ने किसी को नहीं पुकारा, किसी से कुछ भी नहीं पूछा। वैसे भी पूछने को बचा भी क्या था? अब तो उसे विश्वास हो चला था कि यह दुर्योग नहीं भीसमा की चाल थी। फिर उसे ओदिया दिखा, भीसमा का खास संगी। वह भी औरों की तरह कतरा कर निकल रहा था कि हिड़मे ने दौड़कर उसकी राह रोक ली। “भीसमा कहाँ है रे? देख न ये सब किया हुआ?’’ कहते हुए उसकी आँखे भर आयीं।

“मय कुछु नई जानता।” वह नजरें चुराने लगा। उसके चेहरे पर आश्चर्य की जगह भय सा उभर आया था। अब तो कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं थी। ओदिया चला गया था ; मगर हिड़में खड़ी थी। उसका मन किया कि दौड़कर थाने चली जाये; मगर आँखों में गोदमी उभर आया। अपनी सल्फी के लिए मशहूर गोदमी गाँव,अब नित नई वारदातों के लिए जाना जाता है। छावनी ही बन गया है गोदमी।’ नहीं। मैं अपने गाँव को ऐसी आग में नहीं डाल सकती। तो क्या भीसमा को यूँ ही छोड़..?’ सोचती वह देर तक उलझी रही। फिर धीरे – धीरे थिर हो गयी।

गाँव के किसी घर से कोर्र ने बांग दी “ कुकडू कूँ ऽ। “ ‘ भिनसार भी हो गया। भीसमा तो अब लौटेगा नहीं। पुलिस के डर से गाँव वाले भी साथ नहीं देगें। फिर भी हिड़मा को माटी तो देना पड़ेगा।’ सोचकर वह झोपड़ी में गयी और रापा और कुदारी ले आयी। उसका मन बार-बार कच्चा हो रहा था; मगर वह गड्ढा खोद रही थी। किसी तरह गड्ढा खोदा। अब आसनी बिछानी थी। सागौन के पत्तों की आसनी पर लाश को लिटाकर,ऊपर से सागौन के पत्तों से तोपना था। पत्तों का ओढ़न और पत्तों का ही बिछावन।उसके ऊपर मिट्टी की परत और सबसे ऊपर बारीक भुरभुरी मिट्टी की एक परत और डालनी थी, ताकि उस पर सागौन का जंगल उकेर सके। सियान लोगों से सुनती आयी थी कि ऐसा करने से अगले जन्मे में भरा पूरा जीवन मिलता है। बिल्कुल सागौन के जंगल जैसा सुन्दर। आसनी तैयार हुई। उसने हिड़मा को उठाना चाहा; मगर उसे उठा न सकी। उसने बार-बार कोशिश की। हार कर उसने उसे दोनों पैरों से पकड़कर खींचा। इस तरह खींचते हुए उसकी आँखें भर आयीं। आज उसे आसनी पर लिटाने के लिए दो लोग भी नहीं हैं।’ सोचकर उसकी रुलाई फूट पड़ी। लोग अपनी झोपड़ी के भीतर, टाटी की झरी से सब देख रहे थे। उनकी आँखें भी नम थीं; मगर एक डर था,जो उन्हें रोके हुए था। यह डर उनके लिए सबसे बड़ा था। बाघ-भालू से भी बड़ा; मगर मणि मा अपने को रोक नहीं पायीं। वे झोपड़ी से बाहर निकल कर हिड़में की ओर बढ़ चलीं। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। फिर तो रुलाई बाँध तोड़ कर बह निकली। अब वह मणि मा के सीने से लग कर फफक रही थी। उसकी रुलाई का वेग इतना तेज था कि उसका सारा शरीर हिचकोले खा रहा था।

चित्र : प्रवेश सोनी

‘‘चुप जा पेकी, (लड़की) चुप जा। अइसा नइ रोते रे।’’ मणि मा जितना ढाढ़स बॅंधातीं, उसकी रूलाई उतनी ही तेज हो जाती।

“चल पेकी चुप जा! ये काम बी तो करना हय न। लोकर (जल्दी ) कर नइ त पुलुस कू मालुम चल जाएगा।’’ कहती मणि मा की आँखों में भय उतर आया।

‘‘नई अम्मा पुलूस नइ आयेगा।’’ कहती हिड़मे ने हिचकियों के बीच उन्हें सब बता दिया।

मणि मा हिड़मे के साहस पर चकित रह गयीं। उसने गाँव को बड़ी मुसीबत से बचा लिया था। उनकी आँखों में हिड़मे के लिए प्रेम, दया और आँसू सब गड्ड – मड्ड हो उठे। फिर अपने आँसू पोंछते हुए उन्होंने हिड़मा को सिर की ओर से उठाया और हिड़में ने पैरों से; मगर हिड़मा अभी भी पूरा उठ नहीं पाया था।उसकी पीठ अभी भी जमीन पर घिसट ही रही थी कि अचानक दो हाथों ने उसे ऊपर उठा लिया। यह मोदिया थी, हिड़में की गोतियारी। हिड़मे ने उसकी ओर देखा तो आँखों में आँसू फिर लहरा मार उठा। उसका मन फिर कच्चा होने लगा; मगर वह सम्हली और तीनों ने मिलमर हिड़मा को उठाकर आसनी पर लिटा दिया। हिड़मे ने ऊपर से सागौन के पत्तों को पूरा। फिर सबने मिट्टी से उसे ढॅंक दिया। मणि मा रापा से मिट्टी समतल करने लगीं। तब तक मोदिया भुरभुरी मिट्टी ले आयी। हिड़मे ने उसकी हल्की परत बिछाई और सागौन गुप्प (जंगल) उकेरने लगी – फूलों और पत्तियों से भरे-भरे सागौन के पेड़। उसकी आँखों में आँसू थे; मगर ऊॅंगलियॉं अपना काम कर रही थीं। कब्र पर एक भरा पूरा जंगल उभर आया।फिर आई आखिरी जोहार की पारी। अजब सा मंजर था। मृतक कर्म जैसा कठोर कर्म और उसमें रत नाजुक तन और मन वाली औरतें। यह पुरुषों का का काम था। सागौन गुप्प(जंगल) भी घर का पुरूष ही उकेरता था; मगर आज?

‘‘अब आखिरी जोहार कर पेकी।’’- कहती मणि मा उसके और करीब आ गयीं और

सागौन उकेरते उसके हाथ थम गये। ‘ आखिरी जोहार? कैसे करूँ मै? कैसे कहूँ कि अब तुम्हारा मेरे से, हमारे घर से सब नाता छूट गया। अब तुम्हारी दुनिया दूसरी है? तुमको मेंरा आखिरी जोहार।’ सोचा और उठकर झोपड़ी की ओर दौड़ पड़ी। मणि मा उसे देखती रही। फिर उठकर उसकी जगह पर जा बैठी।’’जोहार! जोहार! अखिरी जोहार। अब तुमारा ये दुनिया से …।’’ -कहते उनका गला रुंध गया; मगर वे रस्म निभा रहीं।

महीनों बीत गये; मगर भीसमा नहीं लौटा। हिड़में भी अपनी दिनचर्या में लौट चली थी। वह सल्फी उतारती, हाट भी जाती; मगर हिड़मा हर जगह उसके साथ हो लेता और वह बीते दिनों में खो जाती। उसकी आँखों में अकसर वह मड़ई उभर आती, जहाँ वे पहली बार मिले थे। हिड़मा अपना मुर्गा लड़ा रहा था। मुर्गे को लहकारता, टिहकारता हिड़मा उसकी आँखों में उतरता चला गया था। जीतने के बाद, जब वो मड़ई घूम रहा था, तब वह कैसे मैं उसके साथ चल पड़ी थी।’ सोचती हिड़मे बीते दिनों की सीढ़ियाँ उतरने लगी ……..

‘‘नीमा पेदेड़ केला?” पूछा उसने।

‘‘हिड़मा। “कहकर उसने उस चंचल युवती को देखा।

‘‘अरे! मेरा नाम बी हिड़मे है। अम मितान हुये न।’’ कहती हिड़मे इतनी सहज थी,जैसे बरसों का परिचय हो। ‘‘तुम्हारा मुर्गा बड़ा सुन्दर। अच्चा लड़ता और तुम अच्चा लड़ाता।’’ हिड़मे ने उसे देखा, भरपूर नजरों से। मानो कह रही हो तुम भी तो कम नहीं हो। हिड़मा देख रहा था उसे। उसके चेहरे पर आये भावों को पढ़ रहा था कि…..

‘’चल न रइचुली झूलते है।’’ वह अकचका गया। अभी तो ठीक से जान पहचान भी नहीं हुई और ये!’’नइ रे पइसा नइ हय।’’

“कइसे! मुर्गा लड़ाया न। इतना कमाया फेर।’’ उसने साधिकार कहा।

“तो का सब पइसा खरचा कर दूँ।’’ अब वह भी खुल चला था।

’’काय घर म गोसाइन हय का?’’ क्षण भर को उसका चेहरा बुझा।

हिड़मा के मन में आया कह दे हाँ; मगर उसकी ओर देखते ही जाने क्या हुआ और’’नाय रे! कोई नाय हय।’’ – सुनकर हिड़मे का मुरझाया चेहरा सरइ के पेड़ सा हरिया गया।

“तब चल न। “कहती उसे हाथ पकड़ खींच ले गई और रइचुली के साथ ऊपर नीचे आते -जाते, दोनों बहुत करीब आ गये। वे’ इतवारी हाट ‘ में भी मिलने लगे थे। फिर तो हिड़मे उससे प्यार भरी शिकायतें भी करने लगी। वह अक्सर कहती -’’ तूने मुझे कोकमा (कंघी) नइ दिया।’’

“न रे मय तेरे लाइक कहाँ? मय कहाँ से दे पायेगा तेरा मोल? “हिड़मा उदास हो जाता।

“सुन! तू मेरा मोल नइ देना। मय भाग जायेगी तेरा साथ।’’ वह उसकी उदासी पोछती।

वे हर हाट और मेले में मिलते। साथ-साथ मेला घूमते और लौटते समय घने जंगल की राह होकर लौटते। ऐसे ही एक दिन लौटते समय हिड़मे ने उससे कहा “ काल मेरा गोदनई है रे।’’

’’क्या? “वह चौंका, फिर उदास हो गया।’गोदनई का मतलब, अब ये जादा दिन कुँवारी नइ रहेगी।

“तू आना देखने।’’ – कहती हिड़मे की आँखों में बहुत कुछ उतर आया।

हिड़मा की आँखें चमक उठी थीं।’गोदनई में बुला रही है। यानि अब ये मेरी ही होगी।’ वह जानता था गोदनई स्त्रियों का गोपन अनुष्ठान है। इसी से तो सबको लड़की के जवान होने की खबर मिलती है। इसमें सारे जिस्म पर गोदना के फूल उकेरे जाते हैं। शरीर के गोपन अंगों पर भी गोदने उकेरा जाता है, तभी तो इसमें पुरूषों का प्रवेश वर्जित है। लड़की जिससे प्रणय निवेदन करती है, उसे अपनी गोदनई में बुलाती है। हिड़मा बहुत खुश था। ये मेरे को गोदनई में बुला रही है। मय पक्का जायेगा।’ वह गया था वहाँ। बड़े भिनसारे। कोर्र बाँग से बहुत पहले और महुआ से पेड़ पर चढ़ गया था। उसे सब छुपकर देखना था। बहुत बेचैन था, बार-बार राह को देखता। देर हुई तो उसे लगा शायद हिड़मे ने उससे ठटठा किया है। वह निराश हो लौटने की सोच रहा था कि सूरज की पहली किरण के साथ हिड़मे उसके सामने थी। उसके सारे शरीर पर बस एक लूगड़ा था, जो कमर से नीचे ही लिपटा था। हिड़मा एकटक देखता रहा। दिन चढ़ रहा था।हिड़में की ग्रेनाइट सी देह पर हल्दी और सूरज की किरणें एक अनोखा रंग भर रही थीं। वह रंग हिड़मा की आँखों में उतरने लगा और उसकी नजरें उसके दो जामुनी रसीले फलों पर जा ठहरीं। उसेने पहली बार महसूसा कि हिड़मे सुन्दर है।

गोदनई का अनुष्ठान शुरू हुआ। हिड़मा ने देखा सागौन के हरे-हरे पत्तों के बिछावन पर लेटी हिड़मे को। औरतों ने चारों ओर से घेर रखा था। पाँच औरतों के हाथों में भेलवा, सुई और दर्द कम करने की औषधी थी। बाकी औरतें उनके पीछे खड़ी थीं। एक औरत ने हिड़मे के माथे पर भेलवा के रस से से एक बिन्दु उकेरा और सुई की नोक चमड़ी के भीतर घुसाते ही “ सीई इ। अं बहुत दरद होता। “ वह दर्द से चिहुँकी और उसकी नजरें ऊपर उठ गयीं। उसके दर्द में मिश्री घुल उठी। सुई बार-बार चुभती रही। माथे पर एक नीला सूरज उभर आया;मगर दर्द? यह गोदनई का पहला चरण था। फिर नाक पर एक बिन्दु और ठोढ़ी पर तीन बिन्दियाँ उकेरी गयीं। अब एक साथ कई औरतें उसकी गोदनई कर रही थीं।फिर गोदनई नीचे उतरने लगी। उसे याद आया हिड़मा ने उससे कहा था- “ तू अपनी जाँघ सरइ रुख गुदवाना। मय चाहता तू हमेशा भरी-भरी रहे, मोटियारी रहे, एकदम सरइ के जइसे।’’ सोचकर मुस्करा उठी और’‘ सुन जाँघ म सरइ गोदना।‘‘

‘‘आहा ऽ! सरइ रूख! केतना दरद होयगा जानता भी है।’’ भाभी ने डराया।

‘‘होने दे दरद। मय सरईचच गोदवायेगी। “

“किया बात है! अभी दरद से उछल रही थी अउ अब एतना दरद सहने को तियार है। किसके लिए?’‘भाभी ने छेड़ा तो’‘चल हट।” कहकर ऊपर देखा। हिड़मा से नजरें मिलीं और…! पहली बार लाज ने उसे घेरा था। भाभी ने जाँघ पर सरई रुख उकेरा और सुई चुभोई, तो “ हाय यायो मैं मर ….! “उसे लगा जैसे बिच्छु ने डंक मार दिया हो। एक झनझनाहट उठी और ऊपर तक पैबस्त होती चली गयी।’ इतना दरद मेरे को नइ गोदवाना ये |’ सोचते हुए नजरें ऊपर उठीं।फिर तो उसका दर्द बिला गया। लगा जैसे हिड़मा ने अपनी आँखों से बिच्छु वाला मन्त्र पढ़ दिया हो। फिर तो सुइयाँ चुभती रहीं; मगर दर्द! वह तो जैसे उड़न छू हो गया था। हर चुभन के साथ वह देखती उसे और उसकी आँखें उसका सारा दर्द को चूस लेती।

बहुत दिन के बाद वह हाट आयी। हिड़मा ने देखा पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी वह। उसकी ठोढ़ी और नाक पर गुदा गोदना उसे और खूबसूरत बना रहा था। उसे देखते ही हिड़मा उसकी ओर लपका;मगर फिर ठिठक गया और वह? वह तो आगे बढ़ी ही नहीं। लजाई सी खड़ी रही। उसे शर्म आ रही थी और वह उसके इस नये रूप पर चकित था। तो क्या गुदनई ने इसे छुअन का रहस्य बता दिया है। हाँ। तभी तो …..।’ सोचता देर तक खड़ा रहा। फिर जब वह और पास गया, तो उसे लगा कि उसके चेहरे पर हया के साथ-साथ एक गहरी उदासी भी है।

‘‘क्या हुआ रे। “उसने मनुहार से पूछा।

‘‘कुछु हो। तेरे कू क्या?’’ हिड़मे ने उसे गुस्से और प्यार से झिड़का।

‘‘ऐसा कैसे बोली? मेरे कू क्या?‘‘ हिड़मा ने भी अधिकार जताया।

‘‘फेर का एतना दिन में एको बार नई आया देखने?’‘उसके स्वर में मान था।

‘‘नइ आया रे! क्या करता आके? तेरा मोल देने का हिमत नइ।’‘ वह उदास हो गया।

‘‘ये ऽ! अइसे अपना मन मत मार। मय किसी के साथ नइ जायेगी। तेरेच साथ आयेगी, समझा तू। मेरा बात सुन! अगला महीना जो मड़ई होयेगा,उसमें तू आना फिर अम दुनो भाग जाएगा।”

‘‘कहाँ रे? कहाँ जाएगा भागके? “

“उदर गुप्प (जंगल) में। उदर कोई नइ खोजगा। फिर जब सब ठीक हो जायेगा अम लौट आयेगा।’‘कहती हिड़मे की आँखें उससे मिलीं और उन आँखों में न जाने ऐसा क्या था कि उसने हाँ में गर्दन हिला दी।

मड़ई में वे मिले। खूब घूमे। रइचुली झूले और शाम को बीहड़ ओर बढ़ चले। उधर कोई नहीं जाता था। लोग कहते कि उधर डूब (बाघ) रहता है, मगर प्रेम भला कब डरा है। सो वे भीतर धॅसते चले गये। वह महुओं का मौसम था, सारा जंगल महुये की मादकता से भरा था और जिस जगह को उन्होंने चुना था, वह पाँच पेड़ों का झुरमुट था। नीचे धरती पर महुये ही महुये बिखरे थे। एक तो महुये की मादक सेज। उस पर हिड़मे का संग। सो मादकता एक सैलाब सा उठा और वे उसमें डूबने उतराने लगे। न जाने कब तक। न तो मादक लहरों का कोई ओर छोर था और न ही उनके प्रेम का।

बहुत दिनों बाद लौटे वे। पता चलने पर हिड़मे के यायो- बाबो आये थे उसे लेने; मगर उसने कह दिया कि उसने हिड़मा का संग धर लिया है। बहुत समझाया था बाबो ने,पर वह अडिग रही। फिर तो उनकी जोड़ी एक मिसाल बन गयी थी। वे लड़ते भी बहुत थे। हिड़मा के सल्फी पीने पर तो तूफान उठा देती वह; मगर हर लड़ाई के बाद उनका प्यार और गहरा जाता। हिड़मे बीते दिनों में तैर रही थी कि उसके पेट में एक उभार सा आया और उसने उसे वर्तमान में ला खड़ा किया। उसे दुःख हुआ’ मै बता भी नहीं पायी कि उसका पिल्ला …। मेरे को कहाँ मालूम था कि ऐसा कुछ हो जायेगा। मै उसको बताना नइ, छुआ के देखाना चाहती थी, तभी तो मेरे को इंतजार था ये दिन का, जब ये मेरे पेट भीतर डोले और मैं हिड़मा का हाथ उस पर धरवा दूँ। बिना कुछ बोले। पर मेरे को क्या मालूम था कि?’ सोचती हिड़मे की आँखें बरस उठीं। पेट में एक बार फिर उभार आया। सुबह से उसने कुछ खाया नहीं था। पेज की हंडी वैसी की वैसी पड़ी थी। मन तो अभी भी नहीं था; मगर उसने दोने में पेज डाला और पीने लगी।

महीनों हो चले; मगर भीसमा वापस नहीं आया। हिड़मे भी अपनी दिनचर्या में लौट आयी; मगर एक चीज थी, जो लौट नहीं पायी, वह थी उसकी मुस्कान। सबने मान लिया था कि अब भीसमा कभी नहीं लौटेगा; मगर वह जानती थी कि जरूर आयेगा और उसे उसका इन्तजार था। एक दिन वह सल्फी उतार कर लौट रही थी, तब उसने देखा सामने भीसमा खड़ा था। उसे देखते ही, उसके मन में आया कि वह टांगी उठाये और सारा हिसाब बराबर कर ले मगर …। ‘ हिसाब तो मैं बराबर जरूर करूँगी। फिर ऐसे नहीं।’       ‘‘भीसमा तू कहाँ गया था रे?” कहते हुए उसका मन अँधना (अदहन) जैसा खौल रहा था; मगर स्वर भात की तरह मुलायम था।

भीसमा उसे गौर से देख रहा था। जब लगा वह बिल्कुल सामान्य है तो -’ इसको कुछ भी पता नहीं चला।’ सोच कर वह मन ही मन खुश हुआ; मगर ऊपर से उदासी ओढ़ कर बोला -’‘ मय तो अइसा सोचा बी नइ सकता था; फेर वो साला भुर्रा। “- वह रोने लगा। फिर रोते-हुए वह हिचकियाँ लेने लगा।

‘‘चुप जा रे भीसमा। इसमें तेरा क्या गलती हय। मैं जानती तू बचाया होयेगा भाऊ को। “कहती हिड़मे की नजरे उसके चेहरे पर थीं। वहाँ दुःख की परछाई तक नहीं थी और आँखें? बिल्कुल सूखी। वह समझ रही थी यह सब उसका नाटक है।

“हाँ मय बचाया था,फेर साले ने भाऊ को …। तो मैंने भी साले को मुरकेट दिया’‘।

‘नाटक तो ऐसा कर रहा है, जैसे मैं कुछ जानती नहीं। ’उसने सोचा; मगर कुछ कहा नहीं।

भीसमा यही तो वह चाहता था कि हिड़मे भाई की मौत को एक दुरयोग मान ले। उसने उसकी आँखों में देखा, तो वह सामन्य लगी। फिर तो भीसमा उसका और ख्याल रखने लगा था। हर काम में उसके साथ रहता, उसने फिर कभी अपनी शादी या जोगिया की बात तक नहीं की। वह हिड़मे को विश्वास दिलाना चाहता था कि उसने उसके लिए जोगिया को भी भुला दिया है। हिड़मे सब जानती थी। सो जताती रही कि उसके साथ वह बहुत खुश है।और भीसमा?’अब तो ये मेरे को छोड़ के किसी और का हाथ नइ धरेगी। मै जल्दी पंचायत बुलाऊँगा। फिर तो ये झोपड़ी। सल्फी का रूख और हिड़मे सब मेरा हो जायेगा। फिर मैं जोगिया को भी ले आऊँगा। तब कौन छेंकेगा मेरे को। मैं मालिक होऊँगा घर का, सल्फी का अउ हिड़मे का भी। साली अभी भी कितनी मस्त लगती है?’ सोचते हुए उसकी आँखों में हिड़मे की देह नाच उठी।’ पहले इसको पटाना है। जोगिया तो मेरीच है। मेरे से कितना प्यार करती है वो।’सोचते हुये उसकी आँखों में जोगिया का चेहरा उभर आया।’सब सह लेगी मेरे खातिर। ये हिड़मे?तब इस साली की अकड़ निकालूँगा मैं। बस एक बार मेरे नीचे आ जाये फिर ..।‘ यही सब सोचते हुए सपने बुन रहा था वह।

हिड़मे सब समझ रही थी। उसे मालूम था कि वह जोगिया से मिलकर, उसके बाबो को उसका मोल देने की हामी भर आया हे। अब उसे भी फाँस रहा है; पर वह शांत थी। फिर तो वह उसके लिए और-और उतावला हो चला था। यह उतावलापन पहले तो उसकी आँखों में ही झलकता था। फिर तो उसके व्यवहार में भी उतर आया – ‘‘ हिड़मे अब नइ रहा जाता रे। आखिर तो तू मेरे साथ बैठेगा न, फेर अइसा काय को करती रे।‘‘- कहकर उससे लिपट जाता।

उस क्षण हिड़मे का मन करता उसे इंद्रावती में धकेल दे या उसके सिर पर कुछ दे मारे; मगर वह अपने को जब्त करती।’‘ पहिली पंचाइत कर। फेर हाथ पकड़।’‘ कहती और मीठी सी हँसी हँस कर दूर छिटक जाती।

पंचायत होने वाली थी। भीसमा बहुत खुश था। अब तो हिड़मे उसकी ….। वह सपने में डूबा हुआ था कि -’‘ ये भीसमा उठ न रे। चल जंगल चल। “ हिड़मे ने जगाया।

भीसमा भराभर नींद में था। उसने जैसे तैसे आँखे खोलीं और आँखें मिलते ही, उसकी नींद छू हो गयी। उसे लगा मानो लाँडा, सल्फी और महुआ की मटकी एक साथ ही लुढ़क पड़ी हो, मदमाती हिड़मे उसके सामने थी।’‘ जंगल काय को? यही आ न।’‘उसने, उसे अपनी ओर खींचा।

‘‘नइ! इहाँ नइ। चल न ऽ जंगल।” कहती हिड़मे की आँखों में मादकता का सेलाब लहरा रहा था। फिर तो इस कदर बेकाबू हुआ कि जंगल पहुँचते ही हिड़मे को जकड़ने लगा।’‘ न रे! अइसे नइ। एतना जलदी क्या है। आज तो पूरा दिन अम इदरीच रहेगा न। “ वह दूर हट गयी।

‘‘भाऊ को भी जंगल पसंद था न। पहिली बार तुम लोग इधरीच…?

‘‘वो सब मत याद कर। मय आज सब भुलाके तेरीच होना माँगता।”

‘अब तो ये पूरा का पूरा मेरा बस मे है।‘ वह उबले हुए महुये की तरह फूल गया।

‘इसको मालूम नहीं के तेज आगी म रस छन्न से सूखा जाता है। फेर वो महुआ कोई काम का नहीं रहता?’ हिड़मे के ओठों पर मुस्कान उभरी। देर तक वह उसे लुभाती, छकाती रही। फिर उसने अपने काँधे से बाँस की पोंगली उतारी। उसमें शराब थी। उसने दोने में शराब ढाली और भीसमा के ओठों से लगा दिया। एक, दो फिर न जाने कितने दोने पी गया वह। जब वह नशे से लस्त हो गया, तब वह उसके करीब बहुत करीब हो गयी। इतने करीब कि उसके ओंठ भीसमा के ओठों को छूने लगे। भीसमा कुछ देर तो भौचक खड़ा रहा, रस की हाँडी अचानक उसके ओठों से आ लगी थी, फिर उसने उस हाँडी में अपने ओंठ डुबोये ही थे कि -’‘ हाय यायो। मैं मर गया रे। “ हिड़मे की चींख जंगल में गूँज उठी और वह हड़बड़ा कर पीछे हट गया।

‘‘अच्छा तो ये हो रहा है? “जोगिया उसके सामने खड़ी थी। वह हैरान! जोगिया यहाँ! ‘‘साला तू मेरे को धोखा देता? “उसने अपने हाथ में पकड़ा हँसुआ उसकी ओर फेंकना चाहा। फिर’‘छी रे। तेरे को तो मारना बी बेकार है। “कहा और पच्च से थूका और लौट गयी।

उधर हिड़मे लगातार कराहे जा ररही थी। भीसमा के मन में आया कि हिड़मे का गला दबा दे, मगर मजबूरी थी। सो पूछा -‘‘ तू एतना जोर से चिल्लाई क्यों?

“ वो दरद हुआ न। बड़ा जोर का दरद था। अभी भी होता। देख न पेट में कुछ अड़ गिया है। “ कहा। फिर भीसमा को देखा, उसकी आँखों के सुर्ख डोरे राख हो चले थे। वह अब जोगिया के बारे में सोच रहा था। हिड़मे के ओठों पर तिर्यक मुस्कान उभर आई। अब भीसमा उसके साथ तो था; मगर उसके पास नहीं। उसके मन में जोगिया हलचल मचा रही थी। ‘ मुड़िया औरत सब सह लेती है फेर धोखा? अब वो मेरे को कभी माफ नहीं करेगी।’ उसकी आँखों में उदासी उतर आयी।

वे लौट आये। अगले दिन पंचायत थी। रात गहरा चली थी; मगर नींद? भीसमा की आँखों में जोगिया की आँखें ठहरी हुई थीं। कितनी घृणा थी उनमें।’अब मय उसको कभी नइ पा सकेगा।’ सोचते हुए उसने करवट बदली, तो हिड़मे की देह सामने थी।ग्रेनाइट सी देह।’ मैं जोगिया के खातिर सब किया,फेर ..।’ मन में हूक उठी। हिड़मे की आँखों में भी नींद कहाँ थी। वह आँखों की झिरी से देख रही उसे। उसकी तड़फ देख उसे सुकून मिल रहा था। बहुत इंतजार के बाद सुबह हुई। लोग जुरने लगे। फिर पंचायत शुरू हुई। वैसे यह पंचायत बहुत अहम नहीं थी। कोई फैसला तो लेना नहीं था। उनके फैसले पर मुहर ही लगानी थी। हिड़मे ने देखा भीसमा उदास था। उसकी चालाक आँखों में राख की परतें नजर आ रही थीं।

पंच ने भीसमा से पूछा -‘‘ भीसमा कोर्राम! तुम हिड़मे का संग धरोगे?” उसने हाथ जोड़कर जोहार किया।

“तो आज से झोपड़ी, सल्फी और हिड़मे, सब तुम्हारा होयगा। “उसने पंचों को फिर जोहार किया।

“हिड़मे तू भीसमा संग बैठना माँगती?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुप रही। पंच ने फिर पूछा;मगर वह खामोश ही रही। भीसमा ने उसकी ओर देखा और उसके चेहरे पर ठहरी चुप्पी देख अकुला गया।

“हिड़मे बोल न। वइसे तो पंचायत सब जानती है। फेर तेरा हाँ कहना जरूरी है न। “भीसमा उसके पास जा पहुँचा; मगर वह चुप रही।

‘‘बोल न हिड़मे चुप काहे है? ये फइसला तो हम दोनों है न? तू राजी है न? “कहकर भीसमा ने उसकी बाँह पकड़ी तो उसने उसे झटक दिया।

पंचायत चकित थी और भीसमा? “देख हिड़में अइसा ठठ्ठा मत कर। जल्दी से हाँ कह।? “वह रुंआसा आसा हो आया।। भरी पंचायत में ऐसी बेइज्जती! वह लोगों से नजरें नहीं मिला पा रहा था।

हिड़मे की स्वीकृति जरूरी थी। सो पंचायत ने फिर पूछा। अबकी हिड़मे ने अपना बांया हाथ लहराते हुए बस एक शब्द बोला- नई। फिर भीसमा की ओर ऐसे देखा कि वह तिलमिला ही उठा। उसका मन किया कि उसे..। तभी उसकी नजरें उठीं, सामने जोगिया थी। जोगिया ने उसे देख कर पच्च से थूक दिया। अब भीसमा की आँखों में वो मुर्गा लड़ाई कौंध उठी। वह छटपटा उठा। उसे लगा हिड़मे ने एक भोथरी ब्लेड से उसका गला रेत दिया है। पंचायत ने हिड़में का फैसला मान लिया। हिड़में ने सबको जोहार किया और चल पड़ी उस ओर जहाँ हिड़मा सो रहा था। “ मेरा जोड़ी! मेरा मैना! “कहकर उसने उसकी कब्र को पोटार लिया और गोहार पार कर रोने लगी! उसके बहते आँसू कह रहे थे – जोहार संगी। जय जोहार।

उर्मिला शुक्ल

हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही भाषाओं में रचना करनेवाली उर्मिला शुक्ल का जन्म 20 सितम्बर 1964 को रायपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। वर्तमान साहित्य के अंक में प्रकाशित बड़की अम्मा शीर्षक कहानी से अपनी कथा-यात्रा शुरू करने वाली उर्मिला शुक्ल के तीन कविता-संग्रह ’इक्कीसवीं सदी क द्वार पर’,’महभारत म दुरपति’ तथा ’छत्तीसगढ़ के अउरत’, एक कहानी-संग्रह’मैं फूलमती और हिजड़े’, एक उपन्यास ’बिन ड्योढ़ी का घर’ और एक यात्रा संस्मरण की पुस्तक’ यात्राएं उस धरा की जो धरोहर हैं हमारी’ प्रकाशित हैं।

संपर्क: 21, स्टील सिटी, अवंति विहार रायपुर – छत्तीसगढ़

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चित्रकार : प्रवेश सोनी

चित्रकला और साहित्य दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय प्रवेश सोनी का जन्म 12 अक्तूबर 1967 को हुआ।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रेखाचित्र, कवितायें और कहानियाँ प्रकाशित।पुस्तकों के आवरण के लिए पेंटिंग।

सम्पर्क- praveshsoni.soni@gmail.com

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साहित्य, विचार और संस्कृति की पत्रिका संवेद (ISSN 2231 3885)
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